बाराती, घराती और सैम

 

पच्चीस साल बाद सैम सिन्हा भोपाल लौटा था. उसका मन बिल्कुल उचाट था. अटपटाया सा वह बेमक़सद गलियों-बाज़ारों में अकेला भटकता फिर रहा था. जब थक जाता तो वह घर लौट कर आंगन में पड़ी चारपाई पर लेट जाता और अदवायन में अपने पांव उलझाए बस इसी बात पर मनन करता कि उसे मैनहैट्टन लौट जाना चाहिए अथवा नहीं; वहां भी उसका कौन बैठा था जो उसके मन में चल रहे संघर्ष को समझ सकता? उसके लगभग सभी दोस्तों के विवाह हो चुके थे और उनके लिए रोज़ शाम को पब अथवा क्लब के लिए समय निकलना असम्भव हो गया था. यहां उसके चाचा-चाची और उनका परिवार था जो उसपर जान छिड़क रहा था; यह बात और थी कि उसे उनका लाड़-दुलार एक आंख नहीं भा रहा था. पश्चिम की ‘लीव मी एलोन’ वाली मानसिकता से ग्रस्त, सैम को लग रहा था कि उसके ‘पर्सनल स्पेस’ का लगातार अतिक्रमण हो रहा था. उसकी ऐक्स-गर्लफ़्रैंड पारा ठीक ही कहती थी कि ‘ये इंडियंस बहुत चिपकु होते हैं. इंडिया जाओ तो वे मुझे 24/7 घूरते हैं जैसे कि मैं अजायबघर से आई हूं.’

पांच महीने हुए जब सैम के मां-बाप की एक कार-दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी किंतु सैम ने भारत में अपने किसी रिश्तेदार को उनके निधन की सूचना नहीं दी थी. महीने में एक या दो बार उसके स्वर्गीय पिता फ़ोन पर अपने छोटे भाई स्वरूप और उसके परिवार से भोपाल में बात किया करते थे. उसे स्वयं भी झीनी सी याद थी अपने चाचा-चाची की. क़रीब पच्चीस बरस पहले जब सैम भोपाल आया था तब चाची ने एक गोल मटोल बच्चे को जन्म दिया था, जिसे सब गोलू के नाम से पुकारते थे. पांच वर्षीय सैम उसे गोदी में उठा लेता तो सब चिल्लाते, ‘अरे गोलू को पकड़ो, कहीं सैम उसे गिरा न दे,’ तो उसे बहुत ग़ुस्सा आता था; न जाने क्यों यह याद उसके दिमाग़ में अब तक बसी हुई थी.

प्राइवेट स्कूल में दाख़िला दिलवाने के बाद सैम को जब चाहे छुट्टी दिला कर भारत ले जाना सम्भव नहीं था इसलिए गाहे-बगाहे उसकी मां और पिता अकेले ही भोपाल हो आते थे. सैम की क्रिसमस अथवा गर्मियों की छुट्टियों के दौरान सुपर-स्टोर्स देर रात तक खुले रहते थे और उसके मां-बाप, जो दो-दो सुपर-स्टोर्स के मालिक थे, को सांस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं मिलती थी. वे सैम से बहुत कहते कि वह अकेला अपने चाचा-चाची के पास भोपाल चला जाए किंतु वह मुंह लटकाए घर पर अकेला बैठना पसन्द करता था. कालेज पहुंचते-पहुंचते सैम के बहुत से यार-दोस्त बन गए, जिन्हें छोड़कर वह स्वयं भारत जाने से इंकार करने लगा और इस तरह उसका सम्बन्ध चाचा-चाची के परिवार से बिल्कुल टूट गया.

पांच वर्ष पूर्व गोलु के विवाह पर भी केवल उसकी मां ही जा पाई थीं, जिन के हाथ चाचा-चाची ने पौलिएस्टर का एक चमकदार सूट भिजवाया था जो गोलु की ससुराल से सैम के लिए विशेष तौर पर भिजवाया गया था. गोलु के विवाह के फ़ोटोज़ भी सैम को बड़े अजब, घटिया, और कृतिम लगे थे और उसने सोचा था अच्छा ही हुआ कि वह शादी में नहीं गया.

ऐसा नहीं था कि सैम का मन न हुआ हो कि डायरी में चाचा-चाची का फ़ोन ढूंढे और उन्हें अपने माता-पिता की मृत्यु की सूचना दे किंतु पारा ने, जो उन दिनों उसकी गर्ल-फ़्रैंड थी, उसे ऐसा करने से रोक दिया था कि भोपाल से कहीं उसके रिश्तेदार यहां आ टपके तो वह उन्हें कैसे सम्भालेगा. भारतीय मेहमानों से उकताई हुई पारा के विचार जानकर सैम ने भी यही धारणा बना ली थी कि रिश्तेदार मुसीबत की जड़ होते हैं, जो झूठी मुहब्बत दिखाते हैं और ‘जफ्फियां डालकर’ उधार मांगने की फ़िराक में रहते हैं. सैम जब पिछली बार भोपाल गया था तो उसके चाचा भी सुबह शाम उसके पिता के पांव छूकर आशीर्वाद लेते थे और पिता उन्हें गले लगा लेते थे. जब देखो तब चाची भी जेठानी के पांव दबाने बैठ जातीं थीं. क्या वो सब नाटक था?

