पुनर्जन्म

 

इस वक्त यदि कोई उससे पूछ बैठे कि ज़िन्दगी की सबसे बड़ी सच्चाई क्या है तो वह शायद यही कहेगा कि मौत ही ज़िन्दगी की सबसे बड़ी सच्चाई है।दरअसल पिछले दिनों हुई पिताजी की मौत ने उसे बुरी तरह से तोड़ दिया है।उसे लगता है ज़िन्दगी का यही एक सबसे बड़ा सच है जिसके आगे इन्सान का कोई बस नहीं।

यों काफी दिन तक उसे यही लगता रहा था कि पिताजी मरे नहीं ज़िन्दा ही हैं।यहीं–कहीं गए होंगे लौट आएंगे।आगरा बुआ के पास जाते थे तो रात की गाड़ी से यहां पहुंचते थे।हो सकता है वहीं चले गए हों।शायद आज रात की गाड़ी से लौट आएं…।

यही सब सोचता हुआ वह रात देर तक छत की ओर टकटकी लगाए चारपाई पर पड़ा रहता है।कई बार उसे इस बात का भी आभास हुआ है कि दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी है।वह हड़बड़ा कर उठ बैठता है।दरवाज़ा खोल कर देखता है परन्तु वहां कोई नहीं होता।

वह अपने आप को समझाता है कि अब पिताजी नहीं आएंगे–कभी नहीं अपने हाथों से उसने उनका दाह–संस्कार किया फिर वे वापिस कैसे आ सकते हैं।

कभी–कभी उसे यह भ्रम भी सताता रहता है कि जिस व्यक्ति का उसने दाह–संस्कार किया वह पिताजी नही कोई ओर व्यक्ति था।उसकी शक्ल पिताजी से कुछ–कुछ मिलती थी।यह बात किसी भावुक क्षण में उसने शान्ता से भी कह दी थी तो वह चौंक सी पड़ी थी– कैसी बातें करते हैं आप अस्पताल में डाक्टरों ने चीर–फाड़ करके उनकी कैसी दशा कर दी थी।’ वह रोने लगी थी।

उसे ऐसा भी कभी–कभी लगता है कि कहीं इस आघात को न सह पाने के कारण वह विक्षिप्त तो नहीं हो रहा…?

पिताजी को अस्पताल तक ले जाने का तो याद है उसे लेकिन वह उन्हें वहां से कब और कैसे वापिस लाया था यह उसके ध्यान में नहीं आता।एक हल्का–सा स्वर उसके कानों में पड़ा था ‘योर फादर इज़ नो मोर

वह चिल्ला पड़ा था ‘नहीं…

‘तुम्हें खुद को संभालना होगा।यह तो प्रकृति का दस्तूर है जो आया है–वह एक–न–एक दिन तो जाएगा ही।दाह–संस्कार के बाद हवन के वक्त पण्डितजी उसे समझा रहे थे ‘यह तो शरीर है जो खत्म हो जाता है।आत्मा तो ज़िन्दा रहती है।किसी दूसरे के शरीर में प्रवेश कर जाती है।’ पण्डितजी की इन बातों से उसे थोड़ी शान्ति मिली थी।पिताजी ने भी दूसरा जन्म अवश्य ले लिया होगा।निश्चय ही कोई अच्छा रूप धारण किया होगा उन्होंने।इन्सान कर्मो के अनुसार ही जन्म पाता है विद्वान लोग यही तो कहते आए हैं।

अक्सर उसे लगता है पिताजी अपने नए रूप में किसी–न–किसी दिन अवश्य ही उसके सामने आ खड़े होंगे।लेकिन पिताजी कभी सपने में भी उसके सामने नहीं आए।कितने जाने–अनजाने लोगों की आकृतियां सपने में उसकी आंखों के आगे उभरती हैं परन्तु पिताजी का धुंधला–सा अक्स भी उसके सामने नहीं बनता।यही सोच–सोच कर वह परेशान हो जाता है।सुबह उठता है तो सिर पत्थर की तरह भारी हुआ होता है।आंखें अंगारे की तरह तप रही होती हैं।

‘क्या बात है रातभर सोए नहीं?’ शान्ता चाय का कप आगे बढ़ाती हुई पूछ बैठी थी आज।

‘नींद तो बहुत आई पर सारी रात अजीब अजीब सपने आते रहे।’

‘क्या पिताजी आए सपने में?’

