मानवता और मानव धर्म

शास्त्रों ने मनुष्य शव्द की व्युत्पत्ति के विषय में बताया है कि मनु से उत्पन्न मानव कहे जाते हैं। अमरकोष (मनुष्य वर्ग) में मनुष्या मानुषा मत्र्या मनुजा मानवा सः के आधार पर तथा ‘मनोर्जातास्तु मानवा‘ के अनुसार उक्त परिभाषा पुष्ट होती है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य में रहने वाले दया, दान, शील, सौजन्य, धृति, क्षमा आदि के समवाय से लोकोपकारक धर्म को मानवता कहतें हैं। इसके विपरित गुण (तत्व) को पशुता अथवा दानवी धर्म कहा जाता है।

रूप को देख कर अयं मानवः (यह मनुष्य है) कहना ही पर्याप्त नहीं है। कुछ व्यक्ति ‘आकृतिग्रहणा जातिः‘ (व्याकरण भाष्य) के सिद्धान्त से मनुष्य के रूप, आकार प्रकार को देखकर उद्बुद्ध होने वाली जो मनुष्यत्व जाति है, उसी को मनुष्य शब्द का प्रयोजक धर्म कहते हैं, किन्तु व्यवहार में कोई किसी मनुष्य को देखकर कहता है कि यह मनुष्य है तो यहाँ पर मनुष्यत्व जाति मनुष्य शब्दार्थ प्रयोग का हेतु नहीं है बल्कि मनुष्य में रहने वाला यह एक असाधारण धर्म है जिसे ही हम मानवता कहते है जो सत्यवादी हो, तथा कृतज्ञ हो, ऐसे महापुरूष में रहने वाले धर्म-विशेष को ही मानवता कहा जाता है न कि समस्त पामरापामर में रहने वाले आकृत्या व्यड़ग्य मनुष्यत्व जाति में रहने वाले गुण धर्म को किसी मनुष्य विशेष के लिए मानवोऽयम् व्यवहार किया जाता है तो यह मनुष्य शब्द का लोक और शास्त्र उभयसम्मत अनन्त उज्ज्वल, स्वच्छ गुण विशिष्ट मनुष्य, यही अर्थ किया जाता है। मानव संबन्धी इन्हीं स्वच्छ गुणों को ‘मानवता‘ शब्द से अभिहित किया जाता है।

मानव में प्राकुतिक रूप से तीन प्रकार के गुण पायें जाते हैं। सत्व, रज और तम। मानवता गुण विशिष्ट मानव में सत्व गुण की प्रधानता रहती है, जिससे उसमें त्याग, तप, सत्य, सदाचार, परोपकार और अहिंसादि समदमये गुण स्वभावतः पाये जाते हैं। मानवता गुण विशिष्ट व्यक्ति सर्वदा सिद्धसंकल्प, सर्वसुहृद्, समदर्शी और सर्व हितैषी होता है। वह आत्मा और परमात्मा में भेद नही मानता। वह धर्म के बल पर सदैव निर्भीक रहता है और आत्मवत् सर्वभूतेषु के अनुसार प्राणि मात्र में अपनत्व समझकर उन पर दया और प्रेमभाव रखता है। वह अपने प्रत्येक कार्य में परोपकार और सद्भावना का भाव रखता हुआ प्राणिमात्र के प्रति सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना करता है।

प्राचीन काल में मानव अपनी मानवता की सर्वात्मना रक्षा करते थे। वे मानवता को अपना परम धर्म और धन मानते थे। मानवता के बल पर ही वे अपना और संसार का कल्याण करने में सक्षम व समर्थ हुआ करते थे। आज इस तमोगुण प्रधान कलियुग में पाप का स्रोत प्रबलता से प्रवाहित हो रहा है। इस पाप के प्रवाह में प्रवाहित मानव अपने वास्तविक धर्म कर्म से विमुख होता जा रहा है जिससे उसमें मानवता का भी हॉस होता जा रहा है। मानवता के हॉस से मानव अपने आदर्शो से च्युत हो गया है, जिससे संसार में उसकी छवि दिनोंदिन धूमिल होती जा रही है। यही कारण है कि आज का मानव दूसरों अथवा संसार के कल्याण करने की बात तो दूर, अपना कल्याण करने में भी सर्वथा असमर्थ, और असहाय हो चुका है। मानवता के हृ्ास से देश और समाज की महान क्षति होती है। अतः मानवता की रक्षा और उसका परिज्ञान प्रत्येक मानव को होना ही चाहिए। मानवता ही मानव और अमानव का परिचय करती है। मानवता के अज्ञान से मनुष्य भूलकर कभी अमानव को भी मानव मान लेने पर उसका अनिष्ट होना दुर्निवार है जिसके कारण वह विविध प्रकार की आपत्ति विपत्ति, धोखा, और कष्ट का शिकार हो सकता है। अतः मानव मात्र को मानवता का ज्ञान होना परमावश्यक है। मानवता ही मानव को स्वाभिमान की प्रेरणा देती है जिससे वह अपने सम्मानपूर्ण जीवन के लिए प्रेरित होकर उसमें स्वतन्त्रता की प्रवृत्ति और परतन्त्रता की निवृत्ति के लिए उद्यत होता है।