पिछले वर्ष के दौरान, पारा सैम के जीवन पर बुरी तरह हावी हो गई थी, न सुबह देखती और न शाम, जब देखो तब वह सैम से शराब की बोतल खोलने को कहती और फिर एक के बाद दूसरी बोतलें खुलती चली जातीं. मां-बाप कुढ़ते किंतु चुप रहते क्योंकि वे डरते थे कहीं सैम फिर बाहर जाकर न पीने लगे; कम से कम बेटा आंख़ों के सामने तो था और जैसी भी थी पारा भारतीय थी, गोरी नहीं.

मां-बाप की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात सैम के बहुत से दोस्त और रिश्तेदार मैनहैट्टन में इकट्ठे हुए थे किंतु रहनुमाइ की थी उसके पिता के जिगरी मित्र, शान अंकल ने, जो उनके एकाउंटैंट भी थे. पारा को सैम के दुख का कोई अंदाज़ा नहीं था; उसके लिए तो शराब हर ग़म का इलाज थी. शराब, ड्रग्स और सैक्स; ये सब कहीं सस्ते में तो मिलते नहीं और अपना पर्स खोलने को पारा तैय्यार नहीं थी. सैम से उसे ये सब मिल रहा था किंतु घर में हफ़्ता भर से चल रहे भजन-कीर्तन और लोगों की भीड़ जो शोक प्रकट करने लगातार चली आ रही थी, की वजह से पारा उसके माता-पिता की तेरहवीं तक भी न टिकी. सैम का मन सचमुच खट्टा हो गया था. मां के अभाव में घर की व्यवस्था बिगड़ चुकी थी. गंदे कपडों में और गंदे घर में वह भूखा-प्यासा बैठा रहता था. रिश्तेदार, दोस्त और पड़ौसी आते, जफ्फियां मारकर उसे दिलासा देते और उसके लिए भोजन छोड़कर लौट जाते.

उधर, एक महीना पूरा होने को आया और मैनहैट्टन से भाई-भाभी का जब कोई फ़ोन नहीं आया तो स्वरूप को फ़िक्र हुई. उसने कई बार फ़ोन मिलाने की कोशिश की किंतु जैसे ही भारत से डायल किया गया नम्बर देखता, सैम घबरा कर ‘बिज़ी’ का बटन दबा देता. उसे समझाने वाला कोई न था; उसकी मां का परिवार अमेरिका में बहुत पहले से ही बसा था किंतु किसी वजह से उन लोगों के यहां आना-जाना बंद हो चुका था. मृत्यु पर आए थे वे सब लोग किंतु दिखावे भर के लिए. सैम से रुकने के लिए नहीं कहा और न ही उन्होंने दोबारा उसकी ख़बर ली.

फिर एक दिन आत्मा के बहुत कचोटने पर सैम ने पिता की डायरी निकाली और चाचा-चाची का फ़ोन नम्बर ढूंढ निकाला.

‘में मैनहैटन से सैम.’ घंटा भर की मेहनत से तैय्यार किया गया एक अधूरा वाक्य सैम किसी तरह से बोल गया.

‘अरे समीर, कैसे हो बेटा, हम तुम्हें बहुत दिनों से फ़ोन लगा रहे हैं पर कोई जवाब ही नहीं देता. भैय्या-भाभी कैसे हैं? उन्होंने भी हमें कब से फ़ोन नहीं किया…’ ‘समीर’ के नाम से पुकारे जाने पर सैम भाव-विह्वल हो उठा; सिर्फ़ उसकी मां ही उसे प्यार से समीर कहकर बुलाती थी.

‘मम्मी-पापा…आर…डैड…’

‘मम्मी-पापा को क्या हुआ, समीर?’ चाचा की घबराई हुई आवाज़ सुनाई दी और फिर सैम को फ़ोन पर एकाएक कई आवाज़ें सुनाई देने लगीं. चाचा ने घबराकर शायद फ़ोन गोलू को पकड़ा दिया था.

‘समीर भैय्या, मैं अनंत हूं…गोलू, आपका कज़िन. ताऊजी-ताई जी के बारे में आप क्या  कह रहे थे?’ अनंत ने कांपती हुई आवाज़ में सैम से पूछा जैसे कि वह जान गया था कि उसके ताऊ-ताई जी नहीं रहे.

