भैंस, तुम कितनी खूबसूरत हो!

राधेलाल जी का सौंदर्यबोध बड़ा विचित्र है। उनको पगुरा रही भैंस में भी सौंदर्य दिखाई दे जाता है, बशर्ते उसका स्वामी कोई वी॰आई॰पी॰ हो। वह जब भी हमारे घर आते हैं, हमारे कबाड़ तक को सुंदर कर जाते हैं, क्योंकि हमसे उनके  अनेक स्वार्थ सधते हैं। उनका सौंदर्य-वर्णन कभी निरर्थक नहीं होता है।
उस दिन, चुनाव जीतने के  पश्चात् किसी नेता की उपेक्षित जनता पर पड़ती ठंडी दृष्टि-सी रविवार की निरर्थक सुबह थी और मैं सरकारी कर्मचारी-सा अजगर बना चारपाई पर बैठा मुफ्रत की धूप सेंक रहा था। खिचड़ी बाल, बढ़ी हुई शेव, मुचड़ा हुआ कुर्ता-पाजामा और आँखों में लगी हुई गिद्द मेरी कुरुपता में चार चाँद लगा रहे थे। पत्नी सुबह से हाईकमांड बनी नहा लेने की बार-बार चेतावनी दे रही थी और मैं असंतुष्ट विधायक-सा कानों में रिश्वत डाले अपना शक्ति-प्रदर्शन कर रहा था। गृहयुद्ध  की पूरी संभावनाएँ थीं कि इस बीच राधेलाल ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की तरह प्रवेश किया।
राधेलाल जी के  मेरे घर में घुसते ही मैं अपने शहर में अजनबी हो गया। मेरे घर में शांति के  कबूतर उड़ने लगे, कूड़े  में सुगंध उठने लगी, बच्चे पक्षियों-सा कलरव करने लगे, पत्नी ने चहकने की भूमिका बना ली और मैं चेहरे पर नेताई किस्म की औपचारिक मुस्कान ले आया। मुझे देखते ही राधेलाल जी में किसी रीतिकालीन कवि की आत्मा जाग गई और उन्होंने मेरा नख-शिख सौंदर्य-वर्णन आरंभ कर दिया—‘अरे, वाह! प्रेम भाई कितने अच्छे लग रहे हैं। देखकर लगता है जैसे कोई नवाब अपने दीवाने-खास में हो। बिल्कुल  नेचुरल ब्यूटी लग रही है आपकी। ‘मेरे हुजूर’ हो, छुट्टी को पूरी तरह एंजाॅय करते हो। और आपके  कानों तक आए बाल कितने अच्छे लग रहे हैं, अभी इन्हें कटवाना मत! सच, मेरे पास कैमरा नहीं है, वरना फोटो उतार लेता और किसी भी प्रतियोगिता में पुरस्कार मार लेता।’
राधेलाल जी का अंतिम वाक्य सच से ओत-प्रोत था। कहीं का पुरस्कार मार लेना उनके  बाएँ हाथ का खेल है, क्योंकि उनके  रिश्तेदार किसी-न-किसी पुरस्कार-समिति के  सदस्य हैं। जैसे वुफछ सज्जनों का जन्म भारत-भूमि में रिश्वत खाने वेफ लिए हुआ है, वैसे ही राधेलाल जी को पुरस्कार से नहीं, मुझसे मतलब था। इसलिए वह मेरे रूप-सौंदर्य की प्रशंसा कर रहे थे। संतों को तो प्रशंसा करने से मतलब है, अब चाहे वह गधे की हो अथवा घोड़े की।
राधेलाल जी ने मेरे बिन नहाए रूप-सौंदर्य की ऐसी प्रशंसा की कि मेरी पत्नी को मुझे नहाने के  लिए पुनः कहने का साहस ही नहीं हुआ। अपितु जिस पत्नी ने बिना नहाए मुझे चाय न देने की, न्यायालय में गीता पर हाथ रखकर उठाई कसम-सी-कसम खाई थी, उस राधेलाल ने अपने सौंदर्य-मारक बाण का रुख मेरी पत्नी की ओर किया, क्योंकि इतवार की सुबह नाश्ते के  समय खाली चाय पीकर टरक जाना उनकी प्रतिभा का अपमान था। राधेलाल मेरी पत्नी से बोले, ‘अरे भाभी जी, आपके  हाथ की बनाई हुई चाय को भला मैं कैसे मना कर सकता हूँ और मैं मना कर दूँ, तो आप बिना पिलाए जाने कहाँ देंगी। सच, आपके  हाथ जैसी बढ़िया चाय पूरे मोहल्ले में कोई बनाकर दिखा तो दे। भाभी, आपकी चाय में कुछ जादू होता है। (ऐसा वह मोहल्ले की हर भाभी को कहते हैं।) प्लीज भाभी, चाय मैं खाली ही पियूँगा। आप इतनी प्लेटें लगा देती हैं कि हमें शर्म आने लगती है। औरों के  यहाँ जाओ, तो चाय का एक कप ही मिल जाए तो गनीमत है। औरों की क्या कहें , हम अपने घर में आपको बिस्कुट  के  अलावा क्या खिला-पाते हैं? अपनी अमृता तो इस मामले में भुलक्कड़ है। उसे पता ही नहीं रहता कि घर में बिस्कुट नमकीन खत्म हो गए हैं…पर आपका भाभी जी कमाल है…’