‘नहीं यही सोच कर तो परेशान हूं। पिताजी क्यों नहीं आते सपने में?’

‘आप परेशान क्यों होते हैं जी।कल मेरे मन में भी यही बात आई थी और मैंने पण्डित जी से पूछा था।’

‘फिर? क्या कहा पण्डितजी ने?’ वह उतावला–सा हो आया था।

‘पण्डितजी कह रहे थे पिताजी साधु बन गए।उन्हें मुक्ति मिल गई।’

‘हां–हां उन्हें मुक्ति मिल गई।पिताजी मर गए तो उन्हें मुक्ति  मिल गई।मुक्ति उन्हें मिल गई या हमें?’ वह सिर पकड़ कर फफक पड़ा था।

शान्ता कांप कर रह गई थी।करीब आकर उसके बालों को सहलाने लगी थी ‘आप धीरज रखिए।होनी को कौन टाल सकता है।’

शान्ता के सहलाने से उसे राहत मिली थी।पर उसका मन हुआ था एक बार खूब रो ले।जी भर कर रो ले।शान्ता कह रही थी ‘ देखिए आप खुद को नहीं संभालेंगे तो हमारा क्या होगा।बच्चे आपको सारा दिन उदास देखते हैं तो भीतर–ही–भीतर घुलते रहते हैं।हमें अपने लिए नहीं इनके लिए जीना है।’

हमें इनके लिए जीना है? नहीं–नहीं यह सब बकवास है।जीने के लिए आदमी कोई न कोई बहाना ढूंढ लेता है।

इस वक्त शान्ता उसे बिल्कुल पराई लगने लगी थी।शान्ता उसके दर्द को जरा भी नहीं समझ पाई।समझ पाती तो यह बात कदापि न कहती।

सहसा उसकी नज़र चारपाई पर बैठे बिट्टू की ओर उठ गई थी।निरीह–सा बिट्टु उसकी ओर ताक रहा था।पता नहीं बिट्टु कब से उसकी ओर देख रहा था।वह बिट्टु के सामने खुद को छोटा महसूस करने लगा।उसे लगा वह सच में भावुक हो आया था।

अब शान्ता की बातें उसे बिल्कुल सही लगने लगी थीं।उसने एक नज़र भर कर शान्ता की ओर देखा फिर आगे बढ़ कर बिट्टु को उठा लिया।हां हमें इन्हीं के लिए जीना है–वह सोचने लगा था।

उसके एकाएक बदले व्यवहार पर शान्ता हैरान हुई प्रसन्न भी।चारपाई से उठती हुई बोली ‘आफिस के लिए तैयार हो जाईये मैं नाश्ता लगाती हूं।’

वह बिट्टु को आंगन में छोड़ खुद गुसलखाने में चला गया।नहा–धोकर बरामदे में आईने के सामने आ खड़ा हुआ था।इतने दिनों बाद उसे आईने में अपना चेहरा एकदम से साफ नज़र आया।पिताजी की मौत के बाद जब कभी भी वह आईने के सामने आयाउसे यही लगता आईने के सामने वह खुद खड़ा होने के बावजूद वह खुद नहीं खड़ा है।

आईने के और पास सट गया था वह।गौर से अपने चेहरे को देखने लगा था।शान्ता कल ही कह रही थी ‘अपनी सेहत का जरा ध्यान रखिए।’

