भारत की विडम्बना

 

पूर्व सोने की चिड़ियाँ भारत आज हर क्षेत्र में सो रहा है। नहीं शायद मै गलत सोच रहा हूँ। कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हम जागरूक हुएं हैं। हमारी रूचि घोटालों में भी काफी बढ़ी है। अगर किसी दिन नाया घोटाला सामने नहीं आया तो वो दिन उपलब्धि बन जाता है। कहीं 2G तो कहीं चारा, कहीं कोयला तो कहीं राष्ट्रमंडल खेल। आज का भारतीय नागरिक घोटालों को जीवन का हिस्सा मन चूका है। उसको पता है की चौराहे पर खड़ी पुलिस उसके साथ है क्योंकि उसकी जेब में नोट है। ट्रेन की टिकेट, बच्चे का दाखिला, अभयपत्र प्राप्त करना या किसी भी अन्य सरकारी या गैर सरकारी कार्य हेतु आपके पास किसी चीज की जरूरत है तो वो है धन।

हमारे नौजवान पुरषों स्त्रियों की  इज्ज़त करने में विशवास नहीं रखते अत: उनकी जागरूकता बलात्कार जैसे अपराध की ओर बढ़ी है। वो देश जहाँ नारी को शक्ति का रूप और देवी कहा जाता है।  वो देश जहाँ लड़की के जन्म पर लक्ष्मी देवी को  याद किया जाता है। वो देश जहाँ नौं देवी उपवास साल में दो बार आता है। वो देश जहाँ लोग घर में बहु नहीं साक्षात् लक्ष्मी ले के आते हैं । वही देश जहाँ लक्ष्मी जन्म के साथ दहेज़ की चिन्ता ले के आतीं हैं। वही देश जहाँ लक्ष्मी की शादी लक्ष्मी के बिना नहीं होती। हाँ वही मेरा भारत महान जहाँ हर दिन कई लक्ष्मियों का बलात्कार होता है। हाँ वही भारत जहाँ शक्ति की पर्यायवाचक देवी असहाय होती जा रही है।

समाज को विभाजित करना तो हम भारतीयों से सीखे। हम भारत वासियों की रूचि इसमें है की मैं ब्राह्मण हूँ वो क्षत्रिय है और कोई शुद्र है। अदि काल से चली आ रही विषमता और सामाजिक प्रथा को दूर करने का उपाय बहुत सोच समझ कर आरक्षण के माध्यम से किया गया है। जब उसका असर कम दिख रहा है तो उस आरक्षण को और बढ़ने की कवायत चल रही है। इस उम्मीद में कि वो कुछ काम कर जाए। हाँ वो कुछ कम तो अवश्य करेगा, आरक्षण देने वाले के पक्ष में कुछ मत और नहीं देने वाले के पक्ष में भी कुछ मत की बढ़ोतरी कर जायेगा।

शिक्षा क्षेत्र अब धंधा क्षेत्र बन गया है। जहाँ शिक्षा शुल्क असमान की बुलंदियों को स्पर्श कर रहा है वहीँ शिक्षा स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है। आर्यभट्ट, चाणक्य, चरक, सी.वी. रमन जैसे विद्वानों के इस देश में अनुसंधान का घटता स्तर और रूचि  चिन्ता का विषय बनता जा रहा है। हमारे विद्वान् छात्र अब अनुसंधान हेतु विदेशों में जाना पसंद करते हैं। स्वदेश में उन्हें वो सुविधाएँ मुहैया नहीं की जा रही हैं जो विदेशो में उपलब्ध है।

अर्थशास्त्र में निपुड़ भारत की अर्थ व्यवस्था चरमराती जा रही है। देश में मंहगाई दर चरम सीमा पर है। हमारे कृषि प्रधान देश में किसान आत्महत्या कर रहा है या खेती छोड़ कर कुछ छोटी मोटी नौकरी कर रहा है।

चित्राकिताब के इस युग में आक्रोश भी पहले संगणक पे ही स्थान प्राप्त करता है। फिर अति हो जाने तक विश्राम करने के पश्चात सड़कों पे दिखने लगता है। विडम्बना ये है की भारत गन्दगी को शुरुआत से साफ करने में विश्वास नहीं करता। जब तक उसकी गन्ध से दम नहीं घुटता तब तक भारत उर्जा का संचय करता है। फिर एक दिन सड़कों पे मशाल और मोमबत्ती ले के खड़ा दिखता है। विडम्बना ये है की उन मशालों की लौ जिन पिछ्वाडों को गरम करती है वो रक्षक ही असल में भक्षक बने बैठे हैं। विडम्बना ये है की हमारे नेता और  की जागरूकता  बढ़  है की ये  भली  भाती जन गए हैं कि किसी महत्वपूर्ण विषय पर तब तक मत बोलो जब तक कुछ मतदान का जुगाड़ नहीं हो जाता।  अब समय  उत्तम है, नारी शक्ति का विषय ज्वलंत है। कुछ मतदान का जुगाड़ तो हो ही जायेगा।

विडम्बना ये है कि नैतिक दिखने वाले नेताओं में अधिकतम अनैतिक हैं। जब कुछ गिने चुने नैतिक नेता कुछ करना चाहते है तो उनकी संख्या कम पड़ जाती है।

सबसे बड़ी विडम्बना ये है की सबका लक्ष्य एक है, लक्ष्मी! ऐन केन प्रकारेण लक्ष्मी अर्जित करना। कहीं धन रुपी तो कहीं तन रूपी। अगर देवी लक्ष्मी सही में कहीं हैं तो भारत की ओर देख के अपने नाम को जरूर कोसती होंगी।

जय हिन्द जय भारत !

 

-अमित सिंह 

फ्रांस की कंपनी बेईसिप-फ्रंलेब के कुवैत ऑफिस में में सीनियर पेट्रोलियम जियोलॉजिस्ट के पद पे कार्यरत हैं |

हिंदी लेखन में रूचि रहने वाले अमित कुवैत में रहते हुए अपनी भाषा से जुड़े रहने और भारत के बाहर उसके प्रसार में तत्पर हैं | 

 

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