फेसबुक…. तौबा !!!

रावी ने झांक कर निखिल के कमरे में देखा।

निखिल कंप्‍यूटर पर आंखें गड़ाए हैं। उन्‍हें पता ही नहीं चला कि कोई दरवाज़े पर आ कर लौट गया है।  वहां से पलटकर रावी बड़े बेटे के कमरे की तरफ़ बढ़ गई। वह अपने लैपटॉप पर जुटा है। रावी ने अपने दूसरे बेटे के कमरे की ओर रुख़ किया तो वह अभी लैपटॉप का स्विच ऑन करने की तैयारी कर रहा था। सोचा – चलो, कम से कम एक बन्दे से तो बात की जा सकती है।

रावी उसके पास गई और बोली, ‘बेटा आज लैपटॉप पर क्या काम होने वाला है?’ कुछ ख़ास नहीं मम्‍मी। कोई काम है तो बोलो।‘

रावी ने उलाहने भरे स्‍वर में कहा, ‘बेटे, तुम सब लोग अपने-अपने में व्‍यस्‍त हो। तुम्‍हारी मम्‍मी भी तो इन्सान है। कभी कभी बोर भी हो जाती है। मैं क्‍या दीवारों से बात करूं?‘

उसने आश्‍चर्यभरे स्‍वर में कहा, ‘अग़र आप सारा समय किचन में ही बिताना चाहती हो तो हम क्‍या करें?’ रावी ने कहा, ‘तो क्‍या करूं, तुम ही बताओ। कंप्‍यूटर पर काम करना जानती नहीं। तुम लोग काम करते हो, टपर-टपर उंगलियां चलाते हो, मैं देखती रहती हूं। कभी ऐसा नहीं लगता कि अपनी मम्‍मी को भी कुछ सिखा दें ताकि वह अपना काम ख़ुद कर सके?’

 

इतने में निखिल अपने कमरे से निकलकर आये और बोले, रावी, यदि सब लोग घर में कंप्‍यूटर सीख जायेंगे तो घर की शान्ति भंग हो जायेगी। घर में शान्ति बनाये रखने के के लिये किसी एक को कंप्‍यूटर न आना ज़रूरी है और वह तुम हो जिसे कंप्‍यूटर नहीं आ‍ता, अत: घर शांत है। तुम भी सीख जाओगी तो घर के काम कौन करेगा और खाना कौन बनायेगा? ‘

छोटे बेटे ने एक नज़र अपने पापा को देखा और फिर वह मम्‍मी से बोला, ‘मैं आपको कंप्‍यूटर पर टाइप करना और कुछ कमांड सिखा दूंगा फिर आप बोर नहीं होओगी। आज का दिन मैं ज़रा अपना काम कर लूं।‘ रावी ने कहा, ‘ठीक है। कुछ दिन और सही।‘ निखिल ने बेटे को देखा पर कहा कुछ नहीं और वापिस अपने कमरे में चले गये।

 

इतने में बड़ा बेटा अपने कमरे से निकलकर आया और बोला, कंप्‍यूटर सीखना बहुत आसान है’ और उसने उसी समय कंप्‍यूटर की स्‍क्रीन पर लिखे कमांड खोलकर दिखा दिये। उसने कई साइट्स भी बता दीं जहां जाकर दुनिया भर की जानकारी ली जा सकती थी। गूगल सर्च की साइट से कुछ भी खोजा जा सकता है। रावी हैरान रह गई।

 

रावी ने अपने दोनों बच्‍चों का शुक्रिया अदा किया और उनको डिनर के लिये डा‍इनिंग टेबल पर आने के लिये कह दिया। थोड़ी ही देर में सब हाजि़र थे और सबने मिलकर खाना खाया और निखिल सहित सब गुडनाइट कहकर फिर अपने-अपने कमरों में चले गये। रावी ने एक नज़र कंप्‍यूटर पर डाली और कुछ सोचकर किचन में चली गई1

 

रावी डाइनिंग टेबल को साफ करने में लग गई। उसे भी नींद आ रही थी। सुबह सब‍को ऑफिस और छोटे बेटे को कॉलेज जाना था। खाली कमरा काट खाने को दौड़ रहा था। उसने ज़ल्‍दी से टेबल साफ की और सुबह के पांच बजे का अलार्म लगाकर वह भी सोने के लिये चल दी। बिस्‍तर पर लेटते ही थकावट से उसे जल्‍दी ही नींद आ गई।

 

सुबह अलार्म की आवाज़ के साथ ही रावी जाग गई। उठकर एक लंबी अंगड़ाई लेकर बदन को ढीला छोड़ा और फिर योगासन करने के लिये चटाई बिछा ली। यह उसका रोज़ का नियम है। सुबह के साढ़े पांच बजे से छ: बजे तक वह योगासन व एक चाय अकेले में पीना। यह उसका अपना और सिर्फ़ अपने लिये समय है। इसमें किसी की नो भागीदारी।

