बुरी बला

उस दिन बुद्धवार था , एक आम बुद्धवार। वही पांच बज के सात मिनट पर 

सूर्योदय। उसके एक घंटा पहले ही उजाला और उजाले के साथ-साथ जीवन
सम्बन्धी सभी क्रियाएँ – प्रतिक्रियाएं ,अपने पूर्ण विकसित स्वरूप में !
विभा बिल्डिंग के पीछेवाले पार्क के उस पार बने देवी मंदिर के घंटों की
बेताला आवाज़ और अनुराधा पौडवाल द्वारा गाई गई आरती की घुँघराली
,बेसुरी आवाज़ को कोसती हुई उठी। ठीक चार बजे से मंदिर वाले यह घिसा पिटा
रिकॉर्ड लगाकर सबकी नींद हराम कर देते थे। पर विभा को झींकना नहीं
चाहिए। उसके लिए तो यह अदृश्य वरदान साबित हुआ। आज उसके पुत्र कुँअर की
स्कूल आॅउटिंग थी। कक्षा छै के सारे बच्चे राष्ट्रीय संग्रहालय देखने
जाने वाले थे। विभा को लंच बॉक्स तैयार करने थे। उसके पति नागेन्द्र
पाठक, कुँअर को अपनी कार से स्कूल छोड़ते हुए उधर से ही अपने दफ़्तर चले
जाते थे।
नागेन्द्र का दफ़्तर चार मील पर था। उनके परम मित्र विकास राय सेठ के साथ
साझेदारी में ब्याज बट्टे का व्यापार था। १२ से २० प्रतिशत सूद की दर
से व्यापारियों को रुपिया उधार चढ़ाते थे। अच्छी खासी आमदनी थी। विकास
राय पुराने मित्र होने के साथ साथ दुनियावी और इज़्ज़तदार व्यक्ति थे।
उनकी सुंदरी पत्नी हेमा एयर इण्डिया के शो रूम में रिसेप्शनिस्ट थी।
विभा मितव्ययी गृहणी थी। उसने कभी नौकरी करने की बात नहीं सोंची। यूं
नागेन्द्र का प्रथम प्रेम पैसे से था मगर वह अन्य पतियों की तरह कंजूस
नहीं थे। कुँअर उनकी एकमात्र संतान था अतः वह उसकी सभी जरूरतों पर बिछे
जाते थे।

विभा ने पूना यूनिवर्सिटी से राजनीती शास्त्र में एम ० ए ० किया था।
स्वभाव से वह शांत दिखती थी। बहुत कम बोलती थी। खाने पीने में शुद्ध
शाकाहारी होने के कारण परहेज़ बरतती थी अतः अधिक सामाजिक जीवन से कतराती
थी। कुँअर को बाहर का कुछ भी खिलाते उसे डर लगता था अतः घर पर ही सारे
नुस्खे आज़माती रहती थी जिस कारन वह पाक विद्या में दक्ष हो गई थी।कुँअर
का टिफिन जब खुलता था तो बच्चे तो बच्चे खुद टीचर भी देखती कि आज क्या
आया है। यूं वह फ़ालतू के लाड प्यार की कायल नहीं थी। कुँअर माँ की तरह
सुथरी आदतों का बालक था। दो कमरों के फ्लैट को इतना संवार कर रखती थी
कभी भी फोटो खींच लो।

नागेन्द्र के जाने के बाद काम करने वाली बाई आ जाती थी। घंटा भर में सभी
धंधे निपटा कर वह भुनगा चिरैय्या की तरह उड़ जाती थी। विभा नहां धोकर
,लम्बी समाधि लगाती और ध्यान पूजा आदि करती। टेली के आगे बैठकरअपना
खाना खाती। तब तक कुँअर वापिस आ जाता। बस फिर उसी के साथ थोड़ा आराम
,होमवर्क टेनिस के लिए पार्क में या साइकिल की क्लास। हर हाल में विभा
उसके साथ रहती। लौटकर दोनों नहाते धोते। शाम का खाना बनता। तब तक
नागेन्द्र घर आ जाते।

रोज़ रोज़ एक ही दिनचर्या। नागेन्द्र कुछ सुनाते तो सुन लेती अपने पास
उसके कोई गपशप नहीं होती। उनके प्रश्नो का सटीक उत्तर देती और फिर चुप।
दोनों में कोई किच किच नहीं। नागेन्द्र पत्नी को कभी भी डाँटते नहीं
सुने गए। कहीं बाहर जाना होता तो पुत्र के कारण। उसी की पसंद की जगह,
चाहे फिल्म हो या घूमना फिरना। दोस्तों के नाम पर हेमा और विकास राय।
रिश्तेदारों में विभा की बहन नीना और उसका पति किशोर जो सिंगापुर में
रहते थे।

विभा के सामनेवाले फ्लैट में ,उसी फ्लोर पर ,सावित्री कपूर रहती थीं।
उनकी हर बात विभा से उलटी ! गप्पें हांकना उनकी विशेष प्रवृत्ति थी अतः
पूरी बिल्डिंग का अखबार रोज़ – ब – रोज़ वहीँ छपता था। और यदि मौका लगे
तो वह सबसे पहले विभा को ही सुना जाती थीं। उसके जैसी चुप श्रोता उन्हें
और कहाँ मिलती ?

