पार उतरना धीरे से…

सूरज सिर पर था। धूप में नदी का पानी ऐसे चमक रहा था मानो नदी न हो, चाँदी की कोई चादर धीरे-धीरे हिल रही हो। पानी की सतह से उठती भाप ने धरती और आसमान के बीच एक झीना पर्दा तान दिया था, जिससे उस पार की हर चीज़ धुंधली दिख रही थी। रातना कमैती के मन में भी आस्था-अनास्था के बीच, ऐसा ही एक झीना-सा पर्दा पड़ा था। वह बार-बार सिर झटक कर उस पर्दे के पार देखने की कोशिश कर रही थी, पर सब कुछ धुंआ-धुंआ था। दाहिने हाथ में दबा तीन दिन का बच्चा ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था। तभी एक ‘घच्च,…घूँ…उँ,’ की आवाज़ के साथ रक्त की बूँदें उसके मुँह पर पड़ी थीं। रक्त का एक फब्बारा-सा उड़ा था, जिसके कुछ छीँटों ने नदी में बहती चाँदी को भी एक पल के लिए लाल कर दिया। आस्था के नाम पर कुछ बूँदें सूरज-चाँद और किसी अदृश्य शक्ति तक भी गई होंगी, पर रातना कमैती को केवल अपने पैरों के नीचे की खून से सनी हुई धरती ही दिख रही थी और उसे देख कर उसका सिर चकरा रहा था। वह जैसे समय की गति से पीछे छूटती जा रही थी। अनायास ही वह कई दिन-महीने लाँघ कर बिना किसी तारीख वाले अपने जीवन के एक सामान्य से दिन में जा पहुँची थी। रोज़ की तरह उस दिन भी वह भोर के काम निपटाते-निपटाते फिरकिनी-सी घर के हर कोने में घूम आई थी। वह थक गई थी, हाँफ़ गई थी और अभी दिन बीतना तो दूर पूरब में सुबह की चादर खुलनी शुरु भी न हुई थी। हाँ, आसमान रात के पकने से थोड़ा लाल ज़रूर हो गया था।

वह सुबह होने से पहले ही कुछ सोचे-समझे बिना किसी मशीन की तरह हज़ार काम निपटा लिया करती। उसे जाने-अनजाने भोर और उसकी प्राची बहुत भाती। इस समय आस-पड़ोस के हर आँगन में सन्नाटा रहता। केवल उसी के घर में उसके इतनी जल्दी उठ जाने से बर्तन-भांढ़े खड़कने लगते। इस समय उसका घर आँगन जागता और चारों तरफ़ दूर-दूर तक गली-मुहल्ला-चौपाल, कहूँ तो पूरा गाँव ही सोया रहता। धीरे-धीरे चिड़ियाँ चहचातीं, फिर ढ़ोर-बछेरू रंभाने लगते, रात भर चैन से सोई घिर्री के घड़घड़ाकर घूमने और बाल्टी के कुएं में उतरने की आवाज़े आने लगतीं। जैसे-जैसे यह आवाज़े तेज़ होतीं औसारे में बैठी रातना कमैती कुछ अनमनस्क होने लगती। वह मन ही मन सोचती कि रोज़ की तरह अभी गिद्धू झा की माई लाठी टेकती उसके घर के सामने से गुज़रेंगीं, थोड़ा ठिठक के भीतर की आहट लेंगी और फिर यह कहती हुई आगे बढ़ जाएंगी कि आस न औलाद, फिर न जाने कौन-सा नाज़ फटकती है कमैती इतने भिन्सारे और ऐसा ही होता। लगभग रोज़ ही कमैती उनकी यह बात सुनकर भी अनसुनी करती और भीतर आकर चापाकल पीटने लगती। भदभदाकर ढेर सारा पानी बाल्टी से उफ़न कर नाली में बह जाता। उसकी धोती घुटनों तक भीग जाती, पर वह भीतर-बाहर सूखी ही रहती। इससे पहले कि भोर का झुटपुटा दिन की चटक रोशनी में बदले, धूप की किरचें शीशे की चकमक-सी उसकी आँखों में चुभें, उन्हें चुंधियाएं और आस-पड़ोस के घरों के बच्चे जागकर अपनी आवाज़ों से उसके घर को अन्य घरों से अलग कर दें। वह कई लोटे पानी अपनी देह पर ढार देती।

