प्रतिमा

औरत ! जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं होती । जिसका कोई वजूद नहीं होता ।जिसकी आत्मा मर चुकी होती है । और जिसे ज्यादातर उसके पिता,भाई,पति और बच्चों की वजह से जाना जाता हैं । जिसके जिंदा रहने का मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने परिवार की खुशी होती है ।

औरत अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकती । उसे हर दम,हर वक्त एक अनजाने डर का सामना करना पड़ता है । उसे हमेशा लड़ना पड़ता है – अपना वजूद,अपना आत्मसम्मान तथा अपनी इज्जत बचाने के लिए ।

इसी कारण प्रतिमा अपने माता-पिता, पति, पड़ोसी सबकी नजर में बुरी बन गयी थी । उसकी गलती बस इतनी थी कि वह अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी । अपनी जगह बनाना चाहती थी । इस गुमनाम अंधेरे से बाहर निकलना चाहती थी । उसे रौशनी की तलाश थी, जो बहुत ही धुंधली नजर आ रही थी । और इस धुंधली रौशनी में उसकी मंजिल की तरफ जानेवाला रास्ता बहुत ही अस्पष्ट सा दिखाई दे रहा था ।

प्रतिमा असमंजस में थी ।  उसे यह पता ही नहीं चल रहा था कि वह सही कर रही है या गलत ! जिस रास्ते पर चलने का निर्णय उसने लिया था, उसमें अडचणे तो बहुत थी । उसे पता था कि यह राह इतनी आसान नहीं होगी ।

प्रतिमा को यह समझ में नहीं आ रहा था कि खुद का व्यक्तित्व निर्माण करना क्या इतना बड़ा गुनाह है ?  जो औरत पूरी जिंदगी दूसरों के लिए जीती है , क्या उसे अपने लिए जिने  का कोई हक नहीं है ? सोचते सोचते कब वह समंदर के किनारे पहुंची, उसकी समझ में ही नहीं आया । सागर की लहरें शांत थी, पर प्रतिमा के मन में जो सवालों का सैलाब उमड़ रहा था, उसकी आवाज न कोई सुन सकता था और न ही कोई समझ सकता था ।

प्रतिमा को न चाह थी ऊँचे नाम की और न ऊँचे पद की, उसे चाह थी तो बस अपना अस्तित्व बनाने की ! पूरी जिंदगी प्रतिमा ने अपने परिवार के लिए कुरबान की । अब वह खुद की खुशी के लिए कुछ करना चाहती थी, जिसे लोगों ने बगावत तक की संज्ञा दे दी ।

प्रतिमा यह सोचने पर मजबूर हो गई थी कि लोग इतने स्वार्थी कैसे हो सकते है ?  किसी को नीचा दिखाना इन्हें इतना पसंद क्यूँ है ? और जब अपने ही हमारे खिलाफ खड़े हो जाते हैं, तो कोई जीवन में कैसे आगे बढ़ सकता है ?

विचारों का कोई अंत नहीं लग रहा था । प्रतिमा की आँखें आँसुओं से छलछला गयी । आँसू की दो बूंदें आँखों से छलककर समंदर में मिल गई । तभी उसने झट से अपने बहते आँसुओं को पोछा, उन्हें रोका और मन ही मन दृढ़ निश्चय किया कि अब वह खुद को कभी कमजोर बनने नहीं देगी ।

प्रतिमा का मन कुछ हलका हो गया । उसकी आँखों में एक तरह की चमक आ गई । उसके माथे की सिकुड़न कम हो गयी । उसके चेहरे पर का तनाव खत्म होता सा दिखाई देने लगा ।

प्रतिमा के पैर धीरे धीरे अपने घर की तरफ बढ़ने लगे । एक नयी उम्मीद, नए आत्मविश्वास, नए जज्बे के साथ ! उसने तय कर लिया कि  कितनी भी अड़चनें आएं, वह अपने इरादे से नहीं हटेगी । अपनी पहचान जरूर बनाएगी । और अपनों के साथ-साथ दुनिया को भी दिखाएगी कि औरत अगर ठान ले तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है । बस उसे चाहिए थोड़ा सा प्यार, भरोसे का साथ, प्रोत्साहन के दो शब्द और हो सके तो उसका सम्मान ।

 

  

प्रतिभा  स.बिळगी

जन्म : –  30-जुलाई
शिक्षा  : –  एम. बी. एड,  (पीजीडीटी),  (पी. एचडी)
व्यवसाय :– हिन्दी  प्राध्यापिका , रामय्या  इंस्टिट्यूट  ऑफ  बिजनेस  स्टडीज़ , बेंगलूर  560 054
प्रकाशित :– कविता  संग्रह  “जिंदगी  की  दास्तान
भाषा  सहोदरी  हिन्दी  दिल्ली , आधुनिक  हिन्दी  साहित्य  दिल्ली , प्रतिलिपि  तथा  अम्स्टेल गंगा  नीदरलैंड्स  जैसी पत्रिकाओं  में  कविताएं  प्रकाशित

विविध  कार्यक्रमों  में  कविता  पाठ
कई  राष्ट्रीय  तथा  अंतर्राष्ट्रीय  संगोष्ठियों  में  विविध  विषयों  पर  आधारित  आलेख  ISBN  में  प्रकाशित
लेखन  विधाएँ  :– हिन्दी  तथा  मराठी  भाषा  में  कविता  और  कथा  लेखन
स्थायी  पता :– सशांक  अपार्टमेंट, एम  एस  पाल्या , बेंगलूर  97

 

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