फ़ोन पर हृदय-विदारक चीखें सुनकर सैम ने घबरा कर फ़ोन रख दिया. पारा ने उसे बताया था कि भारत में लोग बड़े अजीब ढंग से शोक प्रकट करते हैं; छाती पीट-पीट कर वे आंखे मलते हुए ज़ोर ज़ोर से रोते हैं और बेहोशी का नाटक करते हैं, कई परिवारों में तो गा-गाकर शोक मनाया जाता है. तकिए से अपने कान-आंख कान बंद किए सैम को ऐसा आभास हुआ कि उसने बेकार में ही उन्हें फ़ोन किया; इस संसार में अब उसका कोई नहीं.

फिर तो भोपाल से रोज़ फ़ोन आने लगे कि सैम कैसा था, मां-पिता का क्रिया-क्रम ठीक से हुआ था कि नहीं; उनके फूलों का क्या हुआ, अकेले वह जीवन की नैय्या कैसे खे रहा था, वह भोपाल क्यों नहीं आ जाता आदि आदि. सैम की मुसीबत यह थी कि वह हिन्दी बोलने में ज़ीरो था. उसके मां-बाप ने सैम को एक महंगे प्राइवेट स्कूल में शिक्षा दिलवाई थी ताकि वह अमरीकियों की तरह अंग्रेज़ी बोल सके. वे गर्व से झूम झूम जाते थे जब उनका इकलौता बेटा अमरीकियों से अंग्रेज़ी में बात करता था. आपस में वे हिन्दी बोलते थे किंतु सैम से वे अपनी टूटी फूटी अंग्रेज़ी में ही वार्तालाप किया करते थे.

सैम को पारा अथवा शराब में कोई दिलचस्पी नहीं रही थी किंतु पारा का और कौन था जो उसे मुफ़्त में शराब पिलाता; कबाब खिलाता? घर ख़ाली देखकर उसकी तो मौज ही हो गई किंतु चाचा-चाची के फ़ोन आते तो वह झींक उठती.

‘ब्लडी लीचेस, वाए डोंट यू टेल देम टु फ़क औफ़…’

‘वाए डोंट यू फ़क औफ़.’ सैम कुछ अच्छे मूड में नहीं था. ग़ुस्से में पारा ने बोतल दरवाज़े पर दे मारी और फिर दरवाज़े पर अपनी सारी भड़ास निकालती हुई सैम के जीवन से सदा के लिए चली गई. अपराध-भावना से तो सैम पहले से ग्रस्त था ही कि मां-बाप के जीते-जी उसने उन्हें कितने दुख दिए और अब वह चाहे कितना भी पछतावा करे, वे तो देखने आने से रहे. वह अपने को इतना अभागा महसूस कर रहा था कि एक सुबह उसके दिमाग़ में आया कि क्यों न वह आत्महत्या कर ले! अपने पिता की पिस्तौल निकाल कर वह अपने को तैय्यार कर ही रहा था कि शान-अंकल उसे साप्ताहिक हिसाब-किताब दिखाने के लिए आए. एक वही थे जो बिना कुछ कहे-सुने उसकी दुखती रगों पर जैसे मरहम रख देते थे.

‘बर्ख़ुरदार, आज या कल, आपको अपने कारोबार की कमान तो सम्भालनी ही होगी; आपका दिल भी बहल जाएगा. हम चाहते हैं कि सबसे पहले आप अपने मां-बाप के फूल गंगा में बहा कर आएं ताकि उनकी रूहों को सुकून मिले.’ पिस्तौल को नज़रन्दाज़ करते हुए शान अंकल बोले थे. अपने दोस्त के इंतकाल से उन्हें भी बहुत सदमा पहुंचा था किंतु उनकी पनीली आंखें मानो मुस्कुरा कर उसे हौसला दे रही थीं.

‘ओनलि इफ़ यू कम विद मी, शान अंकल.’ सैम ने उनकी बात झट मान ली; शायद हरिद्वार जाकर ही उसे शांति नसीब हो. बेचारे चाचा-चाची की भी बात रह जाएगी जो उसके लिए सचमुच परेशान थे.

‘काश कि यह सबाब हमें मिल सकता, बर्ख़ुरदार, पर हम हिंदु रस्मों-रिवाज़ से बिल्कुल वाकिफ़ नहीं हैं. हमारे हिदायत तो यही होगी कि आप अपने चाचा-जान को साथ लेकर जाएं, उन्हें भी तो सुकून की ज़रूरत होगी.’ शान-अंकल ने सैम से नम्बर लेकर भोपाल फ़ोन मिलाया. शोक-ग्रस्त चाचा और चाची बेताब थे जानने के लिए कि हुआ क्या था. शान अंकल ने दुर्घटना के बारे में उन्हें तफ़सील से बताया और फिर उन्हें सैम से हरिद्वार में मिलने की ग़ुज़ारिश की.

