पुराने पन्नों से – मनोज भावुक की भोजपुरी अभिनेता कुणाल सिंह से बातचीत

भोजपुरी भाषा के हम कर्जदार बानी – कुणाल सिंह

भोजपुरी के लोकप्रिय अभिनेता कुणाल सिंह के फिल्म-समीक्षक लोग ‘भोजपुरी सिनेमा के अमिताभ बच्चन ‘ कहेला हालांकि कुणाल जी अपना के एगो साधारन कलाकार के रूप में देखनी। ई कुणाल जी के विनम्रता आ बड़प्पन बा। हालांकि ई बात त सांचे बा जे आज भी कुणाल जी के फिल्म में लिहल फायदा के सौदा ही मानल जाला। इहे वजह बा जे आज के फिल्म में भी (नया फिल्म मे) उहां के कहीं ना कहीं, कवनो ना कवनो रूप मे जरूर दिखाई पड़िले। माई के दुलार, सजना के अंगना, गांव-देस उहां के नया फिल्म ह । एह फिल्म के निर्मातालोग के कहनाम बा कि कुणाल जी के नाम पर फिल्म कुछ चलि जाला। पता ना ई बात केतना सांच बा? पर एह में एतना सच्चाई त जरूर बा कि सुजीत कुमार आ राकेश पाण्डे के बाद अगर केहू अपना दम-खम पर, अपना नाम पर भोजपुरी फिल्म चलावे में सफल भइल त ऊ एकमात्र नाम बा- कुणाल सिंह। कुणाल सिंह के भोजपुरी भोजपुर आ आरा-छपरा के भोजपुरी ह । उनुका में भोजपुरी माटी के संस्कार बा। भोजपुरी के हरेक रश्मोरिवाज से ऊ वाकिफ बाड़न । छोट-छोट बात के विश्लेषण ऊ भोजपुरिया अंदाज में करेलन । उनकर इहे गुण उनका के भोजपुरी फिल्म के सफल हीरो के रूप में स्थापित कइलस। हंसमुख आ मृदुभाषी स्वभाव के अपना एह लोकप्रिय अभिनेता से आज से 4 बरिस पहिले सन ई0 2002 मे कई बेर उनका निवास स्थान- पुनम दर्शन, अंधेरी(पूर्व) में भेंट-मुलाकात भइल आ रसगर, मनगर आ सारगर्भित बात-चीत भइल। प्रस्तुत बा बात-चीत के प्रमुख अंश-

भावुक- भोजपुरी सिनेमा के वर्तमान स्थिति से का रउरा संतुष्ट बानी।

कुणाल सिंह- ना, बिलकुल ना

भावुक-का वजह बा, एह निराशाजनक स्थिति के?

कुणाल सिंह -कई गो वजह बा-

पहिला- फिल्म इंडस्ट्री एगो हीरो के कंधा पर ना चलि सके । सुजीत कुमार आ राकेश पाण्डे के बाद हमरा के छोड़ के केहू उभर के ना आइल। हमहूं केतना दिन ले हीरो बनब। हमार एगो उम्र भइल। त उम्र के एह पड़ाव पर बाग बगइचा में हीरोइन के साथे हमार नाचल शोभा दी का? आज जरूरत बा एगो नया खोज के, जे लंबा पारी के खेल खेल सके। आ ओह प्रतिभा के भोजपुरिया समाज के बीच से ही खोजे के पड़ी, काहें कि उहे भोजपुरी के भोजपुरी के रूप में पर्दा पर उतार सकी। अब त जे पइसा लगावत बा, उहे भा ओकरे बेटा-भतीजा हीरो बनत बा। अइसन स्थिति में एगो प्रतिभा के खोज निकालल बड़ा मुश्किल काम बा आ जब ले एगो अइसन प्रतिभा खड़ा ना होई, जेकरा पर आंख मूंद के लोग विश्वास क सके, आपन पूंजी लगा सके, त हर बेर, हर फिल्म में नया-नया आदमी पर प्रयोग होत रही।एक्सपेरिमेंट के हम बुरा नइखीं मानत मगर कुछ निष्कर्ष त निकले। केहू उभर के त आवे,जेकरा मजबूत कंधा पर हमनी एह चालीस साल पुरान विरासत के भार सौंप सकीं।

