मिस्टेक

कॉलेज अहाते में अपने में खोयी कोमल अपने पैरों को ऐसे बढ़ा रही थी, मानों उसमें से किसी ने प्राणों को खींच लिया हो | उसका हर कदम कच्छवे की गति से धरती की लंबाई नाप रहा था | वह उनींदी थी | रात भर वह सो न पायी थी | एक विचार-एक सोच ने उसे भीतर तक घायल कर दिया था | वह सोना भी चाहती, पर उसका मस्तिक उसे सोने की अज्ञा नहीं दे रहा था | रात भर जागते रहने से उसकी आँखे सूज गयी थी | अपनी आकार से दुगनी…..हाँ, दुगनी | जैसे बड़े-बड़े बेर …..ये..मोटी-मोटी आँखें ..| उसका चेहरा लाल सुर्ख हो गया था | जब भी वह उदास होती, तो वह पिली साड़ी पहन लेती | उस दिन भी उसने पिली साड़ी पहन रखी थी | पिली साडी पुरानी थी | वह अन्य साड़ियों के भाँती उतनी आकर्षक न थी | शायद इसीलिए वह उस वक्त ऐसी ही दिखना चाहती थी | अनाकर्षक…| पर उलटे उस पुरानी पिली साडी में वह और भी खूबसूरत दिखने लगती थी | खूबसूरत कोमल, आँखों की सुजन से मुरझायें फूल की भाँती लग रही थी | गेट की सीडियाँ उतरते समय उसके पास एक हाथ में कक्षा में पढाई जाने वाली किताब थी | तो दूसरे हाथ से उसने अपनी साड़ी को थोड़ा ऊपर खिंचा | ताकि नीचे उतर ते समय पैरों में साड़ी फँस कर गिर न जायें | यह उसकी रोजाना की आदत थी | जैसे ही उसने अपना पहला कदम सीड़ियों पर रखा | उसने महसूस किया सामने कोई खड़ा हैं | उसने बोझिल पलकों को तनिक उठाया | सामने खड़े माधव को देखते ही उसके ह्रदय में कुछ हलचल हुई | एक पल के लिए उसने माधव की आँखों में आँखे डालकर देखा | माधव की भी आँखे सूजी हुई थी | वह भी रात भर  सो न पाया था | उसकी आँखों में आँसू और गुस्सा भरा हुआ था | कोमल उस पल में निश्छल आँखों से कुछ बोल गयी थी | मानो वह कह रही हो,

‘’ माधव, मुझे माफ कर दो ..मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती | मेरी ही गलती थी | जो तुम्हारे साथ आने से इनकार कर दिया | मैंने तुम्ह पर गुस्सा किया | मैं ही गलत थी | तुम सही थे | मैं तुम्हे समझ न पायी थी | माधव, मुझे क्षमा कर दो | मैं अभी इसी पल तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हूँ |’’

माधव ने भी महसूस किया कि कोमल रातभर सो न पायी | लगातार आँखों से आँसू निकल ने से उसकी ऑंखें आँसू रहित उदासीनता की अवस्था को पर कर चुकी थी | वह भी उसे बहुत चाहता था | पर कल श्याम की बात उसके ह्रदय पर ऐसी चोट कर गई थी कि वह उसकी ओर देखना भी नहीं चाहता था | पर न जाने क्यों उस पल उसके ह्रदय में भी कुछ हलचल हुई थी | लगता था कि ह्रदय ने उसे माफ कर दिया हैं | पर मस्तिष्क उसे ऐसा करने की तनिक भी अनुमति नहीं दे रहा था | उसने दूसरे ही पल अपनी नजरों को उससे हटा लिया | और अजनबी की तरह कटूता से अपने क़दमों को आगे बढ़ा दिया | वह उसके करीब से ऐसे गुजरा जैसे मानो वे अजनबी हो | पहले कभी मिले ही नहीं थे | माधव के मस्तिष्क में गुस्सा साफ झलक रहा था | स्थिर कोमल उसकी ओर देखती रही | यकायक कोमल की भावनायें तीव्र हो गयी थी | वह खुले आम जोरो से चीख़-चीख़ कर, चिल्हा कर उसे रोकना चाहती थी | उसे अपने किये पर शर्मिंदगी थी | वह उससे माफी माँगना चाहती थी | पर वह उस वक्त ऐसा करने में असमर्थ थी | किन्तु वह भीतर से चीख रही थी…चिल्हा रही थी |

‘’ माधव, मुझे माफ कर दो | रुको… माधव.. रुक जाओ ना …मुझे ऐसे छोड़ कर मत जाओं | मैं तुम्हारे बिना रह न पाऊँगी | सुनो…सुनो तो …|’’

माधव मन की बात सुनने के लिए मानों तैयार न था | उसका मस्तिष्क उसपर पूरी तरह से हावी हो गया था | वह तो कोमल की हर बात बिना कुछ कहे समझ लेता था | उसने कभी कोमल को, उसके ह्रदय को,  ठेस नहीं पहुँचाई थी | पर उस दिन वह सहन नहीं कर पाया था | कोमल का गुस्से में डाटकर इनकार करना, वह कभी भी भूल नहीं सकता था | दोनों भी हृदय और मस्तिष्क की जंग में अपने-आप को हार चुके थे | उनका अटूट प्रेम एक नाजुक पुल से गुजर रहा था | गुस्सा, मनमुटाव का तूफान; उनके निश्छल प्रेम के रिश्ते के पुल को असुरक्षित कर रहा था |

