‘’मुक्तिपर्व ‘’ उपन्यास में सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक, राजनैतिक विषमता

मोहनदास नैमिशराय द्वारा रचित उपन्यास मुक्तिपर्व में सामजिक, आर्थिक, धार्मिक , शैक्षिक,राजनैतिक  विषमता का शिकार दलित समाज दिखाई देता है | उपन्यास में ढेढ़ चमार जाति के एक दलित परिवार के माध्यम से उक्त समस्याओं को मुखरित किया गया है | यहाँ उपेक्षा, दरिद्रता, आर्थिक विपन्नावस्था, घृणा, गुलामी से गुजरता हुआ परिवार है | साथ ही आर्य समाज एवं डॉ.बाबा साहेब आंबेडकर जी के विचारों से प्रभावित उपन्यासकार द्वारा  ‘शिक्षा से ही सामाजिक विषमता से बाहर निकला जा सकता है ‘ का स्वर उपन्यास में उभरता हुआ नजर आता है |

उपन्यास की कथावस्तु स्वाधीनता आन्दोलन के अंतिम पड़ाव एवं स्वाधीनता के उपरान्त के परिवेश में सूक्ष्म रूप से एवं वास्तव के धरातल पर बुनी गई है | उपन्यास में हमे समाज सीधे-सीधे दो भागों में बंटा हुआ नजर आता है | समाज का एक हिस्सा सारी सुख सुविधाओं से लेस है, तो दूसरी ओर भूख, गरिबी,दरिद्रता, मज़बूरी, विवशता, लाचारी के दुःख और निराशा रूपी सागर में डूबा हुआ दलित समाज नजर आता है | सुख-सुविधाओं से सम्पन्न समाज जमीदारों, नवाब, काश्तकारों का है तो ,दूसरा वर्ग ढेढ़ चमार , डोम, भंगी आदि दलितों का है | एक ओर मंदिर-मस्जिद,बाजार, बाग़-बगीचे, पनघट, स्कूल, ऊँची-पक्की इमारते-घर है | वहीँ दलितों की बस्तियों में कुडाघर, श्मशान,हगनघाट , कलालों की छोटी-छोटी  दुकानें तथा नीम के पेड़ के नीचे बने कच्चे मकान | ऐसी ही सामाजिक विषमता को अभिव्यक्त करते हुए उपन्यास कार कहते है,’’ एक ओर हरा-भरा परिवेश, दूसरी तरफ उदास खंडरनुमा इमारते |’’ १

‘’उधर बाग़-बगीचे थे तो इधर जंगल | उधर बाजार थे, पनघट थे, मंदिर थे, इधर श्मशान, कूड़ाघर, कलालों की दुकाने | दोनों तरफ के अपने-अपने संस्कार थे | और अपनी-अपनी संस्कृति | जब वे एक दूसरे से टकराते तो मारकाट होती | सवर्ण लाठियाँ बल्लम चलाते हुए गालियाँ देते, थूकते, खुले आम पेशाब करते और अपनी उद्दण्ड संस्कृति का परिचय देते | फिर भी वे शहर भर में सभ्य कहलाते |’’२

विषमता  सामाजिक, आर्थिक,धार्मिक,शैक्षिक आदि के बहु परिप्रेक्ष में अपनी गहरी जड़े जमा बैठी थी | उपन्यास में एक और ऐसा समाज है, जो घोर दरिद्रता से जूझता हुआ दिखाई देता है |  साथ ही गुलामी,मजदूरी कमरतोड़ मेहनत करने के बाद इनके कच्चे घरों में दो जून की रोटी नसीब होती है | वहीं हवेली,महलों में नवाब,जमीदार,काश्तकार विलासितापूर्ण जीवन जीते हुए दृष्टिगोचर होते है , ‘’ मालिक लोग मजे से पहलवानी करते, मुर्गो की लड़ाई का मजा लेते, रात में रंडियों के कोठों पर जाते , जहाँ वे गीत-संगीत की महफिलों में देर रात तक जमें होते | नाचनेवालियों के नाज-ओ-नखरे उठाते, उनकी एक-एक अदा पर  सैकड़ों हजारों रूपये लुटा देते |…. रंडियों के कोठे पर उन्हें साकी के हाथ से शराब पीने में जरा भी एतराज नहीं होता | …हाकिमों के लिए गद्दियाँ छोड़ दी जाती एक कनीज के हाथ में पान के बीडे दूसरे के हाथ में पीकदान …|’’ ३