हरिद्वार पहुंचकर भी सैम एक पर-कटे पंछी की तरह फड़फड़ाता रहा. अपना सिर मुंडवाने में सैम ने आनाकानी की तो चाचा ने उसकी हौसला-अफ़ज़ाई के लिए अपना सिर भी मुंडवा लिया. सैम का मन हो रहा था कि गंगा में डूबकर वह बस अपने प्राण दे दे; चाचा से उसका दुख देखा नहीं जा रहा था. उन्होंने जल्दी-जल्दी सारी रस्में निपटवा दीं और अगली सुबह ही वे भोपाल के लिए रवाना हो गए. ट्रेन में भी सैम अधमरा सा पड़ा रहा, चाचा के बार-बार आग्रह करने के बाद उसने बस थोड़ी सी कौफ़ी पी ली.

‘भैय्या-भाभी की बस यही निशानी बची है हमारे पास; इसे हमें हर हालत में ख़ुश रखना है.’ चाचा की आज्ञानुसार बेचारी चाची दिन रात सैम के आगे-पीछे घूम रहीं थीं किंतु सैम था कि मुस्कुरा के भी राज़ी नहीं था. मुश्किल यह थी कि सैम की हिन्दी कमज़ोर थी और चाचा-चाची की अंग्रेज़ी. सैम की अंग्रेज़ी अनंत और उसकी पत्नी मीरा के भी पल्ले नहीं पड़ रही थी; चाचा-चाची को अपने ही बेटा-बहु की शिक्षा पर संदेह होने लगा था, ‘इतना पढ़-लिख के भी तुम दोनों ने बस भाड़ ही झोंकी.’ घर में सब हैरान और परेशान थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें.

‘तुमने अभी तक शादी क्यों नहीं की? अब तक तो तुम्हारे बाल-बच्चे हो जाने चाहिए थे.’ मौका पाते ही चाची ने सैम से पूछा. पारा उसे जता चुकी थी कि दुनिया की कोई भी लड़की सैम के साथ सुखी नहीं रह सकती थी, वैसे भी अमेरिका में 35-40 वर्ष से पहले विवाह के बारे में कोई नहीं सोचता.

‘ब्याह को राज़ी हो तो हम तुम्हारे लिए लड़की देखें.’ चाची ने पूछा तो सैम को लगा कि उन्हें कोई और काम-धन्धा नहीं था क्या? उसे अनमना देख चाचा ने इशारे से चाची को चुप तो करवा दिया किंतु मन ही मन वह तय कर चुकी थी कि सैम की शादी तो वह करवा के ही दम लेगी; जेठ-जेठानी की आत्माओं को शांति पहुंचाने का मानो उन्हें ठेका मिल गया था.

एक पूरा हफ़्ता सैम अपने कमरे में लेटा छत और दीवारें ताकता रहा. चाचा-चाची, अनंत और मीरा सब के सब सैम की टहल के लिए एक टांग पर खड़े थे किंतु उसे लग रहा था कि वे सब उसकी निजी ज़िन्दगी में हस्तक्षेप कर रहे थे. उसे भूख नहीं होती तो भी उसकी थाली में चाची रोटियां धरे चली जातीं, ‘खाओ-खाओ’ का ऐसा शोर मचा रहता जैसे उनके जीवन का एकमात्र ध्येय केवल भोजन हो. कभी लस्सी तो कभी जूस लिए मीरा जब तब उसके सिर पर आ ख़ड़ी होती तो वह बिफ़र उठता किंतु सैम यह भी जानता था कि अमेरिका में उसका ऐसा बर्ताव कोई एक दिन भी नहीं बर्दाश्त करता.

मीरा सैम को अच्छी लगती थी; उसकी अंग्रेज़ी भी ठीक-ठाक ही थी. वह चाचा-चाची की सब बातें समझ जाता था किंतु हिंदी में जवाब देना उसके लिए कठिन था. हंसी हंसी में मीरा उसकी हिन्दी सुधारने लगी तो सैम भी उसका उच्चारण ठीक करने लगा. धीरे-धीरे न जाने कब वह परिवारजनों से खुलने लगा, विशेषतः मीरा और उसके चार-वर्षीय पुत्र शशांक से, जिसके साथ वह घंटो खेलता रहता या फिर उसे लेकर वह लम्बी सैर को निकल जाता; शंशाक के अटपटे प्रश्न उसका घंटों मनोरंजन करते.

इसी बीच शहडोल में चाची की भतीजी पुष्पा का विवाह तय हो गया; वे सभी निमंत्रित थे. अनंत-मीरा और शशांक शहडोल के लिए दो दिन पहले ही निकल चुके थे. चाचा-चाची सैम को अकेला छोड़कर जाने को तैय्यार न थे. बिना शशांक के सैम का भी मन नहीं लग रहा था. मैनहैट्टन में मां सैम को ज़बर्दस्ती हिन्दी फ़िल्में दिखाने ले जाया करती थीं; जिनमें विवाहों के अवसर पर मचने वाले धमाल से वह अच्छी तरह से वाकिफ़ था. उसका मन भी गांव की शादी देखने का हो आया; चाचा-चाची की तो बांछें ही खिल गईं.