माधव का कोमल के पास से बिना बात किये अजनबी की तरह गुजर जाना | कोमल के पहले से ही विव्हल हृदय को चोट पहुँचाने वाला था | वह चोटिल बन चुकी थी | उसने दूसरे हाथ से पकड़ी हुई साड़ी को छोड़ दिया | और वही हाथ बरबस उसके हृदय के पास आ गया | उसने ह्दय के पास वाले स्थान को कस के भींच लिया | और जाते हुए माधव को एकटक देखती रही | उस क्षण उसके लिए दुनिया का अर्थ था, केवल और केवल माधव | गेट से कुछ दूरी पर था.. अध्यापक कक्ष ..| कक्ष के बाहर ..कक्षा परिवर्तन की घंटा लगाई गयी थी | सिपाही ने लोहे का रॉड उठाया और पूरी ताकत के साथ उसपर वार किया | वार करते ही घंटे की ध्वनि पूरे कॉलेज में पहुँच गयी थी | उसी ध्वनि ने कोमल को माधव की दुनिया से बाहर निकाला था | अचानक हुई घंटे की ध्वनि ने उसके कान से प्रवेश कर उसका हाथ पकड़ कर्तव्य की दुनिया में लाया था | माधव को जाते देख, सुख चुके आँखों से उत्पन्न कुछ बूंदों ने उसकी आँखों को गिला कर दिया था | उसने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू उठाया और आँखें पोंछ लिए | वह जब बाहर की दुनिया में आयी तो उसने ईधर-उधर देखा… उसे इस अवस्था में किसी ने देखा तो नहीं | वहाँ संयोग से उस वक्त कोई नहीं था | जो उसे और माधव को इस अवस्था में देखें | पर थोड़ी सी भी आवाज दिवारों को तृप्त करने वाली थी | उन्ह दोनों ने बात भी की, पर मौन ..नयन और मन की भाषा से ..|

माधव जब कोमल के पास से गुजरा, तो उसे लगा: कोमल इसे रोक लेगी | उससे माफी मांगेगी ..पर उसकी नजरों में ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था | दूसरे ही पल में कोमल का मौन और उसकी सूजी हुई आँखों ने उसे पिगला दिया था | वह भी उससे बात करना चाहता था | पर उससे पहल की अपेक्षा कर रहा था | वह पछता रहा था | काश, वही पहल करता | उसने महसूस किया कि उसे अपने किये पर पश्चाताप हो रहा है | यही कारन था कि वह रातभर सोयी नहीं थी | उनींदी थी | जैसे ही गेट को लांघ; सीडियाँ उतर कर आध्यापक कक्ष की और उसने कदम बढायें | माधव ने पलट कर उससे बात करनी चाही पर .. अब देर हो चुकी थी | वह कुछ पल उसके लिए रुकी थी | पर अब माधव उस दिशा की ओर देखें जा रहा था..जहाँ पर कोमल..विरह विदग्ध होकर खड़ी थी | उसने अपना बायाँ हाथ उठाया और अपने चेहरे पर से हल्के से घुमाया | साँसे भरी और साँसे छोड़ता हुआ | वहाँ से अपनी कक्षा की ओर चला गया | कक्षा में उसका मन कहाँ लगने वाला था | उसकी नजरों के सामने कोमल का वह चित्र बार-बार आ रहा था |

माधव और कोमल की पहली मुलाकात, कॉलेज में हुई थी | कोमल का जब अंशदायी अध्यापक के रूप में कॉलेज में चयन हुआ था | तब वह अन्य दो अध्यापिका सहेलियों के साथ किरायें के एक रूम में रहा करती थी | ऐसे में माधव का मित्र जो औरंगाबाद शहर के एक जानेमाने कॉलेज में राजनीति शास्त्र पढ़ाता था | वह माधव से मिलने नांदेड शहर चला आया था | उसके नांदेड आने का कारन कोमल थी | उसे किसी ने बताया था कि उसके जाति की एक कुँवारी लड़की नांदेड के एक जानेमाने कॉलेज में रहती हैं | जहाँ माधव भी पढ़ाता था | उसके पास एक बहाना था | उसे जिसने बताया था | उसने उसके हाथ में एक पत्र थाम दिया था | और कहा था |

‘’ मित्र, तुम्ह नांदेड जा रहे हो, तो यह पत्र लेते जाना | और कोमल को देना |’’

मित्र ने माधव को जानकारी दी थी | माधव ने कॉलेज में आयी नयी अध्यापिका को मित्र के कारन बात किया था | उस वक्त कोमल और मित्र का हल्का-सा परिचय हुआ था | कोमल ने कक्षा की व्यस्तता के कारन, माधव और मित्र को दूसरे दिन रविवार को रूम पर श्याम पाँच बजे बुलाया था | एक छोटे से कागज पर उसने पता लिख दिया और माधव के  हाथ में मुस्कुराते हुए थाम दिया | उस वक्त माधव के मन में सिवाय एक अध्यापिका के परिचय के कुछ नहीं था | जो अपने मित्र की मद्दत कर रहा था | कोमल से उस वक्त कुछ ख़ास बात नहीं हो पायी थी | कोमल भले ही दिखने में उस वक्त खूबसूरत दिखायी दे रही थी | वाणी में मधुरता थी | पर प्रेम जैसा कुछ नहीं था | ना ही उसके हृदय में प्रेम की घंटी बजी थी | ना ही उसके प्रति ऐसा कोई आकर्षण ही था | हाँ, पर माधव का मित्र उसे देख-देख बेहद प्रसन्न हो रहा था | मानों उसकी सारी इच्छायें पूरी हो गयी हो | वह उसे पहले ही नजर में भा गई थी | या यूँ कहे कि उसके हृदय में जरुर घंटियाँ बजने लगी थी | वह सातवें आसमान पर था | माधव को उसे प्रसन्न होता हुआ देख और भी ख़ुशी हो रही थी | जाते-जाते कोमल ने दोनों की तरफ देख कर, दायाँ हाथ उठा कर ‘बाय’ किया था |