क्या हो गया है उसकी सेहत को? सच में चेहरा कितना पीला पड़ आया है।आंखें कैसे भीतर को धंस गई हैं।उसे लगा था पिताजी के प्रति अपने प्यार को वह उनके बाद ही जान सका है।सामने खूंटी से टाई उतारते–उतारते रूक गया वह।पिछले तीन माह से यही सब तो हो रहा है।वह टाई उठाता है फिर रख देता है।उसका मन ही नहीं करता यह सब पहनने को।पिताजी को गुज़रे दिन ही कितने हुए हैं।अभी से ‘अप–टु–डेट’ होकर बाहर निकलेगा तो लोग क्या सोचेंगे।परन्तु उसे पिताजी का वाक्या याद आ जाता है–ए मैन इज़ नोन बाई हिज़ परसनैलिटी।

उसने एक झटके से टाई खेंची और गले के चारों ओर ले जाकर बांधने लगा था।

आईने से चेहरा हटाया तो शान्ता से आंखें दो–चार हो गयीं।शान्ता उसकी टाई की ओर ही देखने लगी थी।

शान्ता को शायद अच्छा नहीं लगा है।ख्वामखाह टाई के चक्कर में पड़ गया।न भी बांधता तो कौन–सी आफत टूट पड़ी थी भला।शान्ता को बुरा तो लगा ही साथ मुझे शिकायत सुननी पड़ेगी सो अलग।

परन्तु शान्ता कुछ नहीं बोली थी।न ही उसके चोहरे पर उदासी या शिकायत जैसा कोई भाव था।मुड़ते हुए बोली ‘नाश्ता लगा दिया है टेबल पर आ जाइये।’जूतों पर ब्रश फेर वह डाईनिंग–रूम में आ गया।टेबल पर एक गिलास दूध प्लेट में दो परांठे और बड़ी कटोरी में हलवा रखा था।

हलवा उसकी कमज़ोरी है।पिछले एक माह से शान्ता उससे कई बार हलवा बनाने को पूछ चुकी थी परन्तु उसने मना कर दिया था।हलवा खाना तो दूर उसे देखना मुश्किल लग रहा था।बस यही लगता उसे हलवा जीभ पर रखते ही उबकाई आ जाएगी।पर आज ऐसा कोई भी एहसास उसके मन में नहीं आया।बड़े आराम से हलवा खाया उसने।

‘मौण्टु अभी तक नीचे नहीं आया?’अलमारी में से बैग निकालते हुए उसने शान्ता से पूछा।

‘कल इम्तिहान है उसका पढ़ रहा होगा।’

‘कल इम्तिहान है तुमने पहले नहीं बतलाया ऊपर जाकर देख तो लेती किसी चीज़ की ज़रूरत हो उसे।’ शान्ता के भीतर ही हंसी का फव्वारा छूटा था।आज इन्हें बच्चों का ख्याल कैसे आ गया।दस दफा बच्चों की शिकायत करती थी फिर भी सुनवायी नहीं होती थी।हर बार एक ही जवाब मिलता था ‘पिताजी से बोल दो जाकर।मैं बिज़ी हूं। प्लीज़ डोंट डिस्टर्ब मी।’

पिताजी के दम से ही मौण्टू पिछले वर्ष कक्षा में प्रथम आ गया था।वरना उसके होते हुए तो शायद पास भी न हो पाता।

पिताजी के चले जाने का जितना दःख उसे हुआ था उतना ही शान्ता को।अब कैसे चलेगा यह घर? शान्ता सोच–सोच कर परेशान थी।मौण्टु की पढ़ाई घर–भर का राशन–पानी बगीचे की देखभाल… कौन करेगा यह सब?