दालान में पड़ी खाट पर सोए बीरन महतो, जबतक मुँह पर भिनभिनाती मक्खियों से आज़िज आकर, उठकर बैठते, तब तक कमैती नहा धोकर किसी दूध से धुली प्रतिमा की तरह साफ़-स्वछ हो, माथे पर बड़ी-सी बिन्दी लगा, मांग में सिंदूर भरकर तैयार हो जाती। धूप-दीप जलाती। भीतर के कोठरे में धरे भगवान जी के आगे मन ही मन बुदबुदाकर ढेर चिरौरी-बिनती करती। उसके बाद चूल्हा जलाकर बीरन महतो के लिए चाय चढ़ाती। वह एक बार में लोटा भर चाय पीते और चाय लोटे से प्याली में पलटते हुए कहते जाते, ‘जे चाय कि लत भी बुरी है, पर बिना इके सुबै का कारजक्रम स्टारट ही नाहीं होता’ अक्सर वह ऐसा कहने के बाद किसी अदृश्य व्यक्ति के सामने एक सवाल उछालते, ‘आखिर क्या किया जाए?’ फिर अनुत्तरित लौट आए अपने प्रश्न का स्वंय एक जवाब गढ़ते और गहरी और सीने में बड़ी देर से दबी साँस छोड़ते हुए कहते, ‘दुक्खों का संसार में कौनउ अंत नहीं है’ उनकी इस बात से कमैती का चेहरा थोड़ा मलिन पड़ जाता, पर वह जल्दी ही उसे अपने  पल्लू में छुपाकर काम में लग जाती।

कमैती लगातार कुछ न कुछ सृरजती, सहेजती रहती, पर उसे अपने हर काम में एक अधूरापन लगता। उसे लगता जैसे उसका मन उसकी देह से बाहर कहीं दूर टंगा हुआ है और उसकी देह एक भारहीन छाया-सी यहाँ-वहाँ मंडरा रही है। कैसे बैठे उसकी देह में गुरुत्व? कौन उतार लाए किसी अदृश्य टहनी पर टंगा मन? कैसे उसका साफ-स्वछ-सुंदर, पर पीला और उदास चेहरा लला उठे? कैसे आए कोख में भार? कैसे कोई ऐसी सुबह हो जिसमें वह धीरे से उतारे अपने पाँव धरती पर, एक धरणी के गौरव के संग? ये सभी प्रश्न हवा में तैरते उसके साथ-साथ चलते। कई बार तो ये प्रश्न इस तरह उसके कानों में गूँजते कि उसे कान पर चीखते आदमी की बात तक सुनाई देनी बंद हो जाती। ये प्रश्न इस तरह आँखों के सामने नाचते कि नाक की सीध में पड़ी चीज तक दिखाई न देती।

ऐसी ही अवस्था में एक दिन मंदिर घाट पर नदी में स्नान करके लौटते हुए कमैती को एक पत्थर से ठोकर लगी थी। उसके दाहिने पैर के अंगूठे का नाखून उखड़ गया था। तब लहूलुहान हो गए पाँव में रसूलन काकी की पतोहू, माने उनके बड़े बेटे की बीबी, मदीनी ने अपने पुराने सूती दुपट्टे से धंजी फाड़कर कमैती के अंगूठे पर बाँधी थी। उसने धंजी बांधते हुए कमैती के कान में कहा था कि ऐसी हालत में रास्ते के गड़हे-पत्थर न दीखना बाज़िव है। ऐसा उसके साथ भी होता था, जब तक उसकी गोद नहीं भरी थी।

