भैंस भड़ाँस

 

सो, भैयो-भैंनों! अब भी समय है। जाग जाओ। बंद आँखें खोलकर कान पर जोर दो। क्योंकि समूचा देश भैंस-रुदन से ज़ार-ज़ार हुआ जा रहा है। वे इतनी मायूस और ग़मग़ीन होती जा रही हैं कि मग़रूर इन्सानों द्वारा उनकी बात न सुने जाने पर वे खटालों के दीवारों से अपना हाले-दिल बयाँ कर रही हैं और अपना भड़ाँस निकाल रही हैं। वैसे नहीं तो ऐसे ही, अपने मन का बोझ हल्का कर रही हैं। वर्ना, क्या पता, इस तरह बढ़ते तनाव का ख़ामियाज़ा उन्हें भी भुगतना पड़ सकता है–बाकायदा इन्सानों की तरह ब्लड-प्रेशर, हार्ट अटैक और ब्रेन हैमरेज़ का शिकार होकर…

ये तो अच्छा हुआ कि मेरा ध्यान एकबैक एक मरियल-सी भैंस की गुहार की तरफ़ गया जो न तो पगुरा रही थी, न ही सानी-चारा चबा रही थी। ऐसा तब घटित हुआ जबकि मैं सबेरे-सबेरे अपने ग्वाले के खटाल में दूध लाने गया हुआ था। बहरहाल, जब मैं उस भैंस के आगे खड़ा होकर उसके हाल का ज़ायज़ा ले रहा था तो उसने ऐसी भरपूर नज़रों से मुझे देखा जैसाकि किसी भैंस ने अब तक किसी भी इन्सान को नहीं देखा होगा। यानी, उसने मुझे बड़े मान-मनुहार के अंदाज़ में देखा। और जब मैंने उसके सिर पर प्यार से हाथ फ़ेरा तो वह फ़फ़क-बिलख पड़ी। आँसुओं का सैलाब उसकी आँखों से उमड़कर उसके ममत्त्व-भरे चेहरे को तर-बतर करने लगा। मेरी समझ में आ गया कि वह काफ़ी लंबे समय से किसी अकथनीय वेदना से घुट-घुटकर मर रही है और अगर अब उसकी अनदेखी-अनसुनी की गई तो ग़ज़ब भी हो सकता है क्योंकि उसके लिए उसके साथ उसका सारा समुदाय खड़ा हो सकता है।

ऐसे में, क्या होगा, यह सभी जानते हैं। सारे देश में त्राहि-त्राहि मच सकती है। उसके समर्थन में देशभर की भैंसें एकजुट होकर दुग्ध हड़ताल कर सकती हैं। हमें दूध की एक-एक बूँद के लिए मोहताज़ बना सकती हैं। यह तो सर्वविदित है कि इस नारी जागरण के दौर में हमारी मम्मियों की ज़िम्मेदारी अस्पतालों के सर्वसुविधा-संपन्न वार्डों में सिर्फ़ बच्चे जनने तक ही सीमित रह गई है। बच्चे को दुग्धपान कराने के आदिम रिवाज़ से वे पहले ही तौबा कर चुकी हैं। सो, दूध मुहैया कराने का ज़िम्मा तो इन्हीं भैंस माताओं का है।

चुनांचे, मैंने उस दुःखी भैंस के दुःख की वज़ह जानने के लिए उसको पूरे स्नेह-भाव से पुचकारा-चुमकारा। मेरी आत्मीयता से अभिभूत होकर, उसकी घिग्घी बँध गई और वह काफ़ी देर तक हकलाती रही। लेकिन, जब मैने यह वचन देते हुए उसको ढाँढस बँधाया कि मैं तुम्हारे दुःखों का निवारण करने में कोई कोताही नहीं बरतूँगा तो वह सामान्य होकर रम्हाने लगी: “हम भैंसें सदियों से इन्सान को अपना दूध पिला-पिलाकर उसे पालती-पोसती रही हैं। लेकिन, हमें हमेशा उसकी हिकारत ही मिली है।”

मैं आश्चर्य से बोल उठा: “ऐसा कैसे हो सकता है? हमारा पूरा समाज प्राचीन काल से तुम्हें माता का दर्ज़ा देता रहा है…”

“जरा, अपने शब्दों पर फिर से ध्यान दो। तुम माता का दर्ज़ा हमें नहीं देते। तुम्हारा समाज हमेशा हमारा उपहास उड़ाता रहा है। तुमलोग हमेशा हमें निर्बुद्धि, जड़ और बेवकूफ़ साबित करने पर तुले रहते हो।” उसकी आवाज़ में एक आक्रोश था।

उसकी बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी। मैंने कहा: “मुळो सारी बातें खोलकर समझाइए। आख़िर, आप किस कारण इतनी पीड़ित हैं?”