दूसरा कारन बा- समुचित सरकारी सहायता आ आपसी संगठन के अभाव। शुरूये से भोजपुरी सिनेमा से सबंधित लोगन के अनेक तरह के कठिनाई के सामना करें के पड़ल बा। सबसे अफसोस के बात त ई बा कि उत्तर प्रदेश आ बिहार जइसन प्रांत, जे भोजपुरी भाषा के सबसे बड़ गढ़ ह, ओकरो सरकार भोजपुरी फिल्म के विकास पर ध्यान नइखे देत। तब होत ई बा कि भोजपुरी फिल्म के सामना सीधे हिन्दी फिल्म से हो जाता। सिनेमा हाल के टिकट के दर हिन्दी आ भोजपुरी दूनों खातिर बरोबरे बा। अब रउरे बताईं कि अइसन स्थिति में करोड़ो के बजट वाला हिन्दी फिल्म देखल लोग पसंद करी कि 20-25 लाख के बजट में बनल भोजपुरी फिल्म ।

तीसरा वजह बा कि आमतौर पर भोजपुरी फिल्म के जे दर्शक बा, ऊ गरीब बा, मजदूर वर्ग के लोग बा। पेट काट के केहू केतना फिल्म देखी? आ जब पेटे काट के देखे के बा त ओही पइसवा में हिन्दी सिनेमा काहें ना देखीं?

एह दौर के एको गो हिट फिल्म के राउरा नाम बताईं। कहां से हिट होई? देशी मुर्गी बिलायती बोल। रउरा भोजपुरी में आपन चीज ना देखाएव त के देखी? हिन्दी वाला चीज हिन्दी में ना देखीं? भोजपुरी बनावे के बा त भोजपुरी बनाईं, हिन्दी के नकल मत करीं। लेकिन एह घरीं नकलची लोग ढेर पैदा हो गइल बा। हिन्दी के नकल क के रउरा भोजपुरी फिल्म बनाइब त चली? ना चली त हिट फिल्म कहां से आईं?

एगो बहुत महत्तव्पूर्ण वजह बा- फिल्म के प्रचार-प्रसार। हम त ‘महाभोजपुर’ से पहिले भोजपुरी पत्रिके ना देखले रहनी हं । भोजपुरी फिल्म खातिर कवनो पेपर- पत्रिका ना। हिन्दी फिल्म के तमाम चैनल आ दूरदर्शन पर प्रचार-प्रसार होला, बाकिर भोजपुरी के कौन चैनल प्रचार-प्रसार करी।

हिन्दी फिल्म पर्दा पर टंगाये से पहिलहीं घर-घर में पहुँच जाला आ भोजपुरी फिल्म पर्दा पर टंगइलो के बाद पब्लिक के बीच ना पहुंचे। काहे? प्रचार-प्रसार के कमी से । इहां त फिल्म लागल बीबी नं0 1 त बीबी नं0 1, बीबी नं0 1बीबी नं0 1 एतना बेर कान में गूंज गइल आ आंख के सामने नाच गइल कि एकरा के मन से उतारलो मुश्किल हो गइल बाकिर कवन भोजपुरी फिल्म के साथे अइसन होला? त एह दिशा में भी गंभीरता से सोचे के जरूरत बा। एह समस्या के समाधान खातिर भोजपुरी चैनल के स्थापना पर विचार कइल जा सकेला।

भावुक- जी, बिल्कुल । हम रउरा से सहमत बानी। आज सख्त जरूरत बा एगो भोजपुरी चैनल के जवना पर भोजपुरी फिल्म, भोजपुरी टेलीफिल्म, सिरियल आ फिल्म प्रचार-प्रसार का साथे भोजपुरी के अउर भी बहुत सारा कार्यक्रम, न्यूज वगैरह देखावल जा सके। एह से दुनिया के पता चली कि आज भोजपुरी में का हो रहल बा आ भोजपुरिया संस्कृति के जड़ केतना गहरा बा। बाकिर एकरा खातिर पहल के करी, का कोई, कइसे होईं? रउरा एह लाइन के सफल आ समर्थ व्यक्ति बानी। रउरा से हमनी के अपेक्षा भी बा आ आग्रह भी कि रउरा एह दिशा मे गंभीरता से विचार करीं आ कुछ निष्कर्ष निकालीं।

