मन का कारनामा

नोटबंदी, जीएसटी, महँगाई इत्यादि मसले सब इकठ्ठे होकर दिमाग में ऊधम मचाते हुए क्रिकेट खेल रहे थे। अभी अभी ट्रेन की सामान्य टिकट के बढ़े हुए पन्द्रह रूपये देकर महँगाई द्वारा लगाया गया छक्का बहुत खल गया था । आमदनी को इक्का-दुक्की पर आउट होते देख ही रहें थे सालो से जिसकी आदत सी पड़ चुकी है।
सरकारें बदली, नेता बदले लेकिन आम आदमी ऊँचाई की एक भी सीढी आगे चढ़ने से रहा। अगर काफ़ी प्रयत्नों के बाद चढ़ता भी तो सरकार टैक्स का काँटा फंसा टांग पकड़कर पीछे खींच लेती| आम आदमी पेट काट काटकर किसी तरह अपना ऊपरी आवरण चोखा रख कर इज्जत बचा रहा है।
संयोगवश आज ट्रेन के सफर में मैंने सामान्य घरेलू कपडे डाल रखे थे। ट्रेन से उतरते ही पतिदेव के सहकर्मियों ने मुझे ले आकर उद्घाटन समारोह के हॉल के बाहर खड़ा कर दिया था | सीढ़ियाँ चढ़ते ही पैरों में पड़ी स्लीपर और भी आम होने का अहसास देने लगी। मेकअप विहीन चेहरा याद आते ही लगा ये कैसे रंगरूप में यहाँ आ गयी मैं। ये मेरे पतिदेव भी कभी कुछ समझते ही नहीं ! मन ही मन भुनभुनाने के सिवा अब कोई चारा भी तो नहीं था मेरे पास। बृजवासी होटल के भव्य उद्घाटन में इस समय मुझे खुद की औकात दो कौड़ी की लग रही थी।
मैं बुदबुदाते हुए कुर्सी पर टिक गयी। दिमाग में उथलपुथल चल ही रही थी कि ‘मैडम क्या लाऊं आपके लिए’ कहता हुआ होटल का मैनेजर अपने दो कर्मचारियों के साथ सामने खड़ा हुआ पूछने लगा। सुनते ही लगा चलो कुछ तो इज्जत बची है। सब टिपटॉप आये हैं लेकिन सबकी आवभगत इतनी अच्छी तो नहीं हो रही। यह सोचकर थोड़ी तसल्ली हुई। फिर भी बिना तैयार हुए आने का अपराधबोध रह रहकर सिर उठा रहा था जो मैनेजर द्वारा मैडम के सम्बोधन और सम्मान से मन में दब जाता था।
तभी मेरी नजरें इधर-उधर मुयाना करते हुए जमीन पर पड़े सौ रूपये के कुछ नोटों पर गयी। बस फिर क्या था ! जो नजरें पतिदेव को खोज रही थीं वह वहीँ उन नोटों पर ठहर गयीं | ट्रेन में पन्द्रह रूपये ज्यादा देने की वजह से जो घाव हुआ था, सौ के वे नोट उस घाव पर मलहम लगा सकते थे। मन कर रहा था कि तुरंत उठूँ और स्लीपर पहनने का फायदा उठा लूँ। तभी मेरी तरफ पीठ किये हुए एक अधिकारी के साथ बैठे अपने पतिदेव पर मेरी नजर जा पड़ी। लगा उनकी पीठ पर लगी दो ईमानदार आँखें मुझे घूर रही हैं और मुझसे कह रही हैं– ‘मेरी इज्जत का कबाड़ा मत कराना। तुम्हें जितने भी पैसे चाहिए, मैं तुम्हें दूँगा। लेकिन खबरदार जो उन रुपयों को लेने उठी तो !’ उनकी आवाज मेरे मन मस्तिष्क में गूंज पड़ी |
नींबू पानी पीते हुए नजर उन्हीं बंडलो को घूरे जा रही थीं| लग रहा था उठू और खर्च से हुए घाव पर मरहम लगा ही लूँ। खुशियाँ बस मुश्किल से तीन कदम की दूरी पर थी। लेकिन मन में चलते द्वन्द से तीन सौ कदम की दूरी हो जा रही थी।
दौलत मिलने की ख़ुशी तो बस वही समझ सकता जिन्हें कभी मिली हों और मैं आतुर थी इस ख़ुशी को जी लेने के लिए।
तभी कोई मेरी तरफ झुककर बोला- “मैडम खाने में क्या लेंगी ?” मन हुआ कि उससे बोल दूँ, वह जमीन में पड़े नोट उठाकर इधर मुझे दे दे, बस ! इस समय जीभ नहीं बल्कि हाथ कुलबुला रहे हैं। पर ऊपर से मन मारकर कह दिया- “जो स्पेशल हो आपके यहाँ का, लेते आइये।”
उसी समय सफाईवाला दिखा जो लगभग नोटों के बगल से ही अपना वाइपर चला रहा था। मुझे तीन कदम की दूरी से साफ़ दिख रहे थे वे नोट। सफाई वाले को पास होकर भी नहीं दिखे वे नोट। क्या पता वह नोट न दिखने का ढोंग कर रहा हों।
