प्रेम- एक गीत है

कामवासना अंश है प्रेम का, अधिक बड़ी सम्पूर्णता का। प्रेम उसे सौंदर्य देता है। प्रेम काम को एक नयी आत्मा देता है, तब काम रूपांतरित हो जाता है और सुंदर बन जाता है। वह अब कामुकता का भाव नहीं रहता, उसमें कहीं पार उतर जाना होता है, वह सेतु बन जाता है। तुम किसी व्यक्ति को प्रेम कर सकते हो, क्योंकि वह तुम्हारी कामवासना की तृप्ति करता है। यह तो मात्र एक सौदा है, प्रेम नहीं। जब काम-भाव छाया की तरह अनुसरण करता है, प्रेम के अंश की भांति। तब वह सुंदर होता है, तब वह पशु-संसार का नहीं रहता। तब पार की कोई चीज़ पहले से ही प्रविष्ट हो चुकी होती है और जब हम किसी व्यक्ति से गहराई से प्रेम किये चले जाते हंै तो धीरे-धीरे काम-भावना तिरोहित हो जाती है, और आत्मीयता इतनी सम्पूर्ण हो जाती है कि कामवासना की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। प्रेम स्वयं में पर्याप्त होता है, जितना प्रेम विकसित होता है, काम उतना ही विलीन हो जाता है और हृदय जिस दिन पूरी तरह प्रेम से भर जाता है, उस दिन कामुकता शून्य हो जाती है। क्योंकि सारी की सारी शक्ति प्रेम में परिवर्तित हो जाती है। प्रकृति कहती है काम… और शिक्षा कहती है, ब्रह्मचर्य….। प्रकृति का विरोध घातक है, प्रकृति का परिवर्तन, प्रकृति का उध्र्वगमन तो सहयोगी है। काम की दुश्मनी में मत खड़े हो जाइये, प्रेम के पक्ष में जीवन को विकसित कीजिए। जितना प्रेम विकसित होगा काम की शक्ति प्रेम में अपने-आप समाहित होती जाएगी। जिस दिन प्रेम पूरा हृदय में भर जाएगा उस दिन उस हृदय में कामुकता अपने आप विलीन हो जाएगी। और किसी तरह से विलीन नहीं होती। ईमानदारी से चिंतन नहीं है, इसलिए थोथी बातों को भी हम दोहराए चले जाते हैं, उन पर कभी विचार भी नहीं करते। मन दो नहीं हैं, मन दो कर दिये गये हैं। मन एक ही होना चाहिए और मन एक ही होने का यह मतलब नहीं है कि पशु हो जाएँ। नहीं, मनुष्य के भीतर जो पशुता जैसी मालूम होती है, उसे एक ही मन को बिना खण्डित किए विकसित किया जा सकता है। और वही पशुता जो ठीक-ठीक विकसित हो, तो दिव्यता में परिवर्तित हो जाती है। यह मन का जो द्वैत है, यह $गलत शिक्षा, $गलत संस्कृति, $गलत सभ्यता का परिणाम है और यह द्वैत जब मिट जाता है तब… उस घड़ी हम प्रार्थना की संभावना पर खरे उतरते हैं।

 

ऐसा नहीं है कि उसका दमन किया गया होता है, उसे गिरा दिया गया होता है, नहीं, वह तो बस तिरोहित हो जाती है। जब जीवन में हम प्रेम के साथ डूबे हुए ऐसे क्षण में प्रवेश करते हैं तब दो प्रेमी समग्र एकत्व में होते हैं। क्योंकि कामवासना विभक्त करती है। अंग्रेज़ी का शब्द ‘सेक्सÓ तो आता ही उस मूल से है जिसका अर्थ होता है ‘विभेदÓ। प्रेम जोड़ता है, कामवासना भेद बनाती है। विभेद का मूल कारण है। काम में क्षण भर को एकत्व का वो भ्रम होता है और फिर एक विशाल विभेद अचानक बन आता है। व्यक्ति अनुभव करता है कि वह प्रिय से बहुत दूर है। काम क्रिया के पश्चात एक हताशा, एक प्रकार की निराशा आ घेरती है… और जब प्रेम ज्य़ादा गहरे उतर जाता है तो और ज्य़ादा जोड़ देता है तो काम की आवश्यकता ही नहीं रहती। हम इतना एकत्व में रहते हैं कि हमारी आंतरिक ऊर्जायें बिना काम के मिल सकती हैं। फिर जो आभा उतरती है वो चेहरों पर, जीवन में, दिखायी देती है। हम दो शरीरों की भांति एक आत्मा में रहते हैं, आत्मा हमें घेरे रहती है, वह हमारे शरीर के चारों ओर एक प्रदीप्ति बन जाती है, लेकिन ऐसा बहुत कम घटता है।