दलितों के घरों में पेट भर भोजन कभी-कभार ही मिलता है | इनके घरों में न जमीदारों –नवाबों की भांति नौकर-चाकर है और नाही रात में रौशनी | इनके कच्चे घरों में चूहे-बिल्लियों की लूका छिपीं नजर आती है | उपन्यासकार ने दलित समाज के वास्तविक चित्र को हुबहू साकार करने का प्रयास किया है | वे एक स्थान पर कहते है, ‘’ बस्ती में पक्के मकान कम थे और कच्चे अधिक | पर सभी घर लिपे-पुते थे |’’ ४

‘’ बस्ती में अधिकाँश घरों में जूते-चप्पल का व्यवसाय होता था | शेष मजदूरी करते थे, नवाबों की हवेलियों पर या जमीदार के खेतों में | उनमें कोई कलक्टर था न पटवारी |’’ ५

‘’घर-घर में चूहे थे | बिल्ली चूहों पर झपटती, और उन्हें दाँतों में दबाकर फुर्ती से ले जाती | बस्ती वालों को एक चूहा कम होने का जरा भी अफसोस नही होता बल्कि अच्छा ही लगता था | वे बिल्ली को कभी-कभी चूहा पकड़ने के लिए शह भी दे देते थे | … वह ट्रंक के नीचे, घड़े के पीछे, आटा पीसने की चक्की के पास या हँडिया के सामने सतर्क होकर बैठती |..घर में बर्तन-भांडे उसके जाने-पहचाने थे | ‘’ ६

ढेढ़ चमार, डोम, भंगी आदि दलित जातियों का सवर्ण समझी जानेवाली ऊँची जातियो द्वारा मानसिक, शारीरिक, आर्थिक, धार्मिक आदि सभी क्षेत्रों में शोषण किया जाता था | उनके साथ जानवरों से भी बत्तर सलूक किया जाता था | मानो वे इन्सान नही, वे कोई पत्थर हो | एक मानव होकर दूसरे मानव के साथ इस प्रकार का नीच बर्ताव हमारे समाज के लिए कतई शोभनीय नहीं है | अपितु संवेदनशील प्रत्येक व्यक्ति उसकी निंदा ही करेगा | नवाब अली वर्दी खां द्वारा  बन्सी की हथेली पर थूकना,सहृदय व्यक्ति में  आँसू और घृणा को बरबस उपस्थित करता है ,

’’ बंसी ने उनकी तरफ हथेली की | नवाब साहब ने उस पर अन्दर का बलगम थूक दिया | ढेर सारी खकारी बंसी की हथेली पर उगल दी गई थी | नवाब साहब के लिए वही उगालदान था और वही पीकदान बंसी की आखों में आँसू भर आये थे, पर मुँह से उफ तक न की थी उसने | वैसे ही हथेली पर बलगम लिए वह बैठक खाने के बाहर आ गया था | उसके भीतर अंधड़-तूफान था | बाहर से वह बिलकुल सहज |’’७

दलितों के लिए उनका स्तर इतना निचला था कि उन्हें अपना नाम भी सवर्णों की भांति रखने की अनुमति नही थी | ताकि दलित उनके पहरावे के साथ नाम से ही पहचाना जा सके | उपन्यास में पंडित केशव प्रसाद बंसी के लड़के का नाम ‘बुद्धू’ रखा था ,

’’ फिर उन्होंने जन्मपत्री निकाली और नाम सुझाया था , बुद्धू …|’’८  बस्ती में दलितों के नाम कुछ इस प्रकार से ही रखे गए थे | उस पंडित का उपहास उड़ाते हुए बस्ती की लुगाइया कहती है ,

