भ्रूण

 

‘‘अभिजीत पेशंट बहुत सीरियस है। बच्चा या माँ दोनों में से किसी एक को बचाया जा सकता है।’’ शहर के जानेमाने अस्पताल के ऑप्रेशन थेटर से बाहर निकलते ही डॉक्टर ने अभिजीत को वह दुःखद समाचार सुनाया था। ऑप्रेशन थेटर में अभिजीत की प्रेग्नंट पत्नी सुप्रिया जिंदगी और मौत से लढ़ रही थी। दोनों में से किसी एक के बचने की संभावना थी। अब निर्णय आँखों से अश्रु बहा रहे अभिजीत पर था। अभिजीत का विवाह हुए अभी डेढ़ साल ही हुआ था। उसने पहली संतान को लेकर कई सपने देखें थे। अभिजीत और सुप्रिया आनेवाले मेहमान के स्वप्नचित्र बनाते और उसमें रममान हो जाते थे। उनके कानों में अजन्मे बालक की किलकारियाँ गंुजती थी। अभिजीत तो बेहद प्रसन्न था कि उनके घर मे एक नन्ना मेहमान आनेवाला था। उसने पहले से ही कई खिलौनों से घर भर दिया था। उसके लिए अलग कमरा भी बनवाया गया था। छत पर चाँद-तारों के लुभावने चित्र अंकित किए गए थे। रात में उसे देखने पर आसमान का आभास होता था। सबकुछ नियोजन बद्ध तरिके से चल रहा था। और अब समय आ गया था। उनकी प्रतिक्षा अब खत्म होनेवाली थी। दोनों ऐक्सायीटेड थे कि बच्चा कैसा होगा ? कैसे दिखेगा ? मेरे जैसा या मम्मी के जैसा ? दोनों में अक्सर इसी बात पर मिठी नोंक-झोंक होती थी कि, ‘‘बच्चा मेरे जैसा होगा ? चेहरा-नैन-नाक सबकुछ मुझ पर जायेगा।’’ बार-बार के नोक-झोंक से दोनांे ने समझौता कर लिया था कि, ‘‘नाक तुम्हारे जैसा होगा और चेहरा मेरे जैसा…।’’ आनेवाले बालक के अवयवों को पहले से ही दोनों ने विभाजित कर लिया था। सुप्रिया के पेट में पीड़ा शुरू हो गई थी। अस्पताल ले जाया गया था। पर कई घन्टे होने के बावजूद भी न उसकी पीड़ा थम रही थी और नाहीं बच्चे का जन्म हो रहा था। पीड़ा धीरे-धीरे दर्द का विशाल रूप बनकर उभर रही थी। ऑप्रेशन थेटर से रूक-रूक कर सुप्रिया की दर्द भरी चीखें निकल रही थी। बाहर अभिजीत का हाल बेहाल हुए जा रहा था। हर चीख के साथ अभिजीत के दिल की धडकने और तेज होती जा रही थी। अभिजीत से चीखें बरदाश्त नहीं हो रही थी। वे चीखें रूकने के बावजूद उसके कानों में सायरन जैसी आवाज गूँज रही थी। उसने अपने कानों पर दोनों हाथ रख लिए थे। और उसके मुख से निकल पड़ा था। …‘‘नहीं …।’’ एक लंबी आवाज जो सह न सकी, सुप्रिया की मरणांतक पीड़ाओं को। गंगूबाई ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा था, ‘‘साहेब, धीरज धरो, कुछ नहीं होगा। गणपती बप्पा हमारे साथ है । मेरा गणपती बप्पा कुछ नहीं होने देगा। मेरी मालकिन टनटन होकर बच्चे को लेकर बाहर आयेगी देखना…।’’ गंगूबाई अभिजीत के घर काम करनेवाली बाई थी। सुप्रिया से बहन जैसा प्यार पाकर वह धन्य हो गई थी। उसका हर पल हर सुख-दुःख में साथ रहता था। सुप्रिया और अभिजीत ने उसपर कई उपकार किए थे। यहीं कारण था कि गंगूबाई अपनी सुप्रिया बहन के लिए अस्पताल आयी हुई थी। जो अभिजीत का धीरज बंधा रही थी। जब डॉक्टर ने यह कहा कि दोनों में से कोई एक बच सकता है, तब उसके पैरों तले की जमींन खिसक गई थी। अचानक सबकुछ रूक गया था। और फिर वह महसूस करने लगा था कि सारी धरती गोल घुम रही है। सप्नों को ऐसा चकनाचुर होते हुए देख वह डॉक्टर से बिनती करने लगा था। अब उसके लिए डॉक्टर ही भगवान का रूप था। अभिजीत ने डॉक्टर के सामने गिडगिडाते हुए कहा था, ‘‘नहीं, नहीं ऐसे नहीं हो सकता। प्लिज डॉक्टर साहब दोनों को बचा लीजिए। मैं अपनी पत्नी से बेहद प्यार करता हूँ। मैं उसके बिना नहीं जी सकता।’’ डॉक्टर ने अपनी मजबूरी को साफ-साफ बयान किया था कि वह कुछ नहीं कर सकता। पर अभिजीत मानने के लिए तैयार ही नहीं था। उसके बस में होता तो वह ब्रह्मा जी के विधान को बदलवा देता। पर वह ईश्वर पर यकीन भी तो नहीं करता था। उसकी नजरों में तो ईश्वर मर चुके थे। इसीलिए हम ईश्वर की प्रतिमा के सम्मुख दीऐ लगाते है और माला पहनाते है। ईश्वर तो इन्सानों में बसा है। डॉक्टर में बसा है। इस धरती का यदि कोई ईश्वर था तो वह सिर्फ डॉक्टर ही था। जो मरते हुए लोगों को जीवनदान देता है। वह डॉक्टर के सामने और भी बिनती करते हुए कहने लगा था, ‘‘ऐसा नहीं कहीये साहब ! चाहे जितना भी खर्चा आये मैं देने के लिए तैयार हूँ। उन्हें बचा लीजिए, डॉक्टर साहब उन्हें बचा लीजिए…।’’ अभिजीत गिड़गिड़ा रहा था पर डॉक्टर अपनी असमर्थता बता रहे थे। डॉक्टर का न मानता हुआ देख, वह उसके पैरों में पड़ गया था। पैरों को पकड़कर वह कहने लगा था, ‘‘मैं आपके पॉव पड़ता हूँ। पर उसे बचा लीजिये।’’ डॉक्टर अभिजीत की दशा को देखकर तैयार हो गया था। उसके बस में तो कुछ नहीं था। सिवाय कोशिश करने के अलावा उसके पास दूसरा कोई मार्ग नहीं था। पैरों पर पड़े अभिजीत को उठाते हुए डॉक्टर ने कहा था, ‘‘उठ अभिजीत, जीवनदाता तो वह भगवान है, सबसे बड़ा डॉक्टर ! आप उनसे प्रार्थना कीजिये की मैं दोनों को बचा पाऊँ। मैं चलता हॅू।’’ कहते हुए डॉक्टर भीतर चला गया था। इस दौरान सुप्रिया की रह-रह कर दर्दनाक चीखे निकल रही थी। अभिजीत निर्गुण ईश्वर भक्त था। वह बाहर खड़ा निर्गुण ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था कि वह सुप्रिया और बच्चे दोनों को सही सलामत रखें। इस संकट से रक्षा करें। उसे दर्द सहने की शक्ति दंें। बाहर कभी बैठता तो कभी इधर-उधर खडे़ होकर घूमने लगता था। उनकी नजर बार-बार उस ऑपरेशन थेटर की ओर जा रही थी। उसके माथे से पसिने की बूँदे टपक रही थी। पसिने से उसके कपडे गिले हो गये थे। बार-बार वह हाथ में रूमाल लेकर चेहरे पर आनेवाले पसिने को पोछे जा रहे थे। गंगूबाई उधर अपने आराध्य गणेश जी की प्रतिमा के सामने बैठ कर दोनों के सही सलामती की दुआँ मॉगने लगी थी। गणेश जी की वह प्रार्थना कर रही थी। वातावरण एकदम गंभीर बना हुआ था। भीतर सुप्रिया अपने आप से लड़ रही थी। तो डॉक्टर अपना सारा तजुरबा दॉव पर लगा रहा था। बाहर अभिजीत और गंगुबाई दोनों बेचैन थे। ईश्वर से प्रार्थना करने में व्यस्त थे। ऐसे मे ‘ऊ ऑय ..ऊ.. ऑय की बालक की आवाज गुंज उठी थी। बालक की आवाज सुनकर बाहर बैठे दोनों के चेहरे के दुःखी, भयवाले विकार अब बदलने लगे थे। कुछ पल के लिए एक मुस्कुराहट की लकीर उन दोनों के ओठों से गुजर गयी थी। पर तुरंत प्रश्न चिन्ह् का मानों उनके मस्तिष्क पर प्रहार हुआ था। ‘‘क्या हुआ। सुप्रिया बची या नहीं ? बालक की तो आवाज आ रही थी पर सुप्रिया की अबतक दिल को चीर ने वाली आवाज एक लम्बी चीख के बाद बंद कैसे हो गई थी। सुप्रिया के चीखों को शांत होता देख उनके भीतर भाँति-भाँति के विचार कोंद ने लगे थे। एक अजीब से भय की शंका की शिकन उनके चेहरे पर साफ-साफ देखी जा सकती थी। ऑप्रेशन थेटर का दरवाजा अबतक जो बंद था। अब वह खुल गया था। डॉक्टर ने दरवाजा खोलकर बाहर कदम रखा था। अपने हाथों के दस्ताने उसने उतार दिये थे। मुहपर पर मास्क बंदा हुआ था। वे ऐसी ही आवस्था में अभिजीत की और बढे चले आ रहे थे। अभिजीत और गंगूबाई भी उन्हें देखते हुए क्या हुआ ? की मुद्रा में खडे़ होर डॉक्टर की प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा करने लगे थे। डॉक्टर ने अपने शरीर से सफेद कोट उतार दिया था। मुहपर लगा मास्क वे उतार रहे थे। और इधर अभिजीत बेसब्री से इंतजार कर रहा था। डॉक्टर ने मास्क उतारते हुए शांत आवाज में कहा था, ‘‘बधाई हो अभिजीत ! बधाई हो ! आपके प्यार और प्रार्थना ने दोनों को बचा लिया।’’ अबतक भय की आशंका से ग्रस्त चेहरे पर मुस्कुराहट की लकिर से आगे बढ़ते हुए चेहरे ने हँसी और खुशी का रूप धारण कर लिया था। उस निर्गुण ईश्वर ने उसकी बात मान ली थी। वह बेहद खुश था। मानों उसे उस दिन दुनिया की सारी खुशी मिल गई थी। वह डॉक्टर के पैरों में पड़ गया था। डॉक्टर उसके लिए साक्षात भगवान बनकर आया था। पैरों में पडकर अभिजीत कहने लगा था कि, ‘‘डॉक्टर साहब आप साक्षात भगवान है। आप मेरी जिंदगी में भगवान बनकर आये हो। आप ने मेरी खुशियों को लुटने से बचा लिया। मैं आपका यह ऋण कैसे चुका पाऊँगा। मांगिये डॉक्टर साहब, आज जो मॉगना है, माँगिये ! मैं अपना आज सबकुछ तुम्हें सौपने के लिए तैयार हूँ। मैं तुम्हें नही बता सकता कि आज मैं कितना खुश हूँ। आज मुझसे कोई अपनी जिंदगी भी माँग ले तो, मैं खुशी-खुशी से देने के लिए तैयार हूँ। मॉगिये डॉक्टर साहब आपको क्या चाहिए।’’डॉक्टर अभिजीत के इस कथन से गदगद भी हो रहा था। और अपने आप को भी आनंदित महसूस कर रहा था कि उससे जो संभव नहीं था। उसे संभव कर दिखाया था। उसने दोनों की जान बचा कर सबकुछ पा लिया था। उसने अभिजीत से कहा, ‘‘मुझे कुछ नहीं चाहिए। तुम्हारे चहेरे पर की खुशी देखकर मैंने आज सबकुछ पा लिया। मैंने आज बच्चे और जच्चे को ही नहीं बचाया बल्कि अपने आप को भी बचाया है। मैने डॉक्टर पर किए जानेवाले विश्वास को बचाया है। मैंने साक्षात भगवान के अंश को बचाया है, मैंने तुम्हारी लड़की को बचाया है।’’ ‘‘लडकी’’! लडकी का नाम सुनते ही अभिजीत की खुशी के सामने आसमान बौना हो गया था। उसने लड़का-लड़की भेद ना करते हुए आनंद सागर में गोते लगा दिये थे। जहॉ से खुशी-आनंद रूपि मोतियाँ भर-भर कर उसके हाथों में आ रही थी। गंगुबाई का चेहरा भी खिल गया था। दोहरी खुशी पाकर ‘‘मालिक बधाई हो, मैंने कहा था ना कुछ नहीं होगा गणपति बप्पा सब ठीक कर देंगें । देखा गणपति बप्पा ने चमत्कार कर दिया।’’ अभिजीत भी उसे बधाई दे रहा था। डॉक्टर को लाख-लाख दुवायें देते हुए और लड़की होने की खुशी को प्रकट करते हुए कहने लगा था, ‘‘लड़की मुझे लड़की हुई है। आपने तो मुझे आज दुगनी खुशी दी हैं। दिल करता है कि मैं आपके हाथों को चुम लू।’’ कहते हुए डॉक्टर के हाथ चुम लिये थे। ‘‘हमारे खानदान में बरसों से लड़की नहीं हुई। यह लड़की नहीं साक्षात देवी है, देवी जिसने अपनी माँ को मौत की आघोष से बाहर खींच कर लाया हैं। आज मैं सारे शहर को मिठाई बाटूँगा। ढोल, बजेगा, जश्न होगा। आज शहर में चुल्हा नहीं जलेगा। मेरी बेटे की आने की खुशी में सारे शहर को खाने की दावत दूँगा।’’ उसने खुशी मंे शहर के लोगों को जितने वह बुला सकता था उन सबको दावत दी थी। गंगूबाई तो प्रसन्नता से जिलेबी के स्थान पर पेडे बाँटने लगी थी। मानो उस घर में लड़की लड़के से भी बड़कर हो। उधर डॉक्टर अपने आप को धन्य मान रहा था। वह अभिजीत की खुशी को देखकर अतीत में खो गया था। वह अपने आप से बाते करते हुए कहने लगा था, ‘‘आज मैं भी बहुत खुश हूँ। बरसों से जो काम मुझसे नहीं हो पाया, वह आज मैंने कर दिखलाया है। आज अभिजीत की पत्नी और बेटी के रूप में मानो अपनी लड़की और पत्नी को बचा लिया हैं। ‘‘मैंने अपने जिंदगी में न जाने कितने पाप किये हैं। न जाने कितनी मॉओ की कोख उजाड़ दी हैं। न जाने कितनी स्त्री भ्रूनों की गला रेतकर निर्मम हत्या कर दीं। रूपयों के लालच मे मैं भूल गया था कि भगवान के बाद डॉक्टर का दूसरा नाम लिया जाता है। मैंने डॉक्टर के नाम को कलंकित कर दिया। मैं इस दुनिया का सबसे बड़ा पापी हॅू। अभागा हूँ। जिसने अपनी पत्नी से लड़के की अपेक्षा करते हुए गर्भ में पल रहे स्त्री भ्रून की हत्या कर दी थी। आखिर नतिजा क्या हुआ। मेरी पत्नी भी उसके साथ स्वर्ग चली गई थी। जिस पत्नी को मैंने अपनी जान से भी ज्यादा चाहा था। इसी हाथों के कुकर्मो से मैंने उसे खो दिया।’’ उस दिन वह खुश था कि उसने एक लड़की को बचाया। वह सोचने लगा था कि उसने एक लड़की को बचाया। वह सोचने लगा था कि आज स्वर्ग में उसकी पत्नी खुश हो रही होगी। उसे अपनी पति पर अभिमान हो रहा होगा। वह महसूस करने लगा था कि उसकी पत्नी जो आसमान में तारा बनकर चमक रही है, वह खुशी से मानो मुस्कुरा रही हो।                                                                                                                                                                      ’ ’ ’ ’ ’ ’ ’ ’

