पेड़ों की छांव तले रचना पाठ” की ४६वीं साहित्य गोष्ठी सम्पन्न हुई

” प्रफुल्लित हो रहा तन मन , फुहारों ने छुआ आकर……….”
” खुशियों की बदरी छाई जब तुम आए / मन में गूंजीं शहनाई जब तुम आए… ”
“आ गया बारिश का मौसम प्यार कर / प्यार पर अब तू जहां निसार कर॥”
दिनांक 29 जुलाई ’ 2018, रविवार, वैशाली,गाजियाबाद
“ वर्षा ऋतु” विषय पर गीतों , कविताओं और गजलों से परिपूर्ण “पेड़ों की छांव तले रचना पाठ” की 46वीं साहित्य गोष्ठी वैशाली सेक्टर चार, स्थित हरे भरे मनोरम सेंट्रल पार्क में सम्पन्न हुई ।
एक सप्ताह से चल रही घनघोर बारिश के बाद चटक धूप में धुले पुंछे पूरी तरह से हरे रंग में रंगे सेंट्रल पार्क की मनमोहक हरियाली की शीतलता के बीच बड़ी संख्या में उपस्थित कवियों , साहित्यकारों व श्रोताओं ने शाम 4.30 बजे से प्रारंभ हुई कविता गोष्ठी में देर शाम 7 बजे तक कविता , गीत व गजल का पाठ किया ।
पेड़ों की छांव तले की इस मासिक गोष्ठी में डॉ वरुण कुमार तिवारी की अध्यक्षता में वरिष्ठ नवगीत कार जगदीश पंकज ने अपनी विशिष्ट शैली में प्रेम गीत पढ़ा “ प्रफुल्लित हो रहा तन मन / फुहारों ने छुआ आकर…. / विनय है बादलों से अब / झमाझम मेह बरसायें / बदन भीगे, नहाये मन / सखी! मल्हार मिल गायें / रहे आषाढ़ न सूखा / मगन सावन हँसे गाकर…” ।
गीतकार कन्हैया लाल खरे ने सावन में नायिका का कहा “ चमकि रही विजुरी बदरी बिच/ तुम्हरे अधरन की हंसि छाई / उमड़त गरजत घन जिय डरपावत / आइ मिलो डरि जाइ भुलाई …” वहीं संयोजक कवि अवधेश सिंह ने अपनी कविता के साथ कुछ बरसाती शेर पढे “ बरसात का असर है / भीगा हर एक शजर है / जो पास हो के गुजरा / दामन उसी का तर है । “ आ गया बारिश का मौसम प्यार कर / प्यार पर अब तू जहां निसार कर / भीग जा तू सर से लेकर पाँव तक / प्यार कर पर शर्त से इन्कार कर ।“ और श्रोताओं को मुग्ध किया । वयोवृद्ध कवि राम सनातन ने भाव विभोर कर देने वाले शिव पार्वती के शृंगार को सावन में उकेरा ।
युवा गीत गजल के सुपरिचित हस्ताक्षरों में मृत्युंजय साधक ने अपने अंदाज मे गीत “खुशियों की बदरी छाई जब तुम आए / मन में गूंजीं शहनाई जब तुम आए / अंबर की चिट्ठी बांचे कारी बदरी / सारी धरती इठलाई जब तुम आए…” परमजीत यादव ‘कम दिल’ ने पढ़ा “मौसम शहर का सुहाना है,/ मिलने का अच्छा बहाना है।
आओ कुछ पल मिलकर जी लें,/ फिर चले जाना जहां जाना है।“ कवि केशव प्रसाद पाण्डेय व ने बारिश पर रूमानी रचनाएँ पढ़ी ।
हास्य कवि और चार लाइनों की क्षणिकाओं के लिए प्रशिद्ध प्रमोद मनसुखा ने पढ़ा –“ हम घर ले आये / लंगड़ा आम / विकलांगो की सहायता / पुन्य का का काम ॥“ , पड़ोसन, हो गयी शिफ्ट / मुफ्त मे गये /सब गिफ्ट । “ । कवि व टीवी पत्रकार अमर आनंद ने विपन्नता के सरोकार को व्यक्त किया “ ये कैसा फसाना है, कैसा ये फंसना / ये रोना, सिसकना, हवा में यूँ तकना / महसूस हो कैसे भिगोना औऱ भीगना…. मंज़िल के मिलने तक बहुत कुछ है सहना / मंज़िल की खुशी में है बारिश का बहना… काव्य पाठ ने प्रभावित किया ।कवियत्रियों में डॉ अंजु सुमन साधक के दोहे “बारिश के उत्पात को, कर देने को माफ़ /  हमने हँसकर कर लिया, तन-मन-घर को साफ़।।,  राहत -सामग्री लिखी, जाने किसके माथ ।/ हाथ पसारे दिख रहा, सारा ही फुटपाथ।। ने वाहवाही लूटी । वहीं नवोदित यक्षिता सिंह ने वर्षा गीत पढ़ा । आज रचनाओं के माध्यम से नायिका के चितवन व नायक की विवशता के बीच वर्षा ऋतु से संबन्धित वेदना संवेदना को व्यक्त किया गया ।वर्षा ऋतु से संबन्धित गीतों , कविताओं और गजलों ने गोष्ठी को नयी बुलंदियों से स्पर्श कराया ।
श्रोताओं में श्री कहानीकार मनीष सिंह , परिंदे साहित्यिक पत्रिका के संपादक टी पी चौबे की विशेष उपस्थिती में सर्वश्री रतललाल गौतम , कपिल देव नागर ,शत्रुघन प्रसाद , सी एम झा , पीयूष मिश्रा , राज देव प्रसाद सिंह , सतीश कुमार आदि प्रबुध श्रोताओं ने रचनाकारों के उत्साह को बढ़ाया ।
गोस्ठी के समापन पर आभार व्यक्त करते हुए इस गोस्ठी के संयोजक कवि लेखक अवधेश सिंह ने इस गोष्ठी की निरंतरता को बनाए रखने का अनुरोध करते हुए सबको धन्यवाद

 

- अवधेश सिंह , संयोजक

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