उसे तो इन कामों में शुरू से ही रूचि नहीं थी।पिताजी लाख समझाते थे ‘घर के कामों में भी थोड़ा ध्यान रखा करो।आठ घण्टे दफ्तर में जाकर कुर्सी तोड़ ली और दोस्तों के साथ घूम–फिर लिया यही तो ज़िन्दगी नहीं।’

पिताजी की इन बातों पर मन–ही–मन खीज उठता था वह।परन्तु अब ये बातें रह–रहकर उसे याद आती हैं और पिताजी को सामने पाने के लिए वह तड़प–तड़प उठता है।

ऑफिस पहुंचा तो वर्माÊ हरिकृष्ण सैनी सभी रजिस्टर खोले अपने–अपने काम में लगे थे।क्या बात ये लोग आज जल्दी कैसे आ गए? उसने घड़ी की ओर नज़र डाली पूरे बीस मिनट लेट हो चुका था वह।रास्ते भर जाने कैसे–कैसे विचारों में उलझा रहा था कि साइकिल की गति इतनी धीमी हो गई थी जिसका उसे आभास तक नहीं हुआ था।

ऑफिस में देरी से पहुंचने के कारण वह काफी शर्मिन्दगी महसूस कर रहा था।अपनी सीट पर जाने की बजाए वह सीधा मैनेजर साहब के कमरे में गया‘सर मैं बीस मिनट लेट हो गया हूं।ऑय एम रियली सॉरी फार दैट।’ मैनेजर अवाक् उसे सर से पांव तक देखने लगा था।ज़रा आगे को झुकता हुआ बोला ‘ क्या पहले ऐसा कभी नहीं हुआ?’

‘सॉरी सर आगे से ऐसा नहीं होगा।’

मैनेजर मन ही मन मुस्कराते हुआ बोला था ‘ दैट्स ऑल राईट’

गर्दन झुकाए वह चैम्बर से बाहर आ गया।उसे लगा था अब सभी उससे मैनेजर के पास जाने का कारण पूछेंगे।उसके कुर्सी पर बैठते ही वर्मा बोला था ‘क्यों धीरेन तुम पुनर्जन्म में विश्वास रखते हो?’

सुबह–सुबह ऑफिस में कैसा विषय चल रहा है यह जानकर उसे आश्चर्य हुआ।यों पिछले तीन माह से इसी सवाल को लेकर उसके भीतर द्वन्द्व मचा हुआ था।पुनर्जन्म होता तो पिताजी अब तक किसी–न–किसी रूप में उसके सामने अवश्य आ गए होते।

‘पुनर्जन्म सब झूठ है’वह एकदम से आवेश में आ गया।

‘तुम क्या सोचते हो पुनर्जन्म के बारे में?’ यह सैन्नी था।

‘खुद को झूठी तसल्ली देने की कोशिश।’ उसके इतना कहने पर सब ओर खामोशी थी।

दोपहर लंच के बाद वह अपनी सीट पर आया तो वर्मा ने चुटकी ली ‘क्यों भई सुना है आज सुबह तुम मैनेजर साहब को सलाम करने गए थे?’

वर्मा की बात का आशय वह समझ गया।तो मैनेजर साहब भी बात को पचा नहीं पाए।बिना कोई उत्तर दिए वह अपनी कुर्सी पर जा बैठा।

‘अब तो तुम्हारी प्रमोशन पक्की प्यारे’एक सम्मिलित ठहाका सारे दफ्तर में गूंज गया।

शाम को बाजार का चक्कर लगाते हुए वह घर पहुंचा था।घर पहुंचते ही उसे एक अजीब–सी टूटन का अहसास होने लगता है।थैले को शैल्फ पर रख वह बरामदे में पड़ी चारपाई पर आकर लेट गया।

‘क्या लाए हैं?’ शान्ता पास आकर थैले को उठाती हुई बोली।

उसके उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही शान्ता ने थैला चारपाई पर उलट दिया।

तीन–चार सब्जियां और बीजों के छोटे–छोटे पैकेट थे।

‘इनमें क्या है?’ शान्ता ने पूछा था।

‘मौसम जा रहा है पालक और सरसों के बीज लाया था।’

