फिलहाल जाओ…पहुँचा आओ मेरा संदेसा

गला खखारते दादा ने पोते से कहा,
जाओ चौरस्ते से बाएँ,
दूसरी गली में, बायीं ओर, चौथे घर में रहने वाली बुढ़िया से कहना,
मेरा सलाम,
कहना जब तबीयत नासाज थी, उसकी दुआओं ने खूब काम किया,
अब वो मेरी बलाएँ ले, और तंदरूस्त रहे.

तुमने तो देखा ही है….
कितना कुछ खो दिया है उस बुढ़िया ने,
आलिशान मकान….. अकेली जान…
परदेस घर ले गए संतान…

शुतुरमुर्ग के पंख सा नरम उसका दिल,
खानाबदोशों के ऊँट सा है,
प्रेम जिसपर स्वयं हक़ जमाता है,
मेरे और उसके बीच की इस आग को तुम समझते-समझते समझोगे,
फिलहाल तुम जाओ उसके पास,
कहना……
तुम्हारी पीठ पर कभी जो थे लदे…..तुम्हारी लाठी नहीं…कोई नहीं, हम हैं,
तुमने जिनके लिए सिल ली थी अपनी ज़बान, उस ज़बान पर तुम नहीं….कोई नहीं, हम हैं,
कुछ औरों से बेहतर होते हैं, और कुछ दूसरों जितना बेहतर नहीं होते,
इस पर तुम करो जी भारी, नहीं, नहीं, कभी नहीं, क्योंकि हम हैं

बहुत हो चुकी दुनियावी माथापच्ची, अचार-विचार-व्यवहार,
कि तुमने जीवन के कई मील के पत्थरों को किया है पार,
दीमक सा जोड़ा है चींटी का घरबार,
अब तुम्हारा भी हक़ है पूरी नींद, बिना इंतज़ार .
बची साँसों पर जीवन का बेतकल्लुफ इख्तियार…..

और अब तुम मेरे इस अकारण प्रेम का मत पूछो सबब,
मैं कहूँगा, कि टूटी लटकी शाख से बेहतर है खिलखिलाता हरा पत्ता.
तो उम्र की आखिरी ढलान पर यह बात समझते-समझते समझ जाओगे.
फिलहाल जाओ…
पहुँचा आओ मेरा संदेसा….

 

-डॉ अनुज कुमार


हिंदी ऑफिसर 
नागालैंड विश्वविद्यालय

 

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