उसने अपनी आँखें मेरे चेहरे पर टिका दीं।

“सुनो, इस देश में हमारे साथ बड़ा भेदभाव किया जाता है। हमारे साथ तुमलोग वैसा ही बर्ताव करते हो जैसेकि तुम्हारे समाज में दलितों के साथ किया जाता है।”

“वो कैसे?” मेरी जिज्ञासा का कोई पारावार नहीं रहा।

“वो ऐसे कि तुमलोग शुक्लवर्णीय गायों को ही सारा मान-सम्मान देते हो जबकि हम भैंसों पर गाहे-बगाहे ताने और फ़ब्तियाँ ही कसते रहे हो…”

मेरा मुँह ताज़्ज़ुब से खुला रह गया। मुझे उसकी बात समझ में आने लगी थी।

उसने आगे कहा: “इस देश में गायों की तादात हम भैंसों की तुलना में बहुत कम है। या, यूँ कहो कि किसी-किसी शहर में ढूँढने से विरले ही सौ-दो सौ गाएं मिलेंगी। ऐसी स्थिति में गाय का दूध मुश्किल से ही कुछ इन्सानों को मयस्सर हो पाता होगा। इस देश में जितने भी होटल, रेस्तरॅा, चाय की दुकानें वग़ैरह हैं, उन सभी में हमारा ही दूध इस्तेमाल होता है। लेकिन, इसके बावज़ूद लोगबाग उस दूध को गाय का दूध ही पुकारते हैं। शायद ही कोई माँ अपने बच्चे से कहती होगी कि लो, बेटा भैंस का दूध पी लो।”

उसकी आँखों से फिर आँसुओं का बादल फट पड़ा। लिहाजा, उसकी आवाज़ और दमदार हो गई थी।

मैंने हाथ जोड़कर कहा: “भैंस माता! आपके समाज के साथ सचमुच बड़ा अन्याय होता रहा है। लेकिन, इस बात पर आप पूरा यकीन कर लें कि आपको भी गौ समाज में ही शामिल किया जाता है।”

मेरे उवाच पर वह बिफ़र उठी: “वाह, वाह! खूब कहा! काम मेरा और नाम किसी और का। खून से मैं तुम्हें सींचूँ और तुमलोग उपकार मानो किसी और का…”

उसने अपनी पैनी सींगें मेरी तरफ़ कर दीं।

मैं सहम गया। मैंने सिर घुमाकर आसपास खड़ी दूसरी भैंसों को भी देखा। उन सभी की हालत कमोवेश इस भैंस की तरह ही थी। भैंस माताओं के साथ सचमुच बड़ी नाइंसाफ़ी हो रही है। मैं पूरे सम्मान से पेश आया: “आप आश्वस्त रहिए, आपकी शिकायत सभी इन्सानों तक पहुँचा दी जाएगी।”

वह आग-बग़ूला हो उठी: “ख़बरदार! हम भैंसों का साधारणीकरण करने से बाज़ आओ। वर्ना, हम बलवा-फ़साद करने पर भी उतारू हो सकते हैं। हमारी मेजारिटी इतनी है कि हम कुछ भी कर सकते हैं।”

मैंने आगे बढ़कर उसका गुस्सा शांत करने की गरज़ से उसकी पीठ पर हाथ फेरा: “मैं अभी यहाँ से बाहर जाकर हर शख़्स को बताऊँगा कि…”

“देखो, हमें इन्सानी समाज में ज़ायज़ ओहदा दिलाने के लिए तुम्हें बहुत सारी मान्यताएं तोड़नी होंगी, किताबों में लिखी बातों में फ़ेर-बदल करनी होगी, समूची सोच में बदलाव लाना होगा…” वह तल्ख़ लहज़े में मेरी बात काटते हुए मेरा रास्ता घेरकर खड़ी हो गई।

वास्तव में, उसका पूरा आशय मैं समझ नहीं पाया था। मैंने विनीत भाव से कहा: “माताजी! आप  सारी बातें खोलकर कहिए ताकि आपके मन में कोई संशय न रहे और मैं हर आदमी तक आपकी बात पहुँचा भी सकूँ!”

