पिता

 

तुम कभी हो
विस्तृत आकाश से,
कभी लगते
एक दिव्य प्रकाश ।
माना तन में
कोई कोख नहीं है
मन में किया
एक गर्भ -धारण
अपना अंग
स्वेद से सींचते हो ।
शिशु के संग
दिवसावसान में
करते क्रीड़ा,
कल्पवृक्ष से तुम
हरते पीड़ा।
तेरा अनन्त ऋण
युग भी बीते
कोई चुका ना पाए,
आज पिताजी
बहुत याद आए,
उस तारे से
झाँकते मेरा घर
आशीर्वाद देकर ।

 

- ज्योत्स्ना प्रदीप

शिक्षा : एम.ए (अंग्रेज़ी),बी.एड.
लेखन विधाएँ : कविता, गीत, ग़ज़ल, बालगीत, क्षणिकाएँ, हाइकु, तांका, सेदोका, चोका, माहिया और लेख।
सहयोगी संकलन : आखर-आखर गंध (काव्य संकलन)
उर्वरा (हाइकु संकलन)
पंचपर्णा-3 (काव्य संकलन)
हिन्दी हाइकु प्रकृति-काव्यकोश

प्रकाशन : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन जैसे कादम्बिनी, अभिनव-इमरोज, उदंती, अविराम साहित्यिकी, सुखी-समृद्ध परिवार, हिन्दी चेतना ,साहित्यकलश आदि।

प्रसारण : जालंधर दूरदर्शन से कविता पाठ।
संप्रति : साहित्य-साधना मे रत।

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