‘’ पंडित जी ,क्या नाम रखा ?…

कालू, चेतू, भाना, बुद्धू, रगडू-झगडू, दगडू या फिर भगडू …

बतलाओं न पंडित जी, दलितों की जनम पत्तरी में कुछ और नाम बताओ …

नाटू, मंगलू, सीरिया …घुरिया, कुडिया, रमिया क्या यही नाम हमारे हिस्से रहे है |’’ ९

किन्तु बंसी विद्रोह करते हुए अपने बच्चे का नाम  ‘’सुनीत’’ रखता है | और यह ऐलान भी करता है कि अब के बाद इस बस्ती में पंडित की जरूरत नही पड़ेगी | बात सिर्फ नाम तक सीमित होती तो ठीक थी | पर पग-पग पर उन्हें दलित होने का अपमान सहना पड़ रहा था | दलितों के लिए रामलाल के कारण बस्ती में स्कूल तो खुलता है ‘’नूतन प्राइमरी स्कूल ‘’ नाम से ..,पर यहाँ कोई भी अध्यापक पढ़ाने के लिए तैयार नहीं होता | क्योंकि वे सभी अध्यापक  सवर्ण जाति के थे | उपन्यास में उधृत यह वाक्य देखें ,

‘’ कोई अध्यापक बस्ती में पढ़ाने के लिए तैयार नही होता | वे सभी अध्यापक सवर्ण थे |’’ १०

उपन्यासकार ऐसे समय उनकी मानवता, धर्म के सम्बन्ध में प्रश्न चिह्न उपस्थित करते हुए उनका मखौल उड़ाते हुए कहते है ,‘’ जो सरस्वती वंदना करते थे | माथे पर तिलक लगाते थे, जनेऊ पहनते थे , चोटी रखते थे, गाय को माता कहते थे, सर्प को दूध पिलाते थे, कुत्तों को अपनी गोद में बिठाते थे, पर दलितों से वे घृणा करते थे | आखिर उनके मानवता का दर्शन क्या था, कुछ समझ में नही आता था | वे ढोंगी थे, पाखण्ड की केचुली पहन समाज में अपना  धार्मिक कारोबार चलाते थे |’’११

सुनीत नूतन प्राइमरी स्कूल में ५०० में ४५० अंक लेकर पास हुआ था | चमार टोला की बस्ती के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था | जब वह इसी स्कूल में पढ़ाई कर रहा था तब उसने पाठ्यक्रम के एक किताब में चित्र देखा था | जिसमें एक ब्राह्मण प्याऊ पर लोटे से पानी पीला रहा है | जब की दलितों को चमड़े से बनी नलकी से पानी पिलाया जाता था | वास्तव में कुछ और तथा पाठ्यक्रम में कुछ और देख कर सुनीत के भीतर जिज्ञासा और विद्रोह के स्वर जागते है | जब सुनीत,मास्टर चौबे तथा बस्ती के लोग प्याऊ पर जाते है और पंडित जी से सागर से पानी पिलाने की बात करते है | इस पर पंडित कहता है ,

‘’पर तुम तो …|

पंडित जी के ओंठो तक आते-आते शब्द जैसे ठहर गए थे | जिन्हें स्वयं सुनीत ने पूरा किया था |

‘’हाँ-हाँ पंडित जी, हम ढेढ़ चमार है |’’ १२

सुनीत को ढेढ़ चमार होने के कारण उपेक्षा, अपमान,घृणा को सहना पड़ा था | पर वह हार नही मानता बल्कि उल्टा उसमें व्यवस्था के विरोध में आक्रोश प्रकट होता है | स्कूल में उससे कोई बात नही करना चाहता है | उसे दलित होने का खामयाजा भूगतना पड़ता है | वह कक्षा में खूब मन लगा कर पढाई करता है पर हर बार वह स्कूल में दूसरे नंबर पर ही आता है | आखिर उसके साथ ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि  सवर्ण कभी भी यह नही चाहते थे कि उनके स्कूल से कोई दलित प्रथम आये | इसीलिए चार-पांच सवर्ण अध्यापक मिलकर राकेश कुमार तथा नगरपालिका कार्यालय अधीक्षक का बेटा अजय शर्मा को स्कूल में प्रथम लाया जाता है | वास्तव में वे कतई यह नही चाहते थे कि दलित पढ़े लिखे | यदि वे पढ़ लिख गए, तो उनकी गुलामी के षड्यंत्र को पहचान लेगें | उनका समाज सुधर जाएगा | तो झाड़ू-पोछा आदि गुलामिवाला काम कौन करेगा ?

