फिर मिलेंगे… ब्रेक के बाद

”फिर मिलेंगे।”  सुनना बड़ा अच्छा लगता है,  जब कोई अपना प्रिय कहे। लेकिन जब कोई पियक्कड़ ट्रक ड्राइवर  ’फिर मिलेंगे’ कहे, तो डर लगने लगता है। मानो कोई आतंकवादी बोल रहा है - ”फिर मिलेंगे।”
बारह माह पुराने पड़ चुके साल को बिदाई दे कर मैं टेंशन-फ्री होकर चला जा रहा था कि पीछे से आवाज़  आई- ”फिर मिलेंगे।”
मैंने देखा, वह साम्प्रदायिकता थी। कुटिलता के साथ मुस्का रही थी.अंदाज़ कातिलाना था, कॉलगर्ल जैसा।
मैंने कहा- ”तुझे हमने सैकड़ों साल तक सहा। अब तो वापस लौट जा। तेरे कारण इस देश में कहीं न कहीं दंगा-फसाद होता रहता है। भगवान के लिए, अल्लाह के लिए, गॉड के लिए,वाहेगुरु के वास्ते वापस मत लौटना।  हमें अब चैन से जीने देना।”
 साम्प्रदायिकता बोली- ”मैं तो इस देश के लोगों के खून में समा चुकी हूँ। मुझसे दूर होना मुश्किल है। मुझसे लाख दूर होने की कोशिश करो, मैं तो लौटूंगी-ही-लौटूँगी।”
मैंने कहा- ”ये तूने कैसे कह दिया कि देश के लोगों के खून में समा चुकी हूँ। अरे, अभी भी लाखों लोग ऐसे हैं जो तेरी सूरत से नफरत करते हैं। तू आ भी जाए तो क्या ? तेरे आने का असर बुद्धिहीनों पर हो सकता है, विद्वानों पर नहीं। तू आकर तो देख, हम लोग तुझे घुसने नहीं देंगे, कहीं। ”
इतना बोलकर मैं आगे बढ़ गया लेकिन मेरे कानों में खौफनाक हंसी और खतरनाक इरादों से भरा वाक्य गूँज रहा था- ”फिर मिलेंगे।”
अभी थोड़ी दूर पहुँचा ही था कि एक काला-कलूटा यमदूत जैसा शख्स दिखाई पड़ा। वह ठहाके लगाते हुए हाथ हिला रहा था और बोले जा रहा था- ”फिर मिलेंगे।”
मैंने पूछा- ”आपकी तारीफ ?”
वह बोला- ”हा… हा… हा… माई सेल्फ घोटाला सिंह उर्फ भ्रष्टाचार सिंह फ्रॉम इंडिया।”
मैंने कहा- ”ओह, तो तुम हो ! तू फिर मिलेगा? तौबा-तौबा। इतना घोटाला करके तेरा जी नहीं भरा जो कहता है, फिर मिलेंगे। क्यों इस देश की फजीहत कर रहा है भाई । पहले ही तेरे कारण हम लोग कहीं मुँह दिखाने के लायक नहीं रहे। तू लोगों के दिमाग में ऐसा घुसा कि भ्रष्टाचारियों का गैंग फैलता गया। जिस नेता-अफसर की पृष्ठभूमि देखो, वहां से घोटाला  रिसता रहता है. पूरा इलाका बदबू से भर गया है.  तेरे कारण ही यहाँ के इंसानों ने चारा घोटाला किया, ताबूत घोटाला, डामर घोटाला किया, कुर्सी घोटाला, ब्लैक बोर्ड और स्लेटपट्टी घोटाला किया, तोप घोटाला किया। एजी घोटाला, टूजी घोटाला, और न जाने कैसे-किसे घोटाले किये।  देश की जान ही ले ली।  न जाने कितनी छोटी-बड़ी चीजों के घोटाले में अपने जौहर दिखा कर लोगों ने देश के विकास को चूना लगा दिया। और, अब तू अपनी बत्तीसी दिखा कर कहता है- फिर मिलेगा। तेरी हरकतों के कारण ही मुझे एक बार कविता लिखनी पड़ी थी कि-
पशुओं ने पूजा की तो ब्रह्मा जी प्रगट भए
बोलो मेरे जीव बोलो, तुम्हें क्या चाहिए।
पशुओं ने कहा, हमें चारा नहीं मिलता है,
भगवान हमें भी तो मंतरी बनाइए।
ब्रह्मा जी ने कहा, ऐसा ही होगा जीव मेरे
जाकर किसी राज्य में मंत्री बन जाइए।”
कविता सुनकर घोटाला सिंह ने जोरदार ठहाका लगाया- ”वाह, साहित्यकारों की कलम से मेरा यश-गान हो रहा है। जय हो।  तो फिर मैं वापस आऊंगा, जरूर आऊँगा। हा हा हा हा। ”