मैंने इशारे से उसे बताया, तो उसने झट से नोट उठा लिये। ‘कम्बक्त यह लकी निकला।’ मैं बुदबुदाई। लेकिन यह क्या, अगले ही पल उसने बिना देखे भाले नोटों के उस बंडल को बगल ही पड़ी कुर्सी पर रख दिया, जहाँ पहले से ही एक स्कूल बैग टिका हुआ था| सामने एक लड़की विराजमान थी। ‘कम्बक्त तो बड़ा ईमानदार निकला। यह बेवकूफ नोटों का बण्डल मेरी मेज पर नहीं रख सकता था ?’ मैं मन ही मन फिर बुदबुदा उठी।
वह भी शायद वैसा ही सोच रहा हो जैसा मैं सोच रही थी। शायद भुनभुना रहा हो मुझपर। मैं उस ओर न देखती तो शायद वही सफाई वाला रुपयों को अपनी जेब के हवाले कर लेता। फ़िलहाल वह भले ईमानदार हो पर मेरा मन बेईमान हुआ जा रहा था।
उसके कुर्सी पर नोट का बण्डल रखते ही नजरें उस बण्डल का एक्सरे करने लगीं। कितने होंगे ? शायद सौ-सौ के तीन-चार नोट और दस-बीस के कुछ छोटे नोट हों। वैसे मेरी नजरें कमजोर हैं पर इस समय गिद्ध दृष्टि मिली हुई थी मुझे। क्या पता इनके बीच में पांच सौ के भी कुछ नोट हों ! जैसे मैं रखती हूँ सौ के बीच पाँच सौ के नोट, पांच सौ से सौ का नोट बड़ा होने की वजह से।
आजकल सौ का नोट जैसे पांच सौ और दो हजार के नोट को कब्जे में कर लेता है उसी तरह मेरा ईमानदार मन उस पड़ी हुई ख़ुशी के कब्जे में पूरी तरह से जकड़ा हुआ था। मैं चाहकर भी नहीं मुक्त हो पा रही थी। मन कह रहा था काश मैं यहाँ एरिया आफिसर की पत्नी की हैसियत से न बैठी होती। मन ही तो था जो क्रिकेट से कबड्डी खेलने पर उतर आया था। जब तक रूपया मेरी जेब की गिरफ्त में न पहुंच जाता तब तक मन में कबड्डी चलती रहनी थी।
मिठाई खरीदते दो युवकों पर नजर गयी। उनमें से एक अपनी जेब में हाथ डालकर कुछ ढूढ़ने लगा था। एक मन किया कि बोल दूँ ‘बेटा, रूपये खोज रहे हो? वे तो यहाँ पड़े हुए हैं |’ पर अगले ही पल मन के चोर ने मुझे कुछ कहने से रोक दिया। क्या पता यह मेरा ही हो जाये तो! क्या पता इन लोगों का न हो पर बोलते ही अपना कहकर ले लें।
मन के भीतर द्वन्द हो ही रहा था कि झक्क सफेद कमीज में बैग का मालिक आया। उसने अपना बैग उठाया और बैग की बगल में रुपये रखे देख कर उसके मन में लड्डू फूट पड़े। उसने चारो ओर नजर दौड़ाई और तुरंत रूपये अपनी जेब के हवाले कर लिया। मेरी नजर तो रुपयों पर टिकी ही थी इसलिए हम दोनों की नजरें आपस में टकराईं। लेकिन उसकी बेशर्मी मेरी बेशर्मी पर भारी पड़ी।
जब एक घंटे की मेरी नजरों की पहरेदारी से मुक्त होकर रुपयों का वह बंडल उस सफ़ेदपोश की जेब की शान बन गया तो मुझे लगा, मेरे जीवन में आई ऐसी ही न जाने छोटी-छोटी कितनी ख़ुशियाँ मेरी नज़रों के सामने औरों के हवाले हो गईं।
- सविता मिश्रा ’अक्षजा’
जन्म स्थान ..इलाहाबाद
शिक्षा …इलाहाबाद विश्वविद्धालय से ग्रेजुएट (हिंदी ,रजिनिती शास्त्र, इतिहास में ) |

लेखन विधा …लेख, लघुकथा, कहानी तथा मुक्तक, हायकु और छंद मुक्त रचनाएँ |
प्रकाशन …पहली कविता पति पहले जहाँ नौकरी करते थे (GEC ) वहीं की पत्रिका में छपी |
‘मेरी अनुभूति’ , ‘सहोदरी सोपान २’ ‘१००कदम’ , साँझा काव्यसंग्रह में प्रकाशित कुछ रचनाएँ ।
‘मुट्ठी भर अक्षर’, ‘लघु कथा अनवरत’, साँझा लघुकथा संग्रह में प्रकाशित कुछ कथाएँ ।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा बेब पत्रिकाओं में छपती रहती है रचनाएँ |
‘संरचना’ सम्पादक डॉ॰ कमल चोपड़ा जी की पत्रिका में छपी ”पेट की मजबूरी” लघुकथा |
महक साहित्यिक सभा, पानीपत में चीफगेस्ट के रूप में भागीदारी |
अभिरुचि ….शब्दों का जाल बुनना, नयी चींजे सीखना, सपने देखना !
ब्लाग .. मन का गुबार एवं दिल की गहराइयों से |
पता .. खंदारी अपार्टमेंट , खंदारी , आगरा २८२००२

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