अभिजीत की दिवार पर टंगी तस्वीर पर फूल चढ़ाते हुए आलोक और सुप्रिया के ऑखों के सामने बिते कल की सारी तस्वीरे चलचित्र की तरह उभर रही थी। अभिजीत की पाँच साल पहले एक दुघर्टना में मृत्यु हो गयी थी। आलोक सुप्रिया के हाथों में हाथ डालकर कह रहा था, ‘‘आज अभिजीत को जाकर पाँच साल बित गये। अब भी ऐसा लगता है कि अभिजीत हमारे ही भीतर कहीं जीवित है। अभिजीत जब अस्पताल में अंतिम सॉसे गिन रहा था। तब उसने तुम्हारा हाथ ऐसे ही मेरे हाथ में देते हुए कहा था। भैया आलोक मैं तुम्हें अपनी अमानत सौंप रहा हूँ। मुझे पूरा यकिन है कि तू इन सब का खयाल रखेगा। तूझे वचन दे कि सुप्रिया को तू अपने जीवन भर साथ रखेगा। तू इसे अपनी पत्नी रूप में स्वीकार करेगा। तू भी मनू के जाने के बाद अकेला पड़ गया है। मेरे जाने के बाद मेरी चारों बेटियों को तू पिता का प्यार देगा। आलोक मेरी बेटियों को मैंने लड़कों की तरह पाला है। मैंने कभी भी लड़की-लड़का ऐसा भेद भाव नहीं किया है। तू इन्हें इतना पढ़ा लिखाना, इतना बड़ा बनाना कि इनकी प्रगति से आसमान भी बौना हो जाये। और उन लोगों को करारा तमाचा देना जो बेटियों को बोझ समझते है… चलता हूँ। इसी हाथों में उसने दम तोडा था… और वह चला गया। हमे छोड़कर।’’ आलोक जब अभिजीत की अतित की यादों में खोया हुआ था तब वहीं गंगूबाई आलोक की बातें सुन रही थी। उसकी आँखें तरल हो आयी थी। क्योंकि उसने गंगूबाई से अपनी बहन से भी ज्यादा बढ़कर सम्मान दिया था। उसने कभी उसके साथ नौकरों सा बर्ताव नहीं किया था। गंगूबाई भी इस प्रेम से विभोर होकर इस परिवार को अपना परिवार मानने लगी थी। ‘‘साहेब अभिजीत साहेब जैसा दूसरा आदमी इस दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। वो तो देव आदमी था। साहेब। देखो कैसा देव बनकर बैठा है।’’ कहते हुए उसने अपने डबडबाई आँखों को पल्लु से पोछा था। सुप्रिया और गंगुबाई की लड़कियाँ बड़ी हो चुकी थी। गंगुबाई ने अपनी बेटी का विवाह भी करवा दिया था।

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अभिजीत की लडकियाँ जब पंद्रह सोलह उम्र की होगी तब अभिजीत उन्हें छोड़कर चला गया था। उसने अपनी लड़कियों से कई सपने देखे थे। वह उनकों सारी दुनिया की खुशियाँ उनकी झोली में डालना चाहता था। उनके लिए वे बेटों से बढ़कर थी। लड़कियाँ जैसे-जैसे बड़ी हो रही थी वैसे-वैसे आस पडोस के लोग, रिश्ते, नातेदार अभिजीत को चार-चार लड़कियाँ होने के कारण ताने मारा करते थे। ‘‘लड़कियाँ बोझ होती हैं। लड़कियाँ पराया धन होती हैं। लड़कियाँ पिता का नाम रोशन नहीं करती। क्यों लड़कियों पर पैसे बरबाद करते हो।’’ आदि कई तानों के अक्सर प्रहार से अभिजीत कहीं-न-कहीं भीतर घायल होता जा रहा था। उस पर लोगांे की एैसी बातों का कोई असर नहीं पड़ता पर बार-बार के चुभनेवाले शब्दों से उसका हृदय उन लोगों ने क्षतिग्रस्त कर दिया था। एक बार ऑफिस से खुशी-खुशी घर लौट रहा था। सड़क पर किसी ने उसे ताना दिया था। वह एक साथ कई चेहरे अपने उपर हावी होते हुए महसूस कर रहा था। एक साथ उसके मस्तिष्क में कई लोगों की आवाजें गूंज रही थी। चलते-चलते वह सड़क के बीचों-बीच आ गया था। उसका सर चकरा रहा था। वह महसूस कर रहा था कि सारी धरती गोल घूम रही है। धरती हिलने लगी है। सड़क से कई गाडियाँ तेज रफतार से गुजर रही थी। कई बार अभिजीत मरते-मरते बचा था। गाडियों की आवाजें, भीड की आवाजों से पहले ही उसका मस्तिष्क दुर्घटना ग्रस्त हो चुका था। बस बचा था तो केवल शरीर। उसे भी एक तेज-तर्रार गाड़ी ने उड़ा दिया था। अब वह बार-बार