 

छ: बजे उठी और फिर उसने सबके लिये चाय बनाई और सबको जाकर जगाया। यह भी उसीका काम है, नहीं तो सभी अपनी मर्जी़ के मालिक हैं। बड़े बेटे की ग़हरी नींद का तो यह आलम है कि उसने अपने लैपटॉप में अलार्म के बजाय आइटम गानों की दो-दो लाईनें रिकॉर्ड कर रखी हैं कि शायद इन लाउड गानों से उसकी नींद खुल जाये पर व्‍यर्थ।

 

रावी ने घड़ी देखी। सुबह के सात बजकर पचास मिनट। घर के और सदस्‍य लगभग तैयार हैं। रावी बड़े बेटे के कमरे में गई। उसने बेटे के हाथों में अपना हाथ फिराया और बोली, ‘बेटे, उठ जाओ। मुझे देर हो जायेगी।‘ उसने अधखुली आंखों रावी को देखा और कहा, ‘पांच मिनट बस।‘ ये पांच मिनट भी ख़ासे लंबे थे।

 

सबने हड़बड़ी में नाश्‍ता किया और धड़ाधड़ नीचे उतर गये। छोटा बेटा बाय कहकर आगे आगे भाग लिया। उसकी बस का समय हो गया था। बड़ा बेटा, निखिल और रावी कार की ओर बढ़े। कार में बैठकर रावी ने ख़ुद को संतुलित किया और चैन की सांस ली और बोली, ‘आज मुझे ऑफिस की बस मिल जायेगी। फिर निखिल से बोली,

 

‘निखिल, तुम कंप्‍यूटर में इतने व्‍यस्‍त रहते हो, मैं सोच रही हूं कि मैं भी कंप्‍यूटर पर हिंदी में टाईप करना सीख जाऊं तो कैसा रहेगा? निखिल ने हंसते हुए कहा, ‘वैसे तुम्‍हारे वश का है नहीं कंप्‍यूटर पर काम करना लेकिन यदि सीख लो तो कम से कम मुझे तुम्‍हारी बातें सुनने से निजात मिल जायेगी।‘

 

रावी की शनिवार को छुट्टी रहती है। सो उसने अपने बेटे से पूछ-पूछकर याहू मैसेन्‍जर खोला। वहां से अपने मित्रों को दोस्‍ती का संदेश भेजा। उसने पाया कि पन्‍द्रह दिनों में उसकी फ्रैण्‍डलिस्‍ट में क़रीब दस लोग जुड़ गये। वे मैसेन्‍जर पर बात करने के लिये ऑफ लाईन संदेश छोड़ देते और साथ ही समय भी। रावी को जब समय मिलता वह उनसे बात कर लेती।

 

निखिल ने महसूस किया कि रावी अब कंप्‍यूटर पर ज्‍य़ादा समय बिताने लगी है। निखिल को यह परेशानी होने लगी कि कंप्‍यूटर पर रावी ने अधिकार जमाना शुरू कर दिया है। यह उनके लिये परेशानी का सबब बनता जा रहा था। निखिल ही क्‍या, दुनियां का कोई भी पति नहीं चाहता होगा कि उसकी पत्‍नी किसी भी काम में उससे आगे जाये।

 

रावी जब भी निखिल से कंप्‍यूटर पर काम करने के लिये कोई मदद मांगती तो वे समय की कमी का बहाना करके टाल जाते। उनके पास यही तो एक औजार था जिसके बल पर वे रावी को अटका सकते थे और रावी कुढ़कर रह जाती। एक दिन रावी शाम को ऑफिस से आकर याहू पर अमेरिका में बनी अपनी सहेली से बात कर रही थी कि रावी के बेटे ने कहा,

 

‘क्‍या मम्‍मी, आप याहू पर बातें करती हैं, यह तो पुराना हो गया। आजकल फेसबुक खूब चल रहा है। वहां अकाउंट खोल लो। वहां आप सर्च में जाकर अपने दोस्‍त खोज सकती हो और जब चाहो उनसे बात कर सकती हो।‘ रावी ने कहा, ‘बेटे, तुम बता दो कैसे खोला जाता है अकाउंट तो मैं वहां काम करने की कोशिश करूंगी।‘

 

बेटे ने रावी को कंप्‍यूटर कुर्सी से उठाया और ख़ुद बैठ गया। उसने कंप्‍यूटर के की- बोर्ड पर अपनी अभ्‍यस्‍त उंगलियों को सैट किया और की बोर्ड पर उसके हाथ मशीन की तरह चलने लगे। वह फेसबुक की साइट पर रावी का फॉर्म भरने लगा और क़रीब पन्‍द्रह मिनट बाद रावी का फेसबुक पर अकाउंट खोला जा चुका था।

 

