मीरा से आलोकित भक्ति-जगत

मीरा का नाम हमारे जेहन में आते ही भक्तिकाल के एक ऐसे विराट व्यक्तित्व की स्मृति जीवन्त हो उठती है जिसकी कृष्णप्रेम-दिवानगी और परमात्म विरह-वेदना को शायद ही  कोई समझ पाया; जिसकी भक्ति साक्षात् मुक्ति पर भी भारी सिद्ध हुई और जो अपने भीतर विश्व की आधी मानवता का दर्द समेटे हुए आज भी नारी-विद्रोह व संघर्ष की प्रतीक है।
मीरा मारवाड़ के संस्थापक राव जोधा की सगी पड़पौत्री थी। बचपन से ही मीरा पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा था। मात्र दो वर्ष की उम्र में ही उसकी मां चल बसी। सोलह वर्ष की किशोरावस्था में तो वह विधवा हो गई जब उसके पति भोजराज एक युद्ध में काम आ गए। कुछ अर्से बाद ही उसके श्वसुर इतिहास प्रसिद्ध राणा सांगा, फिर पिता रतनसिंह, व बाबा (ताउ) वीरम देव भी नहीं रहे। इतना ही नहीं अपने प्रिय (चचेरे भाई) जयमल के भी युद्ध में खेत रहने पर तो वह इस भौतिक जगत में अनाथ ही हो गई। लेकिन यह आश्चर्य किन्तु सत्य है कि मीरा ने अपने इस घोर दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल दिया। अर्थात् जो कुछ भी अपने हिस्से का प्रेम उसने अपनी मां, पति, पिता, बाबा, श्वसुर व भाई को दे रखा था उनके जीवित न रहने पर उस प्रेम को समेट कर उसने अपने गिरधर-गोपाल के चरणों में रख दिया। वह तब भी अनाथ नहीं हुई थी। उससे अधिक सनाथ और कौन होगी जिस प्रेम दिवानी मीरा की जुबान पर हर समय ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ ही रहता था।
पांच-छः वर्ष की उम्र में उसने जब गिरधर गोपाल की मूर्ति को पहली बार देखा तो उसे जैसे पूर्व जन्म की कोई दिव्य अनुभूति-सी हो गई। अंग्रेजी में एक शब्द है – ‘देजावुह’ अर्थात् पूर्व भव की स्मृति का अचानक उठ आना। बाद में मीरा ने अपने एक पद में कहा है कि वह अपने पूर्व जन्म में कृष्ण की ललिता नामक गोपी थी जो वस्तुतः राधा की अष्ठ सखियों में उनकी प्रमुख सखी थी -
‘आयो जी मोरी गलियन में घनश्याम।
पिछवाड़े ते हेरा दीन्यों ललिता दासी नाम…।’
वस्तुतः मीरा व उसके कृष्ण प्रेम को समझने के लिए कृष्ण की प्रेमाभक्ति और राधा-भाव को समझना अति आवश्यक है। कृष्ण को सोलह कलाओं का पूर्णावतार माना गया है। तद्नुसार ब्रह्माण्ड में कृष्ण रूपी परमात्मा पुरुष केवल एक है और शेष सभी जीवात्माएं उनकी गोपियों के रूप में है। इसी को कृष्ण के प्रति गोपी-भाव की भक्ति कहा जाता है, जिसमें द्वापर काल में राधा व ब्रज की तमाम गोपियां लीन थी, जिसमें जीवात्मा परमात्मा के बिछोह और विरह की वेदना में उससे मिलन के लिए तड़पती रहती है। दूसरी भक्ति-भावना वात्सल्य-भाव रूप में है जिसमें यशोदा, कुब्जा या नंद बनकर कृष्ण की सेवा-पूजा की जाती है। उसी का विस्तृत रूप पुष्टिमार्गीय सेवा-पूजा  के रूप में प्रकट होता है। तीसरा मुख्य भाव सखा भाव है, जिस सखा भाव से उद्धव, अर्जुन और द्रौपदी ने कृष्ण की भक्ति की।
