भारत – मॉरिशस की साझा सांस्कृतिक विरासत

भारत और मॉरिशस के बीच मुझे सिर्फ हिन्द महासागर की दूरी का अंतर लगता है। वहाँ के किसी गांव में जाने पर ऐसा लगता है जैसे हम आरा, बलिया , छपरा या आजमगढ़ के किसी गांव में बैठे हैं। सिर्फ फ्रेंच या क्रियोल के शब्द कान में पड़ने से हम उसे अलग नहीं कर सकते। मै बिहार के सिवान जिले का रहने वाला हूँ। रेणुकूट, सोनभद्र , उत्तर प्रदेश में पला बढा हूँ। मुझे मॉरिशस तमिलनाडु, केरला , कर्नाटक या असम से ज्यादा अपना लगता है क्योंकि हमारी भाषा एक है, हमारी संस्कृति और संस्कार एक हैं। विदित है कि मॉरिशस की दो तिहाई से भी ज्यादा आबादी भोजपुरी बोलती है और इन भोजपुरी भाषियों के पूर्वज लगभग 182 साल पहले बिहार और उत्तर प्रदेश से गिरमिटिया मजदूर बनकर वहाँ गए थे। अब सवाल यह उठता है कि इतने वर्षों के बाद भी अपनी विरासत को अक्षुण्ण सुरक्षित बनाए रखना कैसे सम्भव हो पाया। आखिर वह कौन सी ताकत है कि हम ग्लोबलाइजेशन के दबाव और अवरोध के बावजूद मॉरिशस में अपनी जड़ों से कटे नहीं।


