भरे हैं पोर- पोर


हे वंशीधर !
बाँसुरी के भीतर
कितने छिद्र!
एक में क्या असर?
उसी पर अधर!


ये महासुख
एक योगी -समान
दिये अभय-दान
भरे हैं पोर- पोर
मोक्षदायिनी-भोर !


शीत की धूप
ब्याह से पूर्व बेटी
मायके आई
नयन-जल लाई
हिम-निशा- सी लेटी।


हे मोर-पंख!
यूँ ही गर्व न करो,
माना हो तुम
कान्हा के सिरचढ़े,
प्राण वंशी में भरे ।

 

- ज्योत्स्ना प्रदीप

शिक्षा : एम.ए (अंग्रेज़ी),बी.एड.
लेखन विधाएँ : कविता, गीत, ग़ज़ल, बालगीत, क्षणिकाएँ, हाइकु, तांका, सेदोका, चोका, माहिया और लेख।
सहयोगी संकलन : आखर-आखर गंध (काव्य संकलन)
उर्वरा (हाइकु संकलन)
पंचपर्णा-3 (काव्य संकलन)
हिन्दी हाइकु प्रकृति-काव्यकोश

प्रकाशन : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन जैसे कादम्बिनी, अभिनव-इमरोज, उदंती, अविराम साहित्यिकी, सुखी-समृद्ध परिवार, हिन्दी चेतना ,साहित्यकलश आदि।

प्रसारण : जालंधर दूरदर्शन से कविता पाठ।
संप्रति : साहित्य-साधना मे रत।

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