बेटे ने प्रोफाइल में रावी की सुन्‍दर  सी फोटो लगा दी थी जो किसीको भी दोस्‍ती का हाथ बढ़ाने के लिये प्रोत्‍साहित कर सकती थी। रावी ने बेटे से कहा, ‘फोटो ज़रूरी है क्‍या?’ उसने हंसकर कहा, ‘मम्‍मी, आप भी क्‍या बात करती हैं। आपसे कोई बात करे तो उसे पता तो हो कि वह किससे बात कर रहा है। दूसरे, हंसते चेहरे सबको अच्‍छे लगते हैं।‘

अब वह शाम को ऑफिस से आकर और दस मिनट आराम करके कंप्‍यूटर पर फेसबुक खोलकर बैठ जाती। उसके आगे क्‍या करना है, उसे पता नहीं था। अचानक उसके पेज़ पर एक चैट बॉक्‍स खुल गया और एक सज्‍जन ने प्रश्‍न टाईप किया, ‘क्‍या आपसे दोस्‍ती कर सकता हूं?’ रावी को यह रोमांचित लगा और साथ ही उन सज्‍जन की अनौपचारिकता पर आश्‍चर्य भी हुआ।

 

मज़ेदार बात कि उन सज्‍जन की चैट बॉक्‍स में फोटो की जगह कमल के फूल की फोटो थी और नाम था चिल आउट। रावी असमंजस में पड़ गई कि इस बंदे की फोटो नहीं है, सही नाम नहीं है। बात को आगे बढ़ाया जाये या नहीं। रावी ने बड़े सहज रूप में लिखा, ‘ देखिये, मैं आपसे परिचित नहीं हूं। आपने नाम कुछ लिखा है, फोटो कुछ लगाई है।‘

 

इस पर उन सज्‍जन ने कहा, ‘नाम और फोटो में क्‍या रखा है मैडम, बस बात करना है, करना भी नहीं, टाइप करना है।‘ रावी ने कहा, ‘फिर भी मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं किससे बात कर रही हूं। पहले आप यह ख़ुद को सही रूप में पेश कीजिये, फिर मैं सोचूंगी।‘ इस पर वे लॉग आउट कर गये और कभी रावी के चैट बॉक्‍स में प्रकट नहीं हुए।

 

रावी को फेसबुक साइट सपनों की दुनिया लग रही थी, सही फोटो नहीं, नाम भी पता नहीं सही हैं या नहीं लेकिन सब कुछ एक-दूसरे के भरोसे चल रहा था। रावी की फोटो व प्रोफाईल से लोग प्रभावित होते और दोस्‍त बनने का अनुरोध भेज देते। रावी को महसूस हुआ कि यह तो बड़ा अच्‍छा है। यहां बैठे-बिठाये ही सब लोग मिल जाते हैं।

 

वह देखती कि कुछ लोग लॉग आउट होते ही नहीं हैं। वह रात-बिरात जब भी फेसबुक पर जाती तो लोग बैठे मिलते। जब निखिल ने रावी को कंप्‍यूटर पर बहुत ज्‍य़ादा समय बिताते देखा तो उनसे रहा नहीं गया और एक दिन पूछ ही बैठे, ‘रावी, मैं देख रहा हूं कि तुम कंप्‍यूटर को बहुत ज्‍य़ादा समय देने लगी हो। घर गन्‍दा पड़ा रहता है। कोई सफाई नहीं।‘

 

रावी ने निखिल की बात को अनसुना करते हुए कहा, ‘मैं जिस साइट पर हूं, ये अजीब साइट है। कोई किसीको नहीं जानता फिर भी सब ऐसे घुल-मिलकर बात करते हैं मानो जन्‍म-जन्‍मांतर का साथ है। तुम भी अपना अकाउंट खोल लो।‘ पहले तो निखिल ने ना-नुकुर की लेकिन रावी की देखा-देखी उन्‍होंने भी फेसबुक पर अपना अकाउंट खोल ही लिया।

 

बस, यहीं से घर में वह स्थिति शुरू हो गई जिसका रावी को डर था। शुरू-शुरू में तो निखिल अपने लैपटॉप को आराम करने भी देते पर अब तो यह आलम था कि वे लैपटॉप को बिल्‍कुल भी नहीं छोड़ते थे। घर में सन्‍नाटा पसरने लगा। सब अपने अपने कमरे में कैद हो जाते और सिर्फ़ खाना खाने ही बाहर आते, वह भी हज़ार बार बुलाने पर।

 

इधर रावी भी कम नहीं थी। उसने देखा कि फेसबुक पर लोग अपनी फोटो लगाते हैं, कुछ लिखते हैं और फिर अपने दोस्‍तों के नाम से टैग कर देते हैं। फिर जो धड़ाधड़ कमेंट और लाइक क्लिक करते हैं, देखकर मज़ा आ जाता था। रावी ने सोचा कि वह भी ख़ासी पढ़ी-लिखी है और हिंदी पर तो उसका ज़बर्दस्‍त कमांड है। वह भी फेसबुक के मैसेज बोर्ड पर कुछ लिखेगी।

