मेरे दौर का परम श्रद्धेय

बचपन में किताबों से उतना ही डरता था, जितना आज तक न देखी चुडैल से और जितना आज के दिन बीवी से डरता हूं। पर मेरा दुर्भाग्य! किताबों के डर से तो बच गया पर बीवी के डर से शायद मरने के बाद भी तभी मुक्त हो पाऊं जो उसके साथ मेरा यह लास्ट रन हो। पर डर है कि उसका करवा चैथ बीच में व्यवधान न उत्पन्न कर दे।
बचपन में मुझे किताब तो किताब, किसी फटी किताब का गत्ता भी दिख जाता था तो मेरी सिट्टी -पिट्टी गुम हो जाती थी। पूरे बदन में कंपन होने लगता। पसीने पर पसीने आने लगते। मानो मुझे किताब का गत्ता देख कर ही बुखार हो गया हो। किताब छू ली तो मुनादी बुखार के पूरे चांस।
किताब देखते ही तब मुझे लगता था कि मेरे दिमाग को जैसे लकवा मार गया हो। देखते ही देखते दिमाग जाम हो जाता। ठीक वैसे ही जैसे महीना पहले शोरूम से निकाली कार का हंसता- गाता इंजन एकाएक पुलिसवाले को देख जाम हो जाता है।
सच कहूं तो इसी डर के चलते मैंने किताब के भीतर झांकने की हिम्मत आज तक नहीं की। भले ही औरों के भीतर ताक झांक करने में विद्यावाचस्पति होऊं।