दलितों के भगवान और सवर्णों के भगवान अलग-अलग थे | या यूँ कहे की उनके कोई भगवान ही नहीं थे | दलितों को सवर्णों के मंदिर में प्रवेश निषिद्ध था | इसीलिए उपन्यास में बंसी दुखी और निराशा के स्वर में कहता है ,

‘’ क्या हमारे हिस्से में देवी-देवता नही है , हमारे कौनसे देवी-देवता है | हम किनकी पूजा करें, न मंदिरों में उनके लिए प्रवेश है और न मस्जिदों में | क्या वे इन्सान नहीं | उन्होंने आखिर कौन सी गलती की है, उन्हें मंदिरों में प्रवेश की इजाजत क्यों नही है | जब कभी भी उसे वक्त मिलता वह इसी तरह की बातें सोचता | उन पर मनन करता |’’१३

सुनीत जब बनिया पाड़ा की बस्ती के जूनियर हाईस्कूल से गंगाराम हाईस्कूल में एडमिशन लेता है | तब वह स्कूल के आहाते में बने शिव मंदिर में हबीबुल्ला के कहने पर जाता है | वहाँ कक्षा अध्यापक शिवानन्द शर्मा पुजारी का काम भी करते है | उनके अनुपस्थिति में सहायक पुजारी उन्हें सवर्ण समझकर मंदिर में प्रवेश देता है | पर जैसे ही शिवानन्द शर्मा मंदिर में इन्ह दोनों को देखते है , तब वे आग बबूला हो जाते है | दोनों को वे बुरी तरह फटकारते हुए कहते है ,

‘’ एक माँस काटने वाला और दूसरा माँस खीचने वाला | हे भगवान, हे भगवान, सत्यानास हो तुम्हारा | हमारा तो मंदिर ही भ्रष्ट कर दिया |’’ १४

तब सुनीत के मन में प्रश्न उत्पन्न होता है कि मंदिर, भगवान किस लिए है ? कौन भगवान ? कहाँ रहता है वह ? इस प्रकार के मानसिक आघातों को कई सौ सालों से दलित सहता आया था | चहु और से होनेवाले आघात शोषण के कारण वह मानो जीवित लाश ही बन गया था | इसका ही परिणाम था कि आगे विद्रोह का स्वर दलितों में आन्दोलन बनकर उभरा | बंसी उपन्यास में एक स्थान पर कहता है ,

‘’लोगो को दुःख होता है हमारी आजादी से | पशु-पक्षियों की आजादी उन्हें भाती है | चिड़ियों को वे पिंजरे से मुक्त कर देते है , पर हमारी मुक्ति के सवाल पर चुप्पी साध लेते है | हम स्वंय कुछ कहे तो हमे आँखे दिखाते है | हम पर आग बबूला हो बरसते है | जैसे हम काठ के हो | हमारे भीतर संवेदनाएँ ही न हो | हमारे जिस्म में खून ही नही बहता हो | हम कोई मुर्दा है | अब हम गुलाम तो नही |’’ १५

