महाभारत की विशेष लोकनाट्य शैली : पंडवानी

भारतीय साहित्य में  दो प्रमुख आख्यान है-रामायण और महाभारत| जन मानस पर ये दोनों महाकाव्यों  का इतना अधिक  प्रभाव है, शायद ही किसी दूसरे ग्रन्थों का होगा| क्योंकि भारतीय साहित्य, काव्य, मिथक, इतिहास, नृत्य, नाट्य, चित्रकला एवं समस्त शिल्प कलाओं पर इन दोनों ही आख्यानों ने अनेक कलारूपों के सृजन को प्रोत्साहित किया है| भारत में बौद्धिक, शास्त्रीय आभिजात्य कलारूपों के इतर लोकजीवन में भी लोक कलाकारों ने अपनी-अपनी विधाओं में अनेक कलारूपों का विकास किया है|

 

                  कृष्ण चरित्र के दो पक्ष एक बाल्यकाल और दूसरा महाभारत से जुड़ा हुआ है| बाल्यकाल से संबंधित ‘रहस’अथवा ‘रहस लीला’ नाट्य है| जो छत्तीसगढ़ में प्रचलित है| इसे ‘रतनपुरिया रास’भी कहते हैं| कृष्ण चरित्र का दूसरा नाट्य रूप महाभारत पर आधारित है, जो महाभारत अथवा पंडवानी के नाम से प्रचलित है| पंडवानी एक पात्रीय नाट्यरूप है| ‘पंडवानी’ छतीसगढ़ का प्रमुख लोकनाट्य है |पंडवानी शब्द की व्युत्पत्ति पांडव और वाणी दो शब्दों को मिलाने से हुई है, जिसका अर्थ है -‘पांडवों की कथा’ पंडवानी का मूल कथानक तो महाभारत पर ही आधारित है|

                  “पंडवानी”का स्वरूप आरम्भ में गाथा रूप में था,जिसे परधान गोंड गाते थे|परधान गोंड की एक उपजाति है और देवार घुमन्तु जाति है| परधान जाति के कथावाचक या वाचिका  के हाथ में ‘किंकनी’ होता है, देवार के हाथों में ‘रुन्झु’ होता है| परधानों से यह गाथा सम्पूर्ण गोंडवाना में प्रचलित हुई |कलाकारों की एक अन्य घुमन्तु जाति देवारों ने इसे परधानों से अपनाया और उनके द्वारा यह सम्पूर्ण छतीसगढ़ में फ़ैल गई| १९ वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में इस गाथा का विकास लोकनाट्य रूप में होने लगा और बीसवीं शताब्दी में पूर्ण रूप से नाट्य रूप में विकसित होकर स्थापित हो गई| तीजन बाई ने पंडवानी को आज के सन्दर्भ में ख्याति दिलाई, न सिर्फ हमारे देश में,बल्कि विदेशों में भी ख्याति दिलाई है|

               पंडवानी का एक पात्रीय नाट्य रूप सबलसिंह चौहान के हिंदी महाभारत पर आधारित है, जिसे ये पंडवानी कलाकार सबलसिंह चौहान का ‘गुटका’ कहते हैं| परधान पंडवानी का प्रलेखन प्रथम बार सन १९६२ में हुआ था| मोरिस विंटर निज जैसे विद्वान कहते हैं महाभारत का आरंभिक स्वरूप गाथा का ही था जिसे भाट या गाथा गायक प्रस्तुत किया करते थे| कहा कि- “ हमारे पास इस प्रकार के कारण विधमान है जिनसे हम विश्वास कर सकते हैं कि इनमें से अनेक प्रसंगों को गाथा गायक स्वतंत्र काव्य के रूप में प्रस्तुत किया करते थे| ऐसी स्थिति में महाभारत ग्रन्थ महाभारत युद्ध की एक वीरगाथा मात्र नहीं  है, वरन वह प्राचीन गाथाओं का एक समग्र कोश है|”(१ )

                  सम्पूर्ण भारत में अनेक ऐसी गाथाएँ है जिसके आधार पर नाट्य रूप विकसित हुए विधमान हैं – आसाम का ओझा पल्ली,कर्णाटक का ताल मद्दले, आंध्रप्रदेश का बुर्राकथा, महाराष्ट्र का गोंधल और बिहार का किर्तिनिया|