 

लोग कामवासना पर समाप्त हो जाते हैं। ज्य़ादा से ज्य़ादा जब इक्ट्ठे रहते हैं, तो वो एक-दूसरे के प्रति स्नेहपूर्ण होने लगते हैं, ज्य़ादा से ज्य़ादा यही होता है। लेकिन प्रेम कोई स्नेह का भाव नहीं है, वह आत्माओं की एकमयता है, एक गीत है, एक लय है, दो ऊर्जायें मिलती हैं और सम्पूर्ण इकाई हो जाती है। जब ऐसा घटता है केवल तभी प्रार्थना संभव होती है। जब दो लोग अपनी एकमयता में परितृप्त अनुभव करते हैं। बहुत सम्पूर्ण…कि एक अनुग्रह का भाव उदित होता है, वे गुनगुनाना शुरू कर देते हैं प्रार्थना को….।

 

प्रेम इस सम्पूर्ण अस्तित्व की सबसे बड़ी चीज़ है। प्रेम ही वो अवस्था है जब हमें कोई ईश्वर लगने लगता है, हमारी पूजा में, ध्यान में, प्रार्थनाओं में उसका ही चेहरा आकार लेने लगता है। ये प्रेम का अपनी उच्चतम अवस्था में होना है। ये ईश्वर को प्राप्त होना ही होता है। प्रेम सृजित होने लगता है, फिर उस प्रेम को बांटने का सबसे अच्छा तरीका है खुद को मानवता के हवाले कर स्वयँ प्रेम हो जाना। वास्तव में हर चीज़ हर दूसरी चीज़ के पे्रम में होती है। ये शिखर पर पहुँचने पर ही दिखायी देता है। जब हम घृणा अनुभव करते हैं-घृणा का अर्थ ही इतना होता है कि प्रेम $गलत पड़ गया है। और कुछ नहीं। जब हम उदासीनता का अनुभव करते हैं इसका अर्थ यही होता है कि प्रेम प्रस्फुटित होने के लिए पर्याप्त रूप से साहसी नहीं रहा। जब किसी बंद व्यक्ति का अनुभव होता है उसका केवल इतना अर्थ होता है कि वह इतना ज्य़ादा भय अनुभव करता है, बहुत ज्यादा असुरक्षित-वह पहला कदम नहीं उठा पाया। लेकिन प्रत्येक चीज़ प्रेम है। सारा अस्तित्व प्रेममय है। वृक्ष प्रेम करते हैं पृथ्वी को वरना कैसे वे साथ-साथ अस्तित्व रख सकते थे? कौन सी चीज उन्हें साथ-साथ पकड़े हुए है? कोई तो एक जुड़ाव होना चाहिए? केवल जड़ों की ही बात नहीं है क्योंकि यदि पृथ्वी जड़ों के साथ गहन प्रेम में न पड़ी हो तो जड़ें भी मदद नहीं करेंगी। ज्योति जलती है तो उसका ताप दीपक सहता है और बुझ जाती है तो अपने आगोश में समेट लेता है। पतंगे तो अपना प्राणोत्सर्ग ही कर बैठते हैं, किसका प्रेम कम है? दीपक का? या पतंगों का…? या दीपक और ज्याति के मिलन को देखने की उत्कंठा उन्हें ज्योति के पास खींच लाती है किंतु… उन्हें ये कहाँ मालूम होता है कि ज्योति का ताप तो सिर्फ दीप ही सह सकता है क्योंकि उसने ज्योति को अपने हृदय में स्थान जो दिया है….। आह! उन परवानों का जीवन इस पवित्र मिलन की आहुति बनने में ही सार्थकता पा जाता है। बिना ज्योति-शिखा के दीपक… और बिना दीपक के ज्योति-शिखा का अस्तित्व अधूरा है….। ये परवाने तो ज्योति के प्रेम को देखकर उस पर मुग्ध, खिंचे चले आते हैं और प्रेम की मिसाल बन जाते हैं। किंतु दीपक के विशाल हृदय की क्या कहिये… वो उन प्रेमियों को भी अपने अंक में जगह दे देता है क्योंकि प्रेम व्यापक होता है, अपनी व्यापकता में सबको समेट लेता है।
एक गहन अदृश्य प्रेम अस्तित्व रखता है। सम्पूर्ण अस्तित्व, सम्र्पूा ब्रह्मांड घूमता है प्रेम के चारों ओर। प्रेम ऋतम्भरा है। सत्य और प्रेम का जोड़ है ऋतम्भरा। अकेला सत्य बहुत रुखा-सूखा होता है, प्रेमी एक-दूसरे की मदद करते हैं अपने शरीरों को जानने में, इसके बिना हम नहीं जानते कि हमारा शरीर किस प्रकार का है। इस शरीर में मरुस्थल कहाँ है…? और मरुधान कहाँ है…, फूल कहाँ है? कहाँ हमारी देह सबसे अधिक जीवंत है? और कहाँ मृत है? नहीं पता होता है इससे पहले। हम अपरिचित बने रहते हैं, वास्तव में जब हम प्रेम में पड़ते हैं और कोई हमें शरीर से प्रेम करता है तो पहली बार सजग होते हैं, अपनी देह के प्रति, काम मदद करता है दूसरे की देह को समझने में-दूसरे के द्वारा अपने शरीर की पहचान व अनुभूति पाने में! काम शरीर में बद्धमूल करता है और फिर प्रेम स्वयं का, आत्मा का अनुभव देता है। यह पहला वर्तुल है और फिर प्रार्थना मदद करती है, परमात्मा को अनुभव करने में… ये चरण हैं-काम से प्रेम तक, प्रेम से प्रार्थना तक…। प्रेम के कई आयाम होते हैं, क्योंकि यदि सारी ऊर्जा प्रेम है तो फिर प्रेम के कई आयाम होने ही चाहिए…। जब किसी स्त्री या पुरुष से प्रेम करते हैं, तो अपनी देह के साथ परिचित हो जाते हैं, और जब गुरु से प्रेम करते हैं तब परिचित होते हैं अपने साथ…. अपनी सत्ता के साथ और इस परिचय के साथ अकस्मात सम्पूर्ण के प्रेम में पड़ जाते हैं…। स्त्री द्वार बन जाती है गुरु का, गुरु द्वार बन जाता है परमात्मा का, अकस्मात हम सम्पूर्ण में जा पहुँचते हैं और फिर जाते हैं अस्तित्व के अंतर्तम् मर्म में…।

