मुझे ‘बाज़ार‘ ने ज़िन्दा रखा: सागर सरहदी

मुझे ‘बाज़ार‘ ने ज़िन्दा रखा: सागर सरहदी
प्रस्तुति- मनोज कृष्ण

एक बार सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि उनकी हिन्दी उतनी अच्छी नहीं थी, लेकिन सौभाग्य से उन्हें सागर सरहदी और सलीम-जावेद जैसे अच्छे राइटर मिले। हिन्दी फिल्म जगत में सागर सरहदी सिर्फ नाम ही नहीं अपने आपमें एक संस्था हैं। रोमांटिक डायलाॅग लिखने में उनका जवाब नहीं। इससे जुड़ा एक मजेदार किस्सा मशहूर निर्माता यश चोपड़ा से जुड़ा है। फिल्म चांदनी के निर्माण के दौरान उन्होंने किसी वज़ह से दूसरे राइटर को हायर कर लिया। फिल्म फ्लोर पर चली गई। मगर आउटडोर में जाकर कई दिन बाद जब एक भी शेड्यूल नहीं शूट हो सकी। वज़ह साफ थी यश चोपड़ा को जिस तरह के रोमांटिक डायलाॅग चाहिए थे। वो राइटर नहीं लिख पा रहा था। आखिर में यश चोपड़ा ने सागर सरहदी को इस संदेश के साथ बुलवा भेजा कि अगर वो ये फिल्म नहीं लिखते तो हम फिल्म नहीं बनाएंगे। इसके बाद की बात इतिहास है। चांदनी अपने समय की बेहतरीन फिल्म साबित हुई।
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चाहें तो इस अंश को इनपुट बाॅक्स बना सकते हैं….
फिल्म कभी-कभी से सफलता की उंचाइयां छूने वाले सागर सरहदी ने सिलसिला, चांदनी, फासले, रंग, अनुभव, नूरी, दूसरा आदमी, कर्मयोगी, इनकार, कहो न प्यार है, दीवाना जैसी कई बेहतरीन फिल्में लिखीं। 1982 में बनी फिल्म बाज़ार के वह निर्माता-निर्देशक और राइटर रहे। यह फिल्म इंडियन क्लासिक मानी जाती है।
बेहतरीन राइटर, लाजबाव डायरेक्टर-प्रोड्यूसर, संज़ीदा कथाकार-नाटककार सागर सरहदी का जन्म 11 मई 1933 को वर्तमान पाकिस्तान के एबटाबाद में हुआ। बचपन में गंगा सागर तलवार के नाम से जाने जाने वाले सागर सरहदी की ज़िन्दगी का सफर विभाजन का दंश और जीवन की तमाम पथरीली राहों पर शुरू होता है।