रेलगाड़ी से यात्रा करने की बजाय सैम ने कार से जाने की सोची ताकि वह जब चाहे वहां से खिसक कर भोपाल वापिस आ सके. भोपाल से शहडोल का सफ़र क़रीब दस घंटों का था और रास्ते के लिए चाची पूरी रसोई साथ में ले जाना चाहती थीं ताकि रास्ते में सैम को किसी चीज़ की कमी महसूस न हो.

‘तुम्हारी चाची भी न…’ कहते हुए चाचा ख़ुशी-ख़ुशी सामान कार में रख रहे थे. पानी से भरी सुराही को किसी तरह डिक्की में टिकाते वक्त ड्राइवर और चाची के बीच तू-तू मैं-मैं हो रही थी. चाची की सनक और ऐसी ही छोटी-छोटी हठें सैम को अब अच्छी लगने लगी थीं.

शहडोल पहुंचकर सैम का मन कुछ शांत हुआ. वही सब जो उसने मां के बनाए चित्रों में देखा था – पनघट पर पानी भरती हुई रंग-बिरंगे कपड़े पहने औरतें, झूले पर झूलती नटखट बालिकाएं, नहर में नहाते नंग-धड़ंग बच्चे और सजे-धजे मर्द, जो हाथ हिलाए बिना आराम से पड़े मस्ती कर रहे थे और फिर भी उनकी ख़ूब ख़ातिर हो रही थी. सैम मुस्कराया; बच्चु अमेरिका में होते तो नानी याद आ जाती; काम भी सम्भालते और डांट भी खाते.

सुबह पक्षियों के शोर से सैम की नींद खुली तो वह अंगड़ाई लेता हुआ उठ बैठा और उसके उठते ही पूरी हवेली में काम-धन्धा शुरु हो गया. पूरा परिवार उसके ब्रश करने का ही इंतज़ार कर रहा था; फटाफट चाय नाश्ता लगा दिया गया. शुक्र था कि उसके लिए चीनी और दूध अलग से रखे गए थे. खाने-पीने से बचने के लिए वह हवेली से बाहर निकल आया. सामने एक ख़स्ता हाल छ्प्पर के नीचे नन्हे-मुन्ने बच्चे पहाड़े रट रहे थे और उनकी अध्यापिका थी एक सत्तरह-अट्ठारह बरस की युवति, जो सैम को देखकर झटपट बाहर आ गई.

‘हाउ वाज़ यौर टी, सर?’ उसने पूछा. ओह तो सुबह की चाय का इंतज़ाम इस समझदार लड़की ने किया था. सैम को अच्छा लगा कि वह किसी से अंग्रेज़ी में बात कर सकता था.

‘नो थैंक्स, में गूमने को निकला. शेदोल में कुच देकने का है?’ सैम ने अपनी टूटी-फूटी हिन्दी में उससे पूछा. अपनी हंसी दबाते हुए लड़की ने अपना परिचय दिया था.

‘आस पास तो कुछ देखने को नहीं है पर कार से आप आसानी से अमरकंटक या बैकुंठपुर जा सकते हैं, नर्मदाजी के दर्शन भी हो जाएंगे.’

‘नरमादा कौन हे?’

‘नर्मदा एक नदी का नाम है. उनके दर्शन मात्र से आपके सब दुखों का निवारण हो जाएगा; शायद आप इन सब बातों में बिलीव नहीं करते होंगे. आप बांधवगढ़ नैशनल पार्क जा सकते हैं.’

‘दिकाने को तुम मैरे सात चालोगी?’

‘सौरी, मैं आपके साथ कहीं नहीं जा सकती,’ कहते हुए सुप्रिया वापिस अपने छात्र-छात्राओं के पास लौट गई. ऐसा सैम ने क्या कह दिया था कि उसे बुरा लग गया?

शाम को बारात आने से पहले सुप्रिया फिर नज़र आई तो सैम उसके पास चला आया. शादी की तड़क-भड़क में एक वही थी जो सफ़ेद साड़ी पहने थी, किंतु फिर भी वह बहुत सुन्दर लग रही थी. घरातियों को हाथ जोड़े खड़ा देख सैम ने भी हाथ जोड़ दिए.

‘आपको हाथ जोड़ने की ज़रूरत नहीं है. यू आर नौट ए घराती.’ सुप्रिया सैम को घरातियों और बारातियों के विषय में बताने लगी तो सैम ने शुक्र मनाया कि वह उससे बात तो कर रही थी.

‘बट दैट्स नौट फ़ेयर.’ सैम ने कहा.