के ऐसे प्रहारों से मुक्त होनेवाला था। उसका शरीर गाड़ी की टक्कर से कई फूट उपर उछल गया था। पहले ही वार से उसके दोनों पैर टूट चुके थे। उसके सिर पर गंभीर चोट आ चुकी थी। घिसे जाने के कारण शरीर के कई स्थानों से खून की धाराये नदियों का रूप धारण कर रही थी। देखते ही देखते सड़क का कुछ भाग लाल हो गया था। लोग इकट्ठा हो रहे थे। जिन्होंने यह दुर्घटना होते हुए देखा था। उनके मुख से डरावनी चीख निकल चुकी थी। कई महिलाओं की तो बोलती ही बंद हो गई थी। दिल की धडकने तिगुनी, चौगुनी रफतार से धड़क रही थी। कुछ समझदार और संवेदनशील लोगों ने उसे अस्पताल पहुँचाया था। और कुछ लोगों को कोई लेना देना नहीं था। उन्होने अपनी राह पकड़ ली थी। शुरू-शुरू में डॉक्टर ने गंभीर रूप से घायल अभिजीत को अस्पताल में भरती करवाने से इन्कार करवाया था। पर बाद में वह बिनती करने पर तैयार तो हो गया था, पर पहले रूपयों का बंदोबस्त और फार्म भरने के लिए कह रहा था। वे अनजाने लोग पहले ही ऐसा मामले से दूर रहते है। वे ऐसी बातों के कारण परेशान हो रहे थे। पर उन लोगों में एक समझदार निर्भीक युवक था। उसने डॉक्टर से कहा, ‘‘डॉक्टर साहब नये कानुन के तहत तुम्हें पेशंट को बिना किसी पुछताछ के भर्ती करवाना होगा। ना करने पर जेल की सजा भी हो सकती है। यह कानुनन अपराध है।’’ उस युवक की बातों से उस डॉक्टर का सिर ठिकाने पर आ चुका था। उसने मॉफी माँगते हुए तुरंत उसे अस्पताल मंे दाखिल करवा लिया था। पर उसे अस्पताल पहँुचाने और शुरू-शुरू में डॉक्टर से भर्ती से इन्कार करवाने के कारण इस दौरान उसके खून बह जाने के वजह से बचने की संभावना अब अल्प ही रह गयी थी। सो आलोक, सुप्रिया, गंगूबाई, लड़कियों के सामने उसने अपनी अंतिम साँसों पर पूर्ण विराम लगा दिया था।                                                        समय बित रहा था। समय के साथ अभिजीत की लड़कियाँ बड़ी हो रही थी। सबसे बड़ी रीना अब बाईस साल की हो चुकी थी। रीना ने अपने हुनर को पहचाना था। वह रोज नृत्याभास करती थी। नृत्य में अच्छे-अच्छे डान्सर उसके सामने पानी भरते हुए दिखाई देते थे। उसका चयन डान्स इंडिया डान्स में हुआ था। उसने मेहनत और लगन से ही टी.वी. शो डान्स इंडिया डान्स के कई प्रतियोगी को पराजित करते हुए फाईनल तक का सफर तय किया था। सभी लड़कियाँ एक से बढ़कर एक थे। करीना की आवाज कोयल से भी मीठी थी। वह आवाज की दुनिया में अपना अस्तित्व बनाना चाहती थी। तो तीसरी मीना अभिनय करने मंे कुशल थी। वह जितनी दिखने में खूबसूरत थी, उतनी ही बुद्धिमान लड़की थी। उसने भी अपना लक्ष्य बना रखा था। वह फिल्मों में हिरोईन बनना चाहती थी। उसका संघर्ष जारी था। तो सबसे छोटी टिना हँसोड़ थी। खुद भी हँसती थी और दूसरों को भी हँसाया करती थी। उसके शब्दों के जादु से रोता हुआ इन्सान भी हँसने के लिए मजबुर होता था। चारों बहने आपस में बहुत प्यार किया करती थी। एक दूसरें की खुशियों के लिए मर मिटती थी। कभी एक दूसरें की टांग खिंचना तो कभी झुठ मूठ लड़ती थी। पर एक दूसरे के बिना नहीं रह सकती थी। कुछ ही दिनों बाद रीना का फाईलन डान्स होनेवाला था। परिवार के सारे सदस्यों को पूरा विश्वास था कि रीना डान्स इंडिया डान्स का फाईनल जरूर जितेगी। रीना का सपना भी था कि वह जीते। और सारे जमाने को बता दे कि लड़कियाँ किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं। वह डान्स कोरियोग्राफर बनना चाहती थी। वह अपने लक्ष्य से केवल एक कदम ही दूरी पर थी। उस दिन सारे परिवार के सामने रीना नृत्याभास कर रही थी। ‘‘अरे वाह दीदी ! तूने तो आज कमाल कर दिया। तेरा डान्स इतना आच्छा हुआ कि अब तुझे डान्स इंडिया डान्स के कॉम्पिटेशन के फाईनल में जितने से कोई भी नहीं रोक सकता।’’ ऐसे कहते हुए रीना के गले लिपट गई थी। ऐसे में गोलमटोल टीना कहाँ पीछे रहनेवालों मंे से थीं। सबकी लाड़ली-दुलारी टीना ने अपने शब्दों के जादू से वातावरण में हँसी की खुशबू का संचार किया था। वैसे वह घर में सबसे छोटी होने के कारण नटखट थी। जो शैतानी करने में अव्वल थी। वह स्वप्नरंजन करने लगी थी। ‘‘वह फाईनल का स्टेज दर्शकों से खचाखच भरा हुआ स्टेडियम जब रिजल्ट अनाउन्स किया जाएगा तब नीचे से एक ही आवाज गंुजेगी रीना ….. रीना …… रीना ……. तब दोनों मंे से किसी एक का नाम लिया जायेगा। डान्स इंडिया डान्स की वीनर है। धक्-धक्  धक्-धक् धक्-धक् ….’’ ‘‘अरे जल्दी से रिझल्ट बोल दे टीना कहीं दीदी को अटेक न आ जाये।’’ मीना ने उतावलेपन में कहा था। तब टीना ने भी भाव खाते हुए, अकडते हुए अंदाज में कहा था, ‘‘हाँ तो मैं कहाँ थी। धक्-धक्  धक्-धक् धक्-धक् …और इस फाईनेल की विजेता है- दो बूॅद जिंदगी के पाँच जनवरी को पास के ही शीशु केन्द्र में पॉच साल तक के बच्चों को जरूर पीलाईये।’’ करीना ने टीना को टोकतें हुए कहा था । ‘‘टीनू यह सब क्या है ? ।’’ इस पर टीना अपने ही अंदाज में कहने लगी थी। ‘‘दीदी, जब फाईनल रिझल्ट चल रहा होगा, तब बीच में ही टी.वी. पर अॅडव्हर्टाईज होगा की नहीं। और भाई दर्शकों को इतनी आसानी से रिझल्ट कैसे बतायेंगे। थोडी टी.आर.पी. चाहिए ना।’’ जीतने से पहले ही टीना ने अपनी दीदी रीना को विजेता घोषित कर दिया था। उसके अभिनय का साथ देते हुए सभी परिवार के सदस्यों ने तालियों से विजेता का जश्न मनाया था। छोटी ने टेबल पर रखा फ्लावर पॉट उठाया और अपने माँ और पिता अलोक का हाथ पकड़कर उन्हेें विजेता को ट्राफी देने के लिए फ्लावर पॉट की ट्राफी उनके हाथों में थमा दी थी। उन्होंने भी अपने बच्चों के खेल में साथ दिया था। ट्राफी रीना को दी गई थी।       जब घर में खुशनूमा माहोल चल रहा था। ऐसे में गंगूबाई भी आ चुकी थी। गंगूबाई उस दिन लगभग एक माह के बाद आ रही थी। गंगूबाई को देखकर सुप्रिया और उनका परिवार भी खुश हो गया था। पर उनकी खुशियों के सामने गंगूबाई का चेहरा मुर्झाया हुआ, निराश और दुःखी दिखायी दे रहा था। सुप्रिया ने उससे उसके निराशा के कारण को जानना चाहा था। कई दिनों बाद लौटी गंगूबाई को दुःखी देखकर सुप्रिया और परिवार के मन में प्रश्न चिन्ह् उपस्थित कर रहा था। जब सुप्रिया, आलोक और लड़कियों ने एक साथ जोर देकर पुछा था। तब वह आँखों से नीकलनेवाले आँसुओं को पोछते हुये रूआसी आवाज में कहने लगी थी। ‘‘साहेब, मेरी लड़की को जब मुलगी हुई थी, तब मैं खुश मेरा पति भी खुश था। उसने खुशिसे शराब छोड दी। पर …. ं’’ वह जोर-जोर से रोने लगी थी। सुप्रिया ने उसे पानी पीलाते हुए सांतवना दी और आगे बताने के लिए कहा था।, ‘‘मेम साहेब, उसके ससुरालवाले खुश नहीं होंगे। उन्होंने मेरी मुलगी को यह कहकर भेजा कि पहले ही तीन-तीन लड़कियाँ हो चुकी है। अब की लड़का ना हुआ, तो घर लौटकर मत आना। समझले तेरा पति हमेशा के लिए मर गया है। अब तुम्ह ही बताओं साहेब, मेम साहेब मैं क्या करूँ। ? इसीलिए मैं इतने दिन काम पर नहीं आयी।’’ वह रो रही थी। सुप्रिया आलोक और लड़कियों को यह बात सुनकर बेहद दुःख हुआ था कि आज के विज्ञान, तकनीक, आंतरिक्ष के युग में ऐसी सोच। एक और हमारा देश चाँद, मंगल पर बस्ती करने के बारे में सोंच रहा है। दूसरी और ये किस दुनियाँ में जी रहे है लोग ? गंगुबाई के शब्दों से आहत मीना कहने लगी थी। ‘‘मॉ ! क्या सच में लड़कियाँ इतनी बोझ होती है। लड़की होगी तो क्या हो जायेगा ? कौनसा आसमान टूट पडेगा ? जो उसके ससुरालवाले उसे अपने घर नहीं लेंगे ? माँ उस की सास भी तो एक स्त्री ही है ना! क्या, एक स्त्री-दूसरे स्त्री की वेदना और पीढ़ा को नहीं समझ सकती ? रीना भी अपने मन में उठनेवाले प्रश्नों को अपनी माँ के सम्मुख रखतें हुए कहा था। ‘‘हॉ माँ ! लोग कहते है कि लड़कियाँ बोझ होती हैं। वह परायाधन होती हैं। कहते है, लड़कियॉ पढ़ लिखकर क्या करेगी ? चुला चक्की और घर गिरस्ती ही तो संभालना हैं।’’