दरअसल हमारे पूर्वज भाषानुरागी , संस्कृतिनिष्ठ एवं धर्मपरायण थे। वे अपनी परंपरा, रीति – रिवाज और रहन -सहन को कभी नहीं छोड़े। वे आज भी भारतीय परंपरा के अनुसार हीं त्योहारों को मनाते हैं। पूजा-पाठ , कथा -वार्ता, यज्ञ-हवन करते हैं। वहाँ भी भारत की तरह हीं सत्यनारायण भगवान की कथा होती है। हनुमान जी वहां भी घर-घर हैं। भोर में सूरज भगवान् को अर्घ्य देना और शाम को साँझा बाती की परंपरा वहां भी है। यहाँ गंगा जी हैं तो वहाँ गंगा तालाब है। उसके पास शंकर जी की विशाल प्रतिमा है। भारत की हीं तरह वहां भी पूजा -पाठ में पुरुषों से ज्यादा महिलाएं सक्रिय हैं। विशुद्ध भारतीय परिधान साड़ी पहनकर झूमर , सोहर , कजरी गाती हुई महिलाएं देखने पर ऐसा लगता है जैसे हमारी चाची , माई , मौसी , बुआ हमारे हीं गांव के बरम्ह बाबा चाहे काली माई के मंदिर में इकट्टा हुई हैं। कोई महिला तिरछिया के मुस्किया दे तो लगता है हमारे हीं गांव की गुलजारी भउजी हैं, जो इशारे हीं इशारे में शिकायत कर रहीं हैं कि ” काहे कहनी कि फगुआ में आएब ” ? … मॉरिशस की महिलाओं ने हीं हमारे संस्कार, संस्कृति और भाषा को वहाँ जिन्दा रखा है, यह कहूं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
भोजपुरी स्पीकिंग युनियन की चेयरपर्सन डा० सरिता बुद्धू को भोजपुरी समाज के लोग अंतरराष्ट्रीय दीदी कहते हैं। वह मुझे छोटे भाई की तरह मानती हैं और राखी भी बांधती हैं। वर्ष 2014 में मॉरिशस में अप्रवासी दिवस मनाया गया। उस कार्यक्रम में जाने का सौभाग्य मुझे भी मिला था। कहा जाता है कि मॉरिशस में पहला ज्ञात भारतीय तब से 180 साल पहले पहुंचा था। 1834 में मॉरिशस जाने वाले मजदूर बिहार और उत्तर प्रदेश से हीं गए थे। मुझे मॉरिशस को जानने की जिज्ञासा थी. देखने की बड़ी ललक थी। खूब देखा। एक सप्ताह के प्रवास में कई गांवों में गया। मंदिरों में गया। आरा, बलिया , बक्सर और आजमगढ़ के लोग मिले। मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। सात समुन्दर पार भी अपना गांव है। अफ्रीका में भी अपना गांव है। सागर बीच टापू पर भी अपना गांव है। अपनेपन की भावना ने मॉरिशस में मुझे जकड लिया था। वहां के टेलीविजन एम बी सी के भोजपुरी चैनल में मेरा लम्बा साक्षात्कार हुआ। एंकर नर्वदा खेदनाह ने मुझसे दुनिया भर की भोजपुरी के बारे में बतियाया। भोजपुरी मेरी कमजोरी है। मै तीन वर्षों तक (2003 – 2005 ) पूर्वी अफ्रीका के युगांडा में था. वहाँ भी मैंने भोजपुरी एसोसिएशन ऑफ़ युगांडा की स्थापना की। बाद में जब लन्दन गया तो वहां भी मैंने भोजपुरी समाज , लन्दन की स्थापना की। मै भोजपुरी को जीने लगा था और इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़कर स्वदेश मिडिया में आ गया। भोजपुरी टीवी चैनलों से जुड़ गया। इसलिए नर्वदा ने मुझसे भोजपुरी भाषा, साहित्य , मीडिया , फिल्म और देश -विदेश की भोजपुरी के बारे में विस्तार से बातचीत किया। मैंने आयोजित सेमीनार में भोजपुरी सिनेमा के सफर पर न सिर्फ पेपर पढ़ा बल्कि 1948 से 2014 तक की भोजपुरी फिल्मों के सफर पर बनाई गयी अपनी डॉक्यूमेंटरी भी दिखाई जिसे लोगों ने खूब पसंद किया। एकेडमिक गतिविधियों से अलग हमने खूब मस्ती भी की। हमें कुछ भी अलग नहीं लग रहा था। ” पतरी कमरिया डोलता त डोले द … कान के झुमका गिरता त गिरे दे …. पतरी कमरिया डोलता त डोले द ” जैसे लोकगीत पर महिला मंडल के साथ खूब नाचा भी। भोजपुरी में काव्य पाठ किया। मुझे लगा हीं नहीं कि मै विदेश में हूँ। सिर्फ हवाई जहाज की दूरी है। झंडे का अंतर है। लेकिन इससे डी एन ए तो नहीं बदलता तो फिर कैसे बदलेगा स्वभाव , कैसे बदलेगा संस्कार , कैसे बदलेगा रूप रंग। मॉरिशस में हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित है , संरक्षित है और शायद ग्लोबलाइजेशन के खतरे के बावजूद यह हमारे लोकगीतों में , पूजा -पाठ और शादी -व्याह के तरीकों में अनन्त काल तक जीवित रहेगा।
कुल मिलाकर भाषा , सस्कृति , संस्कार , खान -पान , पहनावा , गीत -संगीत , साहित्य और कला जब सब कुछ एक समान है तो भारत और मॉरिशस की साझा सांस्कृतिक विरासत के बारे में बात करते हुए मुझे यही नहीं समझ में आता है कि ” सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है कि सारी ही कि नारी है कि नारी ही कि सारी है।
मुझे तो यही लगता है कि मॉरिशस में अपनी हीं धड़कने हैं जो सात समुन्दर पार में धड़क रहीं हैं। यही वजह है कि वहां से जब कोई मेरा जानने वाला आता है तो लगता है कि मेरे गांव से कोई आया है, चलो उनका स्वागत किया जाय। 1 जून 2016 को मॉरिशस से मेरे मित्रों की एक टोली भारत आई तो लगा कि हमें इनके स्वागत में आयोजन करना चाहिए। मॉरिशस के डेलीगेट्स में महात्मा गांधी संस्थान से अंजली चिंतामणि ( प्राचार्य हिंदी )और अरविन्द विशेसर ( प्राचार्य भोजपुरी ), मॉरिशस बॉर्डकास्टिंग कारपोरेशन से अशिता रघु , अभी उदोय , रितेश महावीर , प्रीती जानकीप्रसाद , काशीनाथ और हिंदी -भोजपुरी के साहित्य्कार डा० हेमराज सुन्दर ने हमारा आतिथ्य स्वीकार किया। इन्हें दिल्ली और शिकोहाबाद में काम था। इसलिए मैंने 7 जून को आगरा और 11 जून को दिल्ली में कार्यक्रम रखा। आगरा में भारत -मॉरिशस मैत्री कवि -सम्मेलन और दिल्ली में भारत – मॉरिशस की साझा सांस्कृतिक विरासत पर परिचर्चा।