उसने कहा: “सुनो, हमारे साथ बेहिसाब भेदभाव किया जाता है जबकि हमारा दूध भी उतना ही सफ़ेद होता है जितना गाय का। बल्कि, यह कहो कि हमारा दूध कहीं अधिक स्वादिष्ट और फ़ायदेमंद होता है। हलवाई हमारे दूध से अधिक खोवा और मलाई निकालते हैं और यह इतना गाढ़ा होता है कि ग्वाले इसमें दो-तिहाई पानी मिलाकर भी शुद्ध दूध की कीमत पर मजे से बेच लेते हैं। मेरे दूध में जो बरकत है, वह सौतन गाय के दूध में कहाँ? बस, यह समळा लो कि देशभर की मिठाइयों की दुकानें हमारे ही रहमो-करम पर चल रही हैं, नहीं तो…”

आवेश में बोलते-बोलते वह रुक गई। मैंने उसके गले को सहलाया ताकि उसका हाँफ़ना बंद हो जाए। फिर, उसने नाद में मुँह डालकर एक घूँट पानी पीया और एक गहरी साँस ली।

“सुनो, तुम अहसानफ़रोश मनुष्यों ने हमें हमेशा दोयम दर्ज़ा दिया है…”

मैंने अपराधबोध से अपना सिर झुका लिया।

उसने दोगुनी शक्ति से अपनी बात जारी रखी: “…तुमलोगों ने हमारे समुदाय को अपने भौंड़े गाली-गलौच में शामिल कर रखा है। भद्दे-भद्दे मुहावरों और लोकोक्तियों से जोड़ रखा है। किसी भलेमानस को भैंस पुकारकर उसकी शराफ़त और अक़्लमंदी का मखौल उड़ाते हो। तुम किसी गाय के आगे बीन बजाकर देखो, वह भी पगुराएगी। वह बीन के सुर में सुर मिलाकर गाने नहीं लगेगी। किसी बावले इन्सान की तुलना क्यों नहीं गाय की मोटी खाल से करते हो? क्या सिर्फ़ हम भैंसों की ही मोटी खाल होती है? सबसे मोटी खाल तो हाथी की होती है। फिर, तुम क्यों नहीं कहते कि फलां आदमी को कुछ भी समळा में नहीं आता; उसकी हाथी जैसी मोटी खाल है…”

मैं उसकी झाड़ सुनते हुए पसीने से भींगता जा रहा था। लेकिन, मैं अपना माथा भी नहीं पकड़ सकता था। क्योंकि ऐसा करने से वह यह समझती कि मैं उसकी फ़िज़ूल बातों से बोर हो रहा हूँ और उससे येन-केन-प्रकारेण कन्नी काटना चाहता हूँ। ऐसे में बिलाशक! वह मुझ पर हमला भी बोल सकती थी। लिहाज़ा, मैं पूरी तरह उसकी बात पर ग़ौर फ़रमाने का अभिनय कर रहा था।

मैंने ख़ुशामदी लहज़े में कहा: “सचमुच आपका समुदाय हम इन्सानों की इतनी ज़्यादतियाँ सहता रहा है कि अब कोई प्रायश्चित करना भी अब नामुमकिन सा लगता है।”

मेरी टिप्पणी पर वह भावुक हो उठी: “इतना ही नहीं, मानव समाज ने हमें सदियों से अशुभ वर्ग में बैठा रखा है। अगर हम किसी मनुष्य के सपने में दिखाई दे जाएं तो वह इसे बड़ा अपशकुन मानता है। मतलब यह कि उसके घर में किसी निकट-संबंधी की मृत्यु होने वाली है। इसी बुरे विचार से उसने हमें मृत्यु के देवता–यमराज की सवारी के रूप में मान्यता दे रखी है। अगर पौ फटते किसी आदमी की नज़र हम पर पड़ जाए तो वह इसे बेहद अशुभ और अपशकुन मानकर वापस घर लौट जाता है…”