कुणाल सिंह- जी, प्रयास चलता, आगे भगवान के मर्जी। अरे एगो समस्या नइखे नू। अब सिनेमा हाल के नियमो बदल गइल बा। एह दिशा में सोचे के जरूरत बा। पहिले नियम इ रहे जे पर डे के हाल के जेतना किराया बा, अगर ओकरा से दू-चार हजार भी अधिक आवता त फिल्म चलत रही, पर्दा पर से ना जाई।जइसे पर डे के किराया अगर 20 हजार बा त 25 हजार ले टिकट आवता त फिल्म चलत रही बाकिर अब फिल्म लगावे का पहिलहीं 80-90 हजार जमा करें के बा। इहो एगो बड़हन समस्या बा। दोसरा प्रदेश मे क्षेत्रीय फिल्म हाल में लगावे के बाध्यता बा। बिहार, यू.पी. में नइखे। एह से भोजपुरी फिल्म उपेक्षित बा। हम बहुत दुखी बानी। भोजपुरी सिनेमा के हमरा कवनो भविष्य नजर नइखे आवत । कवनो संभावना नइखे लउकत। जब लोग ना जागी, अपना मातृभाषा के प्रति प्रेम ना जागी, हीन भावना ना खतम होई। सरकार ध्यान ना दी, तब ले भोजपुरी के मालिक भगवाने बाड़न।

(थोडिका देर कुणाल जी आ हम खमोश रहनी। हम गंभीरता के तूरे के खियाल से बात के दिशा बदलनी)

भावुक- कुणाल जी, रउरा भोजपुरी फिल्म में सबसे अधिक केकरा से प्रभावित बानी?

कुणाल सिंह- लक्ष्मण शाहाबादी से। लक्ष्मण शहाबादी के कलम के बल पर केतना फिल्म भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में मील के पत्थर बनि गइल। उनका गीत-संगीत के जोड़ नइखे। उनका दुनिया छोड़ देला से भोजपुरी सिनेमा से गीत-संगीत खतमे हो गइल। ऊ हीरा आदमी रहलन हं। अब लक्ष्मण शहाबादी जइसन लोग कहाँ मिली? लक्ष्मण भईया बहुत दिलेर आ सहज-सरल आदमी रहलन हं, उनका एह सोझिया स्वभाव के बहुत लोग फायदा उठावल। कहाँ-कहाँ से पइसा जुटा के ऊ एगो फिल्म ‘दुल्हा गंगा पार के’ बनवलन। ओह में उनकर खूब शोषण भइल। ई हमरा से बर्दाश्त ना भइल आ एकरा खातिर निर्देशक से झगड़ो हो गइल। आज लक्ष्मण भईया नइखन बाकिर उनकर गीत-संगीत उनका के कबो मरे ना दी। लक्ष्मण भईया के बिना भोजपुरी सिनेमा के इतिहास अधूरा बा।

भावुक- जी, हमरा बहुत अफसोस बा, कि हम अइसन महान आ विलक्षण प्रतिभा से मिल ना सकनी। खैर हम एगो व्यक्तिगत प्रश्न पूछे के चाहत बानी। इजाजत बा? कुणाल सिंह- पूछीं-पूछीं, हमरा खातिर हर भोजपुरिया अपने बा। संकोच कइसन?


कुणाल सिंह अभिनीत प्रमुख भोजपुरी फिल्म-
धरती मइया, गंगा किनारे मोरा गांव, दुल्हा गंगा पार के, हमार भउजी, पिया रखिह सेनुरवा के लाज, बिहारी बाबू, दगाबाज बलमा, हमार दुल्हा, पिया टूटे ना पिरितिया हमार, गंगा-ज्वाला, बेटी उधार के, कसम गंगा जल के, चुटकी भर सेनुर,कब अइहें दुल्हा हमार, छोटकी बहू, हमार बेटवा , बैरी कंगना, घर-अंगना, चल सखी दुल्हा देखे, माई कसम, दुल्हा-दुलहिन, हक के लड़ाई, सात फेरे, साथ हमार- तोहार, पलकन के मेहमान, सुहाग बिंदिया, पिया बिन नाहीं चैन, राम जइसन भईया हमार, गोदना, माई के दुलार, गांव-देस, सजना के अंगना आदि।


भावुक- भाभी (आरती भट्टाचार्या) जे भोजपुरी फिल्म के पहिला महिला निर्देशिका बाड़ी, रउरा जीवन में कइसे अइनी? माने रउरा लव मैरेज कइनी कि अरेंज मैरेज। कुणाल सिंह-(मुस्मुरात) हमरा पहिलही बुझाइल ह जे कवनो खतरनाक सवाल ह । कोलकाता में ‘कल हमारा है’ (हिन्दी फिल्म) के शूटिग चलत रहे। हम ओह फिल्म में हीरो रहनी। आरती भी अभिनय करत रहली। शुरूआत में परिचय भइल आ आगे चली के ऊ परिणय में बदल गइल। अब एकरा के लव मैरेज कहीं चाहे अरेंज मैरेज।

भावुक- राउर शुरूआत हिन्दी फिल्म से भइल, भोजपुरी में काहें अइनी?

