प्राचीन भारत की ‘ग्रिनवीच’ नगरी

 

भारत का ग्रीनवीच नगर जो सूर्य के ठीक नीचे स्थित है

उज्जैन नगर को सूर्य के ठीक नीचे स्थित होने की अद्वितीय विशेषता प्राप्त है जो उज्जैन के अलावा संसार के किसी नगर की नहीं है। इसी कारण उज्जैन प्राचीन भारत की समय गणना का केन्द्र रहा है जहाँ काल के आराध्य महाकाल विराजमान हैं जो भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं।

उज्जैन की भौगोलिक स्थिति अतिविशिष्ट हैं। खगोलशास्त्रियों के अनुसार यह नगर पृथ्वी और आकाश की सापेक्षता में ठीक मध्य में स्थित है। कालगणना की दृष्टि से इसकी महत्ता सर्वविदित है। प्राचीन भारतीय मान्यता के अनुसार जब उत्तर ध्रुव की स्थिति 21 मार्च से प्राय: 6 मास का दिन होने लगता है तब 6 मास के तीन माह व्यतीत होने पर सूर्य दक्षिण क्षितिज से बहुत दूर होते जाता है। उस दिन सूर्य ठीक उज्जैन के मस्तक पर होता है। उज्जैन का अक्षांश व सूर्य की परम कान्ति दोनों ही 240 अक्षांश पर मानी गई हैं। यह उत्तम स्थिति पूरे संसार में अन्यत्र दुर्लभ है।

इसीलिए उज्जयिनी की भौगोलिक स्थिति के कारण प्राचीन भारत में उज्जैन को “ग्रीनवीच” माना गया है। भारत की ‘ग्रीनवीच’ यह नगरी देश के मानचित्र पर 23.9 अंश उत्तर अक्षांश एवं 770 पूर्व देशान्तर पर समुद्र सतह से लगभग 1658 फीट ऊँचाई पर बसी है। इसी महत्वपूर्ण स्थिति ने इसे काल गणना का केन्द्र बना दिया। जो ज्योतिष का प्रमुख केन्द्र भी बन गई।

आधुनिक समय में रेखांशों की मध्य रेखा में इंग्लैंड का एक ग्रीनवीच नामक शहर है परन्तु प्राचीन भारत में रेखांशों की गणना करते समय उज्जैन पर रेखांशों की मध्य रेखा मानी जाती है। इंग्लैंड के ग्रीनवीच शहर से दुनिया भरत की घड़ियों का मानक समय ग्रीनवीच टाइम तय होता है जिस प्रकार ग्रीनवीच शहर में 1675 ई. में एक राजमान्य नक्षत्र परीक्षण केन्द्र खोला गया था जिसके आधार पर ग्रीनवीच को महत्वपूर्ण माना गया। उसी प्रकार संभवत: विक्रमादित्य के समय उज्जैन में भी एक राज्यमान्य वेधशाला बनाई गई थी जिसने उज्जैन को काल निर्णय और गणना की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाया और उज्जैन को ज्योतिष का महत्वपूर्ण केन्द्र माना गया। जिसके प्रमाण में राजा जयसिंह द्वारा स्थापित वेधशाला आज भी उज्जैन को कालगणना के क्षेत्र में अग्रणी सिद्ध करती है। कालगणना में उज्जैन का व्यापक योगदान रहा है।

भौगोलिक गणना के आधार पर प्राचीन आचार्यों ने उज्जैन को शून्य रेखांश पर माना है। कर्क रेखा भी यहीं से गुजरती है। देशान्तर रेखा और कर्क रेखा यहीं एक दूसरे को काटती भी हैं माना जाता है कि जहाँ यह करती  संभवत: वहीं महाकालेश्वर मंदिर स्थित है। इन्हीं कारणों से उज्जैन नगरी कालगणना, पंचाग निर्माण और साधना सिद्धि के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। यहीं के मध्यमादेय पर सम्पूर्ण भारत में पंचांग का निर्माण होता है।

कालगणना पद्धति यूनान और भारत में एक जैसी हैं स्कन्द पुराण के अनुसार “कालचक्र प्रवर्तकों महाकाल: प्रतायन:” अर्थात् महाकाल कालगणना के प्रवर्तक माने गए हैं। ज्योतिष सूर्य सिद्धान्त ग्रन्थ में भूमध्य रेखा के बारे में उल्लेख है कि