उसकी सिसकियाँ, हिचकियों में बदल गईं। मेरा मन बड़े आत्मग्लानि से भर गया। मैं मन ही मन बड़ी उदारतापूर्वक अपने स्वार्थी मानव समाज को कोसने-सरापने लगा।

मैंने कहा: “भैंस माताजी! अब क्या बताऊँ? आपने बिल्कुल दुरुस्त फरमाया है। मेरा वश चलता तो आपको हर जगह उसी रूप में स्थापित करता, जिस रूप में गौ माता को स्थापित किया गया है। ग्रंथों, धर्मों, मंदिरों आदि में आपकी तूती बोलवाता।”

उसने सिर हिला-हिलाकर अपने चेहरे पर जमा आँसुओं को झटका और फिर, जोर-जोर से हुँकारने लगी: “अब देखो, मंदिरों में गाय-बैलों की ही मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं, हम भैंसों की नहीं। शिवालयों में गौ प्रजाति के नन्दी नामक बैल को शिवजी की सवारी के रूप में स्थापित किया गया है। यज्ञ और पूजा में पाखंडी पुजारी हमारे ही दूध को गाय का दूध पुकारकर इससे सारे पवित्र कर्मकांड निष्पादित करता है। हमारे ही मल को गाय का गोबर मानकर पूजा-स्थल की लिपाई-पुताई करता है और उसे पवित्र बनाता है। लेकिन, कभी उसे यह कहते हुए नहीं सुना गया कि गोबर तो विरले ही मिल सकेगा; चलो, (भैंस के) भोबर से ही काम चला लें। भोबर भी उतना ही पवित्र है, जितना गोबर…”

कुछ पल रुककर उसने साँस ली और नाद में मुँह डालकर एक कौर चारा चबाया। तब, मैंने उसे ध्यान से देखा। उसकी आँखों में विषाद का धुंध छँट रहा था क्योंकि मैंने उसकी भड़ांस निकलवाने में पूरी मदद की थी। प्रत्युत्तर में, वह भी मुझे बड़े ममत्त्व से निहार रही थी क्योंकि उसे मुळा जैसा एक हमदर्द जो मिल गया था।

कुछ सोचते हुए उसकी आँखें लाल हो गईं। उसने आगे कहा: “हम भैंसों का नाम लेना तो उतना ही अशुभ माना जाता है जितना किसी वानर, दैत्य या तुम्हारे समाज में किसी दलित जाति का। मनुष्य घोर पाखंडी है। चूँकि उसका कोई भी काम हम भैंसों के दूध के बग़ैर नहीं चल सकता, इसलिए वह हमारे दूध से कोई परहेज़ नहीं करता। वह हमारे स्तन में दूध का एक बूँद भी हमारे बच्चों के लिए नहीं छोड़ता। अरे! वह हमें कृष्ण वर्ण का होने के नाते शूद्र घोषित करके ख़ुद से किनारा क्यों नहीं कर लेता…” वह बड़े गुस्से में लाल-पीली हुई जा रही थी।

तभी हम दोनों के बीच वार्तालाप में रुकावट-सी आ गई। अभी वह अपनी बात पूरी  भी नहीं कर पाई थी कि ग्वाले ने मुझे आवाज़ लगाई: “बाबूजी, अरे! आप वहाँ उस भैंसे के आगे क्या कर रहे हैं? उससे ऐसे बतिया रहे हैं जैसेकि वह आपकी कोई रिश्तेदार हो…” फिर, ग्वाला मुळो एक किनारे करते हुए उसकी नाद में सानी चलाने लगा। उसने फिर कहा: “बाबूजी! आपके आफ़िस का टेम भी हो रहा है। आपके डिब्बे में मैंने दूध डाल दिया है। फटाफट घर को जाइए। खड़े-खड़े भैंस के आगे बीन बजाने से धरम-करम नहीं चलेगा।”