‘नथिंग इज़ फ़ेयर इन दिस वर्ड.’ सुप्रिया कुछ अशांत होते हुए बोली. सैम ने सोचा कि वह बड़ी अजीब लड़की थी, ‘वेरी अनप्रैडिक्टेबल’.

तभी बारात आ गई; बारातियों के नख़रे ही नहीं मिल रहे थे. लोग तीन झुंडों में बंट गए थे; बाराती, घराती और तमाशाई, जिनमें भिखारी बच्चों की तादाद काफ़ी बड़ी थी. लम्बी चौड़ी उबाऊ रस्मों के बाद दूल्हा-दुल्हन ने एक दूसरे को वर-मालाएं पहनाईं तो भीड़ में कुछ गर्मी आई. दूल्हा के दोस्तों ने उसे गोदी में उठा लिया तो उसके गले में वरमाला पहनाने के लिए छुटकी पुष्पा ने अपने हाथ ऊंचे किए किंतु वह दूल्हे के कन्धे तक भी नहीं पहुंची. उसकी सहेलियां कहीं से एक स्टूल उठा लाईं, जिसपर चढ़कर पुष्पा ने वर के गले में माला पहनाई.

सैम को लगा कि घरातियों के लिए कन्या के विवाह की रस्में छोटी छोटी पहाड़ियां थीं जिन्हें पार करते हुए वे लम्बी लम्बी सांसे भर रहे थे. किसी तरह बाराती जीम कर उठे तो घरातियों ने भगवान का लाख-लाख शुक्र मनाया. अब मेहमानों की बारी थी, जिनमें चाची का परिवार और सैम भी शामिल थे. वे अभी जीमने बैठे ही थे कि दूल्हा के मित्रों ने फ़ब्तियां कसनी शुरु कर दीं. सैम को कुछ समझ नहीं आ रहा था.

सैम के दोने में कढ़ी परोसी ही गई थी कि अचानक एक चप्पल उसकी पत्तल में आ गिरी, कढ़ी के छींटे उछल कर सैम की अचकन और पाजामें पर आ गिरे तो पुष्पा के पिता और भाई हाथ जोड़ते हुए सैम से माफ़ी मांगने लगे.

‘यार, तेरी ससुराल में पकौड़ियों की जगह कढ़ी में क्या चप्पलें परोसी जाती हैं.’ दुल्हा के मित्र भोंडे तरीक़े से हंस रहे थे.

‘डज़्ंट मैटर, कोई बात नई.’ तमतमाया हुए सैम को मीरा चुप रहने का संकेत दे रही थी.

‘अबे चाट ली हो तो हमारी चप्पल तो वापिस कर दे.’ दुल्हा के मित्र अब सैम से सीधे मुख़ातिब थे. सैम इतना समझ गया कि उसकी बेइज़्ज़ती की जा रही थी किंतु उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. दुल्हन के पिता, भाई और अन्य घराती हाथ जोड़े हुए बीच-बचाव करने में लगे थे.

तभी एक मरगिल्ला सा फटेहाल बच्चा भीड़ में से निकलकर सैम की ओर आया और कढ़ी से सनी चप्पल उठाकर चाटने लगा. चप्पल चाटकर उसने बारातियों की ओर फेंक दी और फिर वह सैम की पत्तल में रखे खीर से भरे दोने को उठाकर भागा. बहुत से भिखारी बच्चे उसपर टूट पड़े. उसकी फटी कमीज़ और बदन पर खीर फैल गई थी, जिसे वह जल्दी जल्दी चाटने में लगा था. मधु-मक्खियों से अन्य भिखारी बच्चे भी उसकी कमीज़ और बदन पर लगी खीर चाट रहे थे.

चप्पलें, जूते और छड़ियां घुमाते घराती उद्दंड भिखारियों को खदेड़ने में लगे थे. तभी एक फटेहाल औरत भिखारियों से घिरे बच्चे की कमीज़ उतार कर उसे पीटने लगी. बच्चे पर पिटने का कोई असर नहीं हुआ; अपनी ढीठ आंखों में आशा की एक ज्योति लिए वह अब भी बारातियों की ही ओर देख रहा था कि उनमें से फिर कोई जूता या चप्पल फेंकें तो शायद आज उसका पेट भर जाए.

मन ही मन सैम परेशान था कि तथाकथित प्रगतिशील भारत के बच्चे इतने भूखे कैसे रह गए थे? अमेरिका में अपनी मां के साथ जो भारतीय सीरियल्स वह देखता था; उनमें तो बच्चों की कुछ और ही तस्वीर पेश की गई थी.

