मरे नही चले गए ‘नीरज’ – अकरम हुसैन

मरना और चले जाना यह दो बातें अलग अलग है एक आम इंसान मर जाता है, लेकिन एक रचनाकार, शायर, साहित्यकर्मी, मानवतावादी और बुद्धिजीवी कभी नही मरता क्योकि उसके किए हुए कर्म हमेशा ज़िन्दा रहते है, बल्कि यूं कहें वो इतिहास के सुनहरे पन्नो में हमेशा ज़िन्दा रहता है और पूरी इंसानियत की सेवा अपनी कलाकृतियों से करता रहता है।
गत शाम को एक दिल दहला देने वाली ख़बर मिली कि साहित्य जगत के पुरोधा पद्मश्री गोपालदास नीरज इस आभासी दुनियाँ से कूच कर गए है खबर तो सच मे बहुत हॄदय विदारक थी लेकिन जब कुछ समय बाद मानसिक स्थिति ठीक हुई तो दिल और दिमाग ने यह गवारा नही किया कि नीरज जी हमारे बीच नही है बल्कि दिमाग मे तुरन्त आया कि वो तो हमारे बीच अपने गीतों के माध्यम से हमेशा ज़िन्दा रहेंगे, और ज़िन्दा है बल्कि कुछ यूं  कहें कि उनकी आत्मा तो ज़िन्दा ही है केवल शरीर ही साथ छोड़ गया है वैसे भी गीता में श्रीकृष्ण जी ने कहा है कि ‘आत्मा अजर और अमर’ है।
अलीगढ़ आने के बाद गोपालदास नीरज जी से दो बार मिलना हुआ एक बार उनके घर पर तो दूसरी बार अमर उजाला के एक कार्यक्रम मे जिसमे उनके द्वारा बताए हुए इंसानियत के रास्ते हमेशा याद रहेंगे। क्योंकि उनके जीवन मे एक पर्याप्त अनुभव तो था ही उसके अलावा उन्होंने जीवन को कई उबड़-खाबड़ रास्तो से होकर गुजारा था तो वो उन्हें हमेशा प्रोत्साहित करता रहता था, ज़िन्दगी में कितना भी कठिन समय आया उन्होंने उसका डटकर सामना किया और साहित्य के साथियों को हमेशा इंसानियत की सीख दी…..उन्होंने शुरू में टाइपराइटर के रूप में भी काम किया, अध्यापक भी रहे जब वो मायानगरी पहुंचे तो सबसे बड़े गीतकार भी बने, लेकिन उन्होंने सब मोह माया को छोड़कर इटावा से लेकर मुम्बई तक की ज़मीन नाप ली, फिर भी वो अलीगढ़ जैसे शहर में आकर बस गए और साहित्य के लिए तत्तपर रहे, ज़िन्दगी के नो से ज्यादा दशक गुज़ारने के बाद भी उनमें किसी भी प्रकार का कोई घमण्ड, गर्व नही था बल्कि वो जिससे मिलते थे तो वो उनका मुरीद हुए बिना नही लौटता था ..

 

 

- अकरम हुसैन  ‘पुष्प’
स्कूली शिक्षा – ए. के. इण्टर कॉलेज न्यूरिया से एक से चार तक प्राथमिक शिक्षा, उसके बाद सैंट पैट्रिक इण्टर कॉलेज उत्तराखंड से दसवीं उत्तीर्ण करने के बाद ऑक्सफ़ोर्ड पब्लिक स्कूल लखनऊ से इण्टरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की, दो साल इंजीनियरिंग की तैयारी करने के बाद, तकनीक से मोहभंग हो गया क्योंकि वहां पर लाखों की आय-व्यय थी, लेकिन मानवता और संस्कृति का मुझे ह्रास नज़र आया जिससे मुझे यह प्रतीत हुआ कि तकनीक वाले हमे मशीन तो बना रहे है लेकिन मानव बनने की प्रक्रिया में बाधा उतपन्न हो रही है, यूं तो इंजीनियर बनने के बाद  लाखो, करोड़ो कमा सकते थे, लेकिन मेरा अपनी मातृभूमि, संस्कृति, और संस्कार का कर्ज अदा नहीं हो पाता, जिसको पूर्ण करने के लिए हिंदी भाषा ही मात्र एक साधन था, जिसने मेरी परम् इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए एक सेतु का कार्य किया, ततुपरांत मैंने 2008 में स्नातक हिंदी में एएमयू में प्रवेश लिया, फिर उसके बाद स्नातकोत्तर करने के दौरान छात्र राजनीति में भी भाग्य आजमाया जिसमे अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन सफल नही हो पाया उसके बाद हिंदी और सामाजिक कार्यो में पूर्णतया स्वयं को न्योछावर कर दिया, मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी से एम. फिल. हिंदी करने के उपरांत गिरमिटिया, भारतवंशियों की वैश्विक स्थिति के परिदृश्य को जानने के लिए सूरीनाम देश के भारतवंशियों पर शोध के रूप में  एएमयू में अध्ययनरत, जिसके मर्म को जानने, समझने, मनन करने का अवसर मुझे छिन्नमूल उपन्यास, भारतवंशी भाषा एवं संस्कृति आलोचनात्मक जैसी पुस्तक को पढ़कर ज्ञात हुआ……जिन्होंने अपनी पुस्तको के माध्यम से मुझे गिरमिटिया श्रमिकों की वेदना, उनकी भारतवंशी पीढ़ियों के संदर्भ में जानने के लिए मजबूर कर दिया। अभी भी उनकी पीड़ा, संवेदना को समझने का निरंतर प्रयत्न कर रहा हूँ….जिस प्रकार से हिंदी भाषा को भारतवंशियों को समझने, सीखने का अवसर जो प्रोफेसर पुष्पिता अवस्थी ने प्रदान किया है उसके लिए हिन्दी संसार सदा उनका ऋणी रहेगा, 
विचारधारा – शुद्ध मानवतावादी ,भारतीय संस्कृति के रक्षक के रूप में काम
मौलिक पुस्तकें- भारतीय समाज और हिंदी उपन्यास
संपादित पुस्तकें- थर्ड जेण्डर कथा की हकीकत, प्रवासी साहित्य का यथार्थ
शोध आलेख- राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय पत्र पत्रिका मे प्रकाशित शोध आलेख
संपति - स्वंतंत्र लेखन एवं हिंदी विभाग अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से सम्बद्ध
पता- मोहल्ला तिगड़ी न्यूरिया हुसैनपुर ज़िला पीलीभीत उत्तर प्रदेश भारत 

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