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पिछले दिनों मैं सागर साहब से मिलने उनके आॅफिस गया। मुलाकात के दौरान उन्होंने अपने जीवन-संघर्ष से जुड़ी तमाम बातों को शेयर किया। प्रस्तुत है उनसे की गई बातचीत के सम्पादित अंश -
सागर साहब अपने बचपन के बारे में कुछ बताइए?
- पाकिस्तान के एप्टाबाद में मेरा जन्म हुआ। वहां पर मैंने आठवीं तक की शिक्षा हासिल की। उस दौरान पहली बार मैंने नज़ीर और स्वर्णलता स्टारर लैला मजनू फिल्म देखी। ये फिल्म मुझे इतनी अच्छी लगी कि मैंने फिल्म दोबारा देखी। जब ये बात घरवालों को पता चली तो मेरी पिटाई भी हुई। बहरहाल, हम लोग गांव के ठीक-ठाक खाते-पीते परिवार से थे। सबकुछ ठीक-ठाक था। अचानक कुछ लोगों ने रातों रात सरहदें बांट दीं। उन्होंने हमारा गांव, घर, दरिया, पहाड़ सब छीन लिया। मेरा दरिया सर मुझसे छीन लिया गया जो मुझे आज भी गंगा की तरह पवित्र लगता है। मुझे अपने दरिया सर बहुत याद आती है। वहां की मिट्टी, पत्थर, बाग-बगीचे सबके लिए मैं बहुत रोता हूं। मैं वहां जाना चाहता हूं कम से कम मरने से पहले एक बार जरूर जाना चाहता हूं, मगर मेरी परवाह किसे है?
सियासतदानों ने हमें दरबदर कर दिया। उन्हें इंसानों को बांटने का हक़ किसने दिया? जैसे किसी पेड़ को उठाके दूसरी जगह लगा देने से धीरे-धीरे सारी पत्तियां, फिर टहनियां और आखिर में पूरा दरख़्त सूख जाता है। वही हाल विभाजन के शिकार लोगों का भी हुआ, मगर हम उन खुशकिस्मत लोगों में रहे कि हमने अपने भीतर नई कोपलें पैदा की। और तमाम दुख-दर्द झेलने के बावजूद, अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे।
विभाजन के बाद दिल्ली से मुंबई कैसे आना हुआ?
- मेरे पिता जी गांव में ठेकेदार हुआ करते थे। दिल्ली आने पर हमारे पास कुछ पैसे थे। हम किंग्सवे कैंप में रहते थे। इसके बाद मोरी गेट में घर लिया। मेरे बड़े भाई कमाई के सिलसिले में मुंबई आ चुके थे। बाद में मैं भी बीए करने के लिए यहीं आ गया। पढ़ाई के दौरान ही मेरा झुकावा माक्र्सिज़्म की ओर हुआ। मैं प्रोग्रेसिव राइटर एशोसिएशन और इप्टा से जुड़ गया। यहां से मुझे एक नई आइडेंटिटी मिली।
सागर साहब आप अपनी भाषा यानीकि उर्दू के बेहतरीन प्ले और शार्ट स्टोरी राइटर माने जाते थे। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी जो गंभीर लेखन छोड़के फिल्मों की ओर रुझान हुआ?
- देखिए फिल्मों में दिलचस्पी तो शुरू से ही थी। मगर मैं बनना लिटरेरी राइटर ही चाहता था। मैं प्ले और शाॅर्ट स्टोरी लिखता था। ‘भगत सिंह की वापसी‘ मेरा चर्चित प्ले है, विभाजन के दर्द को समेटे हुए मैंने ‘राखा‘ नामक एक कहानी लिखी थी जिस पर बाद में नूरी फिल्म बनी। बहरहाल, जब पत्र-पत्रिकाओं में छपते हुए मेरे पास कई कहानियों का संग्रह हो गया तो मैं इसे छपवाने को लेकर एक प्रकाशक से मिला। उस जमाने में प्रकाशक ने मुझसे मेरी किताब छापने के बदले 23000 रुपये मांगे। मैंने कहा कि अगर ये रुपये मैं दे भी दूं तो वापस कैसे आएंगे? प्रकाशक ने कहा कि वापसी नहीं होगी। मैं पहली बार इस हक़ीकत से रू-ब-रू हुआ कि एक राइटर होने के बावजूद मैं रोटी नहीं कमा सकता था। इसीलिए मैंने फिल्मों की ओर रुख किया।
आपने लेखन की प्रेरणा कहां से पाई?
- मेरा मानना है कि लेखन एक ऐसा कीड़ा है जो सबके अंदर नहीं होता। लेखक को थोड़ा सा आम लोगों से अलग होना चाहिए। मैंने कभी शादी नहीं की। इसका मतलब ये हुआ कि दस लड़कियों को मैंने प्रेम किया। दस ने मुझे प्रेम किया और छोड़ा। मेरा मानना है प्रेम-लगन, मिलने-बिछुड़ने का जो दर्द है यही, एक लेखक के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है। शायद इसीलिए मैं अपने समय का बड़ा रोमांटिक स्क्रीन राइटर बन सका। मैंने एग्ने ओ-निल/म्नहदम व्ष् छपसस और वुडी एनल को पढ़ा है। इनकी फिलाॅसफी मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है। इनका कहना है, दुनिया में सिर्फ ग़म है। इसी ग़म को टालने के लिए आप कुछ अच्छे काम करते हैं। कोई नाटक, लिखता है, कला बनाता है, कहानी लिखता है, गाता है, बजाता है, राजनीति, व्यवसाय या एक्टिंग करता है, मैं फिल्में लिखता-बुनता हूं।
आप काॅमर्शियल सिनेमा के बेहतरीन राइटर थे फिर अचानक इससे मोह कैसे भंग हो गया?
- ये सिलसिला तो ‘कभी-कभी‘ के दौरान ही शुरू हो गया था। उस जमाने में शशि कपूर साहब जिस फिल्म में होते थे शूटिंग खत्म होने के बाद पूरी यूनिट को पार्टी देते थे। कश्मीर में शूटिंग चल रही थी। हम लोग दो शिकारे में बैठके होटल से दूर एक आलीशान सी जगह पर गए। वहां पर बेहतरीन खाना, गीत-संगीत का प्रोग्राम था। हमारे बीच कई खूबसूरत कश्मीरी लड़कियां नाच-गा रही थीं। महंगी शराब परोसी जा रही थी। इसी बीच मुझे अचानक ये ख्याल आया कि एक गरीब रिफ्यूजी लड़का जो खुद को तरक्की पसंद राइटर और माक्र्सिस्ट कहता है। यहां क्या कर रहा है? मैं रोते हुए वहां से भागा और पार्टी बीच में छोड़के रात को ही बोट से होटल लौट आया। उसी दिन मैंने डिसाइड कर लिया कि मुझे कामर्शियल फिल्में नहीं करनी है और अपने तरह का सिनेमा बनाना है। मगर ये सब अचानक छोड़ना इतना आसान नहीं था। मैंने दोनो मोर्चे पर काम करना शुरू किया और पूरे पांच-छह साल के बाद अपना सिनेमा बाज़ार लेकर आ सका। फिल्म जगत ने मुझे रिजेक्ट नहीं किया, उल्टे मैंने कामर्शियल सिनेमा को रिजेक्ट किया। जिस समय मैंने काॅमर्शियल फिल्में नहीं लिखने का फैसला किया उस समय मेरे पास दो दर्जन फिल्मों के आॅफर थे।

