प्राइस वैल्यू

दिन भर पति बच्चों और सास ससुर के पीछे चकरघिन्नी सी नाचती सृष्टि पति दिनकर के समीप सोने आई तो  पत्नी का कुम्हलाया चेहरा देख पति को करुणा आ गई।
 कहाँ गई हिरणी सी कुलांचे भरती मेरी अर्द्धांगिनी जो दिनभर चहकती रहती।दसेक वर्ष पहले ही तो मेरे आँगन की शोभा बढाने आई थी।मधुर हंसी,चूड़ियों की खनक और पाजेब की छन-छन से घर सजीव सा लगता।धीरे-धीरे घर की जिम्मेदारियों का भार उसके नाज़ुक कंधों पर पड़ता गया । शादी के तीन साल बाद छवि और फिर अंशु के जन्म के  बाद तो मानो उन्मुक्त पंछी कर्त्तव्यों के  बंधन में बंधा अपने पंखों को काटे नीड़ तक सिमट कर रह गया। कभी बच्चों की बीमारी तो कभी बुजुर्गों की तीमारदारी। मात्र सेविका ही बना कर रख दिया मैंने उसको। दिन भर लगी ही रहती है,गर्व है मुझे सृष्टि जैसी जीवनसाथी पाकर।
तभी दिनकर की आत्मा ने धिक्कारा “पत्नी है वह तेरी ,नौकरानी  नहीं “। सोशल मीडिया पर चल रही परिचर्चा उसे मथे जा रही थी।रात भर बैचैनी में करवटे
बदल सुबह उठा तो उसने कुछ  निर्णय कर  स्वयं को बहुत हल्का महसूस किया।
प्यार से पुकारे जाने पर हैरान परेशान सृष्टि माथे पर चुहल करती पसीने को  पोंछते हुए पति के पास आई तो उसने पाँच हजार पकड़ा दिए।
…अरे अभी तो वेतन भी नहीं मिला है।पहली को तो तुम्हे पगार मिलती है फिर ये पैसे तुमने कहाँ से और क्यों लाए।
कुछ हड़बड़ाने लगा था  दिनकर ,हकलाते हुए बोला…तुम दिन भर घर के काम करती हो। बच्चों की देखभाल,मेरे माता-पिता की सेवा शुश्रूषा के अलावा घर की साफ सफाई,खाना पकाना और घर के अनगिनत काम भी तुम्हे ही करने पड़ते हैं।  सोशल मीडिया पर भी हाउस वाइफ के घरेलू भूमिका और उसके आर्थिक मूल्यांकन की चर्चा चल रही है। “हाउस कीपिंग” की वैल्यू तय करने की बात हो रही है। घरेलू महिलाओं को घर के कामकाज के लिये वेतन मिलना चाहिए।
मुझे लगा तुम्हे भी…..बोलते बोलते रुक गया दिनकर।घबराहट के कारण हाथ पैर ठंडे होने लगे।
बस इतनी ही है मेरी मजदूरी,सुबह से शाम तक लगी रहती हूँ दिनकर तुम्हारे घर में। प्राइस वैल्यू  तुमने इतनी कम क्यों रखी मेरी।
मैं इससे ज्यादा और नहीं दे पाऊँगा , सृष्टि मेरी मजबुरी समझो। दिनकर का गला रुंध रहा था…काश मेरी आमदनी कुछ और रहती तो मैं  पत्नी के मनमुताबिक पैसे दे पाता।
क्या मजबुरी समझूं , तुमने तो मुझे मेड बना कर रख दिया है , मैं तो खुद को घर की मालकिन समझ रही थी।तुमने तो मजदूरी पकड़ा दी। ये क्या है दिनकर ,ये घर ये बच्चे क्या सिर्फ तुम्हारे हैं ,मेरा कुछ नहीं  है। अरे!तुमने तो मुझे कुक ,टीचर,नर्स,केयर टेकर,बेबी सिटर बना कर रख दिया।मेरे अधिकारों की बोली लगा तुमने तो मुझे मेरी नजरों से गिरा दिया दिनकर। किसी गृहस्थन का मोल क्या समझोगे ।परिवार तो हमारा अभिमान होता है,चार पैसों से क्या मूल्य आंकोगे हमारा।
अत्यधिक अपमान से रो गयी सृष्टि।
आत्म ग्लानि से भर गया दिनकर ….
मुझे माफ कर दो सृष्टि,तुम्हारे थके कदमों को देख पश्चाताप होता था।खुद को दोषी समझने लगा था।
तुम तो मेरा स्वाभिमान  हो,अपने स्वाभिमान को रुपयों  की तराजू में कैसे तौल सकता हूँ कह पति ने  संतुष्टि लिये पत्नी के ललाट पर प्यार भरी चुंबन दे दी।
पति पत्नी के आपसी रिश्ते  पैसे और भौतिकता  से परे नैसर्गिक  सुख में डूबते चले गये। खिड़की से  झांकता चाँद मुस्करा दिया।
- किरण बरनवाल
शैक्षणिक योग्यता:बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक
जमशेदपुर  , झारखंड

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