मनचाहा

मैं और शिव सहाय जी सफलता के बारे में बातें करते करते सफल व्यक्तियों की निजी जिन्दगी पर भी विमर्श करने लगे.और फिर सोनपापड़ी की परतों की तरह से इन सफल कहे या माने जाने वाले लोगों की फितरत और ऐयाशियों और महिलाओं के साथ उनके संबंधों की एक दुसरे से से बड़ी करीने के साथ चिपकी परतें एक के बाद एक खुलने लगीं .राष्ट्रिय हो या अंतर्राष्ट्रीय ,बिजनेसमेन हो या साहित्यकार ,एक्टर हो या डायरेक्टर कवि हो या रवि ,सच कहूँ तो सभी के जीवन चरित्र में एक बात जो सामान्य मिलती है वो है महिलाएं एक से अधिक महिलाएं .मैंने शिवशंकर जी से पूछा –“सफल पुरुषों और महिलाओं में उनकी रूचि का परस्पर क्या सम्बन्ध है ?क्या यह कोई पुराना टोटका है कि अगर कोई पुरुष एक से अधिक महिलाओं के साथ सम्बन्ध रखेगा तो उसे सफलता जरूर मिलेगी ?” शिवसहाय  जी पहले तो आदतानुसार मुस्कुराए फिर बोले –“ बात में तो दम है तुम्हारी ,मेरे दिमाग में भी यह सवाल कई बार आया करता था .मगर समाधान एक प्रसिद्द वकील की जीवनी पढ़कर मुझे मिला “मैंने चौंकते हुए उन वकील महोदय का नाम और उनका दिया तथाकथित समाधान बताने का उनसे आग्रह किया “शिवसहाय  जी –“उन वकील महोदय से जब किसी मित्र ने उनके महिलाओं के साथ रिश्तों पर परिहास किया तो वकील साहब ने फरमाया –“मनुष्य धन क्यूँ कमाता है ?अरे भई मनचाही जिन्दगी जीने के लिए और मनचाही जिन्दगी तभी हो सकती है जब उसमे मनचाही औरतों का सानिध्य हो .मनुष्य बैल की तरह हाड तोड़ मेहनत करके धन और प्रसिद्धि कमाता है,क्या नीरस और एक रस उबाऊ जिन्दगी के लिए ?नहीं,अगर यही जिन्दगी सबको संतुष्टि देती या जो मिला उसी में अगर मनुष्य संतुष्ट होकर रह जाता तो ना धन कमाने का प्रयास करता ना ही पहचान .दरअसल प्राप्त करना और मनचाहा प्राप्त करना दो विपरीत बातें हैं ,मनचाहा प्राप्त करने के लिए खून पसीना एक करना पड़ता है और खून पसीना एक करने के बाद भी मनचाहा ना प्राप्त किया जाए तो सारी  मेहनत व्यर्थ है .”मेरे अन्दर की महिला, औरत को मनचाहे की उपाधि देने से बहुत ही व्यथित हो गयी और मैं ऐसे सफल व्यक्तियों की संकीर्ण सोच ,स्वच्छन्दता और आवारगी पर क्रुद्ध हो बडबडाने लगी .शिवसहाय  जी ,जो अपने जमाने में स्वंय एक रसिया व्यक्ति हुआ करते थे और अब एक अनुभवी बुजुर्ग एवं साहित्य प्रेमी हैं .उन्हें मेरा इस तरह उन सफल और प्रसिद्ध व्यक्तियों को कोसना नहीं सुहाया और वह भी पूरे जोश के साथ उनकी  हिमायत करने लगे .उनके अनुसार मन मस्तिष्क को सुकून मनचाहा करने से ही मिलता है ,और जब मनचाहा हो जाता है तो ऐसा लगता है जैसे कि हम प्रकृति के आलिंगन में हैं ,चाँद तारे आकाश मानो ह्रदय के वस्त्र का श्रंगार कर रहे हैं .पेड़ पौधे ,फूल तितली ,ओस की बूंदे सब आपको खुश देख मानो झूम रहे हैं .हवा भी सरसराती हुई आपके कपोलों पर मधुर चुम्बन दे शरारत से गुदगुदी करके निकल जाती है .पक्षियों की चहचहाट मानो आपके लिए सिर्फ और सिर्फ आपके लिए आयोजित किया गया एक म्यूजिक कंसर्ट लगती है .इसी जिन्दगी की तलाश में तो सभी रहते हैं ,यही जिन्दगी तो सबको चाहिए होती है मगर कोई कहता नहीं है .हकीकत में जिन्दगी और परम्पराएं दो विपरीत तत्व हैं ,हम जो जिन्दगी जीते हैं वह परम्पराओं से कोसों दूर होती है और परम्पराएं निहायत ही महत्त्वहीन मगर फिर भी हम इन दोनों को गड्ड मड्ड करते हैं और जिन्दगी को मिक्स वेजिटेबल बना डालते हैं .