अक्सर ऐसी स्त्रियां दिल की बहुत उदार होती हैं। सावित्री कपूर इसकी
अपवाद नहीं थीं। विभा की माँ या सास रहने आ जातीं तो वह अपनी पंजाबी
रसोई की धाक ज़माने में ज़रा भी कोताही नहीं बरतती थीं। विभा की बड़ी बहन
नीना उनकी विशेष कृपाभाजन थी क्योंकि जब तब वह सिंगापुर से अपने लिए
इम्पोर्टेड सामान मंगवाती थी. ” मैं पैसे दे दूँगी। चाहे तो अड्वान्स
में ले लो पर भई मंगवा जरूर दो। ”

विभा भरसक कोशिश करती उनकी मांगें पूरी करवाने की। दरअसल नागेन्द्र को
पैसे बनाने का खब्त था। नीना दीदी जो कुछ लाती वह उसपर १०- २० प्रतिशत
ऊपर रखकर आगे टिकाता। सावित्री कपूर के माध्यम से ही बिल्डिंग के अन्य
२२ परिवार विभा के सामाजिक जीवन का अदृश्य अंग थे। सावित्री और विभा की
उम्र में करीब दस वर्ष का अंतर था। सावित्री के तीनो बच्चे बड़े बड़े हो गए
थे। पर दोनों देवी की भक्त थीं। दोनों नव् रातों में व्रत रखतीं। जहां
सावित्री चंचल की भेटें लगाकर संग संग गाती वहीँ विभा दुर्गा सप्तशती का
पाठ करके जल ग्रहण करती।

जिस बुधवार की यह बात है ,उसदिन सुबह छै बजे जब दूधवाला आया तो सावित्री
कपूर ने झटपट अपने दरवाज़ा खोला और दो लीटर दूध ज्यादा देने की मांग कर
डाली। दूधवाला इसके लिए तैयार नहीं था।
” बीबी जी , पहले से बता दिया करो ना ! अब औरों को कैसे निबटाऊँगा ? ”
” अरे बच्चों वाला घर है। आज बेबी ने खीर की मांग कर दी। ”
” शाम को ले आऊंगा। शाम को बना देना। ”
” अरे भैय्या दे दो न। इतना कह रही हूँ तो। ” सावित्री कपूर गिड़गिड़ाईं ।
तभी विभा बाहर आ गयी। ” दे दो महतो। मेरे पास अभी काफी दूध पड़ा है।
शाम को मेरी भरपाई कर देना। ”
विभा की इन्हीं आदतों के कारण सावित्री कपूर उसे बहुत पसंद करती हैं और
हमेशा उसका ख्याल रखती हैं। वह भी इन्हें भाभी बुलाती है। विभा को एक
तरह की बेफिक्री रहती है उनके रहते। -

करीब आठ बजे होंगे जब नागेन्द्र और कुँअर लिफ्ट से नीचे उतरे। विभा ने
उन्हें बाई बाई कहकर विदा किया। सावित्री की -रसोई लिफ्ट के ठीक पीछे
बनी हुई थी अतः वह झट से अपने दरवाजे पर आ जाती थीं देखने कि कौन आया या
गया। विभा को देखकर बोलीं , ” कम ही लड़कियाँ तुम्हारी तरह सुखी होती
हैं विभा। अपने ऊपर से राई नोन का उतारा कर लेना आज। भगवान सदा बुरी
बला से बचाये। ” विभा ने थैंक यू कहकर दरवाज़ा बंद कर लिया और अपनी
दिनचर्या में व्यस्त हो गयी।

करीब डेढ़ या दो का समय होगा। विभा काम काज से फारिग होकर कुँअर की राह
देख रही थी कि. तभी लिफ्ट के रुकने की आवाज़ आई। इसके साथ ही कई जोड़ी
भारी भरकम जूते चलते सुनाई दिए। सहज उत्सुकता से सावित्री भाभी अपने
दरवाज़े में लगी शीशे की आँख से आ जुड़ीं। आगंतुक पुलिस के वर्दीधारी अफसर
थे.। तीन जने थे. । उन्होंने विभा की घंटी बजाई। विभा ने दरवाजा खोला
तो बेहद गंभीर स्वर में एक अफसर ने अंदर बैठकर बात करनी चाही। अपना बेज
दिखाया। विभा हक्की बक्की एक ओर सिमट गई और वह लोग अंदर चले गए। दरवाजा
खुला ही रहा। करीब दस मिनट बाद वह बाहर आये। उनके चेहरे लटके हुए थे।
धीरे से दरवाज़ा उढ़काकर वह लिफ्ट से वापिस चले गए।

सावित्री की सांस धौंकनी की तरह चलती रही। उनको विदा करने विभा दरवाजे
तक क्यों नहीं आई ? क्या कहकर गए वे लोग ? इंतज़ार करना उनके लिए पहाड़ था।
अपने आप को रोक न पाईं। गाउन पहने पहने ही बाहर आ गईं। विभा का दरवाजा
खुला पड़ा था। वह झटके से अंदर दाखिल हो गईं। विभा सोफे का सहारा लेकर
दोनों पैर पसारे जमीन पर बैठी थी। उसके हाथ ढीले पड़े थे और आँखें एकटक
सामने दीवार पर टिकीं थीं। सावित्री भाभी का आना मानो उसे पता भी
नहीं चला।
” क्या हुआ विभा ? ” .
उत्तर शून्य।
” अरी बोल ना।”
पर विभा पत्थर की मूरत , काठमारी बैठी रही। सावित्री ने उसे हिलाया तो
भी ना बोली।
ऐसा क्या कह कर गए ? सावित्री बदहवास नीचे भागी। संयोग से पोलिस वाले
अभी वहीँ थे। और दो चार लोग उनसे बतिया रहे थे। सावित्री ने लगभग
चीखते हुए पूछा, ” क्या हुआ ? तुम लोगों ने क्या कहा मिसेज़ पाठक से ?