माधव ने कॉलेज छूटने के बाद अपने मित्र को नांदेड के दर्शन करवायें | दस गुरुद्वारें, विष्णुपुरी जलाशय के किनारें प्रकृति की गोद में बसा कालेश्वर मंदिर, पहाड़ों की खूबसूरती में बसा रत्नेश्वरी मंदिर और श्याम को गोविन्द बाग़ का ०७:०० बजे का शो |  जो दसवें गुरु गोविन्दसिंह पर आधारित फाऊनटन शो को देख कर आश्चर्य चकित हुआ | यहाँ उसने गरु गोविन्दसिंह जी के इतिहास को पानी के फव्वारों पर भव्य दिव्य रूप में देखा था | जहाँ रोज-भारत के कोने-कोने से गुरुद्वारा दर्शन के लिए आये यात्री शो देखने के लिए जरुर आते थे | मित्र यह सब देख कर धन्य हो गया था | उसने नांदेड के इस सौन्दर्य को निकट से जाना परखा था | उसमें उसके और कोमल की यादों के ख़ुशी के पल मिश्रित थे | मित्र रातभर उसे मिलने की ख़ुशी में न सो पाया था | ना वह खुद सोया और ना ही माधव को सोने दिया था | माधव को यह समझने में देर न लगी थी कि मित्र पहली नजर में उसके प्रेम में पड़ गया था | सुबह हुई …कोमल को मिलने की ख़ुशी उसके चेहरे पर साफ-साफ देखी जा सकती थी | पाँच बजे तक का समय उसे वर्षों के समान लगने लगा था | वह हलके-फुल्के विरह से गुजर रहा था | बिहारी की नायिका की भाँती बैरिन समय उसे काट रहा था | जैसे-जैसे घड़ी की सुइयाँ श्याम पाँच बजे की और दौड़ रही थी | उसका हृदय भी सुइयों की भाँती धड़कने लगा था |

माधव और मित्र, कोमल द्वारा दिए गये पते पर बिना किसी कठिनाई से पहुँच गये थे | वहाँ कोमल भी अपनी सहेलियों के साथ दोनों की प्रतीक्षा में ही बैठी थी | दोनो के पहुँचते ही उसने कहा था,

‘’आईये..आइये, हम आप की ही प्रतीक्षा कर रहे थे | यहाँ पहुँचने में कोई कठिनाई तो नहीं हुई | मेरा मतलब है कि पता, पता करवाने में कोई असुविधा तो नहीं हुई | ‘’

‘’ नहीं-नहीं, बड़ा ही सरल पता था | हमें किसी को पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ी | और आपकी रूम सड़क पर ही तो है | कोई भी आसानी से पहुँच सकता हैं |’’

निचे बैठते हुए माधव ने कहा था |

उस दिन कोमल ने नीली साड़ी पहनी थी | नीली चूड़ियाँ, उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहे थे | कोमल ने पानी का ग्लास हाथ में दिया | और वह भी पास में ही बैठ गयी थी | उसने अपनी सहेलियों के साथ माधव और मित्र का परिचय करवाकर दिया था | उधर मित्र कोमल की ओर एक टक देख रहा था | भीतर पानी लाने के लिए जाने तक और भीतर से बाहर और सामने पास ही बैठ कर परिचय करवाने तक, वह लगातार उसे अपनी नजरों में समायें जा रहा था | वह प्रत्येक पल को नजरों में समाना चाहता था | कोमल के साथ विमल तथा कमल एक साथ रहा करती थी | वे रूम पार्टनर थी | कोमल के साथ उनका स्वभाव भी पता चल रहा था | सभी खुल कर बात कर रहे थे | मानों दोनों उनके गाँव से आये हो | ख़ास कर कोमल का बात करना, जिसमें अपनापन था | भोलापन था | वह ऐसे बातें करती कि जैसे सामने वाले के साथ बहुत पुरानी जान पहचान है |  कोई भी आसानी से उसके स्वभाव और सौन्दर्य से अभिभूत हो उसके प्रेम में पड़ जायें | इस पर मित्र का तो क्या कहना था ? वह इस कदर उसका दीवाना हुआ कि वह उसके लिए उस समय भगवान से भी ज्यादा थी | उसके मन में उससे विवाह के विचार कौंदने लगे थे | वह एक पल भी उसके बिना नहीं रहना चाहता था |