उसके इस बर्ताव पर भैंस ने मेरी ओर बड़े गुस्से और शिकायताना अंदाज़ में देखा। उसने मुझे इशारे से कहा: “क्या मैं अपनी पैने सींगों से इस बदतमीज़ का काम तमाम कर दूँ?” मैंने उसे आँखों ही आँखों में सख़्त हिदायत दी कि ऐसा कभी मत करना। अन्यथा, तुम्हारे भैंस समाज को और घृणा से देखा जाने लगेगा। मैं पूरी मेहनत-मशक्कत से तुम्हारे समाज को वाज़िब ओहदा दिलाने की कोशिश करूँगा और यहाँ मैं लिखित रूप में अपने देशवासियों के सामने पूरे भैंस समाज की ओर से पहली अर्ज़ी दे रहा हूँ।

 

- डॉ मनोज श्रीवास्तव

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष २०००; नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि.; हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि; 2-अक्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष २००४; साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष २००६, न.दि.; हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि; 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष २००८, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इन्कलाब (कहानी संग्रह), वर्ष २००९, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6. प्रेमदंश (कहानी संग्रह) नमन प्रकाशन, 2012; 7-परकटी कविताओं की उड़ान (काव्य संग्रह), अप्रकाशित;

अंग्रेज़ी नाटक  The Ripples of Ganga लंदन के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन केंद्र द्वारा प्रकाशनाधीन,

Poetry Along the Footpath (अंग्रेज़ी कविता संग्रह लंदन के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन केंद्र द्वाराप्रकाशनाधीन,

–इन्टरनेट पर ‘कविता कोश में कविताओं और ‘गद्य कोश में कहानियों का प्रकाशन

राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, तथा वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित

–सम्मान–भगवतप्रसाद कथा सम्मान–2002 (प्रथम स्थान); रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान–2012; ब्लिट्ज़ द्वारा कई बार बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक घोषित; राजभाषा संस्थान द्वारा सम्मानित

लोकप्रिय पत्रिका वी-विटनेस” (वाराणसी) के विशेष परामर्शक और दिग्दर्शक

आवासीय पता: जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत. सम्प्रति: भारतीय संसद (राज्य सभा) में सहायक निदेशक (प्रभारी–सारांश अनुभाग) के पद पर कार्यरत.

 

One thought on “भैंस भड़ाँस

  1. सुनते सुनते उकता गया हूं कि गाय के गोबर, मूत्र में क्या क्या होता है। बहुत से लोग रिसर्च के नाम पर यही सब प्रकाशित करते रहते हैं क्योंकि उनके रिसर्च को इस से लोकप्रियता मिलती है। भैस, ऊंट, बकरी के दूध, मूत्र, और गोबर में क्या कुछ भी नहीं होता। आखिर जितनी गाय के ऊपर रिसर्च की जा रही है अन्य पशुओं पर क्यों नहीं करते। वैसे भी पढ़े लिखे समझे जाने वाले असल में बेवकूफ लोगों की कमी नहीं है देश विदेश में।
    सच बात तो यह है कि इस तरह के अतार्किक विचारों के कारण ही गाय इतनी दुर्गति को पहुंची है। क्योंकि गरीब आदमी ना तो बीमार गाय को ना तो कसाई को बेच सकेगा ना उसका पेट भर पायेगा। गाय के नस्ल की बात करें तो ज्यादातर नस्ले कम दूध देती हैं। दूध मूत्र और गोबर हर मामले में भैस बेहतर ही है। लेकिन रंग काला होता है बस इस कारण कोई भैस को पसंद नहीं करता।
    एक सज्जन कह रहे थे कि गाय गोबर बहुत उपयोगी होता है तो क्या भैस का गोबर नहीं होता, क्या भैस के गोबर से उपले नहीं बनाए जा सकते। मूत्र पीना है तो भैस का मूत्र पीजिये शायद ज्यादा गाढ़ा भी हो।

    माफ कीजिएगा, किसी का मजाक नहीं बना रहा हूं। समझा रहा हूं कि तार्किक सोंचिये और ये ना भी हो सके तो कम से कम अपने विचार दूसरों पर जबर्दस्ती मत लादिये।

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