” बहनजी हमें दुःख है। मिस्टर पाठक नहीं रहे। उनका एक्सीडेंट हो गया।
लगता है कि उन्हेंगाड़ी चलाते समय हार्ट अटैक आया और गाड़ी सड़क छोड़कर पेड़
से जा टकराई। बहुत खराब सीन था। अच्छा हुआ आप आ गईं। हम दरबान से पूछ
ही रहे थे कि और कौन ऐसा हो सकता है जिसे हम बता सकें क्योंकि मिसेज़ पाठक
तो बेहोश सी हो गईं। कोई मृतक का रिश्तेदार या मित्र हो। ”

सावित्री उनपर बरस पड़ीं। ” यूँ एक बेसहारा अकेली लड़की को इतनी बुरी खबर
सुनाने तुम लोग आये तो कम से कम कोई समझदार औरत तो संग लाते जो उसे
संभालती। पहले ही मेरा दरवाज़ा खड़काना था। शॉक में अगर वह भी मर जाती
तो बच्चे का क्या होता ? इतनी जिम्मेदारी के पद पर बैठकर ऐसी गँवार
हरकतें। कोई संवेदना नहीं है ? ”

पुलिसवाला सर झुकाये सुनता रहा। सावित्री थोड़ी ठंडी पड़ीं तो विकास राय
का पता और फोन नंबर देकर उन्हें विदा किया और खुद उलटे पाँव विभा के पास
दौड़ी गईं। अपने घर का दरवाज़ा खुला पड़ा था। झटपट चूल्हे पर से दाल उतारी
जो बस जलते जलते बची। विभा बेहोश पडी थी। वहीँ से हेमा को फ़ोन किया और
बिल्डिंग की अन्य मित्रों को खबर दी।
” जल्दी नीचे आ कंचन। नागेन्द्र का एक्सीडेंट हो गया वह नहीं रहे। विभा
बेकाबू है। ”
दोनों स्त्रियां विभा को संभालने में लग गईं। करीब आधे घंटे बाद हेमा
पहुंची। उसने बताया विकास राय पुलिस से निपटने में व्यस्त हैं। विभा
पथराई बैठी रही। बड़ी मनुहार से स्त्रियों ने दो घूँट पानी उसके हलक में
डाला। उसके मुंह से कुँअर का नाम निकला तो पड़ोसन ने स्कूल को फ़ोन किया
और उसे घर लाने का इंतजाम करवाया। हेमा ने विभा की बहन को खबर दी। उसने
आगे उसके ससुराल व मायकेवालों को खबर की।

कुँअर स्कूल से लौटा। खबर सुन कर वह माँ से जा लिपटा विभा चुपचाप उसे
चिंपटा कर उसके बाल सहलाती रही। जैसे तैसे पहली फ्लाइट से नीना दीदी और
किशोर जीजाजी पहुँच गए। नीना ने बहुत बयन किये ,बहन के दुर्भाग्य को
कोसा। मगर विभा पर कोई असर नहीं हुआ। उसकी आँखें सूखी ही रहीं।
मुहल्लेवालियाँ एक एक करके आती जाती रहीं। सावित्री कपूर सबको चाय बनाकर
पिलाती रहीं और इसके साथ ही सुबह सुबह दूधवाले का किस्सा सबको बारी
बारी से सुनाती रहीं।
” होनी तो देखो ! जाने इसी मनहूस घड़ी के लिए विभा ने अपने हिस्से का दूध
मेरे घर पहुँचा दिया। मेरी नज़र लग गयी बेचारी को। अभी उम्र ही क्या है
? मुश्किल से पैंतीस छत्तीस की होगी ! और बेचारे नागेन्द्र तीन चार साल
बड़े रहे होंगे। हाय। …। ”
बार बार उनकी आँखें भर भर आती थीं। विकास राय उधर पुलिस से निपटकर आये।
सावित्री ने इधर प्रश्नो की झड़ी लगा दी। विकास राय ने संक्षेप में बस
यही कहा कि कई दिनों से तबियत खराब चल रही थी। उन्होंने डॉक्टर को दिखा
लेने की सलाह भी दी थी मगर नागेन्द्र ने कहा कि पेट की मामूली गड़बड़ है।
अच्छा है सफाई हो जाएगी। उसी दिन सुबह उसे कहीं पांच लाख रुपैये पहुंचाने
जाना था तबियत गिरी गिरी सी थी अतः विकास ने उसे घर जल्दी जाकर आराम करने
की सलाह दी। बैग लेकर वह घर ही जा रहा था मगर होनी को कुछ और मंजूर था।
——–
नीना दीदी और उनके पति की निगरानी में माँ बेटे को सौंपकर वह अपने घर चले गए।

अगला दिन और भी कठिन था।

वही मंदिर के घंटे , वही बेसुरी कानफाड़ू आरती। विभा सारी रात सोई नहीं
थी। उसी तरह सोफे के सहारे चटाई पर बैठी रही थी निढाल सी। कुँअर को
किशोर ने संभाल रखा था। दिन भर का थका बच्चा झट सो गया। आज विभा को
किसी बात की जल्दी नहीं थी। नौ बजे पुलिस के आदमी अर्थी को लाये। चारों
तरफ एक मरा मरा सा, फीका क्रंदन उठा। पांच सात मिनट तक हवा में तैरता रहा
मानो किसी मुख्य रोदन की प्रतीक्षा कर रहा हो। पर कोई ठोस स्वर ना
मिलने से धीरे धीरे मंद पड़ता गया और स्त्रियों की फुसफुसाहट में विलीन हो
गया।

