प्यार

भूल चुकी हूँ तुम्हें
पूरी तरह से ।
जैसे भूल जाते हैं बारहखड़ी
तेरह का पहाड़ा
जैसे पहली गुल्लक फूटने पर रोना
फिर मुस्काना
घुटनों पर आई पहली रगड़
गालों पे पहली लाली का आना
तितली के पंखों की गालों पर छुअन
टिफिन के पराठों का आचार रसा स्वाद…
पर जाने क्यों
दुआओं में एक नाम चोरी से चला आता है चुपचाप
घुसपैठिया कहीं का!

 

-डॉ छवि निगम

 

परिचय: एक शिक्षाविद के रूप में कार्यरत (नोयडा) , एक सम्वेदनशील सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता एवं एक उत्साही लेखिका ।कई उत्कृष्ट रचनायें विशिष्ट पुरस्कारों से सम्मानित , हिंदी व अंग्रेजी दोनों ही भाषाओँ में अनेक विधाओं में सक्रिय लेखनरत-जिनमे विचारोत्तेजक एवं व्यंगात्मक लेख, कहानियाँ एवं कविताएँ शामिल है, जिनका सतत प्रकाशन विभिन्न समाचारपत्रों पत्रिकाओं व संकलनों में होता आ रहा है।

 

One thought on “प्यार

  1. मन को छू गई यह कविता प्यार। बहुत सुंदर अलंकृत अभिव्यक्ति। और अंत में उस घुसपैठिये का तो जवाब ही नहीं।बधाई डा.छवि निगम जी को ।

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