अवधी कविता – बरदेखी मा जूता घिसि डायन

बिटिया ब्याहै का सुख पायन,
बरदेखी म जूता घिसि डायन।

भगवान बहुत दिन तरसाइन,
तौ मलकिन बिटिया का जाइन,
माई कै मन तौ मलिन भवा,
पर आय पड़ोसी समझाइन;
न मन का तनिक हतास करौ,
नाचौ-गावो उल्लास करौ,
गुड़ कै भेली बांटौ गोइयाँ,
तोहरे घर लछिमी हैं आइन।

तौ मन तनिका भै पोढ़ भवा,
सबका बोलाय सोहर गायन।
बरदेखी म जूता ——–

खुसियाली मा बरहा कइके,
हम लछिमी नाव धराय दिहन,
जब पढ़ै-लिखै कै उमिरि भई,
एडमीसन जाय कराय दिहन;
ऊ सब काह्यो मा तेज रही,
इंटर मा यूपी टाप किहिस,
जौ डिगरी एम्मे कै लाई,
जानौ हम गांव में टाप किहन।

मुल खुसियाली काफुर होइगै,
जौ बर द्याखै का हम धायन।
बरदेखी म जूता ——–

सतुआ-पिसान लै के निकरेन,
पहुंचेन यक दिन सुकुलाही मा,
सुकुलै सतकार किहिन पुरहर,
मुल मिली न सक्कर चाही मा;
लरिका कै बड़ा बखान किहिन,
लै आए गाँव गवाही मा,
फिर पता लाग ऊ व्यस्त अहै,
अपनेन घर की हरवाही मा।

डिगरी बीए कै फर्स्ट किलास,
उनकै सगरिव फर्जी पायन।
बरदेखी म जूता ——-

पांड़ेपुर कै घर सही लाग,
बर रहा मुला तनिका नाटा,
जौ ठीकठाक वै बतलाते,
तौ रहा नहीं तनिकौ घाटा;
मुल सात पुस्त पीछे कै वै,
पहिले तौ बतलाइन गाथा,
फिर तीन लाख नगदी के संग,
वै माँगि लिहिन मोटर टाटा।

पांड़े का हम परनाम किहन,
औ सइकिल घर का रपटायन।
बरदेखी म जूता ——–

मिलि गए यक जने दूबे जी,
खुद उनके रहीं सात बिटिया,
वहमां से पाँच का ब्याहि चुके,
न छूट बिचार तबौ घटिया;
वै सातौ बिटिया कै कर्जा,
हमहिन से भाटा चहत रहे,
जौ उनसे हम संबंध करित,
न बचत घरे लोटा-टठिया।

दूबे न टस से मस्स भए,
हम केतनौ उनका समझायन।
बरदेखी म जूता ——

दूबे से चार गुना चौबे,
चौबे से आगे रहे मिसिर,
लरिका का धरे तराजू पै,
वै भाव लगावैं घिसिर-घिसिर;
समधी पावै कै आस रही,
मुल मिले हियाँ सब सौदागर,
लंबी दहेज कै लिस्ट देखि,
हम घर कै रिस्ता गयन बिसर।

मोटर-गहना के चक्कर मा,
हम दौरत-दौरत भरि पायन।

 

ओमप्रकाश तिवारी

संक्षिप्त परिचयः

अयोध्या के एक गांव बसावां में जन्मे ओमप्रकाश तिवारी भारत के सर्वाधिक पढ़े जानेवाले समाचार पत्र दैनिक जागरण के मुंबई ब्यूरो प्रमुख हैं। नवगीत, कुंडलिया छंद एवं हिंदी ग़ज़लों के अलावा अवधी व्यंग्य काव्य में भी हाथ आजमाते रहते हैं।

 

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