कमैती मदीनी को पहले से जानती थी। वह यह भी जानती थी कि मदीनी अपने बियाह से पहले हिंदू थी। जात की कुम्हार, पर रसूलन काकी के बेटे से उसने भाग कर रिश्ता जोड़ लिया था। इस बात पर नीचे दोनो परिवारों में और शायद ऊपर दोनो मज़हबों के आलाकमानों में कई दिनों तक अच्छी-खासी ठनी रही थी। कई दिन तक मदीनी और उसके पति को अपने चाचा के खेत पर मड़ही डाल कर रहना पड़ा था। फिर एक दिन रसूलन काकी के भाई, जो हज करने के बाद सीधे काकी से मिलने आए थे, के कहने पर मदीनी को काकी के परिवार ने स्वीकार कर लिया था। मदीनी का यह नाम भी उन्हीं रसूलन काकी के भाई जान यानी ‘हाजी साब’ का दिया हुआ था। कमैती मदीनी को बहुत मानती थी। उसने दो-दो धर्मों पर इमान लाया था। वह एक जन्म में ही दो जन्म जी चुकी थी। उसके मन में धर्म की दोहरी मान-प्रतिष्ठा थी, पर इधर घर में सब कुछ ठीक हो जाने पर भी कोख तो मदीनी की भी कई दिनो तक नहीं भरी थी। उस दिन कमैती के पाँव के अंगूठे में धंजी बांधते समय मदीनी उसके कान में यह भी कह गई थी कि वह जानती है कि उसके दुखों का अन्त कैसे हो सकता है।

अंगूठे पर दूसरा नाखून आ जाने से कमैती की चोट तो कुछ दिन बाद ठीक हो गई थी, पर मदीनी की कही बात उसके मन में जस की तस बसी हुई थी। एक दिन बीरन महतो की ग़ैर मौज़ूदगी में वह मदीनी के घर जा पहुँची थी। मदीनी उसे देखते ही जान गई थी कि कमैती उसके पास क्यूँ आई है। कमैती के बिना कुछ कहे ही मदीनी ने कहा था कि वह बिलकुल चिन्ता न करे, देवी की अनुकम्पा से जरूर हरिया जाएगी उसकी गोद। बस वह जैसे-जैसे कहती जाए, वैसे-वैसे कमैती करती चले।

उसके बाद तो कमैती और मदीनी के बीच मिलने-जुलने का एक सिलसिला ही शुरु हो गया। जल्दी ही, मदीनी ने नदी किनारे मंदिर घाट वाले देवी के उसी मंदिर पर एक तन्त्रिक अनुष्ठान शुरू करा दिया, जहाँ से लौटते समय कमैती के पाँव में ठोकर लगी थी। महीनों चलने वाले इस तन्त्र-मन्त्र में जहाँ कमैती को लगातार दूध और फल का सेवन करना था वहीं उसके पति बीरन महतो को बीड़ी, सिगरेट, पान-तम्बाकू और शराब ही नहीं चाय तक से परहेज रखना था। कमैती तो उसकी बात एक बार में ही मान गई थी, पर बीरन ने इस सबका पालन करने में बहुत ननुकुर की थी। वह मदीनी की बातों पर आसानी से विश्वास नहीं करते थे, पर कहीं न कहीं बीरन महतो भी इस अनुष्ठान को अपने दुखों के अन्त के रूप में देख रहे थे। इसलिए उन्होंने भी कमैती के साथ पूरे जतन से देवी मंदिर से मिले निर्देशों का अक्षरश: पालन करना शुरु कर दिया। हालाँकि बीड़ी-शराब के बिना रहना तो फिर ठीक था, पर सुबह की चाय और खैनी के बिना उनका गुजारा बहुत मुश्किल था लेकिन अपनी किसी कमजोरी के कारण वह आने वाले समय को अन्धेरे में धकेलना नहीं चाहते थे, सो मन मसोस कर ही सही पर वह कमैती का साथ देने लगे थे।