जिसमे पता ही नहीं चलता कौनसी चीज किस मात्रा में है और उसका क्या स्वाद है .मैंने इस मनचाहे की हिमायत करते देख उन्हें संदेह की द्रष्टि से देखा और वह अनुभवी बुजुर्ग मेरे मन की शंका ताड़ गए .उन्होंने मेरे पूछे बिना ही स्वंय रहस्योद्घाटन करते हुए कहा –“हाँ मेरे जीवन में भी एक अधिक या सच कहूँ तो कहीं अधिक महिलाएं रहीं हैं .लेकिन यह स्वीकार करते हुए मुझे अच्छा लग रहा है कि उन सबने मुझे जीवन जीने की कला सिखाई ना ही मैं उन्हें भूल सकता हूँ और ना ही उनके द्वारा प्रदत्त अनुभवों को “ मैं इस बुजुर्ग आदमी के इस रहस्योद्घाटन पर हैरान रह गयी .इसी क्रम में उन्होंने अपने और अब तक के उनके जीवन में आने वाली महिलाओं का वर्णन करना प्राम्भ किया –“ मेरे जीवन में अब तक सात महिलाएं आईं.सुनयना मेरी पहली पसंद थी .मैं आठवीं में और वह सातवीं में ,उसके लिए झरबेरी के बेर भेंट करना ,जीभ जलन वाला चूर्ण उसे चटखारे लेकर खाते देखना उस वक्त मन को आनन्दित करता जो उस वक्त और उस उम्र  में मनचाहा था .और उस मनचाहे को अपलक निहारने के लिए मैं झरबेरी के कंटीले झाड़ों से अपनी हथेली और कोहनी काँटों से लहुलुहान करने के लिए तत्पर रहता था .मनचाहा प्राप्त करने के लिए कई बार अनचाहे कर्म भी करने पड़ते हैं मगर मनचाहे से प्राप्त होने वाली प्रसन्नता अनचाहे के क्षोभ को नेस्तनाबूद कर देती है . मनचाहा आदमी को जीतोड़ मेहनत करना भी सिखाता है .जैसे कि  मैंने की थी हाई स्कूल में ,अपनी गणित की शिक्षिका की नजरों में खुद को होनहार साबित करने के लिए. और जिस विषय से मुझे सबसे ज्यादा नफरत थी, उसी में अच्छे अंक लाने के लिए अंकों के साथ माथापच्ची करने में पूरा पूरा दिन लगा देता था सिर्फ इसी लालसा में कि वह मुझे प्रेम से पीठ थपथपा कर “बहुत बढ़िया “ कह दे .तीसरी लड़की जिससे ट्रेन में उस वक्त मित्रता हुई जब मैं अपनी दादी के अस्थि फूल हरिद्वार में प्रवाहित करने जा रहा था . बातों –बातों में उससे मित्रता और दादी की म्रत्यु से उपजी सहानभूति ने मुझे उसके साथ जो कुछ घंटे बिताने को मिले वो अवर्णनीय हैं .उस वक्त दादी की म्रत्यु किसी फेस्टिवल बोनान्जा से कम नहीं लग रही थी .मनचाहा आदमी को कभी कभी नैतिक तौर पर गिरा भी देता है मगर यह सिर्फ कुछ क्षणों के लिए होता है .मैंने आश्चर्य से प्रश्नवाचक नजरों से उनकी तरफ देखा तो उन्होंने शरारती हंसी हँसते हुए कहा –“मैं उस लड़की से इतना प्रभावित हुआ कि दोवारा मिलने की तीव्र उत्कंठा में भगवान् से प्रार्थना करता था कि इस बार दादाजी के …..” मैं इस अजीब ओ गरीब आदमी की बेबाकी से कही जाने वाली इस बात पर हैरान मगर  हंस हंसकर दोहरी हो गयी .और वह गर्दन झुकाए मुस्कुराते रहे .कुछ देर तबियत से हंसने के बाद मैंने उनसे आगे बोलने को कहा .उन्होंने फिर बात शुरू की –“चौथी से मुलाकात बीएससी फायनल में हुई वह मेरी वाक् पटुता से प्रभावित थी और मैं उसके स्त्रीत्व से ,हम दोनों युवा थे, एक दूसरे को प्रेम करने लगे ,मेरी कही हर बात में उसका सहर्ष समर्थन मुझे प्राप्त होता था ,वो मुझमे अपना मनचाहा यानि प्रेम तलाशती थी और मैं चूंकि एक युवा पुरुष था तो मैं अपना मनचाहा प्राप्त करने को प्रयासरत रहा करता था .