कुणाल सिंह- शुरूआत हिन्दी फिल्म (कल हमारा है) से भइल, ई सही बा, बाकिर भोजपुरी फिल्म ‘धरती मइया’ के अपार सफलता हमरा के भोजपुरी फिल्म में काम करे खातिर उत्प्रेरित कइलस। हमरा बुझाइल जे हम भोजपुरिये खातिर बनल बानी। हालांकि हम भोजपुरी के साथे-साथे दर्जनो हिन्दी फिल्म- नैन मिले चैन कहां, मुर्दे की जान खतरे में, घर-द्वार, माशुका, दोस्ती की सौगन्ध, बागी सुलताना, मुसीबत बोल के आए आदि आ कई गो बांगला फिल्म आ कई गो टी.वी सीरियल (हमारी परम्परा, राज, गीत-संगीत, डुप्लीकेट, ओ मारिया, काला सोना, सुजाता, अतीत आदि) में भी काम कइनी, बाकिर हमरा पहचान मिलल भोजपुरी फिल्म से ही, हम एह भाषा के कर्जदार बानी।

भावुक- जी, कोशिश करब ई कर्ज उतारे के, हालांकि महतारी के कर्ज आज ले केहू उतार नइखे सकल। मातृभाषा महतारिये लेखा होले।

कुणाल सिंह- बिलकुल। भोजपुरी में हम पइसा खातिर ना, एहू खातिर काम करत रहल बानी जे भोजपुरी फिल्म बनत रहो आ आगे भी हमार कोशिश रही कि हम भोजपुरी फिल्म-निर्माण मातृभक्ति लेखा करीं।

भावुक- जी, रउरा से बात-चीत क के मन गदगद हो गइल। बहुत बहुत धन्यवाद आ शुभकामना।

 

 

- मनोज सिंह ‘भावुक’  

 

 

लंदन एवं अफ्रिका में रहते हुए लेखन में सक्रिय भोजपुरी के लिये समर्पित ।नाटक में डिप्लोमा-

बिहार आर्ट थियेटर(पेरिस,यूनेस्को की प्रांतीय

इकाई), कालिदास रंगालय, पटना द्वारा संचालित नाट्य कला डिप्लोमा के टाँपर ।
.

प्रकाशित पुस्तक – तस्वीर जिन्दगी के (भोजपुरी गजल-संग्रह)

(इस पुस्तक के लिये मनोज भावुक को भारतीय भाषा परिषद सम्मान २००६ से नवाजा गया).

 

प्रकाश्य -

1. जिनिगी रोज सवाल (कविता-गीत संग्रह)

2.भोजपुरी सिनेमा के विकास-यात्रा

(मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन, सुजीत कुमार,

राकेश पाण्डेय, कुणाल सिंह,मोहन जी प्रसाद,

अशोक चंद जैन एवं रवि किशन सरीखे

दो दर्जन फिल्मी हस्ती से बात-चीत, इतिहास,

लगभग 250 भोजपुरी फिल्मों पर विहंगम दृष्टि,

भोजपुरी सिरियल एवं टेलीफिल्म आदि)।

3. भोजपुरी नाटक के विकास-यात्रा( शोध-पत्र)।

4. भउजी के गाँव (कहानी-संग्रह)

5.बादलों को चीरते हुए (अफ्रिका एवं यूरोप प्रवास की डायरी)

6.रेत के झील (गजल-संग्रह)

7.कलाकार [ नाटक]

 

नाट्य-रुपांतर व निर्देशन-

फूलसुंघी- भोजपुरी का लोकप्रिय व बहुचर्चित उपन्यास [ उपन्यासकार- आचार्य पाण्डेय कपिल ]

 

नाट्य -अभिनय व निर्देशन-

हाथी के दाँत, मास्टर गनेसी राम, सोना, बिरजू के बिआह, भाई के धन, सरग-नरक ,जंजीर,कलाकार,फूलसुंघी,
बकरा किस्तों का, इस्तिफा,ख्याति,कफन, मोल मुद्रा का, धर्म-संगम,बाबा की सारंगी, हम जीना चाहते हैं व नूरी का कहना है आदि।

