महात्मा

 

मैं पिछले तीस वर्ष से हेमा की कहानी लिखने से बचता रहा हूँ। हेमा की नहीं हेमलता की, उसे सब हेमा कह कर बुलाते थे। हेमा पुकारने पर उसका जवाब होता था  ‘जी साहिब’,  ‘जी बीबी जी’, मगर जब उससे उसका नाम पूछा जाता तो वह कहती थी  ‘जी हेमलता बेडऩी’ नाम है हमारा। उसी हेमा उर्फ हेमलता बेडऩी की कहानी के लिखने से बचता आया हूँ मैं, मगर आज मुझे बचने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। इस कहानी के दो मुख्य पात्र हैं एक मै और एक हेमलता।

मैं रिटायर्ड जेल अधीक्षक माधव सक्सेना हूँ, उम्र अगले माह तिहत्तर वर्ष पूरे कर जाऊँगा। पत्नी दो बरस पहले सफर में अकेला छोड़ कर चली गई, हालाँकि सेहत व उम्र के हिसाब से जाने की बारी मेरी थी, उसकी नहीं। मगर चित्रगुप्त की गणना तो उसकी अपनी होती है। बच्चे? जी बच्चे तो बहुत पहले ही घोसला त्याग कर उड़ारी ले गए। बच्चे कितने है ? जी इन फिजूल बातों का हेमलता की कहानी से कोई सरोकार नहीं है।

जब मैं रोहतक कारागार में सहायक अधीक्षक था तब हेमलता वहाँ उम्र कैद काट रही थी। उसने तीन कत्ल किए थे, एक अपने प्रेमी उदयबीर का, जिसे वह चौधरी का बेटा कहती थी तथा दो उसके दोस्त थे।

क्यों ? क्योंकि चौधरी का बेटा जिसे वह अपने विवाह से पूर्व तथा विवाह के बाद भी अपना प्रेमी मानती थी, उसे अपने दोस्तों को परोसने की हिमाकत कर बैठा था। हेमा के विरोध पर वे जबरदस्ती पर उतर आए थे, बस इसी बात पर उसने कमरे में पड़ी कुल्हाड़ी उठाकर उन तीनों को काट डाला था।

जेल आफिस में हेमा के केस की फाइल थी, लिखा था, मुकदमे के दौरान चौधरी के वकील ने उससे जिरह करते पूछा था कि जब वह अपनी माँ के कहने से विवाह पूर्व कई लोगों के बिस्तर गर्म कर चुकी थी तथा उदयबीर से भी संबन्ध बना चुकी थी तो उसने ये कत्ल क्यों किये ?

हेमा बिफर उठी थी कहने लगी  ‘‘साहिब मेरी माँ ने मुझे नौ महीने अपने गात में रखा- अपने खून से मुझे पाल, फिर अपना दूध पिलाया। उसका मेरे गात पर पूरा हक था अत: जहाँ वह कहती थी मैं चली जाती थी इससे वकील साहिब की माँ का क्या जाता है।’’

‘‘तुमने अभी माना है कि अपनी माँ के कहने से तुम अनेक लोगों के साथ सोई हो’’ वकील ने कहा।

‘‘जी साहिब मैं कब मना कर रही हूँ, माँ पैसे लेकर मुझे जहाँ भेजती थी मै चली जाती थी, मगर मेरा संबन्ध सिर्फ चौधरी के बेटे से था।’’

तुम्हारे पति से भी तुम्हारा संबन्ध नहीं था, हेमलता हँसकर बोली  ‘‘वकील साहिब मेरा पति मेरा मालिक है। जिसके साथ मैंने बिरादरी के सामने सात फेरे लिए हैं मगर मेरा संबन्ध सिर्फ छोटे चौधरी से ही था।’’ जज ने बीच में टोका  ‘तुम ठीक से जवाब क्यों नहीं देती ? अगर तुम्हारा संबन्ध तुम्हारे पति से नहीं है तो यह लडक़ा जो तुम्हारे पति की गोद में बैठा है वह किसका है ? तुम्हारे पति का नहीं है।’

‘‘और किसका होगा साहिब पति का ही है कमेटी के कागज में उसके बाप का नाम देख लें, हेमलता ने मासूम अन्दाज में कहा था।’’

वकील थक कर कहने लगा  ‘‘हेमलता फिर भी तुम कहती हो कि तुम्हारा संबन्ध सिर्फ चौधरी के बेटे से था।’’

‘‘जी हाँ ’’

हेमलता तुम मानती हो कि तुम केवल पहले माँ के कहने से फिर पति के कहने से कई लोगों से हम बिस्तर हुई हो फिर अगर जैसा तुम कहती हो कि उदयबीर तुम्हें अपने दोस्तों के साथ सोने को मजबूर कर रहा था तो क्या नई बात थी, जिससे तुमने उनका कत्ल कर दिया। वकील ने पूछा था