राक्षसालय देवोक: शैलयोर्मध्यसूत्रागा।

रोहितक भवन्ती च यथा सन्निहितं सर:।।

अर्थात् रोहतक, अवन्ती और कुरुक्षेत्र ऐसे स्थल हैं जो इस रेखा में आते हैं। माना गया है कि देशान्तर मध्य रेखा श्रीलंका से सुमेरू तक जाते हुए उज्जयिनी सहित अनेक नगरों को स्पर्श करती है।

कालगणना केन्द्र उज्जैन की वर्तमान स्थिति 220″ अंश पर स्थित है। इसलिए पद्मश्री विष्णु श्रीधर वाकणकर ने महाकाल वन में स्थित डोंगला में सूर्य के उत्तर दिशा का अन्तिम समपाद बिन्दु खोज लिया था। ग्राम डोंगला में आचार्य वराहमिहिर न्यास उज्जैन के मार्गदर्शन में डॉ. रमन सोलंकी एवं श्री घनश्याम रतनानी के खगोलीय अध्ययन पर आधारित भारत की 6ठी वेधशाला निर्मित हो चुकी है। जहाँ म.प्र. शासन के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा भारत का सतह पर लगने वाला सबसे बड़ा टेलीस्पकोप लगाया गया है। तथा यहाँ शंकु यंत्र, भास्कर यंत्र, भित्ति यंत्र भी स्थापित किए गए हैं ताकि पूर्णरूपेण भारतीय आधार पर कालगणना की जा सके। ग्राम डोंगला उज्जैस उत्तर दिशा में 32 किमी पर आगर मार्ग पर अवस्थित है।

मध्य रेखा का सर्वप्रथम प्रमाण पुलिस सिद्धान्त में मिलता है। यह पंच सिद्धांतों का पहला सिद्धान्त है। इसमें उल्लेख है कि यवन देश से उज्जयिनी की ‘नाड़ी’ सात घटी बीस पल एवं वाराणसी की नाड़ी नौ घटी चर है। इसी प्रकार कुछ प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि न केवल रेखांश, बल्कि अक्षांश भी उज्जयिनी से गिने जाते हैं। इसी प्रकार आर्यभट्ट के टीकाकार नीलकंठ द्वारा परमेश्वर नामक ज्योतिविर्द का उल्लेख है। परमेश्वर की पुस्तक ‘गोलदीपिका’ में लिखा है कि 1. उज्जैयिनी लंका के उत्तर में 15 अंश पर स्थित है। 2. जब लंका तथा उज्जयिनी में सूर्योदय होता है तब रोमक देश में मध्य रात्रि होती है। 3. उज्जयिनी के पूर्व में उतने ही दूरी पर “यम कोटी है जितने दूरी पर पश्चिम में रोमक है, किन्तु वह लंका के अक्षांश में है। (यमकोटी जावा का पूर्वी छोर है।)”। 1) गणित और ज्योतिष के प्रकाण्ड श्री वराह मिहिर का जन्म उज्जैन जिले के कायथा ग्राम में शक संवत 427 में हुआ था। प्राचीन भारत में वे एकमात्र ऐसे विद्वान थे जिन्होंने ज्योतिष की समस्त विधाओं पर ग्रंथ रचना की थी। काल गणना व ज्योतिष विधा एक दूसरे से संबद्ध विधा है।

लिंगपुराण के अनुसार सृष्टि का प्रारंभ यहीं से हुआ है। गणितज्ञ आचार्य भास्कराचार्य ने लिखा है -

यल्लेकाज्जयिनी पुरापुरी कुरुक्षेत्रादि देशानस्पृश्यते।

सूत्रं सुमेरुगतं बुधेनिर्गता सामध्यरेखा भव:।।

उज्जैन को शरीर का नाभि देश और महाकालेश्वर को अधिष्ठाता कहा गया है। पृथ्वी के बीचों-बीच 00 देशान्तर पर खींची गई मध्यान्ह रेखा प्रधान याम्योत्तर या ग्रीनवीच रेखा कहलाती है। वर्तमान में दुनिया का मानक समय इसी रेखा से निर्धारित किया जाता है। अर्थात् कोसऽनिैटिव युनिवर्सल टाईम (छच्र्क्) लन्दन के शहर ग्रीनवीच जो इसी रेखा पर है के कारण इस रेखा को ग्रीनवीच रेखा कहते हैं। देशान्तर ग्लोब पर उत्तर से दक्षिण की ओर खींची जाने वाली काल्पनिक रेखाएँ हैं ये रेखाएँ समानान्तर नहीं होती पृथ्वी के बीचों-बीच 0 शून्य डिग्री (00) पर खींची गई ये रेखाएँ ग्रीनवीच कहलाती हैं जो दुनिया के समय का निर्धारण करती हैं।

