भोजपुरी की आत्मकथा

मैं, भावों की धरातल पर मधुर भावनाओं और मानवीय संवेदनाओं से भरी भोजपुरी हूँ। मेरे शब्द श्रृंगार जनभावनाओं के पूर्ण अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम रहे हैं। नतीजतन वैदिक काल से मेरे शब्दों का उचार-विचार जन भावनाओं की पुकार बनकर अपनी सर्वोत्तम उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। मुझे सर्वप्रथम संत-महात्माओं, निर्गुणिया साधकों-सूफीयों ने अपना कंठाहार बनाया। 12वीं सदी के आखिरी वर्षों में मेरा कुछ निखरा रूप काव्यकायिक स्वरूप के साँचे में ढलकर साहित्यिक चेतना का सर्वमान बना। सूफी संत अमीर खुसरो ने मुझे सजा- सँवार कर साहित्य जगत में पेश किया-

खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय।

वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय ।।

खुसरो ने  मुझे साहित्यिक जगत में स्थापित तो किया परंतु मेरे श्रृंगारिक भाव को महज आंशिक तौर उद्घाटित एवं प्रदर्शित कर के ही विराम चिन्ह लगा दिया। मेरे एक सपूत कबीर ने मुझमें साहित्यिक लालित्य के साथ उत्कृष्ट अध्यात्मिक चेतनाओं को संचारित किया। कबीर के दोहा-साखियों का असर यह हुआ कि लोग यह कहने लगे भोजपुरी एक सामर्थवान लोकभाषा है।

प्रीतम, हर से नेह कर, जैसे खेत किसान ।

घाटा दे उर डंड भरे, फेर खेत से ध्यान ।।

कबीर के सद्प्रयासों से मैं साहित्यिक जगत में  सम्मानित एवं प्रतिष्ठित होने लगी। सगुण-निर्गुण साधकों-संतों द्वारा मेरे साहित्यिक भंडार धीरे-धीरे भरते गए। महाकवि जगनी के अल्हा-उदल के साथ ही सोंठी-बिरजा, लोरिकायन, सदावृक्ष-रानी सरंगा, शीत-बंसत मेरी मुस्कान बने। मेरा एक वीर पुत्र शेरशाह सूरी दिल्ली की सल्तनत के राजसिंहासन पर बैठा, मैं उसे लोरी सुनाती रही। उसने मुझमें कविता-गीत भी रचे।

बंग्ला साहित्य के क्रांतिकारी कवि काजी नजिरूल इस्लाम ने मुझमें भी गीत रचे। मैं हर दिन सुरज की रौशनी के साथ एक नई ऊर्जा से जगमाती रही। रौशनी की तरह फैलती रही।  तेग अली तेग ने मुझे फारसी साहित्य की विधा ‘गज़ल’ से भी रूबरू कराया, मुझे अपनी गजलों का माध्यम भी बनाया। वहीं दूसरी ओर हीरा डोम ने तत्कालिन सामाजिक विसंगतियों पर से परदा उठाने के लिए मुझमें ‘अछुत की शिकायत’ की रचना की। मेरा एक और सपूत महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने अपने नाटकों के माध्यम से समाज में जागृति लाने के लिए मुझे ही सुयोग्य समझा। पंडित महेंद्र मिश्र ने काव्यकायिक पूर्वी गीतों के रूप मेरे आँचल को मोतियों से भरा-

सासु मोरी मारे रामा बाँस के छेवकिया से ।

ननदिया मोरी रे सुसुकत पनिया के जाये ।।

महेंद्र मिश्र के समकालीन ही मेरे सुपुत्र जनकवि भिखारी ठाकुर  ने  मुझे अपने नाच-नाटकों की प्रस्तुति से रंगमंच पर स्थापित करने के सफल प्रयास किया। भिखारी के नाटकों की विशिष्टता को देख कर उन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर कहा गया। बाबू रघुवीर नारायण, प्रो० मनोरंजन प्रसाद सिन्हा, डॉ० उदय नारायण तिवारी, दुर्गाशंकर सिंह ‘नाथ’, कृष्णदेव उपाध्याय ने भी हमारी सेवा में कोई कोर- कसर नहीं छोड़ा।

 

आधुनिकता के धुन पर मुझमें पहली कहानी ‘जेहल में सनद’ विमलानंद सरस्वती ने लिखा वहीं मेरे एक और साधक रामनाथ पांडेय ने मुझमें सर्वप्रथम ‘बिंदिया’ नामक उपन्यास लिखा। मेरे दामन में कोई फूल कम ना पड़े इसी क्रम में मुझमें ‘दिवान’(गजल महाकाव्य) ‘रंगमहल’ की नयाब इमारत जौहर शाफियाबादी  ने खड़ा किया। साहित्य के तमाम मानों-प्रतिमानों और शैलियों-परंपराओं की रचनाओं के केंद्र में मैं हूँ, मसलन यात्रा वृतांत, संस्मरण, लघु कहानी, कविता, गीत, गजल, निबंध, नूतन ललित निबंध सब मेरे अंग है। इतना ही नहीं व्याकरणीय चौकसी पर शब्द-अनुशासन से आधुनिक मानक भोजपुरी व्याकरण तक लगभग चौदह व्याकरण मौजूद हैं। भोजपुरी-हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोश, मुहावरा कोश मेरी सशक्ता का परिचय दे रहे हैं।

 