 

सच में रावी ने यह खेल शुरू कर दिया था और देखते-देखते उसके पास भी एक अच्‍छा सिंडीकेट तैयार हो गया था। अपनी कोटेशन के साथ अपनी फोटो भी टैग कर देती। वह इस बात का ज़रूर ध्‍यान रखती थी कि मैसेज बोर्ड पर वह ऐसी कोटेशन लिखे जिससे उसका सुशिक्षित होना ज़ाहिर हो और उसके ग्रुप के लोग इज्‍ज़त दें। फोटो टैगिंग ने तो कमाल कर दिया था।

 

अब तो रावी का यह हाल था कि अपने ऑफिस के कंप्‍यूटर में भी फेसबुक साइट की अनुमति ले ली थी। सामान्‍य तौर पर ऑफिसों में ये साइट्स बैन होती हैं ताकि कर्मचारी काम करें पर रावी के कंप्‍यूटर मैनेजर का भी फेसबुक पर अकाउंट था। सो उसने बिना किसी हील-हवाले के रावी के कंप्‍यूटर में भी इस साइट को खोलने की अनुमति दे दी।

 

अब तो रावी के लिये घर और ऑफिस दोनों फेसबुकमय हो गये थे। इधर निखिल भी इस साइट में व्‍यस्‍त हो गये थे। सुबह ऑफिस के लिये निकलते वक्‍त़ तक निखिल फेसबुक पर लगे रहते। एक दिन रावी ने पूछ ही लिया, निखिल, तुम फेसबुक पर अकेले अकेले हंसते रहते हो, ऐसा कोई क्‍या जोक मार देता है।‘

 

इस पर उनका चे‍हरा लाल हो गया तो रावी को आश्‍चर्य हुआ। रावी ने कहा, ‘तुम तो शर्मा गये। ऐसा क्‍या हुआ ?’ निखिल ने कहा, ‘अब क्‍या बताऊं, फेसबुक पर महिलाएं, लड़कियां आई लव यू, आई मिस यू लिखती हैं तो मैं कह देता हूं, ‘मेरी जो उम्र है, उसमें इस तरह के डॉयलाग न लिखा करें, पर वे लोग मानती ही नहीं।‘

 

रावी ने कहा, ‘तुमने अपने प्रोफाइल में ख़ुद को विवाहित शो किया है?’ इस पर निखिल ने कहा, ‘नहीं।‘ ‘तो यह उसका ही कमाल है मिस्‍टर निखिल’, रावी ने हंसते हुए कहा और साथ ही ख़बरदार भी किया कि ऐसे लोगों से ज्‍य़ादा नज़दीकी न दिखायें। यह नज़दीकी भारी भी पड़ सकती है। रावी निखिल की मास्‍टरनी बन गई थी।

 

अब तो यह आलम था कि रावी और निखिल ऑफिस से घर आते और अपने अपने कमरे में अपने अपने कंप्‍यूटर पर जम जाते। पहले जो छिटपुट बातें होती भी थीं वे भी बन्‍द हो गई थीं। बच्‍चे अपनी दुनियां में मस्‍त थे। बस, जब निखिल और बच्‍चों को भूख लगती तो आवाज़ आती, ‘रावी, अब तो फेसबुक को छोड़ो, घर के चेहरे भूख से सूख रहे हैं, उनके पेट का इंतज़ाम करो।‘

 

रावी को महसूस होता कि बात तो सही है। फिर भी कमेंट कर देती, ‘निखिल, सूप बोले तो बोले, चलनी बोले यह मुझे जमता नहीं है।‘

 

वह जल्‍दी से रसोईघर में जाती। एक गैस पर दाल रखती और दूसरी गैस पर सब्‍ज़ी छौंक देती। फ्रिज़ से आटा निकालती। तीसरी गैस पर तवा चढ़ाती और एकसाथ दो-दो रोटी सेंकना शुरू कर देती। इधर कुकर बजता तो दूसरी ओर सब्‍ज़ी की खुशबू यह जता देती कि उसकी भी सुध ली जाये।

 

रावी के खाना बनाने की गति को देखकर ऐसा लगता मानो उसकी ट्रेन छूटी जा रही है। वह अधीर सी बार-बार कंप्‍यूटर पर फेसबुक पर आती और देखती कि उसकी लिखी कोटेशन पर कितने क्लिक आये हैं। वह इस काल्‍पनिक दुनिया का महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा बनने की पुरज़ोर कोशिश कर रही थी। उसने अभी तक अपने दोस्‍त नहीं बनाये थे। निखिल के दोस्‍त ही उसके दोस्‍त थे।