जिन महापुरूषों ने जीवन में यश-कीर्ति आदि अर्जित की है, या जो कर रहें हैं वह केवल मानवता के बल पर। मानवता से हीन हमारा ज्ञान विज्ञान, धर्माधर्म, विशिष्ट पांडित्य आदि सब व्यर्थ है। अतः मानव जीवन में मानवता की विशेष आवश्यकता है और आज मानवता के रक्षण और पालन पर सबको विशेष ध्यान देकर उसको धारण करने की आवश्यकता है। तभी मानव धर्म, मानव समाज तथा राष्ट्र की रक्षा हो सकती है। अतः समस्त मानवों को मानवता गुण विशिष्ट धर्म को धारण करना चाहिए।

प्राचीन काल के महर्षियों ऋषियों एवं मनीषियों तथा आधुनिक भौतिक विज्ञान विदों की मान्यता है सदैव मानव की सर्वविधा समग्र उत्थान और उन्नति का एकमात्र साधन मानवता ही है। आज के स्वतन्त्र भारत में वर्तमान में जो अनर्थ-अन्याय-अत्याचार हो रहे है उसका मूल कारण व्यक्ति में मानवता का हॉस है। संसार की सभी वस्तुएँ आधेय और आधार पर निर्भर रहा करती हैं। अतः आधेय का आधार के बिना काम और आधार का आधेय के बिना काम नहीं चलता है, ठीक वही व्यवस्था मानव की है। मानव आधेय है और उसकी मानवता आधार है। मानवता रूप आधार के बिना आधेय रूप मानव की रक्षा कथमपि सम्भव नहीं हो सकती। अतः धार्मिक, आर्थिक, आघ्यात्मिक, राजनीतिक और सामाजिक उत्थान के लिए मानव को सर्वात्मना मानव को सर्वदा धारण करना चाहिए। प्रत्येक मानव के लिए जीवन में मानवता का रक्षण और पालन आवश्यक है, उतना ही आवश्यक धर्म का पालन और रक्षण आवश्यक है। धर्म के बिना मानव और उसमें रहने वाली मानवता की रक्षा कथमपि नहीं हो सकती है। अतः मानव को अपने जीवन के सर्वविध कल्याण के लिए धर्म को अपनाना चाहिए। धर्म और मानवता का परस्पर अन्योन्याव्रित संबंध सृष्टि के आदि काल से ही चला आ रहा है।

मानव धर्म का गुण विशिष्ट शास्त्रोक्त धर्म मानवता ही है। अब हम धर्म के विशेष स्वरूप और उसकी व्युत्पति के विषय में बताना आवश्यक समझते हैं। सर्वप्रथम धर्म शब्द की व्युत्पत्ति को समझ लेना जरूरी है। धर्म शब्द के धृ धातु से बनने के कारण इसका व्युत्पत्ति निमित्त अर्थ धारतीति धर्मः अथवा ‘येनैतद्धार्यते  धम्र्मः‘ – जो धारण करे अथवा जिसके द्वारा यह संसार धृत (रक्षित) हो उसे धर्म कहते हैं। वेदों के मतानुसार धर्म संसार की स्थिति का मूल है। धर्म से पाप दूर हो जाता है। धर्म के द्वारा ही सकल संसार स्थित और रक्षित है। धर्म को ही परमपदार्थ कहा गया है, इसीलिए संसार के लोग धर्मात्मा का अनुसरण करते हैं। भगवान वेदव्यास ने कहा है- धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मों धारयते प्रजाः‘। अर्थात जिस ऐसी शक्ति के द्वारा सम्पूर्ण सृष्टिक्रिया धृत अर्थात् रक्षित हो रही है उसी का नाम धर्म है। सृष्टि के समस्त पदार्थों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है 1- जड़ तथा 2- चेतन। अतः इन दोनों पदार्थों को जिस ईश्वरीय शक्ति ने धारण कर रखा है वही धर्म है। संक्षेप में धर्मी की योग्यता शक्ति ही धर्म है। धर्म विहीन जड़ या चेतन पदार्थ का संसार में कोई अस्तित्व ही नहीं अग्रि का उष्णत्व, जल का द्रवत्व, चुम्बक की लौहाकर्षण शक्ति, मनुष्य का मनुष्यत्व (मानवता), पशु का पशुत्व, ब्राहमण का ब्राहमणत्व का अस्तित्व उसकी धर्म शक्ति से ही है। धर्म की अलौकिक शक्ति से ही समस्त विश्व ब्रहमाण्ड रक्षित हो रहा है।