मीरा की भक्ति व कृष्ण प्रेम भी गोपी भाव से ही प्रेरित था। जिसे तत्कालीन राज-घरानों के लोग समझ ही नहीं पाए। वे इसे क्षत्रिय मर्यादा के प्रतिकूल मानने लगे। जो उन दिनों के सामाजिक परिवेश को देखते हुए अस्वाभाविक भी नहीं था। लेकिन गोपी-भाव में निहित आध्यात्मिक सच्चाई छिप नहीं सकी और धीरे-धीरे मीरा तब से समस्त संसार में भक्त    ें शिरोमणी के रूप पूजी जा रही है।
मारवाड़ के तत्कालीन प्रमुख इतिहासकार नैणसी ने अपनी ‘नैणसी की ख्यात’ में जोधपुर राठौड़ वंश के संस्थापक राव जोधा की सगी पड़पौत्री मीरा का कहीं जिक्र तक नहीं किया। तत्कालीन राजशाही ने मेड़ता राठौड़ वंश से शत्रुता के कारण इतिहास के साथ ऐसी भयंकर छेड़छाड़ की लगती है कि वे मीरा जैसी महान भक्त व नारी शैार्य की विश्व स्तरीय शख्सियत तक को भूल गये। यही कारण है कि राज्याश्रित इतिहासकारों की लेखनी की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह उठते रहे हैं। वस्तुतः मीरा को जितना कष्ट उसके ससुराल चित्तौड़ से अपने देवर राणा विक्रम के हाथों मिला उतना ही मारवाड़ के तत्कालीन राजा मालदेव से भी मिला। मालदेव ने राजनीतिक कारणों से अपने ही भाई मेड़ता के वीरमदेव पर बार-बार हमला कर मेड़ता को तहस-नहस कर दिया जिसके कारण मीरा का चित्तौेड़ त्यागने के बाद मेड़ता भी छोड़ना पड़ा।
  मीरा एक अद्भुत वीरांगना थी जिसने अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जीया। ससुराल (चित्तौड़) में उसने कृष्ण को छोड़कर वहां की कुलदेवी की पूजा और मांस-भक्षण करने से इन्कार कर दिया। उसने यही कहा – ‘सीस नवै मम श्री गिरिधारिहि, आन न मानत नाथ वही है।’ चित्तौड़ में मीरा के दो विशेष पूजा केन्द्र थे एक था कुंभश्याम का विशाल मन्दिर और दूसरा उसी परिसर में बना एक छोटा किन्तु सुन्दर कृष्ण मन्दिर जिसे अब मीरा मन्दिर कहा जाता है।
जोधपुर के राव जोधा राठौड़ वंश के प्रमुख राजा थे। क्षत्रियों में राठौड़ वंश अपनी वीरता, सभ्रंातता व तेजस्विता के लिए विख्यात रहा है। मीरा न केवल अति-सुन्दर व मधुर कण्ठ की स्वामिनी थी बल्कि उनमें एक दिव्य तेजस्विता थी। उन दिनों पर्दा-प्रथा का प्रचलन था। राजघरानों की क्षत्रिय बहू-बेटियों केा ‘असूर्य पश्या’ तक कहा गया है। अर्थात् वे इस कदर पर्दे में रखी जाती थी कि सूर्य की किरण भी उनके शरीर को स्पर्श नहीं कर सकती थी। ऐसे में मीरा का ससुराल के मंदिर परिसर में साधु-संतों के साथ सत्संग व भजन करना तथा कृष्ण भक्ति के आलम में नृत्य करना राजघराने को मर्यादा हीन लगा। साथ ही छूतछात व उंच-नीच के हालात् में रैदास जैसे चमार संत को मीरा द्वारा गुरु भाव से आदर देना भी राजघराने को रास नहीं आया। राणा सांगा की मृत्यु के बाद मीरा के देवर राणा विक्रम ने मीरा पर घोर अत्याचार आरम्भ किए लेकिन उसके अत्याचारों से जहां मीरा को आत्मिक रूप से अद्भुत सहन-शक्ति प्राप्त हुई वहीं संसार में मीरा पर कृष्ण कृपा का चमत्कार भी देखा गया जब राणा द्वारा मीरा को भेजा गया जहर का प्याला अमृत और पिटारे में बंद काला नाग फूलमाला बन गया। तब सम्पूर्ण लोकजीवन मीरा की कृष्ण-भक्ति का कायल हो गया।