वस्तुत: सामजिक ,आर्थिक, धार्मिक ,शैक्षिक, राजनैतिक विषमता का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करने में बहुत हद तक उपन्यासकार को सफलता प्राप्त हुई है | ऐसा कहना गलत न होगा | समाज दो भागों में बँटा हुआ हमे दिखाई देता है | एक और ढेढ़ चमार , डोम, भंगी जैसे दरिद्र, उपेक्षित दलित लोग जो कच्चे घरों में रहते है तथा नवाबों-जमीदारों के हवेली एवं खेतों में कमरतोड़ मेहनत और गुलामी करते है | तो दूसरी और नवाब, जमीदार, काश्तकार तथा सवर्ण वर्ग जो अपने-आप को शुद्ध,स्वच्छ,सभ्य कहलवाता है | ऐशो आराम विलासिता का जीवन यापित करते हुए दृष्टिगोचर होता है | रंडियों के कोठे पर, मुर्गों की लड़ाई ,पहलवानी पर रूपये लुटता है | मंदिर-मस्जिद के कारण लड़ता है | ऐसा समाज दलितों के साथ उपेक्षा ,घृणा, दुत्कार, डांट –डपट, जानवरों-सा व्यवहार करता है | वह इन दलित पीड़ितों के साथ प्रत्येक क्षेत्र में शोषण करता है | मानो वह कोई इंसान नहीं बल्कि जानवर या जिन्दा लाश हो | दलितों को न मंदिर में जाने का आधिकार था और न शिक्षा प्राप्त करने का | उनका न कोई नेता है औंर ना ही कोई तहसीलदार ,कलक्टर जो उन्हें इन्साफ दिला सके | छूत –छात से पीड़ित दलित समाज का मर्मस्पर्शी चित्रण उपन्यास में किया गया  है |

 

सन्दर्भ :-

१.मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट ७

२. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट -६५

३. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट १९

४. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट ८

५. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट ८

६. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट १०

७. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट २४

८. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट ३२

९. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट ३१

१०. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट३९

११. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट३९

१२. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट ५४

१३. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट ४९-५०

१४. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली –पृष्ट १११

१५. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय ,संस्करण -२०११ ,अनुराग प्रकाशन

 

 

-  डॉ. सुनिल जाधव

शिक्षा : एम.ए.{ हिंदी } नेट ,पीएच.डी

कृतियाँ :

कविता : १.मैं बंजारा हूँ  २.रौशनी की ओर बढ़ते कदम  ३.सच बोलने की सजा ४.त्रिधारा   ५. मेरे भीतर मैं

कहानी : १.मैं भी इन्सान हूँ  २.एक कहानी ऐसी भी                             .              

शोध :१.नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य  २.हिंदी साहित्य विविध आयाम  ३.दलित  साहित्य का एक गाँव  

अनुवाद : १.सच का एक टुकड़ा [ नाटक ]

एकांकी १.भ्रूण  

संशोधन : १.नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य का अनुशीलन

                 २.विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में लगभग पचास आलेख प्रकाशित

अलंकरण एवं पुरस्कार  : १.अंतर्राष्ट्रीय सृजन श्री पुरस्कार [ताशकंद]

                  २. अंतर्राष्ट्रीय सृजन श्री पुरस्कार  [दुबई]

                  ३.भाषा रत्न [दिल्ली]

                  ४.अंतर्राष्ट्रीय प्रमोद वर्मा सम्मान [कम्बोडिया ]

                  ५. विश्व हिंदी सचिवालय, मोरिशियस दवारा कविता का अंतर्राष्ट्रीय प्रथम

                      पुरस्कार       

विदेश यात्रा :  १.उज्बेक [रशिया ]  २.यू.ए.इ  ३.व्हियतनाम  ४.कम्बोडिया  ५.थायलंड

विभिन्न राष्ट्रिय अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आलेख, कविता, कहानियाँ प्रकाशित :-

   नव्या ,सृजन गाथा, प्रवासी दुनिया, रचनाकार, पुरवाई, रूबरू, हिंदी चेतना, अम्स्टेल गंगा,

   साहित्य सरिता, आर्य संदेश, नव निकष , नव प्रवाह, १५ डेज,  अधिकार,  रिसर्च लिंक,

   शोध समीक्षा एवं मूल्यांकन,  संचारिका,  हिंदी साहित्य आकादमी शोध पत्रिका, केरल,  

   आधुनिक साहित्य,  साहित्य रागिनी, खबर प्लस ..आदि |     

ब्लॉग : navsahitykar.blogspot.com

काव्य वाचन :

       १. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन, ताशकंद

       २. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन,दुबई

       ३. विश्व कवि सम्मेलन, कैनडा

       ४. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन,कम्बोडिया

सम्प्रति : हिंदी विभाग ,यशवंत कॉलेज, नांदेड

पता : नांदेड ,महाराष्ट्र -०५ 

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