करते-कराते किसी तरह उस बात को दो-महीने बीत गए। अब इसे किसी अदृश्य शक्ति का चमत्कार कहें, या दोनो की बदली हुई दिनचर्या और सही खान-पान का नतीजा, एक दिन जब कमैती ने मुँह अन्धेरे अपना पाँव धरती पर रखा, तो न धरती पहले सी थी और न उसका पाँव। वह जैसे-तैसे कमर पर हाथ रखकर उठी भी, तो उसे लगातार चक्कर आत रहे। उस दिन उसे मंदिर भी जाना था, पर न तो उसका कोई काम ही समय पर निपटा और न ही वह समय से तैयार ही हो सकी। यहाँ तक उस दिन इतनी देर हुई की बीरन महतो को बिना कुछ खाए ही काम पर जाना पड़ा।

उधर जब मदीनी मंदिर के बाहर बैठी कमैती की बाट जोहते-जोहते थक गई, तो खुद ही उसका हाल जानने उसके पास आ पहुँचीं। कमैती जहाँ मंदिर न जा सकने के कारण दुखी थी। वहीं मदीनी उसका हाल सुन कर खासी उल्लासित हो रही थी। उसने कमैती को गले लगाकर बधाई दी और बताया कि ऊपर वाले ने तेरी सुन ली। पहले तो एक पल को कमैती को अपनी किस्मत पर विश्वास ही नहीं हुआ, फिर मदीनी के अनुभव पर भरोसा करके वह भी हल्के से मुस्कराने लगी। मदीनी ने मौका देखकर उसे आगे की योजना के बारे में बताने से पहले विश्वास दिलाया कि तेरी गोद में देवी की कृपा से ही बीज ठहरा है, इसलिए तुझे आगे भी उनके आदेशों का पालन करते रहना है। कमैती को तो जैसे देवी की कृपा का साक्षात प्रमाण ही मिल गया था। अब तो वह कुछ भी करने को तैयार थी, पर उस रोज जो कुछ मदीनी ने आगे उससे कहा, वह सब करना उसके लिए लगभग नामुमकिन ही था, पर अब मदीनी की कही किसी बात को न करने की गुंजाइश ही नहीं थी। उस दिन उसने बड़े बुझे मन से उसे हाँ कहा और सोने चली गई, पर उसकी आँखों में नींद कही नहीं थी।

एक जीव को पाने के लिए दूसरे की जान लेने को उसका मन कतई तैयार नहीं था। उसे तो जीव की देह और आत्मा का इतना विचार था कि वह जब बियाह के आई थी तो ससुराल में लगे चापाकल का पानी तक नहीं पीती थी, बस किसी ने कह दिया था कि उसके भीतर चमड़े का बासर लगा होता है। बीरन महतो के खूब समझाने-बुझाने पर भी वह बड़ी मुश्किल से उस पानी को बरतने के लिए तैयार हुई थी। ऐसे में अपने स्वार्थ के लिए किसी जीव की हत्या! किसी की बली! यह ख्याल ही उसके लिए गले में कांटे की तरह था, पर साथ ही साथ कोख में जो पुलक थी, जो उभार था, वह  उसके मन में एक ऐसा मोह पैदा कर रहा था कि उसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार हो सकती थी।

बीरन महतो को जब यह ख़ुशख़बरी मिली तो उन्हें लगा कि दुख के बारे में सालों से उनके ही मुँह से निकलने वाली बात झूठी साबित हो गई है। उन्हें पहली बार भरोसा हो चला था कि दुख कितना भी बड़ा हो, उसका कभी न कभी अन्त अवश्य होता है, पर जब उन्हें कमैती की उदासी का कारण पता चला, तो वे उस पर बहुत हँसे। वह उसकी मनोदशा समझते थे। उन्हें याद था कि उन्होंने कमैती के घर में आने के बाद मांस-मछली खाना एक दम बंद कर दिया था क्योंकि कमैती जीव हत्या नहीं देख सकती थी, पर बाप कहलाने की ललक, सन्तान का लोभ, उसके इस संसार में आकर सुरक्षित बने रहने की आस के आगे उन्हें बच्चे के जन्म पर, उसके बाद जन्म लेने वाले किसी मेमने की बली देने की बात, किसी तरह से गलत नहीं जान पड़ती थी और फिर यह कोई ऐसा काम तो था नहीं कि जिसकी शुरुआत गाँव में उन्हीं से हो रही हो। औरों ने भी ऐसे तान्त्रिक अनुष्ठानों को मंदिर घाट पर देवी की विराट प्रतिमा के सामने पहले भी कई बार संपन्न करवाया था। इस विषय में वह कमैती की भावुकता को भी समझते थे, पर जैसे इस अनुष्ठान में उन्हें अपने कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर मिल रहे थे। इसलिए वह बिना कुछ कहे-सुने ही इसके लिए सहमत हो गए थे। अचानक मदीनी भी उन्हें  बहुत समझदार और उनके परिवार की हितैसी लगने लगी थी। उन्होंने शायद पहली बार मदीनी से बात की थी और बली के लिए कमैती की जचकी के बाद जन्मने वाले जीव का इन्तजाम करने का जिम्मा उसी के ऊपर यह कह के डाल दिया था कि उसकी सहेली के लिए सही-गलत, सब कुछ वह खूब समझती है, इसलिए वही यह सब देखे और रूपए-पैसे की रत्ती भर भी परवाह न करे।

