ममता के आँसू

अभी माँ का अंतिम संस्कार करके आया हूँ. माँ के बिस्तर को हटा कर वहाँ दिया जला दिया गया है, तेरह दिन तक यहाँ दिया जलता रहेगा. माँ की आत्मा यहीं रहेगी मेरे साथ, इसी कमरे में, ऐसा मेरा विश्वास था. उसके बाद? पता नहीं ….
इतने में अम्मा खाने के लिए पूछने आईं, पड़ोसी रामदीन चाचा के यहाँ से खाना आया था. कुछ भी खाने को मन न था इसलिए मना कर दिया और वहीँ आरामकुर्सी पर अधलेटा सा बैठ गया.
माँ की बहुत याद आ रही थी. तेरह साल की उम्र से उनके बिना ही रहा था और आज चालीस वर्ष की उम्र में वे मुझे सदा के लिए अकेला छोड़ कर चली गयीं थीं. पिता द्वारा दी गयी मानसिक और शारीरिक यातनाओं से दुखी हो कर वे मुझे लेकर नानी के यहाँ आ गयीं थीं. मामाजी डॉक्टर थे. उन्होंने माँ को सहारा दिया, उन्हें नर्सिंग का कोर्स करवाया. पर मेरे पिता उन्हें डरा-धमका कर मुझे नानी के घर से वापस अपनी हवेली में ले आये और फिर कभी मुझे उनके पास जाने नहीं दिया. माँ के बारे में सोचते सोचते न जाने कब झपकी लग गयी.
एक झटके से खिड़की के पल्ले खड़खड़ाने की आवाज़ से मेरी नींद टूटी, घड़ी में देखा रात के दो बजे थे. एक सरसराहट सी सुनी मैंने, लगा कोई कमरे से बाहर गया है अभी अभी. सोचा… अम्मा आईं होंगी खाना खाने के लिए पूछने. दिमाग पर जोर डाला तो कुछ याद आया. अरे, हाँ ! माँ आईं थीं मेरे सपने में.… कुछ कह रही थीं.… “बेटा वरुण बहुत सी बातें करनी थीं तुझसे” … तभी सामने देखा, दिए की लौ हवा के झोंके से बुझती हुई सी दिखाई दी. पास जा कर देखा तो तेल कम था दिए में, पास रखी बोतल से दिए में तेल डाला तो टिमटिमाते दिए में नयी जान आ गयी और रौशनी बढ़ गयी … काश! माँ के शरीर में भी प्राण डाल सकता कोई …
नर्सिंग का कोर्स करके मामाजी ने उन्हें दूर बहुत दूर भेज दिया था, जिसका पता मुझे तब लगा जब वहाँ से एक रजिस्टर्ड पत्र आया, अभी ६ महीने पहले. जिसमें माँ की बीमारी की सूचना थी और उन्हें वहाँ से ले जाने के लिए कहा गया था. पते पर मेरे पिता के नाम के साथ हमारी पुश्तैनी हवेली का पता लिखा हुआ था. संयोग से उन दिनों मैं वहीं पर था और मुझे फ़ौरन माँ के पास पहुँचने की डोर का सिरा मिल गया. पिता दो वर्ष पहले ही स्वर्ग सिधारे थे,उनका कोई ख़ौफ़ न था अब मुझ पर.
मैंने देर न की और अगले ही दिन वहाँ जा पहुँचा. पहाड़ियों से घिरे उस अस्पताल में सिर्फ टी.बी. के ही मरीज़ थे, सेनेटोरियम था. नर्सों के क्वाटर में माँ को बड़ी ही विक्षिप्त अवस्था में पाया. पूछताछ करने पर पता चला कि उनकी ऐसी हालत कुछ वर्षों से थी. इलाज के लिए उन्हें मानसिक अस्पताल में भी भर्ती किया गया था. घर के पते पर कई पत्र भेजे गए पर कोई जवाब नहीं आया. न ही कोई उनका हाल-चाल पूछने आया. पर अब उनकी हालत काबू से बाहर थी इसलिए उन्हें अब वहाँ नहीं रखा जा सकता. पागलखाने भेजना पड़ेगा.