चेतन जगत में धर्म की नियामिका शक्ति पूर्णतया दृष्टिगोचर होती है। व्यक्ति सृष्टि क्रम के अनुसार जीवभाव का विकास उद्मिज योनी से प्रारम्भ होकर क्रमशः योनियों में भ्रमण करता हुआ मनुष्य योनि प्राप्त करता है। इस प्रकार धर्म शक्ति द्वारा ही समस्त जीव क्रमोन्नतिलाभ करते हुए परमपद् को प्राप्त करते हैं। केवल चेतन जीव मनुष्य में ही कर्म करने की स्वतन्त्रता और विचार बुद्धि व विवके होने से उनमें धर्म का विकास स्वतन्त्रता के साथ पूर्ण रूप् से हो जाता है। अतः मनुष्य ही धर्म-साधन का अधिकारी होता है। महाभारत में वेदव्यास जी ने कहा है-

मानुषेषु महाराज धर्माऽधर्मौ प्रवर्ततः। न तथाऽन्येषु भूतेषुमनुष्य रहितेष्विह अर्थात मनुष्य में ही धर्म और अधर्म की प्रवृत्ति स्पष्टतः लक्षित होती है। यही वह योनि है जिसको प्राप्त कर जीव (मनुष्य) शुभकर्म करता हुआ मुक्ति को प्राप्त कर सकता है। धर्म के प्रधान तीन अंग हैं- दान, तप और यज्ञ। गीता में भगवान ने कहा है- यज्ञो दानं तपश्चैव, पावनानि मनीषिणाम्।

दान धर्म- के भी तीन अंग हैं- (1) अभयदान (इसमें दीक्षादान भी शामिल है) (2) विद्यादान और (3) अर्थदान (धन, अन्न, वस्त्र, भूमि आदि)। दान के इन तीन अंगों के सत्व, रज और तम गुणों के भेद से तीन-तीन भेद और है। इस प्रकार से दान धर्म के कुल नौ भेद है।

तप धर्म- न्यायिक, वाचिक और मानसिक (वृत्तियों) शक्तियों को रोककर द्वन्द्वसहिष्णु होने को तप कहतें हैं। इसके तीन भेद हैं- (1) शारिरिक तप, (2) वाचनिक (वाचिक) तप (3) मानसिक तप। तप के इन तीनों अंगों के भी सत्व, रज और तपोगुण के अनुसार तीन-तीन भेद हैं।

यज्ञ धर्म- यज्ञ धर्म के अनेक अंग हैं। यज्ञ धर्म का ही दूसरा नाम ‘याग‘ है। सामान्सतः इसके भी मुख्य भेद तीन ही हैं।-(1) कर्म यज्ञ, (2) उपासना यज्ञ (3) ज्ञान यज्ञ। इन तीनों अंगों में से प्रत्येक के भेद निम्नवत हैं-

प्रथम कर्म यज्ञ के प्रधानतः छः भेद हैं- (1) नित्यकर्म (संध्यावंदनादि), (2) नैमित्तिक धर्म् (तीर्थाटन आदि), (3) कान्य कर्म (पुत्रेष्टियज्ञादि), (4) आध्यात्मिक धर्म (देशोपकार आदि), (5) अधिदैव धर्म (वास्तुयागादि), (6) अधिभूत कर्म- (ब्राह्मण योजनादि)। इनके भी सत्व, रज और तमोगुण आधरित तीन-तीन भेद हैं।

