मातृभाषा

मातृभाषा है सबसे बढ़कर
भूल न जाना इसे ज्ञान पा कर
होगी तेरी इससे तरकी, हो जाए गा तू महान.
आपना भाषा अपनी ही होती
पुरे जिंदगी का है ये वरदान .

 
माँ के गोद से जो सिखा ,वही है तेरी मातृभाषा
मराठी,भोजपुरी या हो बंगाली, पंजाबी
इसी से है जीवन का सचा ज्ञान .
कोई बोले जुगराती,ओडिया और बोल रहा द्रविण भाषा.

 
अपनी भाषा पर अमल करो
इसकी करो इज्जत सदा .

अपनी मिट्टी अपनी भाषा की कसमे खाओ तुम सदा .
कसमे को तुम न व्यर्थ करना
जान देकर इसकी लाज बचाना .

 
मातृभाषा “”:- क्या करे यारो ये है कलयुग का साम्राज्य
अपना अपना नहीं होता .
ठुकरा दिया है सब हमको न करता कोई मेरी इज्जत .
भा गया है बिदेसी शराब, न पिरहा कोई देसी.

 
महान ज्ञानी क्रांतिकारियों ने मिलकर बनाया हिंदी को राष्ट्र भाषा.
ठुकरा दिया है इसे भी यार, कैसी है ये कलयुग का साम्राज्य .
जरा समलो , जरा बचालो बना लो आपनी खुद का पहचान .

 
देखो यारो चीन और जापान किया अपनी भाषा का सम्मान .
विकास हुआ ,शिक्षित हुआ बना उनका खुद का पहचान .
मातृभाषा का इज्जत करो, होगा देश का नाम.

 

- प्रिंस रितुराज

ये रचनाकार के रूप में अपना हुनर दिखाना चाहते हैं। 
दिल्ली से छपने वाली भोजपुरी/हिंदी पत्रिकाओं में इनकी रचना प्रकाशित होती रहती है। 
वर्तमान में ये भारत में हैं।

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