रातना कमैती के दिन चढ़ने लगे थे। वह अब पहले की तरह उतनी सुबह नहीं उठ पाती थी। गिद्धू झा की माई, जो उसे सालों से ताने देती आई थीं, कमैती की दिनचर्या में आए बदलावों से सशंकित थीं। अब सुबह चापाकल बीरन महतो चलाने लगे थे। अब कमैती के गाल धीरे-धीरे ललाने लगे थे। वह भीतर से बहुत ख़ुश थी पर मदीनी की बली वाली बात याद आते ही उसका दिल बैठने लगता था, पर बीतते समय के साथ, धीरे-धीरे वह बात आई-गई हो गई और फिर वह दिन भी आ गया, जब कमैती को बच्चा हुआ। जचकी कराने में मदीनी, दाई से भी आगे रही। बच्चे की पहली किलकारी गूँजते ही, उसने टाठी पीट-पीट कर एलान किया कि कमैती के बेटा हुआ है और रूप-रंग में अपनी माँ को पड़ा है। गोरा-चिट्टा, सुंदर और फूल-सा कोमल। बस आँखें बीरन महतो जैसी हैं। बच्चे की सूरत देखके कमैती के अब तक के सब दुख-दर्द दूर हो गए थे, पर मनुष्य जैसे ही एक बाधा को लाघंता है, दूसरे की चिन्ता मन में आ बैठती है, सो दूसरे दिन से ही उसे देवी के मंदिर में तान्त्रिक अनुष्ठान में एक जीव की बली के साथ होने वाले समापन की चिन्ता सताने लगी। वह बार-बार अपना मन यही कहके समझा रही थी कि अब तक जो हुआ सब नियति का खेल था, सो आगे जो होगा वह भी उसकी नियति ही होगी, पर इतने भर से उसका मन शान्त नहीं हो रहा था। जब जचकी के दूसरे दिन, शाम को मदीनी ने उससे यह कहके विदा ली की कल का दिन बड़ा खास है और इस पूरे कारजक्रम का समापन कल नदी किनारे मंदिर घाट पर एक नन्हे मेमने की बली देकर करने का समय आ गया है। इससे बच्चे की सारी अलाय-बलाय टल जाएंगी और उसके परिवार के सारे दुख और कष्ट बली में बहने वाले रक्त के साथ मैया की कृपा से नदी में बहते हुए किसी और घाट जा लगेंगे। कमैती ने मदीनी की सारी बात सुन तो ली, पर जैसे उसी समय से उसके भीतर से कुछ फूटने और रिसने लगा, उस रात उसे किसी करवट नींद नहीं आई।

सुबह जब कमैती बुझे मन से बीरन महतो के साथ बच्चे को लेकर मंदिर पहुँची, तो मदीनी पूरे साजो-सामान के साथ पहले से ही वहाँ उपस्थित थी। उनके पहुँचते ही बड़े उत्साह से उसने अनुष्ठान के आखरी चरण की शुरुआत कराई और खुद कमैती के बेटे को अपनी गोदी में लेकर मंदिर के बाहर बैठकर उसकी आँखों में देखने लगी। मदीनी हिन्दू-मुसलमान दोनो के धर्म को मानती थी, सो दोनो में से किसी धर्म ने भी उसे एक सीमा से आगे प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी थी, पर मदीनी की मन्दिर-मस्जिद दोनो की देहरी के बाहर खासी चलती थी।