‘बाज़ार‘ इंडियन क्लासिक मानी जाती है। इसके निर्माण से जुड़ी कुछ बातें बताइए?
- जब मैंने बाज़ार बनाने का फैसला किया तो मेरी जेब में सिर्फ पांच सौ रुपये थे। अंडर प्रोडक्शन मैंने किसी को पैसे नहीं दिए। स्क्रिप्ट इप्टा के दोस्तों को सुनाई तो वो बोले कि फिल्म बनेगी तो मेरा फ्लैट जरूर बिक जाएगा। मैं नहीं माना फिल्म बना डाली। खरीददार नहीं आ रहे थे। एक साहब को फिल्म दिखाया तो उनका कमेंट था कि इसमें कुछ भी नहीं है लिहाज़ा, अब किसी और को मत दिखाना। लेकिन आज ये सब एक मिथ है। अगर मैं कभी-कभी या फिर कामर्शियल फिल्में ही लिखता रहता तो कब का मर गया होता। मुझे ‘बाज़ार‘ और माक्र्सिज्म आइडोलाॅजी ने ज़िन्दा रखा।
आपके पसंदीदा फिल्मकार कौन-कौन से हैं?
- विमल राय, मबबूब साहब और कुछ हद तक राज कपूर। बाज़ार फिल्म मैंने श्याम बेनेगल, सईद मिर्ज़ा, गोविन्द निहलानी से प्रभावित होकर बनाई। इन फिल्मकारों ने समानांतर सिनेमा का दौर शुरू किया। ये स्टार सिस्टम के खिलाफ थे ये बात मुझे प्रभावित करती थी। मेरा मानना है कि फिल्म के सब्जेक्ट के लिए स्टार सिस्टम बड़ा ही हार्मफुल होता है। अगर आपकी फिल्मों में स्टार है तो आपको खामखाह उसे जस्टीफाई करना पड़ता है। ऐसे में सब्जेक्ट कमज़ोर पड़ जाता है।
समानांतर सिनेमा का दौर खत्म होने की वज़ह क्या रही?
- स्टार सिस्टम के खिलाफ समानांतर सिनेमा का दौर शुरू हुआ। इसकी शुरुआत पश्चिम में हो चुकी थी। वहां से बाॅलीवुड में आई। इसके समाप्त होने की वज़ह उस समय मृणाल सेन या फिर बासु चटर्जी जैसे जो भी निर्देशक समानांतर सिनेमा में आए वो आउट स्टैंडिंग डायरेक्टर नहीं थे। ये एक ही जैसा सब्जेक्ट बार-बार ला रहे थे जिससे आॅडिएंस का मोह भंग हो गया। हालांकि, समानांतर सिनेमा की शुरुआत अच्छी रही मगर बाद में इसमें सफल होने के बाद वही डायरेक्टर फिर से व्यवसायिक सिनेमा और स्टार सिस्टम की ओर भागने लगे। एक तरह से उन्होंने समानांतर सिनेमा को व्यावसायिक सिनेमा की ओर जाने वाली सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया। जिसकी वज़ह से आॅडिएंस ने इसे रिजेक्ट कर दिया। मगर इस दौर का सिनेमा पर व्यापक प्रभाव रहा। स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी, दीप्तिनवल, मिथुन चक्रवर्ती, अमोल पालेकर, ओमपुरी, नसीरुद्दीन जैसे लाजबाब आर्टिस्ट समानांतर सिनेमा की ही देन हैं।
सिनेमा आज और कल, बदलावों को आप किस रूप में देखते हैं?
- पहले सिनेमा पैशन विद प्रोफेशन था। अब सिर्फ बिजनेस बन गया है। पैशन गायब है। मैं विमल राय के सेट पर गया था। दिलीप और नरगिस का एक सीन चल रहा था। विमल दा ने बिना देखे ही कट बोल दिया। दिलीप साहब ने रिक्वेस्ट किया- दादा एक शाॅट और ले लेते। विमल दा अपनी सीट से उठे और बोले- ‘दिलीप मैं बाहर जाता हूं, तुम रिटेक करके ओके कर लो।‘ ऐसा प्रोफेशनलिज्म और आपस में भरोसा अब कहां है? आज फिल्मों से सब्जेक्ट गायब हैं। हीरो खुद को ख़ुदा समझने लगा है। वल्गरिटी हाबी है। सच्चाई का रास्ता छोड़के नशे और उत्तेजना पर खुद को फोकस कर रहे हैं। हमारी परंपराएं, गीत-संगीत सिनेमा से दूर होते जा रहे हैं। पहले हीरो चार-पांच को मारता था अब पचास सौ को मारता है। बीच में तो एक दौर ऐसा भी आया कि काॅस्टिंग भी दुबई से होने लगी थी। अंडरवल्र्ड को पाॅलिटीशियन ने क्रिएट किया। हमने ग्लैमराइज्ड किया। निर्माताओं ने इनके नाम पर मुनाफा कमाया। इन सबके बीच हमारा वो खूबसूरत सिनेमा कहीं खो गया जिसकी दुनिया में एक अलग पहचान थी। हम नाउम्मीद नहीं हैं। उम्मीद है कि जल्दी ही ये बादल भी छटेंगे और अच्छे सिनेमा का दौर फिर से शुरू होगा।

