प्रवासी भारतीयों में हिन्दी की कहानी – संपादन – डा० सुरेन्द्र गंभीर और डा० वशिनी शर्मा

प्रवासी भारतीयों में हिन्दी की कहानी पुस्तक में तेरह देशों में विरासती हिंदी भाषा के संरक्षण और ह्रास का विवरण है। विभिन्न विद्वज्जनों द्वारा भाषा-विज्ञान की दृष्टि से लिखे गए इन लेखों के देशों में छः गिरमिटिया श्रमिकों के देश हैं, पांच पश्चिमी सभ्यता वाले देश हैं और दो एशिया के देश हैं। हिन्दी की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए भारत में हिन्दी जगत के तीन विशेष पक्षों पर अधिकारी विद्वानों द्वारा लिखे गए लेख भी इस पुस्तक के परिशिष्ट में सम्मिलित हैं। विषय-प्रस्तावना और भारत से बाहर के देशों के बारे में तेरह लेखों का केन्द्रीय बिंदु है – सामाजिक भाषा-विज्ञान की दृष्टि से विरासती भाषाओं की वर्तमान स्थिति, इतिहास और भविष्य के लिए संभावनाएं। कुछ लेखों में उन उन देशों में साहित्यिक गतिविधि के बारे में भी संक्षिप्त जानकारी है।

पुस्तक में लेखों की अनुक्रमणिका इस प्रकार है -
पुरोवाक् – डा० गिरीश्वर मिश्र
विषय-प्रस्तावना – डा० सुरेन्द्र गंभीर
मारीशस – डा० विनेश हुकूमसिंह
गयाना – डा० सुरेन्द्र गंभीर
त्रिनिदाद – डा० विशम भीमल
सूरिनाम – डा० मोहनकांत गौतम
फ़ीजी – डा० बृजलाल और डा० रिचर्ड बार्ज़
दक्षिणी अफ़्रीका – डा० उषादेवी शुक्ल
आस्ट्रेिलिया – डा० रिचर्ड बार्ज़
ब्रिटेन – डा० कविता वाचक्नवी
अमेरिका – डा० विजय गंभीर
कनाडा – डा० शैलजा सक्सेना
न्यूज़ीलैंड – सुनीता नारायण
यू.ए.ई. – पूर्णिमा वर्मन
नेपाल – डा० मृदुला शर्मा
भारत (परिशिष्ट) -
हिन्दी की संवैधानिक स्थिति – डा० विजय मल्होत्रा
व्यवसाय में हिन्दी – डा० वशिनी शर्मा
हिंदी से जुड़ी तकनीकें और उनका प्रयोग – बालेन्दु शर्मा दाधीच
यह पुस्तक तीन वर्षों के परिश्रम का परिणाम है और आशा है यह जानकारी और निष्कर्ष विषय के ज्ञानवर्धन में अपना योगदान कर सकेंगे।
पुस्तक की पृष्ठ-संख्या – २३२
प्रकाशक – भारतीय ज्ञानपीठ
संपादन  - डा० सुरेन्द्र गंभीर और डा० वशिनी शर्मा
- अम्स्टेल गंगा परिवार

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