कॉलेज के बाद जैसा कि हर माता पिता के जहन में खाड़ी संकट की तरह से एक ही समस्या उत्पन्न होती है और वह है पुत्र के विवाह की .मुझे भी एक अपरिचित लड़की के साथ ब्याहा गया और इस अनचाहे रिश्ते में कुछ समय तक मनचाहे रिश्ते सी सुगंध रही मगर फिर उस रिश्ते में वही अनचाही उदासीनता और पुन: मनचाहे की तलाश मन ने प्रारम्भ कर दी .मनचाहा एक निश्चित समय तक ही मनचाहा रहता है और उस निश्चित अवधि के बाद वह अनचाहे में तब्दील होना प्रारंभ हो जाता है और आपका दिल फिर मनचाहे की तलाश शुरू कर देता है . मेरा दिल भी मनचाहे के लिए तरसने लगा और फिर विवाह के करीब चार वर्ष बाद फिर एक और मनचाहे की झलक दिखी .छठी जो थी वह एक जीवन से निराश और अकेली स्त्री थी जिसे एक पुरुष ने धोखा दिया और अब वह पुरुषों से नफ़रत करती थी .यह भी सत्य ही है कि जिस शय से हम नफरत करते हैं शांति और प्रेम भी उसी से ही पाने की उम्मीद भी रखते हैं .सहानभूति से शुरू हुआ रिश्ता दोस्ती में बदला और दोस्ती ने प्रेम का रूप ले लिया .वह पुरुषों से नफरत करती थी मगर किसी महिला ने तब तक उसके चेहरे की वो खोयी रौनक नहीं लौटाई ,जो मेरे साथ बिताये पलों में उसके चेहरे पर निखार बनकर उभरी .हकीकत में मनचाहे के अनचाहे व्यवहार ने उसमें  मनचाहे से दूर रहने की और नफरत करने की सोच विकसित कर दी .मगर जैसा कि वैश्विक सत्य है कि मन हमेशा मनचाहा ढूंढता है तब तक ढूंढता है जबतक कि उसे वह प्राप्त ना हो जाए ,यह भी मानव का मनोविज्ञान है कि – जब तक वह उसे प्राप्त नहीं होता वह ढोंग करता है कि उसे उससे नफरत है या उसकी जरूरत नहीं ,मगर जैसे ही वह उसको प्राप्त होने वाला होता है, वह उसे या तो किस्मत या वक्त की दुहाई देकर अपना लेता है . उसने मेरी उबाऊ जिन्दगी को फिर से जीवन पूर्ण बनाया और मैंने उसको मनचाहे से नफरत नहीं वरन अनचाहे को भी मनचाहे में तब्दील करना सिखाया .अगर आप मनचाही जिन्दगी जीना चाहते हो तो आपको यह अवश्य पता होना चाहिए कि -  आपका मन आखिर क्या चाह रहा है और कब ? अधिकांश लोग ढोर या पशु की तरह अपना जीवन चरने या जिन्दगी का बोझा ढोने में व्यतीत कर देते हैं .मगर मैं कहता हूँ कि आपको मानव जीवन मिला है सोचने के लिए दिमाग और महसूस करने के लिए मन भी है तो मन की सुनकर मनचाहा प्राप्त करने की कोशिश क्यूँ ना की जाए ?मैंने उनकी बात बीच में ही काटकर उनसे प्रश्न किया –“आपके सात महिलाओं के साथ सम्बन्ध रहे मगर आपकी आँखों में आंसू और प्रेम सिर्फ अपनी पत्नी के बारे में बात करते ही उमड़ता है ,एक अनचाहे के लिए इतने भाव और आंसू फिर किसलिए? सुनकर शिव सहाय जी भावुक हो गए और ठंडी सांस भरते हुए बोले “दरअसल हम जिसे अनचाहा समझ जीवन भर उसकी कद्र नहीं करते ,एक समय बाद हमें मालूम होता है कि जीवन में उससे ज्यादा मनचाहा तो बस वही था और जब तक आपको इस बात का अहसास होता है आप उसे खो चुके होते हो बिना उसके सामने यह कबूले कि वही बस वही है जो मन में है, मनचाहा है .कुदरत का अनचाहा कहर उस मनचाहे से आपको छीन लेता है .”(कहते कहते उनकी आँखों से आंसू की दो बूँद ढलक कर झुर्रीदार कपोलों को गीला कर गयीं )मैंने माहोल को हल्का करने के उद्देश्य से बात बदली “और वो सातवाँ मनचाहा.. उसके बारे में नहीं बताएँगे ?

