भूख लगती है

‘ऐ माँ कुछ खाने को दे न….ऐ माँ दे न…।’ बाहर दरवाजे से आवाज आई।
रजाई में कांपती सुधा ने अपने पति कमल को कहा जो कि आज ठंड की वजह से काम पर जाने पर आना कानी कर रहे थे ‘सुनो ना देखो कौन है बाहर?’
‘सुधा तुम देखो ना मेरी तो रजाई में भी कपकपी छूट रही है।’ कमल ने जवाब दिया।
लेकिन सुधा के कई बार कहने के बाद कमल रजाई से अपना टोपा और गर्म कपड़ों को संभालता हुआ निकला व उसने दरवाजा खोला।
दरवाजा खोलते ही कमल की जैसे झुरझुरी छूट गई हो।
एक गरीब परिवार था जो खाने को कुछ मांग रहा था। एक अपंग व्यक्ति जो बैशाखियों पर खड़ा था और एक औरत जिसकी गोदी में एक छोटी बच्ची थी। लेकिन उनके तन पर इस भरी सर्दी में भी गर्मी के ही कपड़े थे।
कमल तुरन्त किचन में से कुछ खाने को लाया और उनको दिया।
वो दुवाएं देकर आगे बढ़ने वाले थे कि कमल ने पूछा ‘तुम लोगों को सर्दी नही लगती इतने कम कपड़े पहने हुए है?’ इस पर अपंग व्यक्ति ने जवाब दिया ‘नही साहब केवल भूख लगती है।’ और वो आगे बढ़ गए।
कमल ने दरवाजा बंद किया और सोचने लगा कि ये इस सर्दी को भूलकर अपने लिए खाना लेने निकले है जबकि उसके आफिस में तो हीटर लगे है और उसके पास तो गर्म कपड़े भी है और वह किसी तरह से अपंग भी नही है।
कमल थोड़ा मुस्कुराया और बोला ‘सुधा लंच बनाओ में आफिस जा रहा हूँ।’
सुधा भी हैरान थी, अभी तो ठंड लग रही थी और अभी ऑफिस।
उधर कमल को नई ऊर्जा मिली थी।

 

 

- राजेश मेहरा

में राजेश मेहरा मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक हूँ  | मै दिल्ली में रहता हूँ | मुझे  ऑटो पार्ट बनाने की निजी कंपनी के क्वालिटी डिपार्टमेंट में काम करने का २० साल का अनुभव है | मुझे  लेख, कवितायें लघुकथाएं व् बाल कहानियाँ लिखने का शोक है बचपन से ही में किताबों और कहानियों का  शोकीन रहा हूँ  | मेरा मानना है की आज की भाग दौड़ भरी और तनाव की जिन्दगी में कहानियों के सपनो में जीने से ही आदमी अपनी कुछ उम्र बढ़ा सकता है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>