‘‘मम्मा, लडकियांे को ही क्यों मार दिया जाता हैं। जन्म होने से पहले ही, आँख खुलने से पहले ही उसकी ऑखें क्यों बंद कर दी जाती हैं। जिसने अभी दुनिया भी देखी नहीं थी। उस अजन्मे भ्रून की गला रेत कर हत्या…? घृणा है, उन लोगों से मम्मा मुझे घृणा है। लड़कियाँ तो आज हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है ना ?’’अबतक सब की बाते सुन रहे आलोक की जबान कबतक समाधि में लिन ओंठों के द्वारा के परें रहनेवाली थी। उसने अपने बेटियों का हौसला बढ़ाते हुए कहा था,

‘‘बेटी, तुम सच कह रही हो, बेटियाँ आज किसी भी मायनों में लड़कों से कम नहीं होती। मेरी ही बेटियों को ले लो । सभी एक से बढ़कर एक। सभी अपनी माँ और पिता का नाम रोशन कर रहे है। रीना डान्स में अव्वल है, एक दिन वह बहुत बड़ी कोरियोग्राफर बनेगी। करीना सींगर बनेगी। मीना फिल्मों में अभिनेत्री और टीना हर दुःखी इन्सान को हँसाएंगी।’’                                                                                                                                                                             ’ ’ ’ ’ ’ ’ ’ ’

रीना ने डान्स इंडिया डान्स का कॉम्पिटेशन जीत लिया था। उसने अपने साथ अपने परिवार, पडोसियों, शहर का नाम रोशन किया था। वह सारे न्यूज चैनोलों पर छा गयी थी। सारे समाचार पत्रों में उसके ही गुनगान गाये जा रहे थे। उसे अब पूरा देश जानता था। वह युवा दिलों की धड़कन बन चुकी थी। प्रशंसा और बधाईयाँ देनेवालों की रीना के घर पर तांता लगी हुई थी। जिन लोगों ने कभी अभिजीत को चार-चार लड़कियॉ होने पर ताने कसे थे। जीना दूभर कर दिया था। आज वे ही लोग रीना को बधाई देने के लिए आलोक के घर आये हुये थे। ‘‘आलोक जी, आपकी लड़कियों ने आपका ही नहीं बल्कि हमारा भी नाम सारी दुनिया में रोशन कर दिया है।’’     ‘‘लड़कियाँ होकर कहाँ से कहाँ पहुँच गयी हैं। और हमारे लड़के जीन पर हमने नाज किया था। उनके जन्म पर दीवाली जैसा त्यौहार मनाया था। हम बेहद खुश थे कि हमें लड़की नहीं बल्कि लड़का हुआ था। पर आज वह निकम्मों की तरह घर निट्ठले बैठे है। हमने चार-चार लडकियॉ होने पर अभिजीत और आपका मज़ाक उड़ाया था। आज हम आपसे माफी माँगते है।’’ पड़ोसियों द्वारा सुप्रिया के परिवार से माफी मांगी जा रही थी। पश्चाताप ने उन्हें अलोक के परिवार के नजरों में बड़ा बना दिया था। वे देर आये पर दूरस्त आये थे।’’‘‘काश हमारे यहाँ भी एखाद लड़की होती। आलोक जी आप सच में ही भाग्यवान है। आपके यहाँ इतनी होनहार लड़कियों ने जन्म लिया है।’’ अलोक ने अभिजीत से किया हुआ वादा पूरा किया था। उसकी आँखों से खुशियों के आँसू छलक रहे थे। वह उस दिन बेहद प्रसन्न था।                                                                                              अस्पताल के ऑप्रेशन थियेटर में गंगूबाई की लड़की प्रसव पीड़ा से कराह रही थी। भीतर से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी। इधर गंगूबाई परेशान थी कि लड़का हुआ या लड़की। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह खुशियाँ मनाये या फिर अपने नसिब को कोसते हुए रोये। वह द्विधा मनस्थिति में बाहर बैठी आलोक के बाहर आने की बेसब्री से प्रतिक्षा कर रही थी। कब डाक्टर साहेब बाहर आयेंगे और कब उसे समाचार देंगे।                                                                                                          ’ ’ ’ ’ ’ ’ ’ ’