उपासना यज्ञ- उपासना यज्ञ का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। उपासना पद्वति के अनुसार पांच भेद हैं- (1) ब्रह्ोपासना, (2) सगुणोपासना (पंचोपासना), (3) लीलाविग्रहोपासना (अवतरोपासना), (4) ऋषि, देवता और पितृगण उपासना, (5) क्षुद्र देवता और प्रेतादि उपासना। इसके अतिरिक्त साधन पद्वति के अनुसार चार विधि हैं- (1) मंत्रयोग विधि (स्थूल मूर्तिमय ध्यान), (2) हठयोग विधि (ज्योर्तिध्र्यान), (3) लययोग विधि (बिन्दुध्यान), (4) राजयोग विधि (ब्रह्मध्यान)। उपासना यज्ञ के नौ अंगों के भी सत्व, रज और तम गुणाधारित तीन-तीन भेद हैं।

ज्ञान यज्ञ- ज्ञान यज्ञ के प्रधानतः तीन अंग हैं-

(1) श्रवण (शास्त्र, सत्संग अथवा गुरूमुख से) (2) मनन (ज्ञान भाव का) (3) निदिध्यासन (ज्ञान भाव में) ज्ञान भाव के इन अंगों के भी सत्व, रज और तम गुणानुसार तीन-तीन भेद हैं।

यहां यह भी जान लेना जरूरी है कि उपरोक्त धर्मांगों में कोई भी धर्मांग व्यष्टि जीव की आत्मोन्नति एवं अभीष्ट पूर्ति के लिए अनुष्ठान के तौर पर संपन्न किया जाता है तो वह यज्ञ कहा जाता है और जब वही अनुष्ठान समष्टि के कल्याणार्थ किया जाता है तो उसे महायज्ञ कहते हैं। सनातन धर्म के इन अंगों में से किसी अंग का पूर्णतः शास्त्रोक्त सात्विक ढंग से साधन कर मनुष्य मुक्तिपद प्राप्त करता है। अग्रि का एक स्फुलिंग भी पूर्णतः दाहकार्य कर सकता है।

मानव जन्म से सनातन धर्मा है। सनातन वैदिक धर्मव्यवस्था के अधीन वह वैदिक संस्कृति को धर्म के रूप में आचरण करते हुए उत्तरोत्तर विकास मार्ग पर अग्रसर होता है। धर्म का स्वरूप विराट् है और उसका विस्तार भी विशाल क्षेत्र में है। चेतन राज्य में मानव का पूर्ण प्रशस्त्र अधिकार होने से वह बुद्विविवेक का उपयोग करते हुए क्रमशः परमपद तक पहुॅच सकता है। उपरोक्त धर्म, धर्म के अंग और उपांग बताये गये हैं उसका आचरण मात्र मानव ही कर सकता है और करता है असलिए मनुष्य योनि सृष्टि की श्रेष्ठ योनि मानी जाती है वैदिक धर्म को सांगोपांग धारण करना तदनुसार आचरण करना मानव धर्म की श्रेष्ठता है।

उपरोक्त धर्म के एक अंग के रूप में वैदिक व्यवस्था के अन्तर्गत समान और विशेष धर्मों की व्यवस्था मनुष्य में मनुष्यतत्व की बृद्वि करने के लिए हैं। आश्रम धर्म के अन्र्तगत ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्य आश्रम और सन्यास आश्रम के नियमानुसार आचरण से भी मानवीय गुणों व धर्म का विकास होकर मोक्ष पद की उत्पत्ति कराता है इसी प्रकार वर्णाश्रम धर्म में- ब्राह्मण, श्रत्रिय, वैश्य और शुद्र अपने अपने वर्णानुसार कर्म करते हुए मोक्ष को प्राप्त हो सकते है। यह सब धर्म के उपांग कहे जाते है और सामान्यतः हर वर्ग और वर्ण के मानव को स्वधर्म का पालन करते हुए प्रतिष्ठा और समृद्वि का आधार हैं। मानव आधार है तो मानव धर्म (मानवता) आधेय है सारांशतः-

श्रुतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति मानवाः।

मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानराः।

अर्थात्- श्रुतिपरायण होना मनुष्य का परम धर्म है। इसके विपरित आचरण करना अधर्म और अमानवीय है।

 

- कमलेश  कुमार राय

अध्यक्ष , मानवधर्म ट्रस्ट ,

अध्यक्ष , स्वराज महासभा

वाराणसी, भारत

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