आगरा में आयोजक बने एडवोकेट अशोक चौबे और दिल्ली में नारायणी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डा० चंद्रमणि ब्रम्हदत्त। आगरा में मुख्य अतिथि थे केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रो० नन्द किशोर पांडेय तो दिल्ली में मुख्य अतिथि थे मारीशस गणराज्य के उच्चायुक्त महामहिम जगदीश्वर गोबर्धन। मेरी भूमिका दोनों जगह संयोजन और सञ्चालन की थी।

 

 

 

दिल्ली के द्वारका में भारत – मॉरिशस की साझा सांस्कृतिक विरासत पर बात करते -करते अत्यन्त भावुक होकर श्री जगदीश्वर गोबर्धन ने कहा कि ” देश का विकास करना है , खुद को स्वस्थ रखना है और अपनी संस्कृति को जिन्दा रखना है तो गौ माता की सेवा करो। जिसके पास गाय नहीं है वह गरीब है। इस पर बतौर संचालक मुझे कहना पड़ा कि गोबर्धन सर के बातों की गहराई में उतरने के बाद बहुत सारी बीमारियों का इलाज हो जाता है। गाय को हम मॉरिशस में भी पूजते हैं और भारत में भी। इस भावना को समझना होगा। मॉरिशस से आये सभी मेहमानों के सम्मान के बाद हमने भारतीयों के स्वभाव और मॉरिशस के संघर्ष और विजय की दास्ताँ को अपने मुक्तक और शेरों में कुछ यूं व्यक्त किया -

 

 

हम तो मेहनत को हीं हथियार बना लेते हैं

अपना हँसता हुआ संसार बना लेते हैं

मॉरिशस, फीजी , गुयाना कहीं भी देखो तुम

हम जहाँ जाते हैं सरकार बना लेते हैं
************
ले गए हमको वो गन्ने की बुआई के लिए

बो दिए उनमें हीं हम मड़ुआ रिहाई के लिए

छल किये , जुल्म किये , हमको समझ के बोका

तब व्यवस्था किये हम उनकी विदाई के लिए

जान हाजिर है अगर बन के रहो भाई तो

वर्ना हम तो हैं कसाई भी कसाई के लिए

 

 

 - मनोज सिंह ‘भावुक’ 

 

लंदन एवं अफ्रिका में रहते हुए लेखन में सक्रिय
————————————————————-भोजपुरी के लिये समर्पित ।——————————————————–.

नाटक में डिप्लोमा-

बिहार आर्ट थियेटर(पेरिस,यूनेस्को की प्रांतीय

इकाई), कालिदास रंगालय, पटना द्वारा संचालित नाट्य कला डिप्लोमा के टाँपर ।
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प्रकाशित पुस्तक – तस्वीर जिन्दगी के (भोजपुरी गजल-संग्रह)

(इस पुस्तक के लिये मनोज भावुक को भारतीय भाषा परिषद सम्मान २००६ से नवाजा गया).
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प्रकाश्य -

1. जिनिगी रोज सवाल (कविता-गीत संग्रह)

2.भोजपुरी सिनेमा के विकास-यात्रा

(मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन, सुजीत कुमार,

राकेश पाण्डेय, कुणाल सिंह,मोहन जी प्रसाद,

अशोक चंद जैन एवं रवि किशन सरीखे

दो दर्जन फिल्मी हस्ती से बात-चीत, इतिहास,

लगभग 250 भोजपुरी फिल्मों पर विहंगम दृष्टि,

भोजपुरी सिरियल एवं टेलीफिल्म आदि)।

3. भोजपुरी नाटक के विकास-यात्रा( शोध-पत्र)।

4. भउजी के गाँव (कहानी-संग्रह)

5.बादलों को चीरते हुए (अफ्रिका एवं यूरोप प्रवास की डायरी)

6.रेत के झील (गजल-संग्रह)

7.कलाकार [ नाटक]
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नाट्य-रुपांतर व निर्देशन-

फूलसुंघी- भोजपुरी का लोकप्रिय व बहुचर्चित उपन्यास [ उपन्यासकार- आचार्य पाण्डेय कपिल ]
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नाट्य -अभिनय व निर्देशन-

हाथी के दाँत, मास्टर गनेसी राम, सोना, बिरजू के बिआह, भाई के धन, सरग-नरक ,जंजीर,कलाकार,फूलसुंघी,
बकरा किस्तों का, इस्तिफा,ख्याति,कफन, मोल मुद्रा का, धर्म-संगम,बाबा की सारंगी, हम जीना चाहते हैं व नूरी का कहना है आदि।
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अन्य कलात्मक सक्रियता-