मीरा का सतीप्रथा पर विश्वास नहीं था। इसका मुख्य कारण यह था कि वह तो अपने गिरधर गोपाल को ही अपना ‘सांचा प्रीतम’ मानती थी। इसीलिए अपने पति भोजराज की असमय मृत्यु के बाद उसके सती होने के विचार तक का कोई भी जिक्र इतिहास में नहीं मिलता है। इसके विपरीत वह अपने पद में कहती है -
‘मीरा के रंग लग्यौ हरि को और संग सब अटक परी।
गिरधर गास्या सती न होस्यां मन मोह्यो धन नामी।
जेठ-बहू को नातो नहीं राणाजी म्है सेवग थे स्वामी।’
मीरा राणा के अत्याचारों से व्यथित होकर अपने पीहर मेड़ता आ गई थी वरना उन दिनों बहादुरशाह के द्वारा चित्तौड़ पर किए गए दूसरे हमले के दौरान करीब तेरह हजार क्षत्राणियों द्वारा किये गये जौहर की ज्वाला में वह भी भस्म हो जाती। लेकिन जब मीरा के पीहर मेड़ता पर भी जोधपुर के राजा मालदेव का कब्जा हो गया, तब मीरा वृंदावन चली गई। लेकिन दुःख और संताप ने मीरा का वहां भी पीछा नहीं छोड़ा। वह सदैव ‘भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई’ की मनःस्थिति में रही। उन दिनों विभिन्न धर्मों में सम्प्रदायवाद का जबरदस्त बोलबाला था। यहां तक कि वैष्णव धर्म में भी अलग-अलग सम्प्रदाय बने हुए थे। लेकिन मीरा किसी सम्प्रदाय से कभी बंधी नहीं। उसकी भक्ति के तार सीधे ही अपने गिरधर-गोपाल से जुड़े हुए थे। यही कारण था कि उन दिनों पुष्टि मार्ग के प्रवर्तक वल्लभाचार्य जी के शिष्यों द्वारा मीरा को जब ब्रह्मसंबंध लेने का कहा गया तब उसने इंकार कर दिया। इससे पुष्टिमार्ग के लोग भी मीरा से नाराज हो गए। वृंदावन में वहां के पण्डों व पुजारियों के पाखण्ड से भी मीरा बहुत परेशान हुई। उन दिनों वहां के जीव गोस्वामी नामक संत पुरुष के आश्रम के द्वार पर जब मीरा पहुंची तब उनके शिष्यों ने उसे यह कहकर अंदर जाने से रोक दिया कि उनके गुरुजी किसी स्त्री से नहीं मिलते। मीरा ने तब केवल यही कहा कि अपने गुरुजी को कहना कि मीरा को नहीं मालूम कि इस ब्रह्माण्ड में कृष्ण के अलावा भी कोई पुरुष है। अपने शिष्य से यह बात सुनकर जीव गोस्वामी को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह दौड़कर मीरा के चरणों में गिर पड़े। लेकिन इस घटना के बाद भी मीरा वृंदावन में परेशान ही रही। उसने उस समय अपने समकालीन भक्त कवि नरसी भगत को पत्र भेजकर अपनी व्यथा का जिक्र किया जिसका जवाब नरसी भगत ने निम्न पद से दिया -
‘‘नारायणनुं नामज लेतां बारे तेने तजिए रे।
मनसा वाचा कर्मणा करीने लक्ष्मी वरने भजिए रे।
कुलने तजिये कुटुम्बने तजिये तजिये मा ने बाप रे।
भगिनी सुत दाराने तजिये, जेम तजे कंचुकी साँप रे।