उस दिन से मुलाकाते होते रहीं | जब भी मित्र आता माधव को जरुर साथ ले जाता | दोनों उससे मिलने के लिए उसके रूम पर जाते | और खट्टी-मीठी बातों में खो जाते | समय कैसे गुजर जाता पता ही नहीं चलता था | वहाँ से होकर वापस लौटना दोनों के लिए दूभर हो जाता था | वास्तव में कोमल,विमल और कमल ये भी नहीं चाहते थे कि वे दोनों अब वापस लौट कर जायें | उन्हें भी उनका साथ अच्छा लगने लगा था | मुलाकाते होते रहीं ..| मित्र की इच्छा का कोमल को पता चल गया था | कोमल को यह बात कतई पसंद नहीं आयी थी | वह किसी भी सुरत में उससे विवाह करना नहीं चाहती थी | क्योकि नियति ने उसके साथ बद्दा मजाक किया था | वह अपाहिज था | एक आँख से अँधा, नाक पिचकी हुई | बौना | वह चाहकर भी उससे विवाह नहीं कर सकती थी | उसका कोमल के साथ कोई मेल नहीं था | ना ही वह भविष्य में स्त्री सुलभ ख़ुशी दे सकता था | कोमल ने माधव से मित्र को समझाने के लिए भी कहा था | पर मित्र को समझाना इतना आसान नहीं था | वह तो उसके प्रेम में ऐसे डूबा हुआ था | जैसे भँवरा पराग को चूसने में लींन रहता है | उसे बाहर की दुनिया, दिन-रात का पता नहीं चलता और कमल में फँस जाता हैं | वैसे ही वह भी कोमल के प्रेम में फँस गया था | अब कोमल से भी अच्छी मैत्री बन गयी थी | दोनों की बात सुनना था | किसी एक पक्ष पर निर्णय माधव को ही लेना था | सो उसने कोमल का पक्ष लेना उचित समझा था | इसलिए उसे झूठे प्रेम का नाटक करना था |  कोमल और माधव ने झूठे प्रेम का नाटक किया था | इसका परिणाम मित्र माधव को दुश्मन समझने लगा था | पर किसी भी हालत में मित्र को प्रेम के नशे से बाहर निकालना था | इसलिए माधव हृदय पर पत्थर रखते हुए, दुश्मन बनने के लिए भी तैयार हो गया था | नतीजतन मित्र रूठ कर औरंगाबाद चला गया | फिर लौटकर कभी नांदेड नहीं आया | उसे खोने का गम माधव को भी था और कोमल को भी | कोमल उसके साथ एक अच्छे मित्र के रूप में उसे के साथ रहना चाहती थी | पर वह संभव न था | माधव ने उसे आगे चल कर साफ-साफ बता दिया था | उसने और कोमल ने नाटक किया था | उसे अपनी गलती का अहसास हुआ | उसने दोनों की खत द्वारा माफी मांगी | और वह पुनः पहले जैसा मित्र बन गया था | मित्र के अपाहिज होने के कारन माधव के साथ कोमल को भी अफसोस था | कहा जाता हैं ना; आखिर वहीं होता है, जो नियति को मंजूर होता है |

मित्र के जाने के बाद से लेकर उसे मनाने तक कोमल और माधव मिलते रहे थे | जब भी कॉलेज छूटता वे दोनों साथ में निकल पड़ते थे | कभी इस बहाने से तो कभी उस बहाने से ..| चलते-चलते दोनों के कई विषयों पर बातें हुआ करती थी | आगे चल कर वे और उसकी सहेलियाँ हॉस्टल पर रहने के लिए चले गये थे | जो माधव के घर के रास्ते पर पड़ता था | दोनों का एक ही समय होता कॉलेज से बाहर निकलने का ..| कॉलेज से हॉस्टल लगभग पन्द्रह मिनट की दूरी पर था | पर दोनों इस तरह चलते के वहाँ पहुँचते-पहुँचते आधा घंटा तो हो ही जाता था | फिर भी उनकी बाते खत्म नहीं होती थी | हर रोज नये नये विषय होते, कभी घर की बातें, कभी कॉलेज की, कभी फ़िल्म की..कभी गीत, संगीत..बचपन आदि..आदि | हँसते-मुस्कुराते दिन बीतने लगे थे | वे.. जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे; वैसे-वैसे वे एक दूसरे को निकट से जानने-पहचानने लगे थे | करीब और करीब आने लगे थे | पर उनकी मैत्री में सात्विकता थी | जब भी हॉस्टल आता, तो वहाँ कम से कम दस मिनट तो बाते होती ही थी | एक दिन माधव ने घर चलने का आग्रह किया तो, वह तैयार हो गयी थी | मानो वह इसी की ही प्रतीक्षा कर रही हो | उसने कहा भी था कि उसे घर कब ले जा रहे हो ? उस दिन मौका मिला था | वे वहाँ से बीस मिनट की दूरी पर स्थित माधव के घर पैदल ही निकल पड़े थे | ऑटो जान बुझकर नहीं किया गया था | क्योंकि रास्ते में कई विषयों पर बातें हो सकती थी | दोनों को साथ रहना बेहद पसंद था | दोनों को दोस्ती गहरी हो गयी थी | कॉलेज से लेकर सड़क तक सबको उनकी दोस्ती का पता चल गया था | उन्हें इस बात से कोई फरक नहीं पड़ता था कि कोई क्या कहेगा | उन्ह दिनों एक अध्यापक जिसने अपनी गली की ही एक लड़की के साथ प्रेम विवाह कर लिया था | और दोनों घर छोड़ कर भाग गये थे | सभी यह विषय दोनों को ख़ास कर के सूना रहे थे | कहते थे,

‘’ माधव जी, क्या आप को पता है ?  उस अध्यापक को प्राचार्य ने कॉलेज से निकाल दिया | क्योंकि उसने अपनी ही गली की लड़की के साथ माँ-बाप की बिना अनुमति के प्रेम विवाह किया | और घर छोड़ कर भाग गये | लड़की के माता-पिता ने प्राचार्य से शिकायत कर दी और उन्होंने तुरंत उस अध्यापक को कॉलेज से निकाल दिया | और हमने यहाँ तक सुना है कि उन्होंने पुलिस थाने में रपट लिखा दी है |’’

दोनों ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया था | क्योंकि उन्हें पता था, उन्हमें ऐसा कुछ था ही नहीं |

उस दिन चर्चा किये जाने वाले विषय में ‘प्रेम’ भी था | कोमल ने उस घटना को लेकर पूछा था |

‘’ माधव जी, क्या प्रेम करना गुनाह हैं ?’’

‘’ नहीं तो…प्रेम गुनाह कैसे हो सकता हैं ! प्रेम तो प्रकृति का अनमोल उपहार है | वह सुख-दुःख के सागर में डूबकर परमानंद प्राप्त करता है |’’

‘’परमानंद ..’’

