भारतीय हिंदी बोलने में पिछड़ापन महसूस करते हैं – प्रो. पुष्पिता अवस्थी

विवि के खंदारी परिसर स्थित जेपी सभागार में दो दिवसीय संगोष्ठी की शुरुआत बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने किया।
हिंदी वैश्विक संस्थान नीदरलैंड की निदेशिका और नीदरलैंड की प्रसिद्ध हिंदी पत्रिका अम्स्टेल गंगा  की संरक्षिका  प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने बीज वक्तव्य दिया।
उन्होंने भारत में हिंदी की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की।  उन्होंने कहा कि भारतीय संगोष्ठियों में मंच पर तो हिंदी होती है , लेकिन मंच की सीढियाँ उतरते ही अंग्रेजी में बातचीत शुरू हो जाती है। वही विदेश में  जब दो प्रवासी भारतीय मिलते हैं तो वो हिंदी में बात करते हैं। उनके मन में हिंदी को लेकर हीनता नहीं है , जबकि भारत में हिंदी बोलने को पिछड़ापन माना जाता है।
उन्होंने भारतीय साहित्य और प्रवासी साहित्य की स्थिति के बारे में भी बताया। कहा कि भारतवंशी साहित्य में लोकगीत, लोककथा और लोगों को जोड़ने वाले लोकतत्व हैं, जबकि प्रवासी भारतीय साहित्य की स्थिति भिन्न है।
प्रवासी साहित्य का सूर्यास्त नहीं होगा। अब प्रवासी साहित्य एक देश का साहित्य नहीं बल्कि वैश्विक साहित्य है। प्रवासी साहित्य हमारी संपत्ति है, हमें इसकी रक्षा करनी होगी। यह विचार केंद्रीय ¨हदी संस्थान के उपाध्यक्ष प्रो. कमल किशोर गोयनका ने व्यक्त किए।
श्री गोयनका डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय के केएमआइ द्वारा विवेकानंद जयंती पर साहित्य अकादमी और ¨हिंदी वैश्रि्वक संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में खंदारी स्थित जेपी सभागार में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। संगोष्ठी में प्रवासी हिंदी साहित्य की दशा और दिशा विषय पर साहित्यकारों ने मंथन किया। देवनागिरी लिपि और हिंदी के उत्थान पर भी चर्चा की गई।
काव्यपाठ एवं रचनाकारों से संवाद कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति डॉ. अरविंद कुमार दीक्षित ने किया । शाम के सत्र में दोपहर तीन बजे से काव्यपाठ एवं रचनाकारों से संवाद का आयोजन किया गया । इसमें नीदरलैंड से प्रो. पुष्पिता अवस्थी, न्यूयार्क से डॉ. मंगला, भारत से लीलाधर मंडलोई, ममता शर्मा, मॉरीशस से प्रो. हेमराज सुंदर, कनाडा से गोपाल बघेल ‘मधु’ काव्यपाठ किया । इसमें मुख्य अतिथि नीदरलैंड के भगवान प्रसाद थे । अध्यक्षता अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, भारत के मानद निदेशक नारायण कुमार ने किया ।
मुख्य वक्ता अखिल विश्व हिंदी समिति के अध्यक्ष डॉ. दाऊजी गुप्त ने प्रवासी हिंदी साहित्य में शोध की अपार संभावनाओं के बारे में बताया। उन्होंने ¨हदी भाषा के उत्थान पर जोर देते हुए कहा कि फ्रेंच भाषा के उत्थान के लिए वहां की सरकार प्रयास कर रही है। ऐसे में हमारी सरकार को भी हिंदी के लिए ऐसा ही करना होगा।
विवि के कुलपति डॉ. अरविंद दीक्षित ने प्रवासी साहित्यकारों की पुस्तकें विवि की लाइब्रेरी में रखने और उन्हें ई-लाइब्रेरी में अपलोड करने की बात कही। प्रथम सत्र के अंत में प्रो. पुष्पिता अवस्थी की पुस्तक नीदरलैंड की डायरी और केएमआइ के निदेशक प्रदीप श्रीधर की पुस्तक प्रवासी हिंदी साहित्य का विमोचन किया गया।
धन्यवाद ज्ञापन हरिवंश सोलंकी ने किया। इस अवसर पर मॉरीशस से आई प्रो. अंजलि चिंतामणि, हिंदी सेवी भगवान प्रसाद ने अपने विचार रखे। इस दौरान डॉ. अजय शर्मा, डॉ. शशि तिवारी, डॉ. अमित सिंह, डॉ. रीतेश कुमार, डॉ. आदित्य प्रकाश, डॉ. नीलम यादव, डॉ. गिरजाशंकर शर्मा, योगेश डाबर आदि उपस्थित रहे।
– अम्स्टेल गंगा समाचार ब्यूरो

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