प्रथम पिता प्रहलादे तजियो, नव तजियुं हरिनुं नाम रे।
भरत शत्रुघ्ने तजी जनेता, नव तजिया श्री राम रे।
ऋषि पत्नी श्रीहरिने काजे, तजिया निज भरथार रे।
तेमां तेनुं कईये गयुं, पामी पदारथ चार रे।
ब्रजवनिता विट्ठलने काजे सर्व तजी बन चाली रे।
भणे नरसैयो वृन्दावनमां, मोहन साथे महाली रे।’’
उसके बाद मीरा वृंदावन से गुजरात के डाकोरजी होते हुए द्वारिका चली गई। लेकिन वहां भी पण्डों-पुजारियों ने मीरा को चैन से नहीं रहने दिया। उधर चित्तौड़ राजघराने से कुछ दूत मीरा को चित्तौड़ ले जाने के लिए आ धमके थे। अंततः करीब 49 वर्ष की उम्र (जन्म वि.सं. 1561 – परलोक गमन वि.सं. 1610) में मीरा द्वारिका के मन्दिर में द्वारिकाधीश की मूर्ति में समा गई।
आज मीरा के एक पद पर पीएचडी या उसके पदों पर डी लिट् स्तर का साहित्यिक शोध कार्य भले ही होता हो लेकिन मीरा के लिए तो प्राथमिकता व मुख्य ध्येय केवल कृष्ण-रंजन ही था -
‘मैं तो गिरधर रा गुण गास्या।’
कृष्ण प्रेमाभक्ति की यही विशेषता रही है कि भक्त सदैव कृष्ण-रंजन तथा कृष्ण सदैव भक्त-रंजन में आनन्द लेते हैं। यही स्थिति भक्ति युग में तुलसी, सूरदास और नरसी जैसे भक्त कवियों की अपने इष्ट के प्रति रही है।
आज मीरा के प्रति हमारे दायित्व को समझना अति-आवश्यक है। आज जहां दो-चार गीत गाने लिखकर एक गीतकार लाखों रुपयों की राॅयल्टी मांग लेता है वहां गत अनेक शताब्दियों से मीरा द्वारा रचित पदों को शास्त्रीय संगीत की महान हस्तियों व फिल्मी संगीतकारों द्वारा गाया जा रहा है। उन्होंने मीरा के पदों को गाकर करोड़ों रुपए अर्जित किए हैं। उनका न केवल नैतिक दायित्व बल्कि कानूनी जिम्मेवारी भी बनती है कि वे मीरा की जन्म व कर्मस्थली मेड़ता, कुड़की, चित्तौड़, वृंदावन, डाकोरजी व द्वारिका में मीरा की स्मृति में भव्य स्मारक बनावें तथा वहां कृष्ण प्रेमाभक्ति के प्रचार व संगीत के नये घराने स्थापित करें। द्वितीय यह कि मीरा के जीवन से जुड़े समस्त प्रमाणों की आज सभी वैज्ञानिक तरीकों से सुरक्षा किया जाना आवश्यक है अन्यथा युग बीतने के बाद प्रमाणों के अभाव में इतिहास को पुराणों में बदलते देर नहीं लगती।
मीरा की जन्मतिथि को लेकर कुछ विवाद अवश्य है लेकिन आज भी मीरा जयन्ती शरद् पूर्णिमा को ही मनाई जाती है। कलकत्ता के आचार्य ललिताप्रसाद सुकुल द्वारा प्रकाशित ‘डाकोर की प्रति’ में संकलित पद संख्या 67(ख) में मीरा की जन्म तिथि शरद् पूर्णिमा होने का जिक्र है – ‘रासपूणे जणमिया री राधका अवतार।’
उल्लेखनीय है कि मीरा शब्द का अर्थ प्रकाश होता है। आने वाले युगों में शायद ही कोई विश्वास करेगा कि सोलहवीं शताब्दी की विषम राजनीतिक व सामाजिक परिस्थितियों में मारवाड की बेटी ़मीरा नामक मेड़तिया राठौड़ वंश की एक ऐसी क्षत्राणी हुई थी जिसने कृष्ण भक्ति का उच्चतम शिखर छू लिया था और जिसने सम्पूर्ण विश्व की नारी अस्मिता को अपने दिव्य आलोक से आलोकित कर दिया।