‘’हाँ, परमानंद …प्रेम मानव द्वारा बनाये धर्म, जाति, सम्प्रदाय से ऊपर होता है | वह नदी की भाँती स्वच्छ, फूलों के भाँती मासूम होता हैं | प्रेम दो आत्माओं का मिलन हैं | प्रेम रूपी भक्ति से परमात्मा रूपी आनंद की प्राप्ति होती हैं | उन्ह दोनों ने उस आनंद की प्राप्ति कर ली | ‘’

‘’माधव, तुम प्रेम पर कितना कुछ जानते हो  | तुम्हे सुनना, आनंद प्राप्त करना हैं | इसीलिए मुझे तुम्हारा साथ अच्छा लगता हैं | …माधव जी, प्रेम से ईश्वर प्राप्ति हो सकती है, तो क्या ईश्वर को पाने के लिए सबको प्रेम करना चाहिये ?’’

‘’ कोमल जी, आपके प्रश्न मेरे उत्तर के जन्मदाता हैं | ..प्रेम का विशाल एवं व्यापक आर्थ हैं | मैंने मात्र उसका एक अंग बताया | दो आत्माओं में होनेवाला प्रेम स्वच्छ हो…अन्यथा वह शुद्ध वासना होगी | हमें प्रत्येक कार्य प्रकृति के नियमों में बंध कर करना चाहिये | प्रेम प्रकृति के प्रत्येक कण-कण से, अंग से होना चाहिये | पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नदी-नाले, झरने-समन्दर, आकाश-धरती, मनुष्य ..जो आँखों से दिखता है और जो नहीं दिखता है..उन सबसे प्रेम करना चाहिये |’’

‘’वा माधव जी, आपने प्रेम का एक नया अर्थ बताया | हम ऐसे प्रकृति से प्रेम करने लगेंगे तो..तन और मन की सौन्दर्यता अपने आप प्राप्त हो जायेगी |’’

‘’कोमल जी, यही सौन्दर्य ही आनंद की प्राप्ति करवायेगी |’’

दोनों आपस में प्रेम,प्रकृति,सौन्दर्य, आनंद, नियम आदि विषयों पर बातें करते-करते; कब घर पहुँच गये पता नहीं चला था | उस दिन उन्होंने बीस मिनट की दूरी चालीस मिनट में तय की थी | माधव उस दिन बेहद खुश था कि कोमल को अपने साथ घर ले जा रहा है | और कोमल के भी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था कि वह अपने प्रिय मित्र के साथ घर जा रही है |

उस दिन घर पर कोई नहीं था | माधव ने बॉस से बने गेट को खोला | जो रस्सी से बंधी थी | आँगन में कोमल ने अपना पहला कदम रखते ही उसने कहा था,

‘’वा …कितने सुंदर फूल हैं |’’

आँगन में भाँती-भाँती के फूलों के पौधे सजे हुए थे | उसे माधव और उसके परिवार ने बड़े करीने से सजा रखा था | वे पुष्प आँगन की शोभा बढ़ा रहे थे | माधव मध्यवर्गीय परिवार से था | हाल ही में उन्होंने एक जमीन खरीद कर उसपर कच्चा मकान बनाया था | माधव के पिता ने जमीन खरिदने और घर बनाने के लिए बैंक से लोन लिया था | सो उसी पर वह कच्ची ईंटों से सजा, लोहे के टिनों से ढका था | कोमल को माधव का घर देख वैसी ही ख़ुशी हुई, जैसी उसे अपना घर देख कर होती थी | कोमल का माधव के घर में प्रवेश हुआ | उसके कदम भीतर रखते ही लोड सेडिंग में बिजली आ चुकी थी | यह संकेत थे | उसके साथ खुशियों के आनेके ..| कोमल सच में ख़ुशी थी | ख़ुशी का दूसरा नाम कोमल …| माधव ने निचे चटाई बिछाते हुए उसे बैठने के लिए कहा और वह सहर्ष बैठ गयी | माधव ने कहा,

‘’ कोमल जी, आप तनिक बैठना मैं आपके लिए फस्ट क्लास चाय बनाकर लाता हूँ | ‘’

पर कोमल ने माधव को ऐसा करने से रोका और वह खुद चाय बनाने लगी | उस दिन माधव जो अक्सर दूध पीता था..कोमल के हाथों बनी चाय पी ली | ऐसे में भूक भी लग रही थी | पर घर में कोई नहीं था | कोमल ने यह जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी | उसने उस दिन गरमा-गरम चपाती, दाल और भिन्ड्डी की सब्जी बनायी थी | माधव ने जब उस भोजन को चखा तो..आश्चर्य चकित हुआ | उसकी माँ भी बिलकुल ऐसा ही भोजन बनाती थी |

‘’ कोमल जी, आप तो बिलकुल मेरी माँ जैसा भोजन बनाती हो | मैं बड़ा खुश नसीब हूँ कि आप के हाथों से बना भोजन खा रहा हूँ | पाक कला में आपका जवाब नहीं |’’