‘‘वकील साहिब मैं कितनी बार कह चुकी हूँ कि मेरी माँ का मेरे गात पर अधिकार था जन्म देने से तथा पति का सात फेरे लेने से उसका मैं कैसे टालती,  हमारी जात की यही रीत है। मगर छोटे चौधरी से मेरे मन का संबन्ध था मैं खुद उसके पास जाती थी वह कुछ देना चाहता तो भी नहीं लेती थी। राम कसम,  मैंने एक छल्ला भी नहीं लिया था उससे । उसका हक था मेरे मन पर, इसी लिए उसका हक मेरे बदन पर भी था। मेरा मन उसके लिए था मगर उसका हक यह नहीं था कि वह मुझे किसी और को परोसे। मैंने उसे मना किया था,  हाथ जोड़े थे मगर वह नहीं माना, वह मेरे साथ घात कर रहा था हम बेडऩी घात सहन नहीं करती- सौ मैंने उन्हें मार दिया। आप मुझे फांसी पर चढ़ा दें,  नाहक बवाल क्यों मचा रहे हैं।’’

‘‘तो तुम्हारा यह पहला और आखिरी संबन्ध था, तुम और संबन्ध नहीं बनाओगी।  ‘चौधरी के वकील ने चुटकीली तो सरकारी वकील कहने लगा  ‘अब्जक्श्न योर ऑनर’

मगर हेमलता कहने लगी, वकील साहिब !  सबन्ध बनाए नहीं जाते, हो जाते हैं,  बन जाते हैं। जाने मन किस अदेशी डोर से बंधकर खिंचा चला जावै है ? जाने मन क्यों किसी को अपना बनाने के लिए तड़प उठा है ? जाने क्यों मन किसी का होने के लिए बेकरार हो जावै है? मेरे साथ ऐसा सिर्फ एकोबार हुआ है आगे होगा कि नहीं भला मैं क्या जानम ?

जज ने हेमलता को उम्र कैद की सजा सुना दी थी, वह लगभग पाँच साल से जेल में थी, शुरूआत में कई लोगों ने उससे खिलवाड़ करना चाहा मगर उसके दबंग व्यवहार से घबरा कर वे लोग भाग लिए थे। फिर कब उसका संबन्ध असिस्टैन्ट वार्डन माता सिंह से हो गया इसका पता हेमा के गर्भवती होने के बाद ही लगा। जाँच बैठी तो मातासिंह ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी, उसकी आत्महत्या से हेमलता विक्षिप्त सी हो गई थी, कई दिन कुछ नहीं खाया फिर उसका गर्भपात हो गया था।

जब मेरा तबादला रोहतक कारागार में हुआ था तो हेमा की उम्र लगभग तीस वर्ष थी, पिछले चार साल से उसकी कोई शिकायत नहीं आई थी अत: उसे जेल से बाहर खेत में काम पर भेजा जाने लगा था।

मेरी पत्नी विवाह से पहले अध्यापिका थी, फिर तबादलों और बच्चों की पढ़ाई में खलल पडऩे से उसने त्याग पत्र दे दिया था। अब दोनों बच्चे बड़े हो गए थे, बेटा अपनी पत्नी के साथ मुम्बई में था, बेटी अपने कमांडर पति के साथ विशाखापटनम में थी। पत्नी खाली बैठी ऊब रही थी सो उसने कैदी स्त्रियों में साक्षरता अभियान शुरू कर दिया था, वही पर पत्नी व हेमा में गुरु शिष्या का संबन्ध बना । पत्नी का कहना था कि हेमलता बड़ी जहीन दिमाग है तथा बहुत जल्द पढऩा लिखना सीख गई है, अब तो वह अनपढ़ कैदियों के पत्र भी लिखने लगी थी।

पत्नी की देखा देखी मैंने भी रविवार को कैदियों को प्रेरक प्रसंग तथा रामचरित मानस का कथा पाठ करना शुरू कर दिया था, कभी प्रवचन भी करने लगा था। यह मेरे संस्कृत अध्यापक पिता द्वारा बचपन से आस्थावान बना दिये जाने से संभव हुआ था, कैदी मेरे भजन कीर्तन में आनन्द से भाग लेते थे। स्टाफ के परिजन भी आने लगे थे, मैंने देखा था कि हेमलता बड़े मनोयोग से भजन कीर्तन में भाग लेती थी।