विभा पहले खड़ी हुई फिर फर्श पर धम्म से बैठ गयी। उससे दो गज की दूरी पर
नागेन्द्र को ताड़ के पत्ते की चटाई पर लिटा दिया गया था। पंडित आ गया
था। विभा अर्धसुप्त सी यंत्रवत सब कुछ करती रही। फिर अपनी पूजा के
सामने घुटनों में सर देकर जा बैठी। नीना दीदी ने उसे कई बार झकझोरा , ”
चल अंतिम विदा कह दे। ” पर विभा टस से मस ना हुई . नीना ने देखा उसने
चूड़ियाँ और मंगलसूत्र निकालकर जाने कबसे देवी माँ की तस्वीर के आगे रख
दिए थे।

पुरुषवर्ग अर्थी को उठाकर ले चला। सावित्री और नीना ने खींचकर विभा को
उठाया और बाल्कनी में जाकर खड़ा किया जहां से वह अर्थी को बस में जाते हुए
देख सकती थी वह निर्निमेष देखती रही और उन लोगों के जाने के बाद भी काफी
देर तक वहीँ जड़ सी खड़ी रही।

ग्यारह वर्ष के कुँअर ने सभी रस्में पूरी कीं। उसका भोला मुख और घुटा सर
देखकर सबकी आँखें भर आती थीं। दस दिन तक स्त्रियों ने धार्मिक प्रवचन
कीर्तन आदि किया। बूढ़े माँ बाप आये तो अनेकों का बाँध टूट गया. । बेहद
करुण वातावरण व्यापता रहा मगर विभा को कोई नहीं रुला पाया।
धीरे धीरे समय पपड़ी बनकर इस किस्से पर भी जम गया , नीना और किशोर वापिस
सिंगापुर चले गए। कुछ दिनों तक हेमा और विकास राय रोज़ आते रहे। बूढ़े
माँ बाप बेटे को रोते – रोते अपने गाँव सिधारे। पूना से विभा की माँ
आकर उसके साथ रहने लगीं । उसे अकेला कैसे छोड़ देतीं। वह चाहती थीं कि
विभा पूना जाकर उनके साथ ही रहे।

सावित्री भाभी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी देखभाल करने में। कुछ प्रश्न
उनके मन में अटके हुए थे। एक दिन विकास राय आये तो वह अपने को रोक न
सकीं। अकेला पाकर बोलीं , ” आपने देखा क्या ? जब नागेन्द्र को घर लाए
थे तो उनका रंग कैसा सँवला गया था। होंठ तो एकदम नीले हो गए थे। ”
” बहनजी पोस्ट मार्टम तो करवाना नहीं था। इसके लिए मैंने कितने जतन
किये कि आपको क्या बतलाऊं। बेकार के लफड़ों में पड़ने से पैसा ही ज़ाया
होता। अपना बन्दा तो वापिस आ नहीं जाता। अब पेचिश लगी हुई थी। अंदरूनी
कमजोरी में कब दिल का दौरा पड़ा कहा नहीं जा सकता। दिल के मरीजों के
होंठ तो यूं भी नीले पड़ जाते हैं अक्सर। ”
” मैंने सुना कोई बैग था जो चोरी चला गया। पुलिसवाले लोगों को सुना गए हैं। ”
” हाँ। उसमे पांच लाख रूपया था। गाड़ी का अगला हिस्सा बिलकुल पिच्चि हो
गया था। क्या पता किसने मार दिया भीड़ में। यह भारत है। कौन छोड़ देता
है। पुलिस ने ही उचका लिया हो तो क्या पता ! मुंबई शहर में जिन्दे से
छीन ले जाते हैं तो यह तो मरा हुआ व्यक्ति था। ”
” क्या पता वह उस समय सहायता मांग रहा हो ! क्या पता उसकी सासें अभी चल
रही हों !”
विकास राय उकता चुके थे उत्तर देते देते। बोले ,” अब बहनजी अटकलें तो
सब बहुत लगा चुके। शव परीक्षण के लिए जाता तो बेकार की चीरफाड़ के पैसे
भरने पड़ते कानूनी कार्यवाही होती। ऊपर से पैसे लेने के मारे कोई न हुई
वजह भी ठोंक देते। आप पुलिस के हथकंडे क्या समझेंगी। और खराबी ही होती।
यह सब अंग्रेजों के बनाये क़ानून हैं। वहाँ ठंडा देश है। यहां तो आप
जानती ही हैं सड़ी गर्मी के कारण शव को रखना बर्दाश्त से बाहर हो जाता
है। नीना और किशोर की भी यही राय थी। विभा भी नहीं चाहती थी कि आगे कोई
कार्यवाही हो। जो हुआ सो बिसारकर आगे की सोंचिये। ”

दो महीने लगाकर विभा की माँ भी चली गईं। कुँअर के इम्तिहान अभी बाकी
थे। विभा उसके साथ रात दिन यूँ लगी हुई थी कि जैसे अपने दिमाग निकालकर
उसके दिमाग में रख देगी। इम्तिहानों के बाद वह सावित्री से बोली ,
” भाभी आप मेरे कुँअर का नाम कटवाने मेरे साथ स्कूल चल सकेंगी ?”
” हाँ हाँ क्यों नहीं। कल ही चलो। क्या पूना जाकर रहने का इरादा है ? ”
” अब मेरा यहां क्या है ? ” विभा लम्बी निःश्वास लेकर बोली। ” मुझे
अपना भविष्य भी तो बनाना है। नागेन्द्र ने तो कभी कुछ करने नहीं दिया।
मैंने भी एम ए किया था। बारह साल चूल्हे चौके में ध्वस्त हो गए। ”
कभी कुछ न कहनेवाली विभा आज ह्रदय की ग्रंथि खोल बैठी थी। सावित्री का
मन भीग उठा बेचारी। कैसी नज़र लगी।