कोमल सीधी-सादी लड़की थी | उसमें अपनापन था | भोलापन था | वह गर्व से रहित थी | माधव ऐसी दोस्त पाकर धन्य था | कुछ समय बाद माधव की माँ आ गयी थी | कोमल ने उन्हें देखते ही अपना पल्लू सिर लिया और उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया | कोमल की विनम्रता और संस्कार प्रियता ने माधव की माँ का मन जित लिया था | माधव की माँ ने मन ही मन माधव और कोमल का विवाह होता हुआ देख लिया था | उस दिन कोमल की माँ के साथ बहुत समय तक बात होती रही | श्याम होने को थी कोमल ने अपनी जानकारी हॉस्टल के रुममेंट विमल को दे दी थी | विमल  कोमल को फटकार रही थी कि उसे भी साथ  ले जाती | जब श्याम अधिक हो गयी तो माँ ने माधव को कोमल को हॉस्टल छोड़ आने की बात कही थी | कोमल को माधव का घर अपने घर जैसा लग रहा था | वह हॉस्टल नहीं जाना चाहती थी | पर उसे जाना ही था | सो माधव उसे हॉस्टल छोड़ आया था | वहाँ विमल पहले से ही प्रतीक्षा में बैठी थी | उसने माधव के सम्मुख नाराजगी जतायी थी कि उसे अपने घर क्यों नहीं ले गये | माधव ने भी वादा किया था कि अगली बार उसे भी जरुर घर ले जायेगा | दोनों ने मुस्कुराते हुए दायाँ हाथ उठाकर ‘बाय-बाय’ किया था | विमल माधव को जाता हुआ देख रही थी | उसकी नजर तबतक उसपर बनी हुई थी जबतक की वह नजरों से ओझल ना हो जायें | उस श्याम दोनों भी खुश थे | माधव और कोमल | नींद भी बड़ी सुकून की आयी थी | सपने भी सुंदर थे | सपने में कोमल माधव के घर थी | किचन से माधव की आवाज लागा रही थी |

‘’आजी सुनते हो..और एक रोटी लाऊं क्या ? गरमा-गरम हैं |’’

सुबह भी खुशियों से भरी थी | पक्षियों का मधुर गान, वृक्षों से निकलने वाली शीतल हवा..सूर्य की कोमल किरणों ने उन्हें जगाया था |

दिन बितते गये | विमल, कोमल और माधव एक साथ कॉलेज से निकलने लगे थे | एक दिन कोमल अपने घर गयी थी | सो विमल और माधव कॉलेज से एक साथ निकल पड़े थे | उस दिन विमल ने जिद की कि, ‘’ माधव जी, आज आप को मुझे अपने घर ले जाना ही होगा | कोई बहाना नहीं चलेगा | विमल के स्वभाव में भी अपनापन था | वह भी कोमल की भाँती दोस्त बन गयी थी | विमल निस्वार्थ रूप में सामाजिक कार्य किया करती थी | जितना वह औरों को मदद करने में अपने आप को धन्य मानती थी, उतना ही वह अपने मित्रों, सहेलियों के लिए समर्पित भी थी | विमल भी कोमल की भाँती ही सुंदर थी | पर विमल के सौन्दर्य में साँवलापन था | नयन-नक्ष आकर्षक थे | उसके वस्त्रों के चयन, शब्दों के चयन में स्तरीयता थी | पर अपने सखी-सहेलियों में, दोस्तों में खुलकर अपने मन को रखती थी | मानों वह खुली किताब हो | बातों का उसके पास भंडार था | वह शब्दों की अमीरी लिए थी | वह शब्द ही नहीं अपितु भावनाओं की भी अमीर थी |

विमल को माधव से प्रेम हो चुका था | वह हर पल उसके साथ रहना चाहती थी | उससे बातें करना, उसकी बातें गौर से सुनना | वह पहले कभी इतनी खुश न रही थी | उसके मन का राजकुमार उसे मिल गया था | उसने मन ही मन उससे विवाह की भँवरियाँ ले चुकी थी | जब भी कोमल, माधव के संग हो लेती तो वह भी अपनी कक्षा छोड़ उसके साथ हो लेती | कोमल का माधव के साथ हँस-हँस के बातें करना उसे कतई अच्छा नहीं लग रहा था | उसे जलन होने लगी थी | वह कोई न कोई उपाय ढूंड ही लेती जिससे दोनों में दरार आये | उसे एक अवसर ऐसा भी मिला पर वह उसी में ही फंस गयी | राखी का त्यौहार था | विमल ने माधव को फोन पर कहा,

‘’आज राखी का त्यौहार है | आजाओं राखी का त्यौहार देखने के लिए | ‘’

माधव साफ मन से गया | वह अपनी सहेलियों के साथ राखी का त्यौहार मना रही थी | कुछ समय बीत गया था | पर कोमल अबतक रूम से बाहर नहीं आयी थी | कई बार विमल उसे बुलाने के लिए गयी थी पर वह आयी नहीं | बाकी की सहेलियों ने जोर दिया कि ,

‘’ माधव जी को आपने राखी के लिए बुलाया है | आप राखी बाँध दीजिये | ‘’

वह बेमन से मजबूर हो गई थी | उसने प्लान बनाया था कि कोमल द्वारा माधव को राखी बांध भाई बनवाया जाय | पर हुआ इससे उल्टा और विमल को ही माधव की बहन बनना पड़ा | उस रात वह बहुत रोयी | उसके लिए सबकुछ खोया सा हो गया था | उसे अपने कार्य पर पश्चाताप हो रहा था | पर अब बहुत देर हो चुकी थी | कोमल ने साफ-साफ राखी बाँधने से इनकार भी कर दिया था | कोमल की हरकतों ने बयान कर दिया था कि कोमल भी माधव से प्रेम करने लगी हैं |