 

अब तो यह आलम था कि वह तड़के सुबह उठती और फेसबुक पर पहुंच जाती। वहां जल्‍दी से मैसेज बोर्ड पर कोटेशन लिखती, साथ में फोटो टैग करती और पोस्‍ट कर देती और फिर हर पांच मिनट बाद फेसबुक पर लॉग ऑन करके कमेंट की संख्‍या देखती।कई लोग तो कमाल के थे। वे किसीकी मौत ख़बर भी लाइक क्लिक कर देते थे। रावी उनकी इस फूहड़ता पर खीझ जाती।

 

रावी का एक दोस्‍त है कमलेश। वह बड़ा हैरान होता कि रावी को सुबह सुबह इतना समय कैसे मिल जाता है कि वह फेसबुक पर मैसेज लिखती है और 10 मिनट बाद अपडेट करती है। ऑफिस के लिये कब तैयार होती है, कब टिफिन बनाती है। उसे पता है कि रावी बाहर का खाना पसन्‍द नहीं करती। कहां तो वह इस साइट को देखना भी पसन्‍द नहीं करती थी।

 

जब कमलेश से नहीं रहा गया तो उसने फोन किया, ‘रावी ने कहा, कमलेश, आपको मेरी याद कैसे आ गयी आज?’ कमलेश ने कहा, ‘रावी, आप ठीक तो हैं?’ रावी ने कहा, ‘मुझे क्‍या होना है? अच्‍छी-ख़ासी और हट्टी-कट्टी हूं। क्‍या हुआ? ऐसे क्‍यों पूछ रहे हैं? न दुआ, न सलाम। आजकल क्‍या नया चल रहा है?’

 

कमलेश ने कहा, ‘ मेरी छोडि़ये, आप आजकल हमेशा फेसबुक पर उपस्थित रहती हैं और हर दस मिनट बाद आप अपनी साइट को अपडेट करती हैं, घर में काम नहीं है? ऑफिस जाना बन्‍द कर दिया है क्‍या?’ रावी ने कहा, ‘ओह, तो यह बात है! भाई सुबह चाय पीने बैठती हूं तो साथ में यह काम भी कर लेती हूं। आपको क्‍यों ऐतराज़ होने लगा?’

 

दूसरे दिन रावी ने देखा कि कमलेश ने फेसबुक पर ढेर सारी फोटो भेजी है। उसमें कमलेश कहीं नहीं दिखाई दिया। रावी ने मन ही मन कहा, ‘तो य‍ह बात है। कमलेश अपने दोस्‍तों के लिये टी आर पी बटोर रहे हैं। रावी तो अपना लिखा और अपनी फोटो के साथ हाजि़र होती है, उसमें कमलेश को समस्‍या है। कमलेश जो कर रहे हैं, वह क्‍या है?

 

अब तो रावी जैसे कमलेश से प्रतिस्‍पर्धा करने लगी थी। वे एक फोटो पोस्‍ट करते तो वह दो फोटो पोस्‍ट करती। कमलेश फोन पर रावी को ख़बरदार करते, ‘देखो रावी, तुम स्‍वयं को फेसबुक पर महान क्‍यों दिखाना चाहती हो? कभी यह भी लिखो कि तुम कितनी महान ग़लतियां करती हो।‘ अब रावी ने कमलेश की बात को गंभीरता से लेना कम कर दिया था।

 

उसे पता ही नहीं चल रहा था कि वह फेसबुक की दुनियां से जुड़कर अपने दोस्‍तों से दूर होती जा रही थी। वह एक तरह से फेसबुक की आदी होती जा रही थी। एक तरह से नशेड़ी और लती भी कहा जा सकता है1  अब फेसबुक पर नित नये खेलों की रिक्‍वेस्‍ट आने लगी थी। रावी ने सोचा, ‘हम्, तो यह बात है। ज़रा इस दुनियां को भी देखा जाये।‘ उसने एक रिक्‍वेस्‍ट स्‍वीकार कर ली।

 

क्लिक करते ही उसके सामने खेलों की दुनिया थी। तरह तरह के खेल- फार्म विले, बबल गेम आदि आदि। रावी ने एक नया खेल खेलना शुरू किया तो सामने सिक्‍के आ गये और उसने उधार लिये और खेलना शुरू किया। हारने पर वहां से कमांड आया, ‘टेक मनी फ्रॉम योर क्रेडिट कार्ड।‘ क्रेडिट कार्ड देखकर भावी आशंका को भांपकर उसने खेल को बन्‍द ही कर दिया।

 

रावी का मन यह सोचकर ही कांप गया और होठों ही होठों में बुदबुदाई, ‘जुआ खेलने और खेलना सीखने का पॉलिश्‍ड तरीका। सिक्‍कों के बहाने क्रेडिट कार्ड का नंबर मांगना और खेल खेल में कंगाल बना देने का अच्‍छा तरीका है।‘ वह उस साइट पर एक बार और गई तो वहां उन खेलों को खेलनेवालों का ज़खीरा तैयार हो चुका था।