भारत की मोक्षदायिनी उज्जयिनी के गढ़कालिका क्षेत्र से प्राप्त सिक्कों पर प्राकृत में उज्जयिनी शब्द उत्कीर्ण है। टालमी की ज्योग्राफी के अनुसार उज्जयिनी 770 पूर्व देशान्तर  व 220 उत्तर अक्षांश पर स्थित था जहाँ से शून्य देशान्तर की गणना की जाती थी। अत: यह स्वत: प्रमाणित हो जाता है कि प्राचीन भारत का उज्जैन ग्रीनवीच रेखा पर ग्रीनवीच नगर रहा है। ऐसा भी उल्लेख है कि उज्जैन में सूर्य-मंदिर था। परमारों के पतन के बाद नसिरुद्दीन खिलजी ने सूर्य मन्दिर के भग्नावशेषों पर जल महल और कालियादेह महल का निर्माण करवाया था। यह नगरी अपने पुरातन इतिहास के साथ आज भी ना केवल जीवित है बल्कि अपने सांस्कृतिक महत्व को भी बनाए हुए है स्कन्दपुराण में इसे प्रतिकल्पा कहा गया है।

 

- डा. स्वाति तिवारी

जन्म : धार (मध्यप्रदेश)

शिक्षा : एम.एस.सी., एल.एल.बी., एम.फिल, पी.एच.डी

शोध कार्य :

Ÿ महिलाओं पर पारिवारिक अत्याचार एवं परामार्श केन्द्रों की भूमिका

Ÿप्राथमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण में राजीव गांधी शिक्षा मिशन की भूमिका

Ÿअकेले होते लोग – वृद्धावस्था पर मनोवैज्ञानिक दस्तावेज

Ÿसवाल आज भी जिन्दा हैं : भोपाल गैस त्रासदी एवं स्त्रियों की सामाजिक समस्याएं (प्रकाशनाधीन)

रचनाकर्म :

Ÿमध्यप्रदेश और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, व्यंग्य, समीक्षा, रिपोर्ताज, यात्रा-संस्मरण, कविताओं आदि का नियमित प्रकाशन

Ÿ आकाशवाणी, दूरदर्शन और निजी टी.वी. चैनलों पर रचनाओं का प्रसारण-पटकथा लेखन

विशेष :

मध्यप्रदेश की कलाजगत हस्ती कलागुरू विष्णु चिंचालकर पर निर्मित फिल्म की पटकथा-लेखन, सम्पादन और सूत्रधार

फिल्म निर्माण: इन्दौर स्थित परिवार परामर्श केन्द्रों पर आधारित लघु फिल्म “घरौंदा ना टूटे’ (निर्माण, सम्पादन और स्वर)

प्रकाशित कृतियॉ :-

कहानी-संग्रह :

Ÿ “क्या मैंने गुनाह किया’, Ÿ”विशवास टूटा तो टूटा’, Ÿ “हथेली पर उकेरी कहानियां’ Ÿ “छ जमा तीन”, Ÿ “मुडती है यूं जिन्दगी, Ÿ”मैं हारी नहीं’, Ÿ “जमीन अपनी-अपनी’, Ÿ “बैगनी फूलों वाला पेड”, Ÿस्वाति तिवारी की चुनिंदा कहानियां

अन्य महत्वपूर्ण प्रकाशन :

Ÿ वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक वि¶लेषण पर केन्द्रित दस्तावेज – “अकेले होते लोग’

Ÿ”महिलाओं के कानून से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तक “मैं औरत हूं मेरी कौन सुनेगा’,

Ÿव्यक्तित्व विकास पर केन्द्रित पुस्तक “सफलता के लिए’

Ÿदेश के जाने-माने पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तक “शब्दों का दरवेश” (महामहिम उप राष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी द्वारा 16 जुलाई 2011 को विमोचित)

प्रकाशनाधीन :