सैम ने खड़े होकर अपनी पत्तल उठाकर उस बच्चे को देनी चाही ताकि वह औरत उसे पीटना बंद कर दे. ढेरों बच्चे लपकते हुए आए और पत्तल पर टूट पड़े. सैम को उबकाई आने लगी; चाचा सैम को घसीटते हुए घर के अन्दर ले गए. रात भर सैम उस घटना को लेकर परेशान रहा. अल्ल-सुबह बीन की आवाज़ सुनकर वह खिड़की से झांकने लगा. विदा हो रही थी. औरतें ज़ोर-ज़ोर से रो-गा रही थीं; सैम को यकायक पारा याद आई, जो इस वक्त शराब में धुत्त शायद किसी के साथ सोई पड़ी होगी.

सैम की बची-खुची रात करवटें बदलते निकली; चाहे उसे पीट ही क्यों न रही थी, उस भिखारी बच्चे के पास उसकी मां तो थी. सैम के पास सब कुछ होते हुए भी कुछ न था. उसके मां-बाप ने उसे क्या नहीं दिया; स्वस्थ शरीर, शिक्षा और धन किंतु स्वयं उसने क्या हासिल किया? मां-पिता के समझाने बुझाने के बावजूद उसका दिमाग़ न तो व्यवसाय में लगा और न ही वह उच्च-शिक्षा हासिल कर सका. फिर भी उनकी केवल एक ही इच्छा थी कि वे अपने पोता-पोती की शक्ल देखकर ही मरें. जिस शाम को उनकी कार-दुर्घटना में मृत्यु हुई, वे सैम के लिए ही एक लड़की देखने कैलिफ़ोर्निया जा रहे थे. ऐन वक्त पर सैम ने उनके साथ जाने से इंकार कर दिया था.

‘समीर बेटा, यौर डैड हैज़ हाइ ब्लड-प्रेशर. ही शुड नौट ड्राइव.’ मां ने कहा भी था किंतु उस समय सैम को यही लगा था कि उसे साथ ले जाने के लिए मां उसे ब्लैकमेल कर रही थीं. उनके साथ जाता तो शायद वो दुर्घटना न होती अथवा वे तीनों ही मारे जाते.

‘समीर बेटा, तुझे सुप्रिया कैसी लगी?’ सुबह-सुबह चाची पास आ बैठीं. अब तक वह सैम से कई नवयुवतियों के बारे में पूछ चुकी थीं, जो विवाह के घर में चहकती हुई घूमती रहती थीं.

‘सूपीरिया अबी बच्ची है.’ अपने हिन्दी बोलने की तारीफ़े सुन-सुनकर सैम की हिम्मत बढ़ गई थी और वह अब हिन्दी बोलने से घबरा नहीं रहा था.

‘बच्ची? इस बरस सुप्रिया पच्चीस बरस की हो जाएगी. सुन्दर है, पढ़ी-लिखी है, घर का सारा काम-काज जानती है. बाल-विधवा है तो क्या हुआ? तुम्हारे वहां तो इसे कोई बुरा नहीं मानता, हैं न?’

‘वो बात नईं, में थर्टी का हूं, चाची जी.’

‘तो क्या हुआ? वैसे भी सुप्रिया से कोई और तो ब्याह रचाने से रहा. मुझे तो लगता है कि भगवान ने तुम्हें यहां उसी के लिए ही भेजा है.’

‘पर वो मुजे पसन्द नई करती.’

‘अरे, वो तो तुमसे कैसी मीठी-मीठी बातें करती रहती है, हमने क्या देखा नहीं?’ आंखें नचाती हुई चाची उठ गईं तो सैम को लगा कि बिना सुप्रिया की पसन्द जाने कहीं चाची उस बेचारी पर यह विवाह थोप ही न दें. उसे सुप्रिया पसंद थी किंतु अमेरिका जाने के लिए शायद वह तैय्यार न हो और तैय्यार हो भी जाए तो क्या वह वहां के समाज में खप पाएगी. उसे पारा की याद आई, शायद वह सुप्रिया की मदद करे. नहीं नहीं, पारा को सुप्रिया से दूर ही रखना होगा. कैसी बद्तमीज़ी से बात करती है, विशेषतः भारतीयों के बारे में उसकी भावनाएं कठोर हैं. शायद सुप्रिया को बच्चे पसन्द न हों, जो मां-बाप की मृत्यु के बाद अचानक सैम के लिए बहुत आवश्यक हो गए थे. कितने ही सारे प्रश्न थे जो सैम के दिमाग़ को परेशान किए थे किंतु बार-बार जो उसके मन में घूम रहे थे, वे थे छीना-छपटी में लगे भूख से व्याकुल भिखारी बच्चे, विशेषतः वह बच्चा जिसने कढ़ी से लिपटी चप्पल तक को चाट डाला था.