फिर हेमलता जैसा जेलों में आम रिवाज है, हमारे घर घरेलू काम करने आने लगी थी। यूँ स्टाफ में किसी की पत्नी हेमलता को घरेलू काम हेतु रखने को राजी नहीं थी, मगर मेरी पत्नी को हेमलता पर विशेष स्नेह व भरोसा हो गया था। तभी पत्नी को पुत्रवधू की जच्चगी हेतु मुम्बई जाना पड़ा, अब भी हेमलता घर का कार्य कर रही थी, मात्र मेरे पूजा घर की सफाई वह नहीं करती थी। कहती थी कि वह बेडऩी ब्राहमण के पूजाघर में घुस कर उसे अपवित्र नहीं करेगी।

हेमलता की सजा की अवधि समाप्त हो गई थी, मगर उसे लेने कोई नहीं आया। वैसे भी अनेक वर्षों से उससे मिलने भी कोई नहीं आता था! सुना था उसके पति ने दूसरा विवाह कर लिया था, हेमलता चाहती थी कि मेरी पत्नी के मुम्बई से लौटने तक उसे जेल में रहने दिया जाए। पर ऐसा करना जेल नियम के विरुद्ध होता अत: मैने उसे जेल हस्पताल में अस्थाई नौकरी दिलवा दी ! वह वहीं रहने लगी थी। सुबह शाम मेरे घर पर भी काम कर रही थी, मैंने उसे इस कार्य हेतु वेतन देना चाहा तो उसने मना कर दिया। मैंने भी यह सोचकर कि पत्नी आकर स्वयं हिसाब कर देगी उसे कुछ नहीं कहा।

इन्हीं दिनों जेल में सालाना मरम्मत का काम आरम्भ हो गया था। मेरे क्वार्टर में भी रंगरोगन के अलावा दरवाजे, खिडक़ी जिनमें दीमक लगी थी बदलने थे। उन दिनों मेरे बेडरूम की खिडक़ी दरवाजे बदलने का काम चल रहा था, दूसरे कमरों में अभी ताजा पेन्ट हुआ था, मुझे पेन्ट से अलर्जी है। पेन्ट हुए कमरे में घुसते ही जो छींके आना आरम्भ होती है तो रुकने का नाम नहीं लेती, अत: सोचा कि बेशक बेड़रूम में टूट फूट चल रही है पर मैं इसमें ही सोऊंगा। तब तक शेष कमरों   से पेन्ट की महक खत्म हो जाएगी।

मैंने जेल से माली का काम करने आए कैदी से कहा कि जब ठेकेदार के राज मजदूर चले जाया करें तो वह मलबे को एक तरफ इकट्ठा कर किसी चादर से ढक दे, जिससे पँखा चलने पर धूल ना उड़े। दफ्तर से लौटा तो पाया वह कैदी तो बिना कुछ किये चला गया और हेमलता ने न केवल कमरे से मलवा बाहर फेंक दिया था अपितु दीवारें तक झाड़ कर कमरे को चमका दिया था।

मैंने कहा,  हेमलता,  यह कूड़ा करकट का काम तो लगभग आठ दस दिन चलेगा क्यों रोज मेहनत करोगी, वह सुनकर चुपचाप चली गई।

रोज इसी तरह चलने लगा, मेरे बार-बार कहने पर कि मैं दूसरे कमरे में ही सो जाऊँगा। पत्नी की मौजूदगी या अपने धर्मभीरू स्वभाव के रहते मैंने हेमलता को कभी ध्यान से देखा नहीं था। मगर अब घर के लगभग एकान्त में मैं उसे देखने लगा था। हेमलता सांवली थी मगर उसका गठा बदन व तीखे नयन नक्श, लम्बा कद उसे एक अलग पहचान देते थे। पहली नजर में ही वह मुझे सुन्दर लगी, उसमें एक अजीब सी कशिश थी। एक दो बार जब मैं उसे काम करते हुए निहार रहा था तो लगा कि उसे पता लग गया है और वह जल्दी से काम निबटा कर निकल गई थी।

मनुष्य के मन में सोया शैतान अवसर पाकर जाग उठता है,  फन उठाने लगता है, वही कुछ मेरे साथ हो रहा था। जब भी ऐसे विचार उठते तो मैं धार्मिक मन्त्रों,  शलोकों का उच्चारण मन ही मन कर मन बहलाने का प्रयत्न करता, मगर मन कहाँ मानता था।

मैं लाख कोशिश करता कि कार्यालय से देर से लौटूँ जिससे हेमलता अपना काम पूरा कर जा चुकी हो, मगर मेरा मन व पैर मुझे और जल्द घर घसीट लाते। मैं जब घर लौटता तो पाता कि हेमलता कूड़े का ढेर उठाकर बाहर फेंक रही होती। जब वह झुक कर तसला उठाती तो उसके सुडोल वक्ष और तन जाते और मेरा मन बेकाबू होने लगता, हेमलता शायद मेरी कमजोरी पहचान गई थी अत: जल्द से काम निबटाने का प्रयत्न करती थी।