मास्साब बाबूजी के खास दोस्त थे सो उन्होंने पूरी जिम्मेदारी से, जिम्मेदारी से भी अधिक पूरी ईमानदारी से मेरे हाथ में किताब थमाने की हद से अधिक हर तरह से वैसी ही कोशिश की जैसे अड़ियल चाचा सांड के नकेल डालने के लिए करते थे। पर मेरे हाथ भी ठहरे ठेठ देहाती, इन्होंने सबको शान से गच्चा दे सबकुछ उठाया पर किताब उठाने से एकबार इनकार कर दिया तो कर दिया। मानो भगवान ने मेरे मेरे हाथ किताब उठाने के सिवाय और सबकुछ उठाने को ही लगाए थे। वे मुस्तैदी से बापू की सदरी से सिक्के पूरे कांफिडेंस से उठा लेते। वे बापू की सदरी की अंदर की जेब से बीड़ी का पूरा बंडल पूरी हिम्मत से उठा लेते। क्या मजाल जो बाबूजी को पता चले कि उनका सपूत उनकी सदरी में रखे पूरे बीड़ी के बंडल पर हाथ साफ कर गया है।
आखिर मेरे दिमाग के आगे एक दिन मास्साब नतमस्तक हो ही गए। वैसे नतमस्तक होना तो उन्हें बहुत पहले चाहिए था। मुझे आज भी वह सीन मीना कुमारी सा याद है जब वे चारों खाने चित्त हो बाबूजी से क्षमादान मांगते मेरे आगे अपने दोनों हाथ जोड़ते संबोधित बाबू जी को करते बोले थे,‘ ठाकुर साहब! जिंदगी में एक से एक नालायक से वास्ता पड़ा। पत्थर पर भी लकीरें खींचने का हुनर था मेरे पास , पर अफसोस! इस महान आत्मा के दिमाग में एक लकरी तक न खींच सका। इसके आगे मैं लाचार हूं। इसकी विलक्षण बुद्धि के आगे मैं टूटी तलवार हूं। लगता है, यह इस जन्म का नहीं, जन्मों- जन्मों का कालिदास है। यह बिन पढ़े ही डाक्टरी पास है। कृपा कर अब अपने बेटे के हाथों में किताब थमाने के लिए मुझे और न कहें। कहीं ऐसा न हो कि इसके हाथों में किताब थमाते -थमाते मैं अपने हाथ में किताब लेना ही भूल जाऊं।’
‘तो इसका आगे होगा क्या मास्साब?’ हालांकि मैंने तब तक किसी किताब में जल्लाद की तस्वीर भी न देखी थी , देखता तो तब जो कभी किताब के गत्ते से आगे किताब के भीतर झांका होता। पर उस वक्त बाबूजी पहली बार पूरे जल्लाद लगे थे, असहाय से। रत्ती भर कम न रत्ती भर ज्यादा।
‘अब इसे राजनीति में डाल देना। खूब चांदी कूटेगा, वाही वाही लूटेगा, ’ मास्साब ने दोनों हाथ जोड़ने के बाद से उस दिन से हमारे घर तो आना – जाना बंद कर ही दिया था पर गांव के स्कूल से भी अपना तबादला करवा लिया था। उस गांव के स्कूल से जिसने उनकी पूरी की पूरी तनख्वाह बचवा कर रखी थी। उन्होंने गांव से जाते -जाते ये बात भी ध्यान न रखी कि वे जितने साल हमारे गांव में रहे , पानी के बदले मुफ्त के दूध से नहाते रहे। बदन में सरसों के तेल के बदले देसी घी लगाते रहे। उन्होंने टांगों के नीचे से अपने कान पकड़े कि बची मास्टरी में गधा भी मिले तो उसे भी सहर्श पढ़ाऊंगा, पढ़ा कर डीसी बनाऊंगा, पर मेरे जैसे को बच्चों की उपस्थिति रजिस्टर में मरने के बाद भी न चढ़ाऊंगा।
आगे बाबूजी ने पढ़ने को न कहा। पांच बहनों के बाद छठा जो हुआ था उनका सपूत। बिन पढ़े ही स्वस्थ रहूं तो खुदा ने विलायती दिया।
किताब से पीछा छूटा तो लगा मैं मोक्ष पा गया।
………..पर बाद में पता चला कि किताबों का जिंदगी में क्या महत्व है?
जब दस- बीस स्वयंभू बुद्धिजीवियों के बीच उठने- बैठने का सौभाग्य नसीब हुआ तो उनसे जाना कि आज के दौर में बंदे के पास बुद्धि भले न हो , पर औरों के सामने अपने को बुद्धिजीवी घोषित करने के लिए उसके घर में ढेरों ऐसे लेखकों की किताबों से ठसाठस भरी अलमारियां होना जरूरी हैं, जिनके बारे में लिखने वालों को भी पता न हो कि ये किताब उन्होंने ही लिखी है । उसे अपने नाम के आगे गधा होने के चलते डाॅक्टरेट लगाना बेहद लाजिमी है। घर में आए मेहमानों के थू्र बाहर अपने बुद्धिजीवी होने की अफवाह फैलवाने के लिए जरूरी है कि उसके सोने के कमरे में किताबें दम घुटती मिलें, एक दूसरे पर चढ़ी हुईं, एक दूसरे के आगे अड़ी हुईं , ठीक आज के बुद्धिजीवियों की तरह, एक दूसरे को सांस तक न लेने की कसम खाए। आज के सच्चे बुद्धिजीवी के पास किताबें हाथी के दिखाने के दांतों की तरह होती हैं। रही बात खाने के असली दांतों के बारे में जानने की सो, बुद्धिजीवी के खाने के दांत देखने के लिए मुंह में अपनी उंगली डाल किसीको अपनी उंगलियां दलवानी हैं क्या? वह तो बिन दांत भी कम नहीं होता।
आजका सच्चा बुद्धिजीवी वह है जो लोकलाज की परवाह किए बिना किताबों के बीच प्रेमिकाओं की तरह बीवी के होते हुए भी दिनरात घिरा रहे। किताबें चाहे कबाड़ी से लेकर ही घर में बीवी की तरह क्यों न रखी गई हों।