कोई अपनी पत्नी की तुलना में पर-नारी की प्रशंसा कर दे तो पर नारी का गद्गद् होकर पकौड़े, सैंडविच, बिस्कुट ,, नमकीन आदि की प्लेटें सजाना स्वाभाविक ही है। ऐसा ही स्वाभाविक कृत्य मेरी पत्नी ने भी किया। प्लेटें सामने देखते ही राधेलाल को पत्नी-वियोग पीड़ित करने लगा। उन्होंने कामदेव की तरह तरकस से एक और सौंदर्य-बाण का प्रहार किया। ‘क्या भाभी, इतने बढ़िया पकौड़े और सैंडविच, सच आप कैसे बना लेती हैं। अमृता यहाँ होती तो आपसे कुछ  सीख ही लेती, उसे तो बस सुबह से सफाई की पड़ी हुई है, न खुद चाय-नाश्ता किया है और न मुझे ही दिया है।’ राधेलाल जी ने भूमिका बाँध दी थी, जिसके  आधार पर मेरी पत्नी को संवाद बोलने थे,‘अरे भाई साहब, आप भी कमाल करते हैं, उनको काम में अकेला छोड़कर यहाँ बैठे हैं। जाइए, आपको मेरी कसम, उन्हें भी बुलाकर लाइए।’
जिस इतवार की सुबह को मैं अजगर की तरह काटना चाहता था, उसने मुझे ही काट दिया। राधेलाल की पत्नी के  आगमन को जानकर मुझे उनके  स्वागत में बे-मन से नहाना और शेव करनी पड़ी। मेरी मुसीबतों का अभी यही अंत नहीं था। राधेलाल द्वारा बाँचे गए प्रशंसा-पुराण द्वारा उन्हें अभी नाश्ता ही प्राप्त हुआ था, इतने तुच्छ कार्य के  लिए राधेलाल दंपती अपने सौंदर्यबोध बाण का उपयोग नहीं करते हैं। उनका जन्म तो महान कार्यों के  लिए हुआ है।
राधेलाल-पत्नी का हमारे घर में प्रवेश क्या हुआ, जैसे बसंत छा गया। ऋषि -मुनियों की तपस्याएँ भंग होने लगीं तथा स्वार्थ के  कदम थिरकने लगे। ‘कितने अच्छे पकौड़े लग रहे हैं इस प्लेट में पड़े हुए। आपको याद है, जब हम दो साल पहले आपके  यहाँ आए थे और आपने मस्टर्ड कलर की साड़ी पहनी थी और प्रेमजी ने क्रीमीश  रंग की कमीज पहनी थी, तब भी हम लोगों ने ऐसे ही पकौड़े खाए थे, हाय खाए थे न! सच, आप लोग कितने अच्छे हैं। (पकौड़ों ने हमें अच्छा बना दिया वरना हम भी थे आदमी बेकाम  के ।) प्रेम जी जैसा मित्र तो इन्हें मिल ही नहीं सकता। ये इनके  साथ कहीं भी जाएँ, मुझे कभी एतराज नहीं होता है। आपने हमारे संकट में हमारी सहायता की है। (ये दीगर बात है कि उन्होंने हर संकट में मुँह फेरा  है।) आप  तो मेरे भाई जैसे हैं। अब आप आज रात की ही बात देखिए, इन्हें किसी काम के  लिए बीस हजार की जरूरत थी, (राधेलाल को किस काम के  लिए बीस हजार की जरूरत थी, इसे छिपाना आवश्यक था, क्योंकि वह हमारे अंतरंग मित्र हैं।) अब मैंने इनसे कहा, किसी और के  आगे हाथ मत फैलाना ,जब तक भाई साहब जैसे मित्रा हैं। आप दे दें तो ठीक, वरना काम गया भाड़ में। सच, कितने अच्छे हैं आप लोग!’
मुझे और मेरी पत्नी को भावुक करने के  लिए इतना ही बहुत था। कितना अच्छा बनने की प्रक्रिया में मैंने बीस हजार दो रुपए सैकड़ा के  हिसाब से उधार लिए और उनकी सेवा में अर्पित  कर दिए।
भैंस के  आगे बीन बजाओ तो वह पगुराएगी, परंतु उसकी काली-काली चमड़ी की प्रशंसा में चार चाँद लगाओ तो वह दूध देगी ही। जो सुंदर है, आकर्षक है, उसकी प्रशंसा करोगे तो उसका अहं तुष्ट होगा, परंतु जो असुंदर  है उसकी प्रशंसा करोगे तो वह आपका गुलाम हो जाएगा।
आपको भैंस समझकर आपके  सौंदर्य का गान गानेवालों की कमी नहीं है। कुछ  नेता के  रूप में आते हैं, कुछ पूँजीपतियों के  रूप में आते हैं तथा कुछ साहित्यिक आलोचकों के  रूप में आते हैं। कुछ अर्थों में भैंस सुंदर होती है। देखने और समझने की बात यह है कि सौंदर्य-वर्णन करनेवाली नीयत में क्या है। संसार में ऐसे अनेक धनुर्धारी अब भी हैं, जो शिखंडी को सामने रखकर अमूर्त बाण छोड़ते हैं।
आपकी भैंस ही नहीं, आप भी सुंदर हो सकते हैं, बशर्ते आपको उसका मूल्य न चुकाना पड़े। लोगों का सौंदर्यबोध आजकल इतना भोथरा हो गया है कि बसंत की उपेक्षा हो जाती है और ऐसे में कोई धूर्त कोयल पतझड़ की प्रशंसा वेफ गीत गाने लगे तो सावधान होना ही पड़ता है।