माँ को वहाँ से अपने पिता की पुश्तैनी हवेली में वापस ले आया,फिर उन्हें शहर के मानसिक रुग्णालय में भर्ती कर दिया. पर मैं जब भी उनसे मिलने जाता वे मुझे पहचानती ही नहीं थीें, बस एकटक देखती रहती थीं। वहाँ के इलाज़ से माँ की हालत में कुछ सुधार आने लगा था. अब वे स्वयं ही समय से खाना और दवा लेने लगी थीं . मुझे उम्मीद थी कि कभी न कभी वो मुझे पहचान ही लेंगी. पर ऐसा हुआ नहीं और एक दिन अचानक खबर आयी कि उन्हें दिल का गहन दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गयी.
अब मैं हर दिन माँ के कमरे में ही सोने लगा था. उम्मीद थी कम से कम तेरह दिन तक तो माँ की आत्मा मुझे वहाँ देखती ही रहेगी. रात को ठीक दो बजे अचानक मेरी नींद खुल जाती और मैं किसी के जाने की आहट महसूस करता.
एक रात मैं बहुत देर तक सोया नहीं ऑफिस का कुछ काम करता रहा कब दो बज गए पता ही न चला. अचानक कमरे में कुछ सरसराहट सी महसूस हुई. मेरा ध्यान टूटा. दरवाज़े की तरफ़ देखा, कोई न था. सोचा … मेरा वहम होगा … फिर लिखने में लग गया. लिखने के लिए एक कोरा कागज़ उठाया ही था, पर ये क्या? मेरी कलम… वह सब नहीं लिख रही थी जो मैं लिखना चाह रहा था. मेरी कलम से जो रेखाएँ उभरीं वे माँ की तस्वीर में बदल गयीं. मैं हैरान रह गया. याद आया … आज बारहवाँ दिन था माँ को गुज़रे हुए… और फिर कागज़ पर लगातार कलम चलती गयी जिसमे माँ की सारी कहानी उभरती गयी। उसमें लिखा था …

” तुम्हारे पिता की पुश्तैनी हवेली छोड़ने के बाद मैं अपनी नर्सिंग ट्रेनिंग पूरी करके पहाड़ पर बसे उस सेनेटोरियम में नौकरी करने चली गयी थी. सब कुछ ठीक चल रहा था पर मुझे तुम्हारी बहुत याद आती थी. तुम्हारे पिता के उखड़े-उखड़े बर्ताव के कारण मेरा तुमसे मिलना संभव न था, पर मेरे मन में उम्मीद की एक किरण जरूर थी कि समझदार होने पर तुम जरूर मुझसे मिलने आओगे. प्रतीक्षा करती रही, बरसों बीत गए पर तुम न आये.… आये भी तो तब, जब मैं अपना मानसिक संतुलन खो चुकी थी. उस समय तो मैंने तुम्हें नहीं पहचाना पर अब खूब पहचान रही हूँ. तुम शायद नहीं जानते एक माँ के लिए अपने बच्चे से बिछुड़ना कितना दुखदायी होता है? तुमसे मिलने के लिए मैंने कई पत्र तुम्हारे पिता को भेजे थे पर एक का भी उत्तर नहीं आया. इस बात से मेरा दुःख और बढ़ता गया. तुमसे बिछुड़ने के बाद मैं तुमसे कभी मिल न सकी… अस्पताल में नौकरी करते हुए भी मैं सब लोगों के बीच अपने आप को बहुत अकेला महसूस करती थी. तुम्हारी याद में रात-रात भर आँसू बहाती थी. धीरे धीरे गहन अवसाद मुझे अपने चंगुल में जकड़ता गया. मैं मानसिक रूप से बीमार रहने लगी.
उसके बाद जो हुआ वह तुम्हें मालूम ही है. मेरी ज़िंदगी बस इतनी ही थी. मुझे बहुत सुकून मिला कि तुम्हारे हाथों मुझे मुखाग्नि मिली और मेरा अंतिम संस्कार तुमने ही किया.”
स्वयं ही लिखते और उसे पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखों से झर- झर आँसू बहने लगे.
अचानक मेरी कलम को न जाने हुआ … उसकी निब ही टूट गयी.
दूसरी कलम ढूँढने के लिए मैंने अपने पिता की अलमारी खोली. जैसे ही दराज़ खोली… ख़तों का एक पुलिंदा मिला. खोल कर देखा तो माँ के खतों के साथ अस्पताल के भी वो पत्र मौजूद थे जिनमें माँ की बीमारी के बारे में जानकारी दी गयी थी और मैं उन सब से अनजान था… काश!!! मैंने पिता की अलमारी पहले खोली होती ….