- मुरलीधर वैष्णव

जन्म तिथि: ०९ फरवरी, जोधपुर

शिक्षा : बी.ए., एलएल.बी.

राज्य सेवा: करीब ३४ साल का राज.न्यायिक वं उच्चतर न्यायिक सेवा अनुभव रजिस्ट्रार प्रशासन राज.उच्चन्यायालय,जोधपुर व सुपर टाइम स्केल 
जिला न्यायाधीष पद से २००६ में सेवा निव्रत। ५ वर्ष के लिए अघ्यक्ष उपभोक्ता संरक्षण मंच जोधपुर पद पर पुर्ननियुक्ति।

साहित्य- स्रजन: कवि-कथाकार

प्रकाशन : ’पीड़ा के स्वर’कथासंग्रह अक्षय-तूणीर लघुकथा संग्रह व ‘हेलौ-बसंत’काव्य-संग्रह
राज.पत्रिका दैनिक भास्कर, हंस, कथादेश, सरिता, मुक्ता, मधुमति आदि अनेक राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में सतत रूप से साहित्यिक एवं सामाजिक सरोकार की सैंकड़ों रचनाएं प्रकाशित।
बाल साहित्य आदि प्रकाषन-दो बाल कथा संग्रह ’पर्यावरण चेतना की बालकथाएं’ ,’चरित्र विकास की बाल कहानियां ’ ,एक बालगीत संग्रह व एक बालकथा संग्रह प्रकाषनाधीन, बाल वाटिका का संरक्षक।

राजस्थानी भाषा में भी कविताएं ’जागती जोत’ में प्रकाशित

अंग्रेजी में विभिन्न कानूनी बिंदुओं पर अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका सीटी.जे. (कन्जूमर एंड ट्रेड प्रेक्टिस लॉ) में अनेक आलेख

प्रदत्त सम्मानः 
१ . राज.पत्रिका सृजनात्मक साहित्यपुरस्कार २००२ 
२ .राज.साहित्यअकादमीकाविषिश्टसाहित्यकारसम्मान २०१३ 
३ . वीरदुर्गादाससाहित्य सम्मान मेहरानगढ ट्रस्ट जोधपुर २००८ 
४ . सर्जनात्मक संतुश्टि संस्थान जोधपुर सर्वश्रेश्ठ लघुकथासम्मान २०१२ 
५ .रेस्पेक्ट इंडिया २००८ सम्मान
६ .उत्सव मंच,अजमेर २०१२ सम्मान
७ .सुमित्रानंदन पंत बाल साहित्य सम्मान २०११

अन्य सामाजिक कार्य : संरक्षक ‘जाग्रति’ आरटीआइ एनजीओ जोधपुर गरीब प्रतिभाशाली बच्चों को आर्थिक मदद उदयपुर, प्रतापगढ़, भीलवाड़ा, कुशलगढ़, बांसवाड़ा एवं जोधपुर में अब तक करीब ३००० से अधिक वृक्षारोपण एवं उनका पोषण ,निःशुल्क कानूनी सेवा के दर्जनों केम्प्स में विधिक शिक्षा प्रसार
जोधपुर संभाग में उपभोक्ता कानूनी शिक्षा प्रसार एवं जाग्रति हेतु उल्लेखनीय कार्य

सम्प्रति पता आदि: विधिक सलाहकार एवं स्वतंत्रलेखन ’ , रामेष्वरनगर ,बासनी , प्रथम फेस, जोधपुर , जोधपुर (राज.)

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