उस दिन कमरे की मरम्मत तथा पेंट हो गया था। मेरा बिस्तर आज दूसरे कमरे में था। मैंने बिस्तर पर बैठ कर जूते उतारे फिर हाथ मुँह धोकर वापिस बिस्तर पर आ बैठा जबकि आम तौर पर मैं शाम की चाय लॉन में लेता था। तभी हेमलता ने झुककर चाय की ट्रे बिस्तर के साथ रखी तिपाई पर रखी, उसके झुकने से उसके सुडोल वक्ष पर मेरी नजर पड़ी तो मन बेकाबू हो गया। मैंने हेमलता की कलाई पकड़ कर खुशक गले से कहा हेमा मेरे पास बैठो,  हेमा का हाथ बुरी तरह कांप रहा था, आँख उठाकर देखा तो पाया कि वह पत्ते की तरह कांप रही थी, उसका चेहरा विवर्ण हो गया था। उसे इस हालत में देख कर मेरा हौंसला बढ़ा, मैंने उसे खींच कर अपने पास बैठा लिया, मैं उसे अपने आगोश में लेने का प्रयत्न कर रहा था । वह कांपती हुई असहाय सी बोल रही थी, नहीं बाबू जी ऐसा मत करें, मैं तो कूड़ा हूँ वही कूड़ा जिससे आपको अलर्जी है, मैं हाथ जोड़ती हूँ पाँव पड़ती हूँ मुझे छोड़ दें, जेल की शेरनी मेरे सामने भयभत हिरनी सी थी।

फिर अचानक वह स्वयं को छुड़ा कर मेरे पाँव में पड़ गई और कहने लगी  ‘साहिब मेरे इस बदन को जाने कितने रूपलोभी अमानुषों ने रौंदा कुचला है, यह वह पुष्प नहीं है जिसे मैं आप सरीखे महात्मा के चरणों में चढ़ा सकूँ, इससे पहले मैं कुछ करता कहता चह चली गई। मैं बहुत देर बिसतर पर गुमसुम बैठा रहा , होश आने पर सोचने लगा महात्मा कौन है मैं या हेमलता।’

 

- डॉ० श्याम सखा ‘श्याम’

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ०‘श्याम सखा ‘श्याम’ निदेशक हरियाणा साहित्य अकादमी न केवल एक प्रतिष्ठित लेखक हैं जो चार भाषाओं के विद्वान हैं , हिन्दी,पंजाबी, अंग्रेजी व हरियाणवी में कहानी,उपन्यास गीत गज़ल दोहे आदि अनेक विधाओं में लिखते हैं। अब तक उनकी २० पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।

एक अद्‌भुत संयोग यह भी है कि वे एक लोकप्रिय सफ़ल चिकित्सक भी हैं ।:  M.B;B.S. FCGP शिक्षा प्राप्त डा० श्याम सखा श्याम इन्डियन मेडिकल एसोसिएसन के हरियाणा प्रदेश के प्रेजिडेन्ट रह चुके हैं।

सम्मान: लोक साहित्य व लोक कला का सर्वोच्च सम्मान पं॰ लखमीचंद सम्मान (हरियाणा साहित्य अकादमी)। विभिन्न अकादमियों द्वारा 5 पुस्तकें (अकथ, घणी गई थोड़ी रही (कथा संग्रह), समझणिये की मर (हरियाणवी उपन्यास), कोई फायदा नहीं (हिन्दी उपन्यास), इक सी बेला (पंजाबी कहानी संग्रह) तथा हिन्दी एवं पंजाबी की 10 कहानियाँ भी पुरस्कृत। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न राज्यों की संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मानों से अलंकृत।

कृतियां: अंग्रेजी, हिन्दी, पंजाबी व हरियाणवी में कुल प्रकाशित २०, चार उपन्यास, चार कहानी संग्रह, पाँच कविता, एक दोहा सतसई, दो गजल संग्रह।

अंग्रेजी उपन्यास: strongwomen@2ndheaven.com (शीघ्र प्रकाश्य)

सम्पादन: मसि-कागद (साहित्यिक त्रैमासिकी 11 वर्ष)

विशेष: एक उपन्यास कुरूक्षेत्र विश्वविद्यलाय के हिन्दी एम.ए. (फाइनल) के पाठ्यक्रम में।
रचना कर्म पर पीएच.डी. व 4 एम.फिल शोध कार्य सम्पन्न।

संप्रति: निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी
संपर्क: पंचकूला- 134113 (हरियाणा)

 

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