विमल बहन तो बन गयी थी पर उसने ठान लिया था | माधव उसका न हुआ तो क्या हुआ उसे कोमल का भी नहीं होने देंगी | प्रेम के टूटन ने विमल के ह्रदय और मस्तिष्क पर गहरा आघात कर दिया था | आचानक उसका स्वभाव बदल गया था | सभी उसके इस परिवर्तन से आश्चर्य चकित थे | वह न जाने रात-रात भर क्या सोचा करती थी | लगता था कि उसके दिमाग में बस यही चलता रहता कि कोमल को माधव से कैसे जुदा किया जायें | वह हर बार नये-नये पैंतरे आजमाती थी | वह विमल के मन में माधव की बुराइयाँ करने लगी थी | उसने धीरे-धीरे उसके मन में जहर भरना आरम्भ कर दिया था | और उधर माधव के मन में कोमल के बारें में …| दोस्ती में कुछ दरार-सी साफ झलकने लगी थी | कुछ मन मुटाव के बाद फिर से उनमें गहरी दोस्ती हो गयी थी | अब माधव के ह्रदय में भी कोमल को लेकर हलचल मचने लगी थी | वह अब उससे प्रेम करने लगा था | पर उसने कभी उसे उजागर नहीं किया | वह सोचता कि कोमल न जाने उसके बारें में क्या सोचेगी | और वह समय की प्रतीक्षा में जुड़ गया |  कोमल का माधव के घर और माधव का कोमल से मिलने होस्टल आना बद्दतसुर जारी था | कभी गार्डन में, कभी चाय कैंटीन में, तो कभी सिनेमा हाल में | उनका अव्यक्त प्रेम सबको दिखाई देने लगा था | एक दिन कोमल ने उसे अपने घर चलने की जिद की थी | पर माधव ने कोई कारन बताकर आने से इनकार कर दिया था | इनकार सुनकर वह बहुत नाराज हो गयी थी | उसकी सुरत रोनी सी हो गयी थी | ऐसा लगता था कि वह अब रो पड़े ..| उस दिन वह बहुत बेचैन थी | उस दिन के बाद उसने कई दिनों तक माधव से बात करना टाल दिया था |

कई दिनों तक बात ना हो पाने के कारन माधव भी विरह में था | वह ठीक से सो न पा रहा था | और ना ही उसका किसी में मन लग रहा था | जब भी वह कोमल से बात करना चाहता था | तब कोमल उसे एक तो टालती या गुस्से में उसका अपमान करती | माधव समझ नहीं पा रहा था कि उसमें एकाएक ऐसा परिवर्तन क्यों आया | उसने बहुत जानने की कोशिश की पर उसने बताने से और बात करने से इनकार कर दिया | उन्ही दिनों उसने एक भयानक सपना देखा था | कोमल और माधव हाथ पकड़े हुए थे | कोमल मुस्कुरा रही थी | पर अचानक उसने उसका हाथ छोड़ दिया | कोई उसे खींचता हुआ ले जा रहा हैं | और वह जोर से चिल्हा रही हैं |   ’’ माधव..माधव…|’’   और वह गायब हो गयी | जब सपना टूटा तब वह रात भर सो न पाया था | वह सोच रहा था | कुछ तो अनिष्ट हुआ है | उसे लग रहा था कि अभी इसी वक्त जाकर उसे मिले | और देखे वह सुरक्षित तो है | उसपर कोई संकट तो नहीं आया | पर रात के तीन बज रहे थे | इस वक्त यदि वह बाहर गया तो घर के सब लोग परेशान हो जायेंगे | उसी समय उसने तय कर लिया था कि वह उससे ही शादी करेगा | वह उसके बिना नहीं रह सकता | भले ही वह दूसरे जाति की थी |  उनके प्रेम जाति देख कर नहीं हुआ था | वह तो हो गया था | सुबह ही उसने यह बात अपनी माँ से और फिर पिता को बता दी |

‘’ मैं कोमल से बेहद प्रेम करता हूँ | मैं उसके बिना नहीं रह सकता | मैं उसीसे ही विवाह करना चाहता हूँ | वह भी मुझसे प्रेम करती हैं | ‘’

घर के लोगों ने कोमल और उसके स्वभाव को देखा था | वे तो पहले से ही सोच रहे थे कि कोमल उनके घर की बहु बने | उस दिन वह बहुत खुश था | उसके सामने आसमान भी बौना पड़ रहा था | वह जल्द जाकर उससे अपने प्रेम और विवाह का इजहार करना चाहता था | उस दिन वह उससे मिलने और बात करने के लिए बेताब था | पर विमल उसे अब भी टाल रही थी | श्याम हो गई,.. तो माधव से रहा नहीं गया | वह हॉस्टल पहुँचा | और उसे अपने घर चलने के लिए कहा,

‘’ कोमल तुम्हे माँ याद कर रही थी | तुम्हे आज घर पर बुलाया हैं |’’

उसने रूखे स्वर में आने से इनकार कर दिया और कहा कि ,

‘’ मैं नहीं आ सकती माधव जी .. मुझे मिलने के लिए घर से कोई आया है | आप यहाँ से जा सकते हैं |’’

जब माधव उसे लिए बिना जाने को तैयार नहीं था | तब उसने सीधे कह दिया |

‘’ माधव जी, मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ | प्लीज आप यहाँ से जाइये | मैं अभी आपसे बात करने के मुड़ में नहीं हूँ | आप सीधे तरीके से जा रहे है, या वार्डन को बुलाऊं ..|’’

यह सुनना ही था कि माधव का सारा उत्साह, सारी ख़ुशी धरी की धरी रह गयी थी | उसे भी गुस्सा आ गया था | उसने जाते-जाते कहा,

‘’ आज यदि तुम्ह नहीं आयी तो मैं तुम्हसे कभी भी बात नहीं करूँगा | समझलेना हमारी दोस्ती टूट गयी |’’

वह खमोश थी | माधव ने आखरी बार उसकी और गुस्से में देखा और वह चलता बना | रात भर वह सो नहीं पाया कि उसने ऐसा क्यों किया | उसकी आखों में आँसू और गुस्सा था | अब वह उससे कभी बात नहीं करेगा | उसके सपने टूट चुके थे | जब वह सुबह कॉलेज गया | तब गेट पर उन्ह्की मूक मुलाखात हुई | वह भी रात भर रोई थी | उसकी आँखे सूजी हुई थी | उसे बिना बात किये माधव, कोमल को लाँघ गया था |

