प्रतीक्षा मत करो

तुम्हारी आँखों में/उदासी का काजल
पिघलने लगा है/रिसने लगा है गाढ़ा द्रव
नदी का बहता पानी/झुलसने सा लगा है
तुम्हारी प्रतीक्षा की आँच से
………………………….
मत करो प्रतीक्षा/गुम हो जाने दो
अपना रेशा-रेशा दुःख/इन खामोश वादियों के
चीखते सन्नाटे में और जी लेने दो इन्हें
तुम्हारा मखमली संवेदन
…………………………..

तुम्हारे आँसू इससे पहले कि/कर दें नमकीन
पहाड़ी नदी के पानी का स्वाद
इनकी फुहारों से सींच दो/शब्दों के बीज
के अंकुरित होके/जी उट्ठेंगे
तुम्हारे ख्याल/फिर से
और इन सुहानी वादियों में
खिल जायेंगे/वफ़ा की टहनियों पे
उमंगों के फूल
………………………….
मत करो प्रतीक्षा
उस शापित दुष्यंत की
जो तुम्हे नही चीन्हता
वो प्रेम जो एक अंगूठी की
मिथ्या परिधि में लपेटा गया हो
तुम्हे कैसे स्वीकारेगा
समय साक्षी है/तुम शकुन्तला हो
और वही रहोगी/सृष्टि के अंतिम छोर तक
किन्तु वो नही दुष्यंत/तुम्हारा शकुंतले
बचे-खुचे साहस को समेटो……
और निकाल फेंको उसे/अपने विचारों के दायरे से
मुक्त हो जाओ/इस भ्रम जाल से
………………………………………..
देखो कैसे/झरता है हरसिंगार
फूलता है मोगरा/फिर-फिर/हर बार
तुम भी वल्लरी सी झूम जाओ
बन जाओ फिर से/कण्व-दुहिता
प्रकृति तुम्हे समेटने को आतुर/बाहें पसारे
वन-लताएँ/ पहाड़ी झरने तुम्हे
चूमना चाहते हैं…..उठो और दौड़ कर
पकड़ लो समय की इस धारा को
जो आकाश की झिर्री से झाँक रही
तुम्हारी ओर
आओ और जी भर के जिओ/अपने हिस्से का आकाश
केवल अपने लिए

 
- आरती तिवारी

जन्मतिथि- ८ जनवरी

शिक्षा- एम. ए., बी. एड.

सम्प्रति- पूर्व अध्यापिका केन्द्रीय विद्यालय पचमढ़ी

प्रकाशन- नई दुनिया, दैनिक भास्कर जैसे प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में कविताएँ/आलेख व पत्र प्रकाशित ,साहित्य सरस्वती, वीणा सृजन की आंच, शब्द प्रवाह, हस्ताक्षर जैसी कई साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित

One thought on “प्रतीक्षा मत करो

  1. बहुत बढ़िया कविता ।शापित दुष्यंत को छोड़ना ही होगा ।बधाई आरती ।

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