अगले दिन सावित्री कपूर विभा के संग स्कूल गईं। प्रधान अध्यापिका ने
जरूरी कार्यवाही के बाद क्लास टीचर से मिलने और रिपोर्ट निकलवाने को कहा।
विभा ने सावित्री को अंदर भेज दिया और खुद सिरदर्द का बहांना बना कर
बाहर ऑफिस में ही बैठी रही। कुँअर की क्लास टीचर स्टाफ़रूम में मिली।
गोरा रंग , सुन्दर गोलाईदार बदन ,यही कोई पच्चीस से तीस तक की उम्र। सफा
लग रहा था की पढ़ाई पूरी करके किसी अच्छे रिश्ते की इंतज़ार में नौकरी कर
रही है फिलहाल। सावित्री ने उससे कुँअर की रिपोर्ट मांगी तो उसका चेहरा
पीला पड गया। घबराई सी बोली ,” आप कौन लगती हैं उसकी ? ”
मुस्कुराकर सावित्री ने बताया कि परिवार की मित्र होने के नाते वह केवल
उसकी मा की सहायता कर रहीं थीं। वह लड़की -बिनती आनंद ” ,हाँ हाँ कल
भिजवा दूँगी कुँअर के हाथ। अभी मेरा पीरियड लगा हुआ है किसी और क्लास
में। ” कहकर जल्दी से सटक ली।

विभा ने सुना तो व्यंग से मुस्कुराई। अगले हफ्ते से बच्चों की छुट्टियां
शुरू होने पर सावित्री कपूर अपने मायके अमृतसर चली गईं और विभा घर को
ताला लगाकर पूना। वापिस लौटने पर सावित्री को विभा का न होना बहुत खला।
आते जाते उसके घर पर पड़ा ताला उनके दिल को कचोटता। वही मंदिर की बेसुरी
आरती। वही दूधवाला। बाल्कनी पर जातीं तो पत्थर के जैसी सुन्न विभा की
मूरत उनको याद आती। खीर बनातीं तो खुद नहीं खा पातीं।

छः महीने गुज़र गए। विभा की कोई खबर नहीं आई। एक और नया बुधवार। सर
झुकाये , भाजी का झोला लटकाये वह लिफ्ट से उतरीं तो बिल्डिंग के पोर्टिको

में एक नई लड़की नज़र आई। पतली दुबली ,जींस और टॉप पहने थी। बाल कटे
हुए ,पर्म किये हुए कंधे तक लटक रहे थे। ऊंचे हील के सैंडल और काला धूप
का चश्मा। चटख गुलाबी लिपस्टिक। सावित्री ने देखा अनदेखा कर दिया। बम्बई
में सब फैशन से रहती हैं। होगी कोई। वह लड़की चिल्लाई ,” भाभी ई ई ई
—”
चाहे कोई रूप धर लो आवाज़ तो बदल नहीं जाती। विभा की गुहार सुनकर
सावित्री उससे जा लिपटीं।
” अरे मैं तो पहचानी भी नहीं तुझे। कब आई ?”
” बस अभी अभी टैक्सी से उतरी हूँ। दरबान सामान ऊपर ले गया है। ऊपर
चलिए सब बताती हूँ।

सदा की कमबोल विभा आज बुलबुल सी चहक रही थी , ” भाभी मैंने नौकरी कर ली
है। नीना दीदी के पति ने अपने किसी दोस्त से कहकर मुझे एक बड़ी कंपनी
में जगह दिला दी है। कुँअर नए स्कूल में गया है। नए दोस्तों में खुश
है। विकास राय ने मुझे दुनिया भर के कागज़ पत्तर संवारने के लिए यहां
बुलाया है। इन्स्योरेंस वगैरह छुडानी है। वह तो चाहते हैं कि मैं
नागेन्द्र की पट्टीदारी कुँअर के नाम चढ़वा दूँ ताकि बड़ा होकर वह यही काम
कर सके। ”-
” यह तो बड़ी अच्छी बात होगी। ”
” नहीं भाभी ,मैं इसे खत्म कर देना चाहती हूँ। कुँअर बड़ा होकर खुद
अपने फैसले करेगा। मैं क्यों उसे किसी बपौती के बंधन से- बाँधूँ ?
स्वतंत्रता इंसान के लिए कितनी आवश्यक होती है यह कोई मुझसे पूछे। मैं
पहले भी नौकरी करना चाहती थी मगर नागेन्द्र को मेरा पराये मर्दों में
उठना बैठना पसंद नहीं था। एक ही बेटा है बहुतेरा पाल लूंगी। ”
विभा के चेहरे पर कटुता थी ,आवाज़ में क्षोभ। सावित्री के लिए यह सब नया
था। वह केवल अपनी गृहस्थी का इंजन और पति की अडोल अनुगामिनी बनी रहीं
जीवन भर। विभा की आँख में आंसू थे मगर अपने लिए।