घोटाला सिंह बड़ा ही दृढ़-प्रतिज्ञ नज़र  आ रहा था। आजकल यही हो रहा है। भ्रष्ट लोग ज्यादा मजबूती से अपनी बात करते हैं और ईमानदार आदमी गड्डमड्ड हो जाते हैं। लुंजपुंज।
घोटाला सिंह ठहाका लगाता चला गया। मैं दुखी हो गया और सोचने लगा कि यही हाल रहा तो तेरा क्या होगा रे इंडिया उर्फ भारत, उर्फ हिंदुस्तान!
मैं दुखी होकर चला जा रहा था, तभी बंदूकें लेकर कुछ लोग- ”हमारा धर्म खतरे में है”  का शोर मचाते हुए टपक पड़े। वे भी कह रहे थे फिर मिलेंगे।
मैंने कहा- ”भई, तुम आतंकवादियों लोगों के कारण पूरा देश टेंशन में रहता है । ऊपर वाले के लिए अब तुम लोग वापस मत आना।”
सारे-के-सारे हँसे- ”आतंकवाद पूरी दुनिया में अंगद का पाँव बन चुका है। हमें कोई नहीं हटा सकता। क्या भारत, क्या अमरीका और क्या फ्रांस, हम लोग हर जगह करते हैं डांस। जैसे ही मिलता है चांस,लोगों की जान ले लेते हैं. हमें बड़ा मज़ा आता है. ”
मैंने गुस्से में कहा- ” तुम सब कुत्ते की मौत मरोगे, देख लेना। देश प्रेम और बलिदान की भावना वाले तुमसे मुकाबला लेंगे। ”
आतंकवादी हँसे- ” देश प्रेम, बलिदान धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है बन्धु। तुम किस जमाने की बात कर रहे हो। अब तो लोग अपने ही देश की जय कहने में संकोच करते हैं.मैं वापस आऊंगा. मिलते हैं ब्रेक के बाद. ”
मैंने कहा- ”लेकिन  हम वीर सपूततुम्हारा मुकाबला करेंगे।”
आतंकवादी हँसे। बोले- ”आप भोले हैं। सुविधाओं के कारण देश प्रेम मर चुका है। आप उसे जगाने की असफल कोशिश करते रहें। हम लोग अभी जा रहे हैं लेकिन वादा करते हैं…
…फिर मिलेंगे।”
मूड खराब हो चुका था कि कैसी-कैसी ताकते हमारे पीछे पडी है. कहा रही है, मिलेंगे ब्रेक के बाद।  ये पहले मेरे देश को परेशान किया करती थी, अब दुनिया भर को तंग करने लगी हैं सोचता चला जा रहा था कि फिर एक आवाज़  ने चौंकाया- हमहू  मिलेंगे, ब्रेक के बाद। ”
पलट कर देखा, पाखण्ड मुस्करा रहा था. मैंने कहा -”तुम भी महान खतरनाक जीव हो।  तुम इस देश की राजनीति में ऐसे घुलमिल गए हो जैसे शराब में पानी, जैसे नदी में प्रदूषण। तुम जाओ भाई, तुम्हारे कारण देश के अच्छे दिन नहीं आएँगे।”
पाखण्ड नफासत के साथ हँसा और बोला- ”हमारा जलवा चिरकाल से है. हमारे कारण सत्ता चलती है, धर्म चलता है. सरकार चलती है, बाजार भी चलता है..अभी थक गया था, तो विश्राम कर रहा था, मगर फिर सक्रिय होऊंगा। यानी आज की भाषा में बोले, तो ब्रेक के बाद। नेताओं के दिमाग में घुस कर रहने में मुझे बड़ा मज़ा आता है, जब वे नाटक-नौटंकी करते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है. चोर से कहते है, चोरी करो, और सिपाही से कहते हैं जाकर पकड़ लो. ये ससुरे, जो कहते हैं, वो बिलकुल नहीं करते, यही मज़ा है.आम लोग परेशान होते हैं, इनको गालियां  देते हैं तो मुझे  बड़ा सुख मिलता है.”
इतना बोल कर वह भी जोर से हंसा।  और जाने लगा , मैं उसको पकड़ने के लिए उसके पीछे भागा मगर हड़बड़ा कर गिर पड़ा …. और… और और मेरी नींद खुल गई।  बाप रे, इन दिनों इन दिनों कितने बुरे-बुरे सपने आने लगे हैं।