 

इससे बड़ी विडंबना और क्‍या हो सकती है कि निखिल के कंप्‍यूटर पर व्‍यस्‍त रहने पर रावी चिढ़ती थी और कुढ़ती थी और अब वही रावी कंप्‍यूटर और वहां की साइटों की अभ्‍यस्‍त हो गई थी। वहां हिंदी, अंग्रेज़ी, रोमन में हिंदी फ़र्राटे से चल रही थी। सब एक दूसरे के सपनों से खेल रहे थे। कोई किसीका नहीं था फिर भी सब सबके थे। अजीब भंवरजाल थी फेसबुक।

 

वह निखिल की ओर देखती तो उनका तो और भी बुरा हाल था। वे फेसबुक पर झुके रहते और चाय-नाश्‍ता भी फेसबुक पर बतियाते हुए करते। खाना तक वे फेसबुक पर व्‍यस्‍त रहते हुए ही खाते। रावी को लगता कहीं निखिल फेसबुक पर इश्किया तो न‍हीं रहे और रावी को पता न चल जाये, इस डर से वे लैपटॉप का पल्‍ला नहीं छोड़ते।

 

जो कमलेश और रावी हमेशा हंसी-मज़ाक की बातें करते थे, अब उनमें खटपट होने लगी थी। रावी को महसूस होने लगा कि कमलेश कहीं उसकी प्रसिद्धि से जलने तो नहीं लगे? फेसबुक पर उसे ढेर सारे कमेंट्स जो मिलते हैं। उन दिनों फेसबुक दोनों के बीच झगड़े की जड़ बन गई थी।

अब कमलेश ने भी फेसबुक की बाबत बात करना बन्‍द कर दिया था।

 

रावी और निखिल को पता ही नहीं चल पा रहा था कि उन दोनों के बीच संवादहीनता की स्थिति अपनी पराकाष्‍ठा पर थी। रावी का काम खाना बनाकर निखिल को थाली देना और रात को शुभ रात्रि कहना ही रह गया था। रात को कभी रावी की नींद खुलती तो वह निखिल को लैपटॉप पर सिर झ़ुकाये टाईप करके देखती। वह फिर अपने कमरे में चली जाती।

 

अचानक रावी ने देखा कि फेसबुक पर अश्‍लील चित्रों का तांता सा लग गया है। मज़ेदार बात कि वे अश्‍लील चित्र औरतों के ही होते थे। पुरुष शायद ख़ुद को आदम रूप में दिखाने में अपनी हेठी समझते थे। कई बार तो रावी को शक़ होने लगता कि कहीं इन फोटो के लोग पॉर्न फिल्‍म तो नहीं बना लेंगे? फेसबुक पर कोई भी किसीकी वॉल से कमेंट्स और प्रोफाइल से फोटो ले सकता है।

 

फेसबुक पर अब औरतें भी खुलकर सामने आने लगी थीं। कभी उनकी लेटे हुए फोटो, तो कभी नाभिदर्शना साड़ी। पूरा क्‍लोज़अप। फोटो के पुरुष उन फोटोज़ को देखकर सराहते और लिखते, ‘awesome, very pretty photos.’ फोटो-फोटो का खेल शुरू हो गया था। सेक्‍सी फोटो का खुला बाज़ार सामने था। इन पुरुषों को ख़राब फोटो भी awesome लगती थी।

 

रावी इन फोटो को देखकर सोचती कि क्‍या इनके पतियों को पता है कि उनकी पत्‍नी फेसबुक पर अपनी तथाकथित सुंदरता के जलवे दिखा रही है। यह सोचते ही रावी को झुरझुरी छूट जाती। फेसबुक पर ही कुछ महिलाएं अचानक ग़ायब हो जातीं। पता चलता कि उनके पति दौरे से वापिस आ गये हैं। उन्‍हें अपनी पत्नियों के फेसबुक पर होने की ख़बर नहीं है। ओह, तो यह बात है!

 

एक दिन रावी ने कहा, ‘निखिल, हम आपस में बात करना भी भूल गये हैं।‘ इस पर निखिल ने कहा, ‘इसके लिये तुम भी समान रूप से जि़म्‍मेदार हो।‘ इस पर रावी तुनक गयी और बोली, ‘मैं हमेशा तुम्‍हारे कमरे में आती हूं और तुम लैपटॉप पर झुके होते हो। तुम्‍हें तो पता भी नहीं चलता कि मैं कब आई और कब गई। नहीं तो मुझे आवाज़ नहीं देते या काम नहीं पूछते ?’