Ÿ सवाल आज भी जिन्दा है (भोपाल गैस त्रासदी और स्त्री विमर्श)

Ÿ लोक परम्पराओं में विज्ञान (माधवराव सप्रे संग्रहालय द्वारा प्रदत्त प्रोजेक्ट)

Ÿ ब्राहृ कमल एक प्रेमकथा (उपन्यास)

सम्पादन (1996 से 2004 तक) :

Ÿ सुरभि (दैनिक चौथा संसार),

Ÿ घरबार (दैनिक चेतना)

चर्चित स्तंभ लेखन (वर्ष 96 से 2006 तक) :

Ÿ हमारे आस पास (दैनिक भास्कर),

Ÿ महिलाएं और कानून (दैनिक फ्रीप्रेस, अंग्रेजी),

Ÿ आखिरी बात (चौथा संसार),

Ÿ आठवां कॉलम एवं अपनी बात (चेतना),

सम्मान और पुरस्कार :

Ÿ “अकेले होते लोग’ पुस्तक (वर्ष 2008-09) के मौलिक लेखन पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नई दिल्ली द्वारा 80 हजार रुपये का राष्ट्रीय पुरस्कार

Ÿ “स्वाति तिवारी की चुनिन्दा कहानियाँ’ पर मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 22/01/12 को वागेशरी सम्मान 2010 (छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ “बैंगनी फूलोंवाला पेड़’ कहानी संग्रह पर 02 अक्टूबर, 11 को प्रकाश कुमारी हरकावत महिला लेखन पुरस्कार (मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ देश की शिशार्स्थ पत्रिका “द संडे इंडियन’ द्वारा देश की चयनित 21वीं सदी की 111 लेखिकाओं में प्रमुखता से शामिल

Ÿ “अभिनव शब्द शिल्पी अलंकरण”, 2012 सांस्कृतिक संस्था अभिनव कला परिषद, भोपाल द्वारा

Ÿ लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार पं. रामनारायण शास्त्री स्मृति कथा पुरस्कार

Ÿ जाने-माने रिपोर्टर स्व. गोपीकृष्ण गुप्ता स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार (श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के लिए)

Ÿ शब्द साधिका सम्मान (पत्रकारिता पुरस्कार) Ÿ निर्मलादेवी स्मृति साहित्य सम्मान, गाजियाबाद (उत्तरप्रदेश)

Ÿ पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में अनुपम उपलब्धियों के लिए “स्व. माधवराव सिंधिया प्रतिष्ठा” सम्मान

Ÿ हिन्दी प्रचार समिति, जहीराबाद (आन्ध्रप्रदेश) द्वारा सेवारत्न की मानद उपाधि

Ÿ पं. आशा कुमार त्रिवेदी स्मृति मालवा-भूषण सम्मान

Ÿ मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा स्थापित देवकीनंदन साहित्य सम्मान

Ÿ अंबिकाप्रसाद दिव्य रजत सम्मान

Ÿ भारतीय दलित साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश का सावित्रीबाई फूले साहित्य रत्न सम्मान

विशेष :

कुरुक्षेत्र वि.वि. हिमाचल प्रदेश और देवी अहिल्या वि.वि. इन्दौर, वि.वि.चैन्नई, जवाहरलाल नेहरू वि.वि. नई दिल्ली में कहानियों पर शोध कार्य।

मैसूर में 02 से 04 अक्टूबर, 2011 तक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा

“सुशासन और मानव अधिकार” पर आयोजित तीन दिवसीय सेमीनार में शोध पत्र का वाचन।

माण्डव में 5 से 7 नवम्बर, 2011 को देश के शिरसस्थ कथाकारों के संगमन 17 में भागीदारी।

संस्थापक-अध्यक्ष, इन्दौर लेखिका संघ, इन्दौर।

वुमन राइटर्स गिल्ड आफ इंडिया (दिल्ली लेखिका संघ) की सचिव (वर्ष 07 से 09)

इंडिया वुमन प्रेस कार्प, नई दिल्ली की आजीवन सदस्य

सम्प्रति : मध्यप्रदेश शासन में जनसम्पर्क विभाग में अधिकारी (राज्य शासन के मुखपत्र मध्यप्रदेश संदेश में सहयोगी सम्पादक)

सम्पर्क - चार इमली, भोपाल – 462016 (मध्यप्रदेश – भारत)

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