-गिरीश पंकज

प्रकाशन : दस व्यंग्य संग्रह- ट्यूशन शरणम गच्छामि, भ्रष्टचार विकास प्राधिकरण, ईमानदारों की तलाश, मंत्री को जुकाम, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएं, नेताजी बाथरूम में, मूर्ति की एडवांस बुकिंग, हिट होने के फारमूले, चमचे सलामत रहें, एवं सम्मान फिक्सिंग। चार उपन्यास – मिठलबरा की आत्मकथा, माफिया (दोनों पुरस्कृत), पॉलीवुड की अप्सरा एवं एक गाय की आत्मकथा। नवसाक्षरों के लिए तेरह पुस्तकें, बच्चों के लिए चार पुस्तकें। 2 गज़ल संग्रह आँखों का मधुमास,यादों में रहता है कोई . एवं एक हास्य चालीसा।

अनुवाद: कुछ रचनाओं का तमिल, तेलुगु,उडिय़ा, उर्दू, कन्नड, मलयालम, अँगरेजी, नेपाली, सिंधी, मराठी, पंजाबी, छत्तीसगढ़ी आदि में अनुवाद। सम्मान-पुरस्कार : त्रिनिडाड (वेस्ट इंडीज) में हिंदी सेवा श्री सम्मान, लखनऊ का व्यंग्य का बहुचर्चित अट्टïहास युवा सम्मान। तीस से ज्यादा संस्थाओं द्वारा सम्मान-पुरस्कार।

विदेश प्रवास: अमरीका, ब्रिटेन, त्रिनिडाड एंड टुबैगो, थाईलैंड, मारीशस, श्रीलंका, नेपाल, बहरीन, मस्कट, दुबई एवं दक्षिण अफीका। अमरीका के लोकप्रिय रेडियो चैनल सलाम नमस्ते से सीधा काव्य प्रसारण। श्रेष्ठ ब्लॉगर-विचारक के रूप में तीन सम्मान भी। विशेष : व्यंग्य रचनाओं पर अब तक दस छात्रों द्वारा लघु शोधकार्य। गिरीश पंकज के समग्र व्यंग्य साहित्य पर कर्नाटक के शिक्षक श्री नागराज एवं जबलपुर दुुर्गावती वि. वि. से हिंदी व्यंग्य के विकास में गिरीश पंकज का योगदान विषय पर रुचि अर्जुनवार नामक छात्रा द्वारा पी-एच. डी उपाधि के लिए शोधकार्य। गोंदिया के एक छात्र द्वारा गिरीश पंकज के व्यंग्य साहित्य का आलोचनात्मक अध्ययन विषय पर शोधकार्य प्रस्तावित। डॉ. सुधीर शर्मा द्वारा संपादित सहित्यिक पत्रिका साहित्य वैभव, रायपुर द्वारा पचास के गिरीश नामक बृहद् विशेषांक प्रकाशित।

सम्प्रति: संपादक-प्रकाशक सद्भावना दर्पण। सदस्य, साहित्य अकादेमी नई दिल्ली एवं सदस्य हिंदी परामर्श मंडल(2008-12)। प्रांतीय अध्यक्ष-छत्तीसगढ़ राष्टभाषा प्रचार समिति, मंत्री प्रदेश सर्वोदय मंडल। अनेक सामाजिक संस्थाओं से संबद्ध।

संपर्क :रायपुर-492001(छत्तीसगढ़)

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