 

इस पर निखिल ने कहा, ‘तुम अपनी दुनिया में मस्‍त हो और मैं अपनी दुनिया में। मेरे वहां बहुत मित्र हैं। कई बातें करनी होती हैं, चर्चा करना होता है।‘ रावी ने कहा, ‘हां, वह तो मैं देख रही हूं। चलो, इस बात को जाने देते हैं। जिस बात पर मतभेद हो, उससे बचना ठीक है नहीं तो अपन दोनों को लड़ने में देर नहीं लगेगी’ और यह कहकर रावी वहां से खिसक ली थी।

 

अचानक रावी ने देखा कि फेसबुक पर भाषायी समूह बन गये हैं। उर्दू, गुरुमुखी और गुजराती भाषा में संदेश भेजे जाने लगे हैं। ये भाषाएं रावी पढ़ नहीं सकती सो सिर्फ़ टैग किये नामों से पता चलता था कि ये संदेश जाति विशेष के लिये हैं, पर क्‍या लिखा है, वह जान नहीं पाती, पढ़ नहीं पाती। एक बार तो कमाल हो गया। कमलेश का गुससे से भरा फोन आया,

 

रावी, आपने मेरे और मेरे मित्र के विषय में किसीसे बातें की हैं?’ रावी ने कहा, आप ठीक तो हैं? मैं क्‍यों किसीसे बातें करूंगी?’ वे दावे से बोले, ‘आपने की हैं और चैट बॉक्‍स में की गई बातों को कॉपी-पेस्‍ट करके मुझे ई-मेल किया गया है।‘ रावी ने अपना सिर पीट लिया। बोली, ‘अरे, ऐसा तो कुछ कहा नहीं कि आप तक बात पहुंचे। सहज रूप से कुछ कह दिया होगा।‘

 

कमलेश को फोन पर सॉरी कहकर रावी ने फोन काट दिया। अब उसे फेसबुक पर जाते और चैट बॉक्‍स पर कुछ लिखते डर लगने लगा था। दोस्‍ती की आड़ में उसे उसके ही दोस्‍तों के सामने नीचा दिखाया जाने की कोशिशें की जाने लगी थीं। रावी ने ऐसा कभी नहीं किया था। कितनी बातें उसके पेट में थीं। उसने कभी किसीका बुरा नहीं चाहा था।

 

इस फेसबुक के चक्‍कर में रावी का लिखना-पढ़ना छूटता जा रहा था। वह दिनभर उजबकों की तरह फेसबुक के सामने बैठी रहती। चाहे घर हो या ऑफिस, उसके लिये दोनों जगहें समान थीं। एक दिन तो हद ही हो गई। वह फेसबुक खोले बैठी थी कि अचानक चैट बॉक्‍स में एक कमसिन से चेहरे ने टाईप किया, ‘हाय! आप मुझसे दोस्‍ती करेंगी? आपकी फोटो बहुत सुंदर है। आपकी उम्र क्‍या है?’

 

रावी ने पलटवार करते हुए पूछा, ‘तुम्‍हारी कितनी उम्र है?’ उस लड़के ने टाईप किया, ‘अठारह साल।‘ रावी ने उसे लड़के को उपदेश देते हुए कहा, ‘तुम्‍हारी उम्र पढ़ने की है। फेसबुक पर टाईम पास करने की नहीं।‘ उस लड़के ने टाईप किया, ‘यहां आपका उपदेश सुनने नहीं आया। रात को ग्‍यारह बजे ऑन लाईन आईये हम सेक्‍स की बातें करेंगे।‘ यह कहकर वह लॉग आउट कर गया।

 

रावी को काटो तो ख़ून नहीं। उसकी नसों में मानो ख़ून जमकर रह गया था। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। उसकी आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा। निखिल के कमरे में जाकर देखा तो वह लैपटॉप पर झुके हुए थे। रावी फिर अपने कमरे में आयी। उसे फेसबुक पर जाते डर लग रहा था।

उसने कांपते हाथों से चैट बॉक्‍स से लॉग आउट किया और चुपचाप अपने कमरे में आ गई।

 

उस दिन के बाद वह देर रात को फेसबुक पर जाती ताकि संदेश देख सके। वहां पर वह देखती कि बड़ी ही क़मसिन उम्र के लड़के ऑन लाईन होते और बिना किसी संकोच के चैट बॉक्‍स पर आ जाते और पूछते, ‘आप अभी तक जाग रही हैं?’ रावी शराफत से उत्‍तर देती, ‘हां, कुछ काम है।‘ इस पर वे बड़ी ही निर्लज्‍ज़ता से लिखते, ‘इतनी रात को फेसबुक पर क्‍या काम हो सकता है आपको?’