 

- प्रेम जनमेजय

वर्तमान दौर की सर्वाध्कि चर्चित व्यंग्य विधा के संवधन एवं सृजन के क्षेत्रा में प्रेम जनमेजय का विशिष्ट स्थान है। व्यंग्य को एक गंभीर कर्म तथा सुशिक्षित मस्तिष्क के प्रयोजन की विध मानने वाले प्रेम जनमेजय ने हिंदी व्यंग्य को सही दिशा देने में सार्थक भूमिका निभाई है। परंपरागत विषयों से हटकर प्रेम जनमेजय ने समाज में व्याप्त अर्थिक विसंगतियों तथा सांस्कृतिक प्रदूषण को चित्रित किया है । व्यंग्य के प्रति गंभीर एवं सृजनात्मक चिंतन के चलते ही उन्होंनें सन् 2004 में व्यंग्य केंद्रित पत्रिका ‘व्यंग्य यात्रा’ का प्रकाशन आरंभ किया।  इस पत्रिका ने व्यंग्य विमर्श का मंच तैयार किया। विद्वानों ने इसे हिंदी व्यंग्य साहित्य में ‘राग दरबारी’ के बाद दूसरी महत्वपूर्ण घटना माना है। इनके लिखे व्यंग्य नाटकों को भी अपार ख्याति मिली है।

जन्म : इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

विधाएँ : व्यंग्य, बाल साहित्य, आलोचना, नाटक

व्यंग्य संकलन : राजधानी में गँवार, बेर्शममेव जयते, पुलिस! पुलिस!, मैं नहिं माखन खायो, आत्मा महाठगिनी, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ, शर्म मुझको मगर क्यों आती, डूबते सूरज का इश्क, कौन कुटिल खल कामी, ज्यों ज्यों बूड़ें श्याम रंग

आलोचना : प्रसाद के नाटकों में हास्य-व्यंग्य, हिंदी व्यंग्य का समकालीन परिदृश्य, श्रीला

ल शुक्ल : विचार, विश्लेषण और जीवन 

नाटक : सीता अपहरण केस 

बाल साहित्य : शहद की चोरी, अगर ऐसा होता, नल्लुराम

अन्य : हुड़क, मोबाइल देवता

संपादन : व्यंग्य यात्रा (व्यंग्य पत्रिका), बींसवीं शताब्दी उत्कृष्ट साहित्य : व्यंग्य रचनाएँ, हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन (श्रीलाल शुक्ल के साथ सहयोगी संपादक)

सम्मान: आचार्य निरंजननाथ सम्मान, व्यंग्यश्री सम्मान, कमला गोइन्का व्यंग्यभूषण सम्मान, संपादक रत्न सम्मान, हिंदी अकादमी साहित्यकार सम्मान, इंडो-रशियन लिटरेरी क्लब सम्मान, अवंतिका सहस्त्राब्दी सम्मान, हरिशंकर परसाई स्मृति पुरस्कार, प्रकाशवीर शास्त्री सम्मान, अट्टहास सम्मान

सम्प्रति: एसोसिएट प्रोफेसर , दिल्ली विश्वविद्यालय ,नई दिल्ली , भारत

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