आज मैं अपने सपूतों तथा साहित्यिक धरोहरों के आधार पर यह गर्व से कहती हूँ कि मैं आज दुनिया की किसी भाषा साहित्य से किसी भी पैमाने पर लेश मात्र भी कम नहीं हूँ। यह मेरा दंभ नहीं सहजता है। इसकी बानगी मेरी विशालतम शब्द संपदाओं में देखने को मिल सकती है। मुझमें एक ओर मोती बीए का संयमित श्रृंगार बोध है तो वहीं दूसरी ओर  जनवादी तेवरों की ऊँचाई को छुता हुआ  गोरख पांडेय के क्रांतिगीत भी हैं।

समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई ।

हाथी से आई, घोड़ा से आई, अंग्रेज़ बाजा बजाई॥

गीत-संगीत, और सिनेमा के रूपहले पर्दे पर मैंने दस्तक दी। नजीर हुसैन, चित्रगुप्त ही नहीं मो० रफी, मन्ना डे, लता मंगेशकर, आशा भोंसले जैसे अजीम फनकारों ने मेरी सशक्ता का परिचय खूब कराया। वहीं दूसरी ओर रामेश्वर सिंह कश्यप (भोला सिंह- रेडियो नाटक), डॉ० विवेकी राय, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ० प्रभुनाथ सिंह, डॉ० विद्यानिवास मिश्र, गिरजाशंकर राय ‘गिरिजेश’, डॉ० गजाधर सिंह, डॉ० राजेंद्र प्रसाद,  पं० कुबेर नाथ  मिश्र ‘विचित्र’, पांडेय कपिल, डॉ० गुरूचरण सिंह ‘गुरू’, डॉ० सदानंद शाही, प्रो० शत्रुघन प्रसाद, प्रो० ब्रजकिशोर एवं डॉ० जीतेंद्र वर्मा जैसे मेरे हजारों लाल अपने साहित्यिक कौशल से मेरे साहित्य-आँचल को विस्तार दिया है।

 

‘भोजपुरी पत्रिका’ 1948 में मेरे लाल आचार्य महेंद्र शास्त्री ने अपने संपादन में प्रकाशित किया। इस पत्रिका के बाद से मुझमें प्रकाशित कृतियों की संख्या उत्तरोतर बढ़ने लगी। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी ओंकारेश्वर पांडेय, सभाजीत मिश्र, डीएन राय, सदाशिव त्रिपाठी, नीराला, अनील ओझा नीरद, जनार्दन सिंह जैसे लालों ने मुझे एक नई पहचान दिलायी है।

 

12 मार्च, 1970 को मुझे अपने स्वाभिमान का मुद्दा बनाकर मेरा लाल जौहर शाफियाबादी सबसे पहले मेरे लिए आमरण अनशन पर बैठा। अनुमंडलाधिकारी, गोपालगंज के लिखित अनुरोध पर उसने अपना अनशन तोडा। यह मेरे लिए ऐतिहासिक दिन था। ऐसा लगा कि अब धीरे-धीरे अस्मिता, आत्म-स्वाभिमान एवं भोजपुरी-गौरव को लेकर मेरे लाल एकजुट हो रहे हैं। आंदोलित हो रहे हैं। 1972 में आंदोलन की गति को तेज करने के लिए अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का गठन हुआ। इसके बाद भोजपुरी संगठनों की संख्या  बढ़ती रही।

 

आज राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भोजपुरी केंद्रीत सौ से ज्यादा बड़े संगठन हैं जिनके सदस्यों की संख्या हजारों में है। चार सरकारी भोजपुरी अकादमियां भी कार्यरत हैं। बावजूद इसके यह मेरा दुर्भाग्य है कि आजादी के छ: दशकों के बाद भी मुझे अपने ही देश में संवैधानिक मान्यता तक प्राप्त नहीं है। जबकि मुझे बोलने वालों की संख्या तकरीबन 20 करोड़ से भी ज्यादा है। गैरों की कौन कहे मुझे मेरे अपने ही छलने का लगातार प्रयास करते हैं और आज भी मुझे बोली कह कर अपमानित करते हैं। क्या यह दुख कि बात नहीं है कि महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने 1947 में भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के गोपालगंज अधिवेशन में यह बात पूरजोर तरीके से उठाई कि मुझे पठन-पाठन का माध्यम  बनाया जाए लेकिन वही ढाक के तीन पात! राहुल सांस्कृत्यायन, बनारसी दास चतुर्वेदी एवं परमेश्वरी लाल गुप्त के सपने धरे के धरे रह गए। आज मेरे लिए सरकारी स्तर पर केवल उदासीन रवैया देखने को मिलता है-

साँच पऽ बा आँच खाली जी हुजुरी  बा इहाँ,

चाहें जइसे होखे परिवर्तन जरूरी बा इहाँ ।।

 

- देवेंद्र नाथ तिवारी 

जन्मदिन : १२ नवम्बर
जन्मस्थान : देवरिया, उत्तर प्रदेश
पेशा : शाधार्थी, स्वतंत्र पत्रकार एवं संस्कृतिकर्मी
रूचि : लेखन, अध्यापन एवं पर्यटन
आपके द्वारा संपादित प्रकाशित कृति : गीत- गगन ( भोजपुरी), मितवा (भोजपुरी)

वर्तमान में भोजपुरी की मासिक ई-पत्रिका आखर के सम्पादन में सहयोग
पूर्व में ‘द संडे इंडियन’ (भोजपुरी) में कापी संपादक का कार्यानुभव.

4 thoughts on “भोजपुरी की आत्मकथा

  1. जी नमस्ते
    इ बार हमार रचना प्रकाशित ना भईल हऽ का ?
    plz. reply

    • tiwari ji , राउर इ रचना बहुत बढ़िया बा |
      अद्भुत

  2. वाह रे हमरे भइया, मज़ा आ गइल। खूब सूनर लिखले हउवा। अइसहीं आगे अउर लिक्खा आ भोजपुरी के अर्श पर पहुँचावा।।

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