सावित्री उसके आने से खुश थीं। उसे अपने ही घर रखा। अगले दिन विभा ने
एक बार फिर कुँअर के स्कूल जाकर उसका टेनिस और स्विम्मिंग का इनाम और
प्रमाणपत्र लाने को कहा।
” तुम भी संग चलो न। ”
” नहीं मुझे जरूरी सामान छाँटना है। ”
सावित्री कपूर स्कूल गईं। लौटीं तो एकदम बदहवास ! विभा नागेन्द्र के
दामी कपडे जूते आदि बेदर्दी से गरीबों को बाँट रही थी। . सावित्री कपूर
घबराई हुई बोलीं ,” विभा ऊपर चल। तुझे कुछ बताना है। ”
” क्या हुआ ? सर्टिफिकेट नहीं दिया कया ? ”
” देती क्यों नहीं। मगर तुम सुनो। …। ज़रा यह बताओ……. ” वह हाँफते
हुए बोलीं। विभा ने पानी पिलाया।
” वो , वह जो कुँअर की टीचर थी न ,वह लड़की ? उसे तुम जानती थीं क्या ? ”
विभा ने दूसरी तरफ मुंह घुमा लिया। क्षणिक आवेग को रोकते हुए सहज होकर पूछने लगी
” क्यों क्या हो गया ? ”
” वह तुम्हारे नागेन्द्र की अंगूठी। … सच ! देवी माँ कसम !! —-वही
अंगूठी पहने थी। अरे मेरी पहचान धोखा नहीं खा सकती। नागेन्द्र की
अंगूठी — काले पत्थर पर हीरे से एन ० पी ० लिखा था अंग्रेजी अक्षरों
में !!! ”
” हाँ वह उसे शादी में मिली थी मेरे मायके से। ” -
” हाय ,उसके पास कैसे पहुंची ? ”
विभा पहले तो मौन साधे रही। उसके चेहरे पर एक भाव आता था और एक जाता
था। जैसे किसी ने उसकी चोरी पकड़ ली हो।- फिर सँभाल कर ,दृढ़ता से उसने
मन के सब संशय परे फेंक दिए और बोली ,” भाभी आप बेकार अपने को कोसती
रहीं की मुझे आपकी नज़र लग गयी। मेरी सुहाग सेज तो जाने कबसे लुट चुकी
थी। जब कभी मैं नागेन्द्र से कोई नई फरमाइश करती वह -मुझे समझा कर कहते
कि नई चीज़ जब तक शो केस में सजी रहे ,नई लगती है। जैसे ही उसे खरीदकर
घर ले आओ वह पुरानियों में से एक लगने लगती है। —– बहुत जल्दी मुझे
समझ में आ गया था कि मैं भी उनके लिए बस वही थी ——-पुरानियों में
से एक।
पिछले पांच साल से यह औरत उनके संग लगी हुई थी।.. पहले मुझे पता नहीं
चला मगर कुँअर जैसे जैसे बड़ा होने लगा उसकी समझ में आने लगा। उसके दोस्त
उसका मज़ाक बनाते थे और टीचर को पीठ पीछे ” तेरे पापा की बाहरवाली ”
पुकारते थे। – कुँअर कुंठित रहने लगा था।मैंने नागेन्द्र को समझाया तो
उसका उत्तर खरा था , छोड़ दो। वापिस चली जाओ।

” मेरा एक ही उद्देश्य था जीवन में कि कुँअर का जीवन सहज रहे.
नागेन्द्र कुँअर को अपने पौरुष का प्रसार समझता था और जी जान से उसपर
निछावर था। मेरे जाने से कुँअर का पिता उससे छिन जाता ,शायद बड़ा होकर वह
मुझे कभी माफ़ न करता। अपनी ख़ुशी की खातिर मैं उसकी दुनिया क्यों उजाड़ती
? इसलिए मैंने अपनी सभी आकांक्षाओं का गला घोट लिया और मैं शांत बनी
रही। नागेन्द्र ,जो पैसा पैसा दांत से पकड़ते थे ,इस लड़की पर हज़ारों
लुटाने लगे। मुझे कपडे धोते समय उसकी जेब से गहने या साड़ियों के बिल
मिलते। मेरा जीवन एकाकी हो गया था मगर मैंने सब गरल पी लिया। किससे
कहती। माँ बाबा सुनकर टूट जाते। इसकी माँ और पिताजी निपट अनजान ,गँवारू
लोग। शहर में कमाई करनेवाला बेटा उनके लिए किसी राष्ट्रीय सम्मान से कम
ना था। नीना दीदी नागेन्द्र से चिढ़ती थी। शादी के समय उसके गंदे मज़ाक
झेल चुकी थी। मैंने अपनी आन रखने के मारे उसे कुछ नहीं बताया। देवी के
भक्त पिता ने हम दो बेटियों को बेटों की तरह पाला था। हम कन्या कुमारी का
स्वरूप थीं ——–
सिसकते हुए विभा आगे बोली ,” शादी हो गयी तो मैं अपने को गौरां पार्वती
समझने लगी। मगर भाग्य ने मुझे योगिनी बना दिया। —– भाभी मैं
छिन्नमस्ता हो गयी।” विभा बिलख रही थी।
सावित्री ने पानी पिलाया ,थोड़ा स्वस्थ हुई तो कुछ पल दीवार को टकटकी
बांधे देखती रही। सावित्री स्वयं अपने आंसू पोंछ रही थी।
विभा कहती गयी , ” मेरी ममता मेरी संजीवनी थी। मैं अगर जरा भी विचलित
होती तो कुँअर ढह जाता। उसका बचपन विषाक्त न हो जाए इसलिए मैंने अपनी
अस्मिता को , अपने सर को काटकर हाथों में थाम लिया था और उसे अपने ह्रदय
का खून पिलाती रही। उन दोनों का तामसी शारीरिक मिलन मेरे सत्व को चुनौती
देता था मैं उन्हें पाँव तले कुचलकर अपने अंतस में ऊर्जा का संचार महसूस
करती थी। दिन रात घृणा का गरल पिया है मैंने। अब मुड़कर देखती हूँ तो समझ
नहीं पाती कि कैसे मैं एक शरीर में दो विलोम चरित्र बन कर जी रही थी।”
” तुमने विकास राय को क्यों नहीं बताया ?” सावित्री ने पूछा।
-
”विकास राय ? उसे पता था। उसने समझाया भी मगर नागेन्द्र नहीं हटा।
ऐसे ही काट ली। ”