 

रावी लॉग आउट कर जाती और दूसरे दिन उसको अपने मैसेज बोर्ड पर उन लड़कों के मैसेज मिलते, ‘अरे, आप तो डरकर लॉग आउट कर गईं। हम तो आपसे बात करना चाहते थे। वह समय बिल्‍कुल सही था आपसे बात करने का।‘ रावी ने झल्‍लाकर टाइप किया, ‘तुम लोगों की उम्र के तो मेरे बेटे हैं। कुछ तो शर्म करो। मैंने तुम लोगों को कोई रिक्‍वेस्‍ट नहीं भेजी थी।‘

 

इस झल्‍लाहट के उत्‍तर में उसे मैसेज बोर्ड पर स्‍माइली आईकॉन मिलते। ये क़मसिन बच्‍चे किस तरह लुक-छिपकर ओरल सेक्‍स का मज़ा लेना चाहते थे, देखकर रावी हैरान थी। उसने उन सभी लडकों को ब्‍लॉक मोड में डाल दिया। खु़द का चैट बॉक्‍स बन्‍द कर दिया। वह और कर भी क्‍या सकती थी? अब वह फेसबुक पर जाने से एक तरह से डरने लगी थी।

 

कमलेश को हैरानी हुई कि रावी अचानक क्‍यों बन्‍द हो गई फेसबुक पर आना। उन्‍होने फोन किया, ‘हैलो रावी, क्‍या हुआ? फेसबुक पर नहीं दिखाई दे रहीं?’ रावी ने कहा, ‘फेसबुक मैंने फ्रैण्‍ड्स बनाने के लिये जॉइन किया था। लेकिन वहां जो चल रहा है, उसने मुझे मानसिक रूप से बहुत परेशान किया है1 इस साइट पर लिखे या फोटो का पॉर्न रूप भी बनाया जा सकता है।‘

 

कमलेश ने कहा, ‘यह दुनियां अपने लिये नहीं है रावी। हर चीज़ के दो पहलू होते हैं। फेसबुक सच में कई अश्‍लील बातों को प्रश्रय दे रही है। सपनों का बिगड़ता रूप सामने आ रहा है। तुम फेसबुक पर आया करो पर कुछ भी लिखने बचो। तुम इसकी भयावहता से परिचित नहीं हो। अति तो किसी भी चीज़ की बुरी होती है। पर ऐसा क्‍या हुआ? मुझसे शेयर कर सकती हो।‘

 

कमलेश की इस बात पर कमलेश फोन पर रावी की सिसकियों को साफ सुन सकते थे। उन्‍होने अनुमान लगा लिया कि रावी के संवेदनशील दिल को चोट लगी होगी। अन्‍यथा वह इतनी ज़ल्‍दी रोनेवालों में से नहीं है। कमलेश ने फोन पर सिर्फ़ इतना ही कहा, ‘बस रावी, और नहीं।‘ रावी के लिये अपने दोस्‍त कमलेश के इतने ही शब्‍द काफी थे। रावी ने ‘थैंक्‍स’ कहकर फोन रख दिया।

 

 

- मधु अरोड़ा

  • कृतियां:
  • ‘बातें’- तेजेन्द्र शर्मा के साक्षात्कार- संपादक- मधु अरोड़ा, प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, सीहोर।
  • ‘एक सच यह भी’- पुरुष-विमर्श की कहानियां- संपादक- मधु अरोड़ा, प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन, नई दिल्‍ली।
  • ‘मन के कोने से’- साक्षात्‍कार संग्रह, यश प्रकाशन, नई दिल्‍ली।
  • ‘..और दिन सार्थक हुआ’- कहानी-संग्रह, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्‍ली।

  • सन् 2005 में ओहायो, अमेरिका से निकलनेवाली पत्रिका क्षितिज़ द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी सम्‍मान से सम्‍मानित।
  • ‘रिश्‍तों की भुरभुरी ज़मीन’ कहानी को उत्‍तम कहानी के तहत कमलेश्‍वर स्‍मृति कथा पुरस्‍कार—2012
  • हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, परिकथा, पाखी, हरिगंधा, कथा समय व लमही, हिमप्रस्‍थ, इंद्रप्रस्‍थ पत्रिका में कहानियां प्रकाशित।
  • जन संदेश, नवभारत टाइम्‍स व जनसत्‍ता जैसे प्रतिष्‍ठित समाचारपत्रों में समसामयिक लेख प्रकाशित।
  • आकाशवाणी से प्रसारित और रेडियो पर कई परिचर्चाओं में हिस्सेदारी। हाल ही  में विविध  भारती,  मुंबई में दो कहानियों की रिकॉर्डिंग व प्रसारण। मंचन से भी जुड़ीं।
    जन संपर्क में रूचि।
  • कथा यू के की गत अठारह वर्षों से सक्रिय कार्यकर्ता व मुंबई प्रतिनिधि।

One thought on “फेसबुक…. तौबा !!!

  1. मधु जी आप ने फेसबुक के आदी लोगों की ज़िन्दगी का सच प्रस्तुत कर दिया है । बधाई ।

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