सारा दिन खेत में बैठे-बैठे सैम ने आख़िर तय कर ही लिया कि वह गांव के सभी भिखारी बच्चों की परवरिश करेगा. भोजन के लिए ही छीना-छपटी करते रहे तो जीवन में वे और क्या हासिल कर पाएंगे? यकायक उसे लगा कि जैसे उसे जीवन का उद्देश्य मिल गया हो; एक बड़ा बोझ उसके दिमाग़ से उतर गया था. उसे लगा कि उसके मां और पिता उसके इस संकल्प से ख़ुश थे. उसके पिता कहा करते थे कि मुहिम चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, एक सिरे से बस जुटने भर की देर है, कहीं न कहीं तो उसका दूसरा सिरा मिल ही जाएगा. एक पराए देश में जाकर उसके मां-बाप ने जब दो सुपर-स्टोर्स खड़े कर लिए तो क्या वह कुछ बच्चों की परवरिश भी नहीं कर पाएगा? उसकी नसों में भी तो उन्हीं का ख़ून बह रहा था. सामने से सुप्रिया को आते देख वह मुस्कुराने लगा.

‘विल यू मैरी मी, सूपरिया? मुझसे शादी करोगी? बेफ़िक्री के अंदाज़ में सुप्रिया से पूछा जो मुंह फाड़े उसे निहार रही थी. भारतीय सीरियल्स के ये संवाद सैम ने कई बार सुन रखे थे.

‘सूपरिया, बौत सोच के मुजे बताना बिकौज़ मैं उन सब पुअर बच्चा लोग को एडौप्ट करना चाता हूं.’ बिना किसी लाग-लपेट के सैम ने अपने मन की बात सुप्रिया को बता दी क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि चाहे सुप्रिया विवाह से इंकार कर दे; इस मुहिम में उसका साथ अवश्य देगी.

 

- दिव्या माथुर

दिव्या माथुर 1984 में भारतीय उच्चायोग से जुड़ीं, 1992-2012 के बीच नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी रहीं और आजकल भारतीय उच्चायोग के प्रेस और सूचना विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं। रौयल सोसाइटी की फ़ेलो, दिव्या वातायन कविता संस्था की संस्थापक और आशा फ़ाउंडेशन की संस्थापक सदस्य हैं।
कहानी संग्रह - आक्रोश (पद्मानंद साहित्य सम्मान, हिन्दी बुक सैंटर, दिल्ली), पंगा और अन्य कहानियां (मेधा बुक्स, दिल्ली), 2050 और अन्य कहानियां (डायमंड पौकेट बुक्स, दिल्ली) और हिन्दी@स्वर्ग.इन (सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली)।
अँग्रेज़ी में कहानी संग्रह (संपादन) – औडिस्सी: विदेश में बसी भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (स्टार पब्लिशर्स), एवं आशा: भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (इंडियन बुकशैल्फ़, लन्दन)।
कविता संग्रह - अंतःसलिला, रेत का लिखा, ख़्याल तेरा, चंदन पानी, 11 सितम्बर, और झूठ, झूठ और झूठ (राष्ट्रकवि मैथलीशरणगुप्त सम्मान)।
अनुवाद - मंत्रा लिंगुआ के लिए बच्चों की छै पुस्तकों का हिंन्दी में अनुवाद : औगसटस और उसकी मुस्कुराहट; बुकटाइम, दीपक की दीवाली; चाँद को लेकर संग सैर को मैं निकला; चीते से मुकाबला और सुनो भई सुनो। नैशनल फ़िल्म थियेटर के लिये सत्यजित रे-फ़िल्म-रैट्रो के अनुवाद के अतिरिक्त बी बी सी द्वारा निर्मित फ़िल्म, कैंसर, का हिंदी रूपांतर। इनकी रचनाओं का भी विभिन्न भाषाओं में अनुवाद।
नाटक : Tête-à-tête और ठुल्ला किलब का सफल मंचन, टेलि-फ़िल्म : सांप सीढी (दूरदर्शन)।
सम्मान/पुरस्कार : भारत सम्मान, डॉ हरिवंश राय बच्चन लेखन सम्मान, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त प्रवासी भारतीय पुरस्कार, पदमानंद साहित्य सम्मान, प्रवासी हिन्दी साहित्य सम्मान, आर्ट्स काउंसिल औफ़ इंगलैंड का आर्टस एचीवर पुरस्कार, चिन्मौय मिशन का प्रेरणात्मक व्यक्ति सम्मान, इंटरनैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ पोइटरी द्वारा पुरस्कृत कविता, बौनी बूंद ‘Poems for the Waiting Room’ परियोजना में सम्मलित, ‘दिव्या माथुर की साहित्यिक उपलब्धियाँ’ नामक स्नातकोत्तर शोध निबन्ध, ‘इक्कीसवीं सदी की प्रेणात्मक महिलाएं’, ‘ऐशियंस हू ज़ हू’ और विकिपीडिया की सूचियों में सम्मलित।
संप्रति : भारतीय उच्चायोग, लंदन, में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी।

2 thoughts on “बाराती, घराती और सैम

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