वह उठते हुए रहस्मयी मुस्कान के साथ बोले “कुछ राज अगर राज ही रहे तो अच्छा “

 

- सपना मांगलिक

जन्मस्थान –भरतपुर

वर्तमान निवास- आगरा(यू.पी)

शिक्षा- एम्.ए ,बी .एड (डिप्लोमा एक्सपोर्ट मेनेजमेंट )

सम्प्रति–उपसम्पदिका-आगमन साहित्य पत्रिका ,स्वतंत्र लेखन, मंचीय कविता,ब्लॉगर

संस्थापक – जीवन सारांश समाज सेवा समिति ,शब्द  -सारांश ( साहित्य एवं पत्रकारिता को समर्पित संस्था  )

सदस्य- ऑथर गिल्ड ऑफ़ इंडिया ,अखिल भारतीय गंगा समिति जलगांव,महानगर लेखिका समिति आगरा ,साहित्य साधिका समिति आगरा,सामानांतर साहित्य समिति आगरा ,आगमन साहित्य परिषद् हापुड़ ,इंटेलिजेंस मिडिया एसोशिसन दिल्ली

प्रकाशित कृति- (तेरह)पापा कब आओगे,नौकी बहू (कहानी संग्रह)सफलता रास्तों से मंजिल तक ,ढाई आखर प्रेम का (प्रेरक गद्ध संग्रह)कमसिन बाला ,कल क्या होगा ,बगावत (काव्य संग्रह )जज्बा-ए-दिल भाग –प्रथम,द्वितीय ,तृतीय (ग़ज़ल संग्रह)टिमटिम तारे ,गुनगुनाते अक्षर,होटल जंगल ट्रीट (बाल साहित्य)

संपादन– तुम को ना भूल पायेंगे (संस्मरण संग्रह ) स्वर्ण जयंती स्मारिका (समानांतर साहित्य संस्थान)

प्रकाशनाधीन– इस पल को जी ले (प्रेरक संग्रह)एक ख्वाब तो तबियत से देखो यारो (प्रेरक संग्रह )

विशेष– आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर निरंतर रचनाओं का प्रकाशन

सम्मान- विभिन्न राजकीय एवं प्रादेशिक मंचों से सम्मानित

पता- कमला नगर , आगरा

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>