                  भारत के अनेक क्षेत्रों में महाभारत की कुछ लोक शैलियों का विकास हुआ है| लोक शैलियों का विकास अधिकतर नीची जातियों द्वारा  हुआ है| उत्तर भारत के मेवात क्षेत्र के मीरासियों द्वारा गाया जानेवाला पांच कड़ा लोककाव्य महाभारत का ही मेवात बोली में उपलब्ध लोक स्वरूप है| पांडू का कड़ा भी  कहा है| यानि पांच खंड |नर्मदा और मही  नदी के बीचवाले विस्तृत क्षेत्र में महाभारत का लोक स्वरूप पंडवानी के नाम से प्रचलित है|  पंडवानी के अधिकांश कथावाचक न सिर्फ नीची जातियों से आते हैं| सर्वाधिक गोंड समुदाय के हैं| गोंड जन जाति में प्रचलित चार महाकाव्यों में से एक पंडवानी है| गोंडवानी, रामायनी एवं करमसैनी लोक के अन्य तीन महाकाव्य हैं| करमसैनी अब लुप्तप्राय हो चूका है|

                  परधानों की पंडवानी में मूल गाथा तो महाभारत पर ही आधारित है लेकिन लोक कथाओं, लोक नायक और स्थानों के नाम स्थानीय प्रभाववश जुड़ गए हैं| गोंड मिथकों का मिश्रण हुआ है| इन लोगों के अलावा देवार जाति के लोग भी पंडवानी गाथाएं गाते हैं| देवार, गोंड एवं कंवर से उत्पन्न हुए हैं|जो सारंगी बजाते हैं| व्यवसाय में जादू अब गौण हो गए हैं| परधानों और देवार दोनों ही जातियों के गायकों द्वारा गायी जानेवाली गाथाएँ लगभग समान है|  वह लोग गायक चिकारा सद्रश्य तंतु वादय पर गाथाएँ गाते हैं, जिसे स्थानीय बोली में सारंगी कहा जाता है| गाथाओं का कथानक, भाषा एवं गायन की शैली भी अत्यधिक मिलती जुलती है| देवार अपनी मूल भाषा को फारसी कहते हैं, जो मंडला की छतीसगढ़ के अधिक समीप है| यहाँ यह फारसी बोली से उनका तात्पर्य फारसी भाषा से कदापि नहीं है| मध्यप्रदेश की अनेक जनजातियां अपनी ठेठ बोलियों को फारसी विशेषण से संबोधित इसलिए करती हैं , क्योंकि उन्हें समझने में अन्य लोगों को कठिनाई होती है|

                  लेकिन  परधान और देवारों में मूल अंतर यह है कि परधान प्रवास के उपरांत अपने घर वापस आ जाते हैं, जबकि देवार किसी समय विशेष में अपनी भूमि से उखड गए और उन्होंने घुमंतू जीवन शैली अपनाई| देवार जाति का पंडवानी के प्रचार -प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान रहा है|

छतीसगढ़ में पंडवानी की दो शैलियाँ मिलती है-

1.कापालिक

2.वेदमती

‘कापालिक’ शैली लोकोन्मुखी है जिसे गायक स्वतंत्रता पूर्वक गाता है| इस शैली में लोक तत्वों, लोक कथाओं, क्षेत्रीय एवं जातीय मिथकों का बेधड़क समावेश करता है| ‘कापालिक’ का अर्थ तांत्रिक समुदाय नहीं बल्कि लोक की स्मृति का पर्यायवाची है, जो कपाल में सुरक्षित है उसे स्थानीय लोग ‘कापालिक’ कहते हैं|

      पंडवानी की प्रथम शैली जिसे कापालिक कहा जाता है| निषाद, बहेलिया,कंवर,सतनामी,तेली आदि अनेक कलाकार पंडवानी गाने लगे| एक तरफ द्विजों के बीच महाभारत या भागवत का पारायण ब्राह्मण कथा वाचकों द्वारा किया जाता था| जहाँ दलित जातियों को जाने की मनाही होती थी, तो दूसरी ओर लोक में महाभारत की ऐसी शैली का प्रचार -प्रसार हो रहा था जिसके प्रस्तोता और श्रोता दोनों ही सर्व साधारण जन थे जो नीची जातियों के थे| यही वजह है कि महाभारत की लोकशैली को छतीसगढ़ में एक व्यापक जनाधार एवं लोक सरंक्षण उपलब्ध हुआ|

‘वेदमती’ का अर्थ वे काव्य अथवा गाथाएँ हैं जो लिपिबद्ध होकर ग्रन्थ रूप में आ चुकी है| लिखित शब्द को स्थानीय बोली में वेद कहकर संबोधित किया जाता है|