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित।

रंगमंच,आकाशवाणी,दूरदर्शन में बतौर अभिनेता, गीतकार, पटकथा लेखक। ‘

पहली भोजपुरी धारावाहिक ‘ साँची पिरितिया’ में अभिनय ।

भोजपुरी धारावाहिक ‘ तहरे से घर बसाएब’ में कथा-पटकथा-संवाद-गीत लेखन।

पटना दूरदर्शन से एंकरिंग।

भरत शर्मा व्यास द्वारा भावुक के चुनिन्दा गजलों का गायन

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचो से काव्य-पाठ, व्याख्यान एंव भाषण ।

भारतीय रेडियो, दूरदर्शन और समाचार पत्र के अलावा

BBC LONDON से भी interview प्रकाशित-प्रसारित-प्रदर्शित ।

विश्व भोजपुरी सम्मेलन के आठवें राष्ट्रीय अधिवेशन में (४,५,६ अक्टूबर २००७ ) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में मंच संचालन, संयोजन व विषय-प्रवर्तन

.

सम्बदध्ता-

1. राष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्व भोजपुरी सम्मेलन (इंग्लैण्ड)

2.संस्थापक, भोजपुरी एसोशिएसन आँफ युगाण्डा (BAU),पूर्वी अफ्रिका

3. मंत्री, मारीशस भोजपुरी सचिवालय

4.पूर्व प्रबंध मंत्री, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना

5 . भोजपुरी की लगभग सभी संस्थाओं से जुडाव ।

6. U.K की एकमात्र हिन्दी पत्रिका पुरवाई और mauritius की पत्रिका बसंत में भी रचनायें संकलित

7. भोजपुरी की लगभग डेढ़ दर्जन पत्र पत्रिकाओं भोजपुरी अकादमी पत्रिका, भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका, समकालीन भोजपुरी साहित्य, कविता, पनघट, महाभोजपुर, पाती, खोईंछा, भोजपुरी माटी, पहरुआ, भोजपुरी संसार, भोजपुरी वर्ल्ड, पूर्वांकुर, विभोर, भैरवी, निर्भीक संदेश और द सण्डे इण्डियन (भोजपुरी ) में लेखन. रचनायें विभिन्न webmagzines में भी |

8. U.K Hindi Samiti के सदस्य

9. UK Moderator of Global Bhojpuri Group on The Net.

10. अमेरिकन बायोग्राफिकल इंस्टीच्यूट के रिसर्च बोर्ड आफ एडभाइजरी कमिटी के मानद सदस्य

11.Chife Editor, www.bhojpatra.net (An Online Bhojpuri Content Management System)

12. Editor, www.littichokha.com

13. विदेश संपादक, समकालीन भोजपुरी साहित्य
सम्मान-पुरस्कार-

भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, द्वारा भोजपुरी गजल-संग्रह ‘ तस्वीर जिन्दगी के’ के लिये —– सिनेहस्ती गुलजार और ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी के

हाथों भारतीय भाषा परिषद सम्मान 2006,

(भोजपुरी साहित्य के लिए पहली बार यह सम्मान ) ।
.

बिहार कलाश्री पुरस्कार परिषद द्वारा रंगमंच के क्षेत्र में विशिष्ट, बहुआयामी और बहुमूल्य योगदान के लिये—- बिहार कलाश्री पुरस्कार
.

अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना, द्वारा कविता के लिये — गिरिराज किशोरी कविता पुरस्कार
.

बिहार आर्ट थियेटर, कालिदास रंगालय, पटना, द्वारा —बेस्ट एक्टर अवार्ड
.

अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति, मथुरा, द्वारा काव्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिये — कविवर मैथलीशरण गुप्त सम्मान

.

अखिल विश्व भोजपुरी विकास मंच, जमशेदपुर द्वारा विदेशों में भोजपुरी के प्रचार-प्रसार हेतु — विश्व भोजपुरी गौरव सम्मान
.

वर्ष २००७ में दर्जनों साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा यथा भोजपुरी समाज सेवा समिति, काशी, माँ काली बखोरापुर ट्रस्ट, आरा, एवम् जीवनदीप चैरिटेबल ट्रस्ट, वाराणसी आदि द्वारा सम्मानित / अभिनन्दित.

अनुभव - क्रिएटिव कंसल्टेंट,महुआ प्लस 

 

 

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