 

… काम के प्रति स्वस्थ प्रकृतिस्थ दृष्टिकोण होना चाहिए। ये जानना चाहिए कि सारी प्रकृति… सारा विराट सृजन उस पर खड़ा है। फूल इसलिए खिलते हैं, वृक्ष इसलिए खिलते हैं, पक्षी इसलिए गाते हंै, बच्चे इसलिए पैदा होते हैं। सारी दुनिया में जो भी क्रियेटिविटी है, वह सब बुनियाद में काम से संबंधित है, तो काम का मन में सम्मान होना चाहिए, निंदा नहीं। उसे स्वीकार की जरूरत है, और स्वीकार के द्वारा यह एक-दिन परिवर्तित होकर ब्रह्मचर्य बन सकता है लेकिन विरोध में लड़कर नहीं….। अत्यंत सहृदयता, अत्यंत सहजता, अत्यंत मैत्रीपूर्वक उस शक्ति को परिवॢतत किया जा सकता है और मार्ग है कि प्रेम विकसित हो तो काम भी अपने आप गति में होता है। जैसे कि पानी को बहाव देना हो तो हम एक नाली बना दें, तो पानी उससे बहने लगता है और नाली न हो तो पानी कहीं भी बह जाता है। प्रेम की नाली अगर भीतर चित्त में निर्मित हो तो काम की सारी एनर्जी प्रेम में परिवर्तित होती है और बहती है। यदि ये भौतिक स्तर पर ही न रह जाए तो …ये प्रेम का गीत है… दो आत्माओं के मिलन का गीत है। प्रेम और प्रेम की अभिव्यक्ति के मध्य सांसारिक भोगों का कोई स्थान नहीं, पुरुष व प्रकृति का मिलन नैसर्गिक अवस्था में ही होना चाहिए। प्रेम के अभाव में स्त्री व पुरुष तत्वों का समागम असम्भव है…। पुरुष और प्रकृति का मिलन प्रेम की पराकाष्ठा है।

 

- ज्योत्सना ‘प्रवाह’

मै ज्योत्सना प्रवाह विगत दस वर्षों से लेखन कार्य में संलग्न हूँ, मेरी कई कहानियाँ एवं आलेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं जैसे मेरी सहेली, सरिता, गृह शोभा, अन्तरा,  साहित्य अमृत, हरिगंधा, कथा देश आदि में निरंतर छपती रही हैं, विगत तीन वर्षों से अन्तरा पत्रिका में मेरा स्तम्भ मनवा रे लगातार प्रकाशित हो रहा है, पायनीयर बुक कंपनी ने मेरी कहानी को वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कहानी का पुरस्कार भी दिया है |

सम्प्रति – गृहिणी हूँ 
जन्म – 06 जुलाई 
शिक्षा – इंटरमीडिएट 
महमूरगंज,वाराणसी, 221010 (उ.प्र.)    

 

 

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