पंडवानी की लोकप्रियता से ब्राहमणों ने व्यंग्यात्मक आक्षेप किए,गोंड गंवार क्या जाने महाभारत शास्त्र| “अरे अच्छे –अच्छे पंडितों के बस का नाम नहीं है जो शास्त्र, उसे अपढ़ गंवार गाने लगे हैं, जिन्हें न पढ़ना आता है, न शात्र का ही कोई ज्ञान है और न कथा का ही कोई सिर पैर जिन्हें मालूम हो, वे क्या महाभारत सुनाएंगे|” (२) इन्हीं व्यंग्यात्मक बाणों ने उन्हें  महाभारत पढ़ने के लिए प्रेरित किया| इसे समझना इन अनपढ़ों के बस की बात नहीं थी, लेकिन जब हिंदी भाषा में लिखित पद्य बद्ध महाभारत की रचना सबल सिंह ने की तो पंडवानी गायकों ने इसे ही अपना लिया, इन्हों ने दोहों और चौपाईयों में समग्र कथा का वर्णन किया है| महाभारत की मूल कथाओं के अनुरुप शुद्धिकरण की इस ब्राह्मण वृति के परिणाम स्वरूप लोक तत्वों का अधिकाधिक त्याग कर जिस पंडवानी शैली का विकास छतीसगढ़ में हुआ उसे वेदमती शैली कहा गया|

वर्तमान स्वरूप –

आज कथा वाचन के साथ –साथ अभिनय भी समाविष्ट हो गया है,नया नाटकीय एवं रोचक शैली का विकास होता हुआ द्रष्टिगत होता है| प्रथम महा युद्ध के दौरान छतीसगढ़ में मराठों के साथ तेलुगु भाषी भी आए |फिर स्थाई रूप से यही रहने लगे |कथा वाचकों के संपर्क में आए आंध्र की बुर्रा कथा शब्द तम्बूरा कथा का अपभ्रंश है|उन्होंने ही तम्बूरा बजाते हुए हाव भाव के साथ प्रस्तुति की जानेवाली प्रयोग धर्मी कथा को बुर्रा कथा कहा है| जिसमें तम्बूरा का प्रथम अक्षर ‘त’ लुप्त हो गया है, बूरा शब्द का बुर्रा हो गया है| बुर्रा कथा में तम्बूरे को कलाकार न सिर्फ वाद्य के रूप में प्रयोग में लाता है, वरन कभी योद्धा की गदा के रूप में प्रयोग करते हुए नाटकीय स्थितियों की प्रस्तुति अभिनय द्वारा करता है| वर्त्तमान में बुर्रा कथा और पंडवानी के स्वरूप में समानता  द्रष्टिगत होती है| आज कल पंडवानी में तबला, हारमोनियम, खंजड़ी, मंजीरा आदि वाद्यों का भी प्रयोग होता है| पंडवानी में अभिनय शैली का विकास शायद बुर्रा कथा का ही प्रभाव माना जा सकता है| पुरुष एवं स्त्री दोनों ही कलाकार गाते हैं| पुरुष गायक आमतौर पर बैठकर गाते हैं, जबकि स्त्रियाँ  खड़े होकर नृत्य करते हुए पंडवानी प्रस्तुत करती हैं| एक हाथ में तम्बूरा तथा दूसरे में करताल लिए छतीसगढ़ी भाषा में गाते हैं| अक्सर संगत में साज पर चार या पांच कलाकार होते हैं एवं एक रागी होता है, जो गायक होता है उनके साथ हुंकारा भरता है| बीच बीच में टिप्पणी भी करते हैं, सम्पूर्ण पंडवानी १८ दिन तक चलती है| रात्री के समय चलती है| वर्तमान में श्री झाडूराम देवांगन,पुनाराम निषाद,रेवाराम आदि प्रमुख है| महिलाओं में तीजन बाई,लक्ष्मीबाई,प्रभा यादव,पुन्नी बाई, शान्ति बाई चेलक, ऋतु वर्मा और उर्मिला बाई आदि|

तीजन बाई देश ही नहीं विदेशों में डंका बजा चुकी है| पंडवानी की प्रतिष्ठा प्रबुद्ध जनों में बढ़ने से लोक जीवन में भी उसकी पुनर्प्रतिष्ठा हुई है, जिससे पंडवानी के भविष्य के प्रति नई आशाएं बढ़ी है| इन्हीं कलाकारों की  वजह से लम्बे समय तक जन मानस में सुरक्षित रख सकते हैं| लोक संस्कार, लोक कथा, लोक साहित्य जिसे समाज कहीं भूलता हुआ बिसारता हुआ दिखाई दे रहा है इसे प्राण वान बनाने के लिए लोक कलाकार बड़ी निष्ठा से जुड़े हुए हैं उनको कोटि कोटि प्रणाम|

 

संदर्भ सूची-

|(१ )पंडवानी: निरंजन महावर :पृ:१५

(२) पंडवानी: निरंजन महावर :पृ:२८

 

- डॉ कल्पना गवली

एसोसियेट प्रोफेसर,
हिंदी विभाग,
कला संकाय, महाराजा सयाजी राव विश्वविधालय, बडौदा.

 

 

 

 

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