 
- शील निगम

आगरा (उ. प्रदेश )में जन्म ६ दिसम्बर
शिक्षा- बी.ए.बी.एड.

कवयित्री, कहानी तथा स्क्रिप्ट लेखिका.
मुंबई में १५ वर्ष प्रधानाचार्या तथा दस वर्षों तक हिंदी अध्यापन.
विद्यार्थी जीवन में अनेक नाटकों,लोकनृत्यों तथा साहित्यिक प्रतियोगिताओं में सफलतापूर्वक प्रतिभाग एवं पुरुस्कृत.
दूरदर्शन पर काव्य-गोष्ठियों में प्रतिभाग एवं संचालन तथा साक्षात्कारों का प्रसारण.
आकाशवाणी के मुंबई केंद्र से रेडियो तथा ज़ी टी.वी. पर कहानियों का प्रसारण.प्रसारित कहानियाँ -’परंपरा का अंत’ ‘तोहफा प्यार का’, ‘चुटकी भर सिन्दूर,’ ‘अंतिम विदाई’, ‘अनछुआ प्यार’ ‘सहेली’, ‘बीस साल बाद’ ‘अपराध-बोध’ आदि .
देश-विदेश की हिंदी के पत्र -पत्रिकाओं तथा ई पत्रिकाओं में कविताएं तथा कहानियाँ प्रकाशित.विशेष रूप से इंगलैंड की ‘पुरवाई’ कनाडा के ‘द हिंदी टाइम्स’ व ‘प्रयास ‘ तथा ऑस्ट्रेलिया के ‘हिंदी गौरव’ व ‘हिंदी पुष्प’ में बहुत सी कविताओं का प्रकाशन .’हिंद युग्म’ द्वारा कई कविताएँ पुरुस्कृत.
बच्चों के लिए नृत्य- नाटिकाओं का लेखन, निर्देशन तथा मंचन.
कहानियों के नाटयीकरण साक्षात्कार,कॉन्सर्ट्स तथा स्टेज शो के लिए स्क्रिप्ट लेखन.
हिंदी से अंग्रेज़ी तथा अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद कार्य-हिंदी से अंग्रेज़ी एक फिल्म का अनुवाद, ‘टेम्स की सरगम ‘ हिंदी उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद, एक मराठी फिल्म ‘स्पंदन’ का हिंदी अनुवाद.
A special Issue of ‘TSI, Hindi 111 Top Hindi Women Writers of 21st Century’, published in August,2011, has included me in this issue as one of the top writers in ‘The Sunday Indian’ published in NOIDA

डॉ आंबेडकर फेलोशिप अवार्ड से सम्मानित. (दिल्ली)
“हिंदी गौरव सम्मान से सम्मानित (लंदन )

विदेश-भ्रमण - जर्मनी, फ्रांस, हॉलैंड, बेल्जियम, फ़िनलैंड, युनाइटेड किंगडम,ऑस्ट्रेलिया ,सिंगापुर तथा मालदीव्स.

पता- वर्सोवा,अंधेरी (पश्चिम),मुंबई-६१.

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