 

अन्य कलात्मक सक्रियता-

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित।

रंगमंच,आकाशवाणी,दूरदर्शन में बतौर अभिनेता, गीतकार, पटकथा लेखक। ‘

पहली भोजपुरी धारावाहिक ‘ साँची पिरितिया’ में अभिनय ।

भोजपुरी धारावाहिक ‘ तहरे से घर बसाएब’ में कथा-पटकथा-संवाद-गीत लेखन।

पटना दूरदर्शन से एंकरिंग।

भरत शर्मा व्यास द्वारा भावुक के चुनिन्दा गजलों का गायन

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचो से काव्य-पाठ, व्याख्यान एंव भाषण ।

भारतीय रेडियो, दूरदर्शन और समाचार पत्र के अलावा

BBC LONDON से भी interview प्रकाशित-प्रसारित-प्रदर्शित ।

विश्व भोजपुरी सम्मेलन के आठवें राष्ट्रीय अधिवेशन में (४,५,६ अक्टूबर २००७ ) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में मंच संचालन, संयोजन व विषय-प्रवर्तन

 

सम्बदध्ता-

1. राष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्व भोजपुरी सम्मेलन (इंग्लैण्ड)

2.संस्थापक, भोजपुरी एसोशिएसन आँफ युगाण्डा (BAU),पूर्वी अफ्रिका

3. मंत्री, मारीशस भोजपुरी सचिवालय

4.पूर्व प्रबंध मंत्री, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना

5 . भोजपुरी की लगभग सभी संस्थाओं से जुडाव ।

6. U.K की एकमात्र हिन्दी पत्रिका पुरवाई और mauritius की पत्रिका बसंत में भी रचनायें संकलित

7. भोजपुरी की लगभग डेढ़ दर्जन पत्र पत्रिकाओं भोजपुरी अकादमी पत्रिका, भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका, समकालीन भोजपुरी साहित्य, कविता, पनघट, महाभोजपुर, पाती, खोईंछा, भोजपुरी माटी, पहरुआ, भोजपुरी संसार, भोजपुरी वर्ल्ड, पूर्वांकुर, विभोर, भैरवी, निर्भीक संदेश और द सण्डे इण्डियन (भोजपुरी ) में लेखन. रचनायें विभिन्न webmagzines में भी |

8. U.K Hindi Samiti के सदस्य

9. UK Moderator of Global Bhojpuri Group on The Net.

10. अमेरिकन बायोग्राफिकल इंस्टीच्यूट के रिसर्च बोर्ड आफ एडभाइजरी कमिटी के मानद सदस्य

11.Chife Editor, www.bhojpatra.net (An Online Bhojpuri Content Management System)

12. Editor, www.littichokha.com

13. विदेश संपादक, समकालीन भोजपुरी साहित्य
सम्मान-पुरस्कार-

भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, द्वारा भोजपुरी गजल-संग्रह ‘ तस्वीर जिन्दगी के’ के लिये —– सिनेहस्ती गुलजार और ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी के

हाथों भारतीय भाषा परिषद सम्मान 2006,

(भोजपुरी साहित्य के लिए पहली बार यह सम्मान ) ।

 

बिहार कलाश्री पुरस्कार परिषद द्वारा रंगमंच के क्षेत्र में विशिष्ट, बहुआयामी और बहुमूल्य योगदान के लिये—- बिहार कलाश्री पुरस्कार

 

अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना, द्वारा कविता के लिये — गिरिराज किशोरी कविता पुरस्कार

 

बिहार आर्ट थियेटर, कालिदास रंगालय, पटना, द्वारा —बेस्ट एक्टर अवार्ड

 

अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति, मथुरा, द्वारा काव्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिये — कविवर मैथलीशरण गुप्त सम्मान

 

अखिल विश्व भोजपुरी विकास मंच, जमशेदपुर द्वारा विदेशों में भोजपुरी के प्रचार-प्रसार हेतु — विश्व भोजपुरी गौरव सम्मान

 

वर्ष २००७ में दर्जनों साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा यथा भोजपुरी समाज सेवा समिति, काशी, माँ काली बखोरापुर ट्रस्ट, आरा, एवम् जीवनदीप चैरिटेबल ट्रस्ट, वाराणसी आदि द्वारा सम्मानित / अभिनन्दित.

अनुभव - क्रिएटिव कंसल्टेंट, ज़ी टीवी

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