शान्ता की आंखों के आगे बगीचे की सूखी क्यारियां एकदम से लहलहा उठीं।मन–ही–मन प्रफुल्लित हो उठी थी वह।तेज़ी से किचन की ओर मुड़ती हुई बोली ‘मैं अभी चाय लाती हूं।’

चाय की काफी तलब महसूस हो रही थी उसे।शान्ता के चाय लाते ही उसने लपक कर प्याला पकड़ लिया।

‘मौण्टू की तैयारी हो गई?’ चाय सुड़कते हुए बोला वह।

‘गणित में कुछ कमी महसूस कर रहा है।सालाना इम्तिहान के लिए कुछ सोचना पड़ेगा।आप कहें तो ट्यूशन के लिए…?’ शान्ता कुछ डरती–डरती बोली थी।

‘नहीं मैं ही उसे रात को एक–दो घण्टा दे दिया करूंगा।’शान्ता का मन हुआ खुल कर हंस दे।ये पढ़ा पाएंगे भला।पिताजी लाख कहते रह गएÊ तुम्हारा गणित अच्छा है मौण्टू को पढ़ा दिया करो।पर इन्हें पुस्तकों और पत्रिकाओं से फुर्सत मिलती तब न।

चाय का खाली कप उठाकर शान्ता किचन में चली गई थी।थोड़ी देर बाद वह भी किचन में आ गया। फ्रिज में से मूली और टमाटर निकालकर वह सलाद बनाने लगा था।

आज भूख कुछ जल्दी ही लग आई थी उसे।शान्ता ने भी खाना पहले से कुछ जल्दी ही तैयार कर लिया था।वह खाना खा कर बिस्तर में आ गया।

शान्ता ने सोचा था वह आज थका हुआ है शायद।नींद आ रही होगी।परन्तु किचन समेट कर शान्ता कमरे में आई तो वह जाग रहा था।चारपाई पर अधलेटा–सा पड़ा कहीं शून्य में ताक रहा था।इस वक्त वह काफी आहत–सा लग रहा था।

शान्ता असमंजस में पड़ गई।अभी थोड़ी देर पहले तो चेहरे पर ऐसे भाव नहीं थे। ‘आपकी तबियत तो ठीक है न जी?’ शान्ता साथ वाली चारपाई पर लेटती हुई बोली।

वह सोते से जगा था जैसे।दरअसल कमरे में आते ही उसे सुबह ऑफिस में चला विषय ‘पुनर्जन्म’ वाली बात याद आ गई थी।और उस विषय के याद आते ही पिताजी का चेहरा उसके सामने आ खड़ा हुआ था।

बिना शान्ता की ओर देखे हुए वह बोला ‘एक बात पूछूं?’ उसकी आवाज़ इस तरह से घुटी–घुटी थी मानो किसी गहरी खाई के भीतर से बोल रहा हो।या फिर जो कहना चाहता था बड़ी मश्किल से कह पा रहा था।

‘पूछिए’ शान्ता ने खुद को सहज बनाए रखा।

‘तुम्हें पिताजी के चले जाने पर कैसा लगता है?’वह उसी रौ में बोला।

शान्ता फटी–फटी आंखों से उसकी ओर देखने लगी।यह भी कोई सवाल हुआ।किसी एक के चले जाने पर दूसरे को कैसा लग सकता है.।घर का जानवर भी चला जाए तो आदमी को दुःख होता है।फिर इन्सान तो इन्सान ही है।

शान्ता चुप रही तो वह ही बोला ‘तुम्हे नहीं लगता कि पिताजी के चले जाने पर हमारा जीवन कितना आसान हो गया है।’

शान्ता एकदम से जड़–सी हो आई थी।वह ही बोलाÊ ‘कितनी भाग–दौड़ हो आई थी हमारे जीवन में।पिताजी के लिए कभी ये कर कभी वो कर…’ जरा रूक कर बोला ‘ कुछ करते थे तब भी पिताजी को सन्तुष्टि कहां होती थी।उन सब तकलीफों से मुक्ति मिल गई हमें।’

