फाइल

रश्मि, मेरी लाल रंग वाली फाइल नहीं मिल रही है, कहाँ रख दी है तुमने, कुछ आवाज मे झुंझलाहट लाते हुए मैंने अपनी पत्नी रश्मि को आवाज लगाई। एक तो ऑफिस के लिए निकलने में रोज देर हो जाती है, उपर से मेरा बॉस, जो बैठा ही रहता है कब किस पर अपनी भड़ास निकाल सके, और एक ये रश्मि है, जो मेरी किसी भी चीज को अपनी जगह पर रहने ही नहीं देती।

 

रश्मि कहाँ रख दी तुमने, आवाज में कुछ तेजी लाते हुए फिर से एक बार मैंने आवाज दी।

 

रश्मि लगभग दौड़ते हुए रसोई से आई, शायद कुछ डरी-डरी भी थी, मेरे गुस्से को देख कर। आते ही, धीरे से बोली, मैंने आप की कोई फाइल नहीं हटाई है, आप ने जहाँ रखी होगी, वही होगी, एक बार फिर से देख लो।

 

शायद उससे, इस जबाब कि आशा मुझे नहीं थी, गुस्सा कुछ ज्यादा ही दिखाते हुए बोला, उस फाइल को मुझे आज ही बॉस को देना था, प्रेजेंटेशन है, देर भी हो रहा है मुझे, अब मैं क्या करूँ, क्या जबाब दूंगा, बॉस को।

 

रश्मि ने कहा मैं देख लेती हूँ, आप नाश्ता कर लो, देर हो जाएगी। पर अब मैं कहाँ रुकने वाला था, मैंने कहा, नहीं खाना मुझे, मैं जा रहा हूँ। और न जाने क्या – क्या बड़बड़ाते घर से निकल गया। ये भी ना सोचा कि गलती किसकी है।

 

ऑफिस पहुच कर थोड़ा चैन मिला, जब यह पता लगा कि बॉस ने मुझे अभी तक बुलाया नही है। लेकिन फिर वही यछ प्रश्न, कि फाइल गयी तो गयी कहाँ। यहाँ भी नहीं है, फिर आखिर गयी कहाँ। काम में मन ही नहीं लग रहा था, सर मैं दर्द भी होने लगा, एक कप चाय बनायीं, और अपनी चेयर पर आ कर बैठा ही था कि मेरा सहकर्मी मयंक आया और बोला, मीटिंग अभी चल रही है, और सर ने तुम्हे बुलाया है।

 

क्या मीटिंग चल रही है, उफ़… अब क्या होगा, क्या जबाब दूंगा …

 

सर झुकाए डरते – डरते बॉस के कमरे में दाखिल हुआ, मेरे अभिवादन करने के बाद, बॉस ने मेरा परिचय कराया, ये हैं मि० राजीव, इस प्रोजेक्ट को यही हेड कर रहे है। मेरी कानों को यकीन ही नहीं हो रहा था, सहसा मेरी नजर बॉस के टेबल पर पड़ी, और… और मेरी फाइल यहाँ, पर कैसे?

ओह!

सहसा मुझे सब कुछ याद आता गया, कल ही तो बॉस ने मुझे बुलाया था, और फाइल भी ले ली थी, ये कह कर कि, तुम अक्सर लेट हो जाते हो।

 

केबिन से बाहर आते हुए लगा, ये कैसा अपराध कर लिया मैंने, कल कि सारी घटनाक्रम एक – एक कर के मेरे आँखों के सामने आने लगी।

 

कल घर जाने में देर हो गयी थी, रश्मि बिस्तर पर थी, उसे शायद तेज बुखार था, मेरे आने पर जब वो उठने कि कोशिश करने लगी, तो मैंने ही तो मना किया था, कि रहने दो आराम करो, और दवा भी दी थी।

 

उसे कितनी तकलीफ थी, पर बार – बार उठने कि कोशिश कर रही थी, कि मेरे लिए खाना बना सके। उसे मालूम था कि मुझे कुछ भी बनाना नही आता।

 

लेकिन मैंने ही मना कर दिया और दोनों के लिए ब्रेड बटर ले आया, और साथ ही खाया।

उसे काफी अफ़सोस था की वो मेरे लिए खाना नहीं बना पा रही।

 

और आज, थोडा आराम होते ही, लगता है मेरे लिए सुबह से ही रसोई में थी, ये सोच कर कि मैंने कुछ भी ठीक से नहीं खाया है कल से।

 

उफ़ मुझे क्या हो गया था सुबह, मैं इतना स्वार्थी कैसे हो गया, मैंने तो उसकी तबीयत के बारे में भी कुछ नहीं पूछा, और लड़ाई भी कर ली अलग से।

 

दो बुँदे यूँ ही आखों से छलक पड़े अपने इस खुदगर्जी पर।

 

सच ही है, आसूओं का कोई वजन नहीं होता, पर गिरने के बाद मन हल्का जरुर हो जाता है।

 

 

 

 

 - डॉ ज्ञान प्रकाश    

 

 

शिक्षा: मास्टर ऑफ़ साइंस एवं डॉक्टर ऑफ़ फिलास्फी (सांख्यकीय)
कार्य क्षेत्र: सहायक आचार्य (सांख्यकीय), मोतीलाल नेहरु मेडिकल कॉलेज इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश ।
खाली समय में गाने सुनना और कविताएँ एवं शेरो शायरी पढ़ना ।

 

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