बीरन महतो और रातना कमैती हवन कुन्ड के आगे बैठे, आग में घी झौंक रहे थे। मंदिर के बाहर बजते ढोल-मजीरों से घाट की सीढ़ियों पर बंधे मेमने की देह रह-रहकर फड़क जाती थी। तभी एक ज़ोर के शंखनाद के साथ हवन के समापन की घोषणा हुई और कमैती और बीरन मंदिर से बाहर निकल कर सीढियों पर आ खड़े हुए। ढोल-मजीरे और तेज़ हो गए। मंजीरे बजाने वाले ने जेब से गुलाल लेकर हवा में उड़ा दिया। बीरन और कमैती के बाल गुलाल से रंग गए। अब सूरज सिर पर आ पहुंचा और नदी का पानी धूप से झिलमिलाने लगा। सीढ़ियों पर बंधे मेमने को खोलकर  उसपर पानी-फूल-रोली छिड़की जाने लगी। कमैती ने साँस साधकर मुँह फेर लिया। मदीनी ने कमैती की दशा भांपते हुए उसके दाहिने हाथ में उसके बेटे को पकड़ा दिया। भूख और सिर पर चटकती धूप से बच्चा बिलख-बिलख कर रोने लगा, पर कमैती आँखें मूंदे, दाँत भींचे नदी की ओर मुँह करे खड़ी थी। बीरन, सब कुछ अच्छे से निपट जाने से  चेहरे पर संतोष का भाव लिए निश्चिन्त से खड़े थे।

तभी अचानक मेमने का सिर घाट की सीढ़ियों पर लुड़क गया था।

न चाहते हुए भी कमैती के मुँह से चीख निकल गई। उसके सामने वही दृश्य था जिसे वह कभी देखना नहीं चाहती थी। उसके भीतर जैसे एक ही पल में सब कुछ सूख गया था। वह अपने भीतर से उठते किसी चीत्कार जैसे स्वर को सुनने की कोशिश कर रही थी, पर ढोल-मंजीरों के तेज़ स्वर ने जैसे उसे बहरा कर दिया था, अब उसे भीतर-बाहर का कोई भी स्वर सुनाई नहीं दे रहा था। माथे पर लगा गुलाल बहकर चेहरे पर फैल गया था। आँखें फाड़ने पर भी उसे चारों ओर खून के अलावा कुछ नहीं दिख रहा था। तभी मदीनी ने उसे जोर से झंझोड़ा और एक काली कसी हुई देह वाले आदमी ने बिना गर्दन के मेमने को लाकर कमैती के बाएं हाथ में पकड़ा दिया। उस आदमी ने लगभग चीखते हुए कमैती के कान में कहा इसे और बच्चे को साथ में लेकर धार में उतरना और मैया का नाम लेकर हाथ बदल लेना। बच्चे को दाएं से बाएं में ले लेना और इसे बाएं से दाएं में लेकर धार में छोड़ देना। मेमने की देह को पकड़ते ही कमैती को लगा था कि वह गर्दन कटने पर भी जीवित है, उसका दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा है। उसकी साँस अभी भी चल रही है। उसकी गर्दन से बहते लहू से कमैती का आँचल लिथड़ा जा रहा था। दाहिने हाथ में दबा बच्चा अभी भी रो रहा था। कमैती समय के पार किसी और संसार में विचर रही थी। मदीनी ने उसे हिलाते हुए कहा ‘देर न कर कमैती बच्चा बड़ी देर से भूखा है। नन्ही-सी जान कब से बिलख रही है’। मदीनी की बात सुनकर कमैती बिना कुछ कहे घाट की सीढ़ियाँ उतर कर तेज़ धार की ओर बढ़ने लगी। बीरन को ढोल-मंजीरे बजाने वालों ने घेर लिया। बीरन के नियम-संयम के दिन खत्म हो गए थे। वह अपनी अंटी में से पैसे निकाल कर खुशी से उन पर लुटा रहे थे। उधर कमैती घाट की सीढ़ियां उतरकर कमर डुबां पानी के तेज़ बहाव में पहुँच गई थी। मदीनी ने लगभग चीखते हुए कहा, ‘रुक जा कमैती, यहीं रुक कर हाथ बदल ले और मैया का नाम लेकर बहा दे इस जीव को’, पर जैसे कमैती तक मदीनी की कोई आवाज़ नहीं पहुँच रही थी। कमैती की हालत देख कर घाट पर खड़े सभी लोग अनिष्ठ की आशंका से आक्रान्त हो उठे थे। सहसा ढोल-मजीरे बजने बंद हो गए थे। बीरन जब तक कुछ समझ पाते तब तक कमैती ने हाथ बदला, बाँए हाथ का जीव दाँएं में किया और दाँए हाथ का बाँए में और बाँए का जीव लगातार तेज़ होती जा रही धारा में बहा दिया। मदीनी ने ज़ोर से छाती पीट ली। बीरन यह दृश्य देखकर सीढ़ी पर ही ढह गए। घाट से दो तीन तैराक धार में कूद पड़े, पर जीते-जागते भूख से रोते-बिलखते तीन दिन के बच्चे का धार में दूर-दूर तक कोई निशान नहीं था। कमैती बिना सिर के मेमने को छाती से लगाए घाट की सीढ़ियों पर बैठी विलाप कर रही थी, ‘ई देखा, इ अबहां जियतआ, मरा नाहीं है, हम साँची कहत हैंन, इ मरा नाहीं है’।