विभा अविरल आंसू बहा रही थी। सावित्री की आँखें भी गीली थीं।
विभा बोली ,” यहां इस गृहस्थी में किसी तीसरे की दखल नहीं थी। पैसे
धेले की कमी नहीं थी। ”
” पर यह अंगूठी उसके पास कैसे पहुंची ? ”
” मरने से कुछ दिन पहले बिनती का जन्मदिन था। नागेन्द्र शाम से ही
गायब हो गये। उसके संग कहीं रंगरेलियां मनाकर रात को चार बजे घर आये।
सुबह उनके हाथ में अंगूठी नहीं थी। मैंने पूछा तो निष्ठुरता से कहा किसी
को पसंद थी दे डाली। ”
” मेरी चीज़ देने का तुन्हें हक़ क्या था ? ”
” मुझे मिली चीज़ तुम्हारी कहाँ रह गयी। मैं चाहूँ तो तुम्हें भी जिसे
चाहूँ दे डालूँ। दान में मिली हो। दान में ! ”
नागेन्द्र हद से नीचे गिर चुका था। कुँअर ने बताया कि उसकी टीचर पापा की
अंगूठी पहने थी। मैंने विकास राय को बताया तो नागेन्द्र साफ़ मुकर गया और
कहा कि वह तो खो गयी थी। मैं बात को पी गई। वापिस तो मिल नहीं सकती थी।

” अरे कैसे नहीं? तुम कल ही मांगने चलो। मैं तो उसका सारा गरूर तोड़ दूँ
दो मिनट में। टीचर होगी अपने घर। चोट्टी न हो तो। सरे आम मुंह काला
करूंगी।तुम कल ही चलो मेरे साथ। ” .

” भाभी जब पति ही चोरी गया तो उसकी अंगूठी का क्या ! ऐसी औरत का पहना
हुआ क्या मैं पहनती ? न हीं कुँअर को पहनने दूँगी। माँ बाबा की निशानी
थी। जाने कितने और खर्चे ताक पर फेंक कर बनवाई थी। उसे अपवित्र किया।
बहुत रोई थी मैं। घुट घुट कर —– भाभी मुझे नागेन्द्र का कुछ भी नहीं
रखना। यह घर भी मैं बेचना चाहती हूँ। कल एस्टेट एजेंट को बुलाया है।”

” अरे ऐसे कैसे सब छोड़ देगी। तूने ही तो यह एम्पायर खड़ी की है। ”
” कैसी एम्पायर ? जब मूर्ती खंडित हो जाती है तब मंदिर भ्रष्ट हो जाता
है। ”. विभा ने बताया कि आखिरी पल तक वह दोनों एक साथ देखे गए थे।
जब गाड़ी पेड़ से टकराई थी एक लड़की कूदकर भागी थी और ऑटोरिक्शा लेकर भाग
निकली थी। इसीलिए पुलिस ने तहकीकात करने में समय लगाया था। बड़ी मुश्किल
से विकास राय ने शव को परीक्षण से छुड़ाया था क्योंकि वह अपनी दूकान की
बेइज़्ज़ती अखबारों में नहीं चाहते थे। किस्सा बन जाता। यह व्यापार तो नाम
पर चलता है।

सावित्री कपूर उसकी कहानी सुनकर बहुत भावुक हो गईं थीं। बोलीं , ” विभा
अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है। फिर से शादी कर सकती हो। ”
” नहीं भाभी। अब नहीं। मुझमे क्या कमी है ? रहा पुरुष का प्रेम ? वह
सब हमारे शारीरिक हॉर्मोन्स का खेल है। मातृत्व की पराकाष्ठा पर पहुंचकर
वह उछाल अपने आप तिरोहित हो जाता है। मैंने कुँअर को पा लिया।
नागेन्द्र के रहते मैं उसे उससे दूर नहीं कर सकती थी। वर्ना कबकी छोड़
चुकी होती। अब बस ! ”

शाम को जब कपूर साब घर आये तो आदत के मुताबिक सावित्री ने अपने मन के
टेपरिकॉर्डर का प्ले बटन दबा दिया। कपूर साब अपनी दिनचर्या के साथ साथ
उनकी रनिंग कमेंट्री सुनते रहे चुप चाप। जब सावित्री ने बताया कि विभा
घर बेचना चाहती है तब उन्होंने हुंकारा भरा। पत्नी से कहा कि तीनो
बच्चे बड़े हो रहे हैं। उनको अधिक जगह चाहिए अतः घर वह खुद ही ले लें तो
एक ही तल पर तीन कमरे और मिल जायेंगे।