आलोक ऑप्रेशन थियेटर से बाहर आया था। उसने गंगुबाई की और देखते हुए कहा, ‘‘बधाई हो गंगूबाई तुम्ह नानी बन गयी हो। मीठाई बांटिये, मीठाई, लड़की हुई है। तुम्हारे घर लक्ष्मी आयी है।’’ यह बात सुनना ही था कि गंगूबाई को जोर का झटका लगा था। उसने अपने दोनों हाथ माथे पर रखते हुए नीचे बैठ गयी थी।, ‘क्या, लड़की हुई है। अरे, माझ्या देवा! यह क्या मेरे नसीब में आया। मैंने पिछले जनम में जरूर कोई पाप किये थे, जो आज ये दिन देखने पड रहे है।’’ वह छाति पर हाथ से पीटते हुए रोने लगी थी। वह अपनी लड़की के दुर्भाग्य पर आश्रु बहा रही थी। उसकी नजरों के सामने उसके ससुरालवालों ने कही हुयी सारी बाते विक्राल रूप में तांड़व कर रही थी। उसको इस तरह पीड़ित देखकर आलोक उसे समझा रहा था।’’ गंगूबाई, इस मासूम ने क्या पाप किया है ? जो इनके आने से इतना दुःखी हो रहे है। देखो जरा उसके मासूम चेहरे की तरफ देखों। और तुम इसके आने पर छाती पीटकर रो रही हो। यह तो प्रकृति का अनमोल उपहार है।’’ उसकी आँखों से बहते दुःख हताशा, निराशा के आँसू भीतर से कुछ भयानक सोंच रहे थे। कुछ ऐसा जिसे होना नहीं चाहिए। जिसकी कल्पना हम सामान्य रूप से नहीं कर सकते थे। वह डॉक्टर के पैरों में गिरकर गिड़गिड़ाते हुए कहने लगी थी, ‘‘यह मेरे लिए उपहार नहीं डॉक्टर साहेब, यह मेरे लिए शाप है शाप। डॉक्टर साहेब मैं आपके पाँव पड़ती हूँ। आप इसे मरा हुआ घोषित कर दीजिये।’’ आलोक की बोलती ही जैसे बंद हो गई थी। यह बात उसके कल्पना के परे थे। अनपेक्षित यह सब कुछ घटित हो रहा था। आलोक उसे समझा रहा था और गंगूबाई अडी हुई थी कि उसे मरा हुआ घोषित कर दें। एक पगली जैसी स्त्री जो अबतक अस्पताल के किसी कोने में बैठी यह सारा दृश्य देख रही थी। वह दौड़ते हुए आयी और कहने लगी, ‘‘मुझे दे दो यह बच्चा। मैं इसे पालती हूँ।  दे दो, दे दो। इस दुनिया में ऐसे कई निसंतान लोग है, जो संतान के लिए तरस रहे है। उनके सामने लड़की-लड़का भेदभाव नहीं वे तो बस संतान का सुख चाहते है। मुझे दे दो, मुझे दे दो। उस पगली लड़की की बात सच तो थी पर आलोक ने उसे वहाँ से भगा दिया था। ‘‘ऐ भाग यहाँ से, गंगूबाई मैं इसे गोद लुंगा। मैं इसे पालुंगा। ना मैं इसे मरने दुंगा, ना मैं इसे अनाथों की तरह जीने दूँगा। मैं इसे पिता का प्यार दूॅगा। यह मेरा पश्चाताप होगा। मेरे ही कारण मेरी पत्नी और पुत्री इस दुनिया को छोड़कर चले गये। इसमें मैं अपनी मरी हुई बेटी का चेहरा देख रहा हूँ। इस से मेरी पत्नी की आत्मा को शान्ति मिलेगी। और मुझ पर लगा हुआ कलंक भी कम होगा।’’                               आलोक सुबह जल्दी उठ गया था। वह आईने में देखकर सेविंग कर रहा था। बिस्तर पर लेटी सुलोचना नींद से चीखते हुये जागी थी। आलोक दौड़कर प्रेग्नंट सुलोचना के पास आया था।                                                                     ‘‘क्या हुआ सुलोचना’’                                                                  चेहरा पसिने से तरर्र हो गया था। घबराई, साहमाई-सी आलोक के गले लिपटते हुए उसने कहा था ‘‘आलोक मैंने एक भयानक सपना देखा…।

-  डॉ. सुनिल जाधव

रचनायें :-
कविता : मैं बंजारा हूँ /रौशनी की ओर बढ़ते कदम / सच बोलने की सजा / …….
कहानी /  एकांकी : मैं भी इन्सान हूँ / एक कहानी ऐसी भी /भ्रूण ….
शोध : नागार्जुन के काव्य में व्यंग /हिंदी साहित्य विवध आयाम / …..
अनुवाद : सच का एक टुकड़ा {नाटक }
अलंकरण : सृजन श्री ताशकंद /सृजन श्री -दुबई / हिंदी रत्न -नांदेड
विदेश यात्रा : उजबेक [रशिया]/ यु.ए.इ./ व्हियात्नाम /कम्बोडिया /थायलंड …
पता : महाराष्ट्र -०५ ,भारत

One thought on “भ्रूण

  1. भाई सुनील जाधव को ‘भ्रूण ‘ जैसी रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई।आप इसी तरह लिखते रहें । हमारी शुभकामनायें।
    संपादकीय मण्डल को ऐसी रचना को अपनी पत्रिका मेन स्थान देने के लिए धन्यवाद ।
    – सुमन सरस्वत , मुंबई – भारत ।

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