‘ऐसा क्यों कहते हो जी शान्ता का डूबता हुआ स्वर था ‘वह तो एक बाहरी दौड़ थी।टूटता तो आदमी भीतर से है।और वह भीतर की दौड़ अब शुरू हुई है।’

उसे आज पहली बार लगा कि शान्ता उसके दर्द में पूरी तरह से शरीक है।काफी हल्का महसूस करने लगा था वह खुद को।करवट बदलते हुए बोला ‘सुबह जल्दी जगा देना मुझे।’

‘क्यों?’

‘आज बीज लाया था न।सुबह क्यारियां तैयार करनी हैं।’

शान्ता से रहा ही नहीं गया।बोली ‘एक बात कहूं जी?’

‘कहो’ शान्ता के एकदम से बदले लहजे पर वह जरा सोच में पड़ गया था।

‘आप तो बिल्कुल पिताजी हो गए हो।’

वह पिताजी हो गया है शान्ता की बात का अर्थ वह पूरी तरह से समझ नहीं पाया।वह पिताजी कैसे हो गया है भला।देर तक इसी बात को लेकर उलझा रहा था।

शान्ता की आंख लग गई तो वह बिस्तर पर से उठ खड़ा हुआ।भीतर जाकर आईने के सामने खड़ा हो गया।आईने पर नज़र पड़ते ही वह अवाक् रह गया… आईने में पिताजी का ही अक्स था।

 

- विकेश निझावन

अब तक देश की लगभग सभी पत्र–पत्रिकाओं ‘धर्मयुग , साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका, हंस, कादम्बिनी, कथाबिम्ब, वर्तमान साहित्य, कथादेश, रूपकन्चन, वागर्थ, हिन्दी चेतना, गगनांचल, सरिता, नवभारत टाईम्स, शिखर, कथाक्रम… आदि में दो सौ से ऊपर कहानियां एवं कविताएं प्रकाशित।

दस कहानी संग्रह , चार कविता संग्रह, दो उपन्यास तथा एक लघुकथा संग्रह तथा कुछ बाल पुस्तकें प्रकाशित।

कहानी संग्रह : हर छत का अपना दुःख , अब दिन नहीं निकलेगा, महादान, आखिरी पड़ाव, कोई एक कोना, गठरी, महासागर, मेरी चुनिंदा कहानियां, कथापर्व, मातृछाया आदि।

कविता संग्रह: एक खामोश विद्रोह, मेरी कोख का पांडव, एक टुकड़ा आकाश, शेष को मत देखो। लघुकथा संग्रह– दुपट्टा, उपन्यास–मुखतारनामा।

सम्मान: कहानी संग्रह ‘अब दिन नहीं निकलेगा’ एवं कविता संग्रह ‘एक टुकड़ा आकाश’ हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत। कुछ कहानियां राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत।

कहानियां न चाहते हुए, ऊदबिलाव, एक टुकड़ा ज़िंदगी का दूरदर्शन पर नाट्य रूपान्तर। आकाशवाणी से कहानियों एवं कविताओं का नियमित प्रसारण।

कुछ कहानियों का गुजराती, अंग्रेजी, पंजाबी, तेलगू एवं उर्दू में अनुवाद।

‘विकेश निझावन का जीवन एवं साहित्य’ पर कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से छात्रा सोनिया राणा को पी .एच ड़ी .की उपाधि प्राप्त।

साहित्यिक पत्रिका ‘पुष्पगंधा’ का सम्पादन।

संपर्क: अम्बाला शहर–134003

One thought on “पुनर्जन्म

  1. “Its very realistic and beautiful story. Congratulations to the writer.”

    अनुवाद : यह बहुत इस वास्तविक और सुन्दर कहानी है । लेखक को बधाई ।

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