 

- मनोज कृष्ण

 

मनोज कृष्णा जी मीडिया और मनोरंजन के विभिन्न क्षेत्र में दस साल से अधिक का अनुभव रखते हैं | वे टीवी शो, सीरियल और फिल्म के लिए मुंबई के स्वत्रंत स्क्रिप्ट लेखन में सक्रिय हैं |

वर्तमान में वे सॉफ्ट ड्रीम फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड में लेखक हैं |

 मुंबई में: मनोज ने २०१० से २०१२ के बीच में काफी सारे कार्यक्रम में सफल योगदान दिए हैं | उनमें से कुछ चुनिन्दा नाम हैं ; क्राइम पेट्रोल, अखियों के झरोखों से, रुक जाना नहीं, हम हैं बजरंगी, लापता गंज, डिटेक्टिव देव, आदि |

2007 के बाद से अप्रैल २०१०: प्रज्ञा टीवी (फिल्म सिटी नोएडा) के साथ सह निर्माता और वरिष्ठ पटकथा लेखक | प्रोमो लेखन में विशेषज्ञता, जिंगल्स / संवाद स्क्रीन प्ले, वृत्तचित्र, विसुअलिज़िंग, विचारों और गल्प स्क्रिप्टिंग का विकास.
वृत्तचित्र कार्यक्रमों आधारित: भारत के तीर्थ, उत्सव, गुरुकुल, यात्राक |

 २००१ से २००७ : इस दौरान मनोज की प्रिंट मीडिया के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका रही; लोकायत, सीनियर इंडिया, महामेधा, न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया, माया, यूनाइटेड भारत, जनमुख, आदि |

 व्यावसायिक योग्यता: M.J.M.C. महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) से

शैक्षणिक योग्यता: एम.ए. (हिन्दी), C.S.J.M. विश्वविद्यालय. कानपुर

 

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