नए दौर के बुद्धिजीवी को किताबों के भीतर क्या है? इसकी जानकारी कतई जरूरी नहीं, उसके घर में किताबों की संख्या कितनी है , इसकी लेटेस्ट सटीक जानकारी उसकी छाती पर चिपकी होनी चाहिए। आदमी असल में तीक्ष्ण बुद्धि से बुद्धिजीवी उतना नहीं होता, जितना उसके घर में रखी किताब होने से होता है। यह किस मुए को पता कि आपने कितनी किताबें पढ़ीं? आज की तारीख में बुद्धिजीवी की बुद्धि के वजन का पता उसकी बद्धि से कम, उसके घर में धूल चाट रही किताबों से लचपचाती ,टूटती, बुढ़ापे में बुढ़ापे के भार से झुकी कमर की तरह किताबों से लदी षैल्फों से अधिक लगता है। घर में रखी किताबें किसी भी गधे के बुद्धिजीवी होने का आधा पुख्ता सबूत होती हैं। किसीके घर में रखी किताबों को देख बाहर वाला रत्ती भर भी समझदार हो तो मजे से गच्चा खा जाता है, षर्त इतनी है कि वह जुबान खुलवाने की लाख कोषिष करवाने के बाद भी अपनी जुबान न खोले। ऐसा होने पर मेरा दावा है कि कोई उसके बुद्धिजीवी होने पर सवाल उठाना तो दूर ,उंगली तक नहीं उठा सकता । गधे तक को आधा बुद्धिजीवी उसके घर में रखी किताबें बना देती हैं और आधा बुद्धिजीवी वह अपना मुंह बंद रख बना रह सकता है।
मित्रो! विशुद्ध बुद्धिजीवी वह नहीं होता जिसके पास बुद्धि होती है। बुद्धि वाले तो एक से एक अपने आसपास मंडराते मच्छरों की तरह अब बारहों महीने ही मिल जाएंगे पर किताबों वाला बुद्धिजीवी आपके शहर में शायद ही कोई मिले। जो मिले तो ज्यादा सोच विचार किए बिना उसे जी भर गले लगा लेना। ये जमाना बुद्धिजीवियों का नहीं, इन जैसे बुदबुदीजीवियों का है, विद्यालय से लेकर विद्यालय तक। पारंपरिक बुद्धिजीवी वैसे अब बचे भी कहां हैं।
सफल बुद्धिजीवी वह नहीं जो सारी उम्र बुद्धि विश्वविद्यालय को किताबों में उलझा नष्ट करने के बाद भी खुद को खुद ही बुद्धिजीवी घोषित कर पगलाया इतराता फिरता है। मेरे दौर का बुद्धिजीवी बुद्धि के सदुपयोग के अतिरिक्त और सबकुछ करता है। सफल बुद्धिजीवी वह जो बुद्धियाए कम गरियाए अधिक। यह दौर ज्ञान की धीमी- धीमी आंच पर पकने का दौर नहीं, तुतलाना शुरू करते ही अपनी- अपनी डार चुन जो मन में आए बकने का दौर है, औरों की जेब से चाय पी मुंह खुलते ही अपनी प्रशंसा में कसीदे पढ़ने का दौर है। आज सफल बुद्धिजीवी वह है जो कड़वी घूंट कर आठ- दस हजार की आलू-प्याज के लिए लिफाफा बनने को मजबूर किताबें कबाड़ी से खरीद , किताबों से उलझे बिना उनसे समझौता कर विशुद्ध बुदबुदीजीवी हो हर कहीं सम्मानित होता रहता है। असल में किताबों से समझौते में जो सुख है वह उनसे उलझने में कहां?

 
 - अशोक गौतम


जन्म- २४ जून ( हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की अर्की तहसील के म्याणा गांव में)।

शिक्षा- हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से साठोत्तर प्रमुख हिंदी नाटकों में अस्तित्ववादी-चेतना शोध विशय पर पीएच.डी।

प्रकाशित व्यंग्य संग्रह- लट्ठमेव जयते, गधे ने जब मुंह खोला, ये जो पायजामे में हूं मैं, झूठ के होल सेलर।
लेखन- ब्लिट्ज, दैनिक ट्रिब्यून, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राज एक्सप्रेस, पंजाब केसरी, दिव्य हिमाचल, सरिता, सरस सलिल, कादंबिनी, मुक्ता, वागर्थ ,कथाबिंब, हिमप्रस्थ, सत्य स्वदेष , इतवारी अखबार , नूतन सवेरा, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान व वेब पत्रिकाओं- प्रवक्ता डॉट कॉम, जनकृति, सृजनगाथा, हिंद युग्म, रचनाकार, हिंदी चेतना , साहित्यकुंज आदि में रचनाएं प्रकाशित ।

संप्रति- हिमाचल प्रदेश के उच्चतर शिक्षा विभाग में एसोशिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।


संपर्क- गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन, हि.प्र.

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