कपूर साब एक नामी दवाई कंपनी में केमिस्ट थे और बीस वर्षों में काफी
ऊंचे पद पर आ पहुंचे थे। फ़्लैट में सामान ही कई हज़ार का भरा था। विकास
राय को बीच में डालकर विभा ने उनके हाथ घर बेच दिया। तीन हफ्ते लगे
कागज़ी खाना पूरी करते। विकास राय ने रुपये पैसे के बाकी भुगतान आदि
देखने का जिम्मा अपने ऊपर लिया। यूं भी बैंक और कंपनी के लोन थे सो
बेईमानी की गुंजाइश नहीं थी। विभा पूना चली गयी। वहां से उसे आगे
दिल्ली जाना था. । जॉब वहीँ फिक्स हुई थी।

सावित्री कपूर घर पाकर एक ओर बहुत खुश थीं तो दूसरी ओर उनका मन भारी हो
हो आता था। विभा हर कमरा जस का तस छोड़ गयी थी। उनकी उदासी कपूर साब ने
भाँप ली। वह बरज कर बोले , ” देख सवि ,हम खत्री लोग हैं। किसी का बरता
हंडाया हमें नहीं चाहिए इसलिए एक ध्यान से सब अन्न आटा बर्तन कपडे
गरीबों को दे दे। मैं यह पलंग ,सोफ़ा भी नहीं रखूँगा। ऑफिस में बात की
है। लोग लेने को तैयार हैं। तू सब साफ़ करवा ले। ”

सावित्री एक एक करके हर कमरे की सफाई खुद करने में जुट गईं। सबसे पहले
रसोई घर। वहीँ एक कोने में लकड़ी का पूजाघर स्थापित था। उसे झाड़ा पोंछा
तो उसकी दराज़ से उन्हें विभा का मंगल सूत्र मिला। वह अपनी हरी चूड़ियाँ
भी वहीँ रख गई थी। सावित्री का दिल कचोटने लगा। तभी एक डिब्बी से एक
शीशी मिली। उसपर अंग्रेजी में लिखा था pure arsenic lethal poison .
हिंदी में भी लिखा था ,तेज़ ज़हर शुद्ध संखिया। शीशी आधे से अधिक खाली
थी।

कपूर साब आये तो सावित्री ने झट उन्हें यही बात बताई। कपूर साब सन्न रह
गए। पर बोले कुछ नहीं। सावित्री पति की नाराज़गी देख चुप मार गईं। खाना
आदि खाने के बाद उन्होंने पूछ ही तो लिया। ” ऐ जी ,आप मुझसे क्यों नाराज़
हो गए ? ”
” सवि तू बहुत भोली है। तुझे मालूम नहीं कि क्या हुआ। ये बात फ़ैल गयी
तो विभा जेल में होगी। अब समझ में आया की विकास राय को उसने पोस्ट
मार्टम रुकवाने की इल्तिज़ा क्यों की। याद करो विकास ने कहा था कि मरने
से पहले नागेन्द्र कई दिनों से पेट की खराबी से परेशान था। उसका लंच
का डिब्बा विभा लगाती थी। रात को भी वह घर में खाता था। मेरे ख्याल से
विभा ने जब अंगूठी की मांग की और झगड़ा हुआ तभी कहीं से ज़हर की जुगाड़ की.।
वह ऊपर से शांत बनी हुई थी पर अंदर का ज्वालामुखी उसे चैन नहीं लेने दे
रहा था। उसने धीरे धीरे रोज़ उसके खाने में ज़हर मिलाना शुरू कर दिया और
आखिरकार दस एक दिनों के बाद वह मर गया। याद है उसका रंग नीला पड गया था
? विभा पर बुरी बला तो आई मगर उसके चलते वह- खुद बुरी बला बन गई। ” -

सावित्री सन्न रह गयी। सारी रात आँखों में ही काट दी। सुबह नहा धोकर
पूजा के आसान पर बैठीं तब कहीं मन स्थिर हुआ। सप्तशती का पढ़ा याद आया ,
” —- और अंत में देवी ने महाकाली का रूप लिया और अपनी रक्तजिह्वा से
रक्तबीज का सारा खून पी लिया ”
शांत चित्त से विभा का सिखाया मन्त्र स्वतः गाने लगी ——– ”
मधुशुम्भ् महिष मर्दिनी महा शक्तियैः नमः ”

 

- कादंबरी मेहरा


प्रकाशित कृतियाँ: कुछ जग की …. (कहानी संग्रह ) स्टार पब्लिकेशन दिल्ली

                          पथ के फूल ( कहानी संग्रह ) सामयिक पब्लिकेशन दिल्ली

                          रंगों के उस पार (कहानी संग्रह ) मनसा प्रकाशन लखनऊ

सम्मान: भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान २००९ हिंदी संस्थान लखनऊ

             पद्मानंद साहित्य सम्मान २०१० कथा यूं के

             एक्सेल्नेट सम्मान कानपूर २००५

             अखिल भारत वैचारिक क्रांति मंच २०११ लखनऊ

             ” पथ के फूल ” म० सायाजी युनिवेर्सिटी वड़ोदरा गुजरात द्वारा एम् ० ए० हिंदी के पाठ्यक्रम में निर्धारित

संपर्क: लन्दन, यु के

One thought on “बुरी बला

  1. आपके अथक शब्दों के बाण रोक न सके मुझे यहाँ लिखने से। एक स्त्री के अंतर्मन की ऐसी व्यथा और उसका ऐसा परिणाम की एक राधा को माँ काली बना देती है। शुरुआत से लेकर अंत तक विभा का मनोरम रूप आपके शब्दों से और निखर गया। खूबसूरत लेखनी को नमन ।

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