कुछ दिनों के बाद एक दिन श्याम को उसे भुलाने के लिए वह अपने मित्र के साथ शहर के बागीचे में गया था | बागीचे के गेट पर विमल से मुलाक़ात हुई | जो किसी का इंतजार कर रही थी | उसने उन्हें रोकने का प्रयास किया और बाहर किसी होटल पर चलने के लिए कहा | पर अब माधव, कोमल से जुडी हुई यादों से दूर जाना चाहता था |वह विमल से भी दूर जाना चाहता था | जब वह बागीचे में अपने दोस्त के साथ गया | तब उसने देखा कि कोमल किसी के हाथ में हाथ डाले घूम रही हैं | उसे अब समझ आया था कि विमल ने ऐसा क्यों कहा था | उस समय उसके पैरों तले की जमीन खिसक गयी थी | उसने अपने ह्रदय पर पत्थर रखा और अजनबी की भाँती वहां से आगे चलता बना | कुछ दिनों बाद पता चला कि वह कोमल का मंगेतर था | उसे याद आया कि उस दिन कोमल ने उसे अपने घर चलने के लिए क्यों कहा था | क्योंकि वह माधव को अपने माता-पिता से मिलवाना चाहती थी | वह किसी और से विवाह नहीं करना चाहती थी | उसने अपने माता-पिता से भी बात कर ली थी पर माधव ने आने से इनकार कर दिया था | और जब माधव नहीं आया तो उसके माता-पिता ने उसका विवाह किसी ओर से तय कर दिया | जब माधव कोमल को अपने घर बुलाने के लिए हॉस्टल गया था | तब कोमल ने इसी कारन से इनकार कर दिया था | वह चली भी जाती और सच्चाई बता भी देती पर उसके दायें पैर पर एक बड़ी पुंसी आगयी थी | जिस कारण उसका पैर सूज गया था | और वह ठीक से चल नहीं पा रही थी | पुंसी के कारन उसे वेदना हो रही थी | वह थोडा भी हलचल करती तो उसे दर्द हो रहा था |  उस दिन कोमल के साथ विमल ने भी आँसू बहाये थे | विमल को पश्च्याताप हो रहा था कि उसी के कारन यह सबकुछ हुआ हैं | विमल,कोमल,माधव बाहर से मुस्कुराते हुए नजर आ तो रहे थे पर वे भीतर ही भीतर आँसू बहा रहे थे | तीनों के मुख से अनायस ही एक ही शब्द निकला था…’मिस्टेक’ |

 

-  डॉ. सुनिल जाधव

 नाम :  डॉ.सुनील गुलाबसिंग जाधव

शिक्षा : एम.ए.{ हिंदी } नेट ,पीएच.डी

कृतियाँ : {कविता} : १.मैं बंजारा हूँ  २.रौशनी की ओर बढ़ते कदम  ३.सच बोलने की सजा            ४.त्रिधारा   ५. मेरे भीतर मैं {कहानी} : १.मैं भी इन्सान हूँ  २.एक कहानी ऐसी भी                             .   {शोध}:१.नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य  २.हिंदी साहित्य विविध आयाम  ३.दलित   साहित्य का एक गाँव  {अनुवाद} : १.सच का एक टुकड़ा [ नाटक ]{एकांकी} १.भ्रूण  

संशोधन : १.नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य का अनुशीलन

                 २.विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में लगभग पचास आलेख प्रकाशित

अलंकरण एवं पुरस्कार  : १.अंतर्राष्ट्रीय सृजन श्री पुरस्कार [ताशकंद]

                  २. अंतर्राष्ट्रीय सृजन श्री पुरस्कार  [दुबई]

                  ३.भाषा रत्न [दिल्ली]

                  ४.अंतर्राष्ट्रीय प्रमोद वर्मा सम्मान [कम्बोडिया ]

                  ५. विश्व हिंदी सचिवालय, मोरिशियस दवारा कविता का अंतर्राष्ट्रीय प्रथम

                      पुरस्कार       

विदेश यात्रा :  १.उज्बेक [रशिया ]  २.यू.ए.इ  ३.व्हियतनाम  ४.कम्बोडिया  ५.थायलंड

विभिन्न राष्ट्रिय अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आलेख, कविता, कहानियाँ प्रकाशित :

   नव्या ,सृजन गाथा, प्रवासी दुनिया, रचनाकार, पुरवाई, रूबरू, हिंदी चेतना, अम्स्टेल गंगा,

   साहित्य सरिता, आर्य संदेश, नव निकष , नव प्रवाह, १५ डेज,  अधिकार,  रिसर्च लिंक,

   शोध समीक्षा एवं मूल्यांकन,  संचारिका,  हिंदी साहित्य आकादमी शोध पत्रिका, केरल,  

   आधुनिक साहित्य,  साहित्य रागिनी, खबर प्लस ..आदि |     

काव्य वाचन :

       १. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन, ताशकंद

       २. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन,दुबई

       ३. विश्व कवि सम्मेलन, कैनडा

       ४. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन,कम्बोडिया

सम्प्रति : हिंदी विभाग ,यशवंत कॉलेज, नांदेड

पता : नांदेड ,महाराष्ट्र -०५

 

One thought on “मिस्टेक

  1. आदरणीय सम्पादक जी, बहुत-बहुत शुक्रिया …आपने मेरी कहानी को आपकी पत्रिका में स्थान दिया | आपका प्रोत्साहन भविष्य में नूतन सृजन की प्रेरणा रहेगी |
    पुन: धन्यवाद !

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