मदीनी अपने दोनो हाथ उठाए दो-दो मज़हबों के ख़ुदाओं से तेज़ धार की बली चढ़ चुकी नन्हीं-सी जान को बचाने के लिए गुहार  लगा रही थी।

थोड़ी ही देर में तीनो तैराक खाली हाथ घाट पर लौट आए थे। नदी धीरे-धीरे शान्त होकर सम पर बहने लगी थी। कमैती के होशो हवाश लौटने पर बिना किसी आवाज़ के उसका आर्तनाद हवा में नमी की तरह घुलने लगा था। उसको लग रहा था भोर हो रही है और गिद्धू झा की माई लाठी टेकती हुई उसकी ओर बढ़ रही हैं। वह कह रही हैं, आस ना औलाद फिर जाने कौन-सा नाज़ फटकती है, कमैती इतने भिन्सारे’। वह ज़ोर-ज़ोर से चापाकल पीट रही है। भदभदाकर पानी बह रहा है और उसी में बहा जा रहा है, उसका तीन दिन का बच्चा। कमैती भरे कण्ठ से, अपनी स्मृति के बहुत अंधेरे कोठर से एक गीत निकाल कर गा रही है, ‘पार उतरना धीरे से………धार उतरना धीरे से’।

 

- विवेक मिश्र

विज्ञान में स्नातक, दन्त स्वास्थ विज्ञान में विशेष शिक्षा, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्कोत्तर। एक कहानी संग्रह-‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’ प्रकाशित। ‘हनियां’, ‘तितली’, ‘घड़ा’, ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ?’ तथा ‘गुब्बारा’ आदि चर्चित कहानियाँ। लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व कहानियाँ प्रकाशित। साठ से अधिक वृत्तचित्रों की संकल्पना एवं पटकथा लेखन। ‘light though a labrynth’ शीर्षक से कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद राईटर्स वर्कशाप, कलकत्ता से तथा कहानिओं का बंगला अनुवाद डाना पब्लिकेशन, कलकत्ता से प्रकाशित।

संपर्क- मयूर विहार फेज़-2, दिल्ली-91

One thought on “पार उतरना धीरे से…

  1. अम्स्टेल गंगा परिवार को बधाई तथा मेरी कहानी ‘पार उतरना धीरे से’ प्रकाशित करने के लिए हृदय से आभार।

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