नवगीत: फिर-फिर पुलकें उम्मीदों में

फिर-फिर पुलकें उम्मीदों में
कुम्हलाये-से दिन !

सूरज अनमन अगर पड़ा था..
जानो– दिन कैसे तारी थे..
फिर से मौसम खुला-खुला है..
चलो, गये..
जो दिन भारी थे..

सजी धरा
भर किरन माँग में
धूल नहीं किन-किन !

नुक्कड़ पर फिर
खुले आम
इक ’गली’
’चौक’ से मिलने आयी
अखबारों की बहस बहक कर
खिड़की-पर्दे सिलने आयी

चाय सुड़कती अदरक वाली
चर्चा हुई कठिन.. .

हालत क्या थी
कठुआए थे
मरुआया तन माघ-पूसता
कुनमुन करते उन पिल्लों का
जीवन तक था प्राण चूसता !

वहीं पसर अम्मा-कुतिया ने
चैन लिये हैं बिन… .

पंचांगों में उत्तर ढूँढें,
किन्तु, पता क्या,
कहाँ लिखा क्या ?
’हर-हर गंगे’ के नारों में
सबकुछ नीचे बहा दिखा क्या ?

फिरभी तिल-गुड़ के छूने को
सिक्कों में मत गिन.

 

- सौरभ पाण्डेय


जन्मतिथि : 3 दिसम्बर 
पता : नैनी, इलाहाबाद – 211008, (उप्र)
शिक्षा : बी.एस.सी (गणित), डिप. इन सॉफ़्टवेयर, डिप. इन एक्स्पोर्ट मैनेजमेण्ट, एमबीए.
पुस्तकें : परों को खोलते हुए शृंखला (सम्पादन), इकड़याँ जेबी से (काव्य-संग्रह), छन्द-मञ्जरी (छन्द-विधान)
प्रकाशन : राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं तथा ई-पत्रिकाओं में, अनेक सम्पादकों के संकलन में रचनाएँ सम्मिलित.
सम्बद्ध मंच : प्रबन्धन सदस्य, ई-पत्रिका ओपनबुक्सऑनलाइन; सदस्य, प्रमर्शदात्री समूह, विश्वगाथा (त्रैमासिक)

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