पारिजात की पूजा

नहा-धोकर पारिजात अपनी स्वर्गीय मां के शयनकक्ष के एक कोने में स्थापित चंदन की लकड़ी से बने पूजाघर के सामने जा बैठा. छुटपन से वह मां की बगल में बैठा कभी देवी-देवताओं को तो कभी अपनी श्रद्धानत मां को निहारा करता था. नियमित पूजा के अलावा, मां हर पूर्णमासी के दिन सत्यनारायण का और दोनों बच्चों के जन्मदिनों पर सुन्दरकाण्ड का पाठ करना नहीं भूलती थीं. पिता जब दौरे पर होते तो वह घर में रामायण का पाठ भी रखवाती थीं, जिसमें उनकी अंतरंग सहेली जयश्री आंटी और आस-पास के बूढ़े-बूढियां ढोलक-हार्मोनियम के साथ पाठ किया करते थे. मां पारिजात के हाथ में मंजीरे पकड़ा देतीं तो उसे लगता कि जैसे उसे एक बहुत महत्वपूर्ण काम सौंपा गया था. वह अपना पूरा ध्यान ताल पर केन्द्रिन करता किंतु फिर भी बेताला हो जाता तो जयश्री आंटी अपने घुटने पर हाथ से ताल देकर उसकी ताल ठीक कर दिया करतीं थीं.

‘मम्मी, जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो राम बनूंगा या कृष्ण?

‘मेरे प्यारे प्यारे बेटे, तुझमें उन दोनों के ही गुण आ जाएं तो कितना अच्छा हो.’ मां उसे कसके अपने सीने से लगाकर कहतीं तो पारिजात को सचमुच लगने लगता कि वह कृष्ण बना मुरली बजा रहा था अथवा हाथ में धनुष-बाण लिए सोने के हिरण के पीछे भाग रहा था.

‘और जीजी, वह राधारानी बनेगी या सीताजी?’

‘पूर्णिमा तो दुर्गा मैय्या या मां शेरांवाली का अवतार है.’

पारिजात की आठ-वर्षीया बड़ी बहन पूर्णिमा को बचपन से पूजा पाठ में कोई दिलचस्पी नहीं थी. जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, वह मां की पूजा का खुल्लम-खुल्ला मज़ाक उड़ाने लगी. यहां तक कि मां उसे प्रसाद देने से भी घबराती थीं कि कहीं वह उसे लेने से भी इंकार न कर दे और भगवान उस पर नाराज़ न हो जाएं; न जाने क्या बैर था उसे मां के पूजा-पाठ से. हालांकि पिताजी को भी मां के ‘गोरख-धंधे’ से कुछ लेना-देना नहीं था किंतु वह उनके पूजा-पाठ का निरादर नहीं करते थे; हाथ जोड़ कर प्रसाद भी खा लेते थे.

सुबह घर से निकलने के पहले मां पारिजात से हाथ जोड़ कर प्रसाद ग्रहण करने को कहतीं; फिर प्रसाद में चढ़ाए गए बादाम और किशमिश उसके हाथ में थमा देतीं, जिन्हें वह मज़े में चबाता स्कूल, कालेज अथवा दफ़्तर को निकल पड़ता. एक लम्बा समय गुज़र चला था इस परिपाटी को निभाते. जब मां महीने से होतीं तो पारिजात से वह सुबह-सुबह दिया जलवा लेतीं ताकि उसे स्कूल, कालेज अथवा दफ़्तर जाने में देर ना हो जाए, उस दिन वह सेब खाता हुआ जाता, जिसमें बादाम और किशमिश का मज़ा नहीं था.

‘हरि अप, परि. स्कूल को देर हो रही है, मम्मी के कमरे में घुसा न जाने क्या करता रहता है.’ पूर्णिमा बवाल मचा देती ताकि यह बात किसी तरह पिता के कान तक पहुंच जाए.

‘पारिजात को तुम अपने जैसा धर्मान्ध बना कर छोड़ोगी.’ मां का पारिजात से पूजा-पाठ करवाना पिता को बिल्कुल पसन्द नहीं था. उनकी आकस्मिक मृत्यु के पश्चात पूर्णिमा ने मां की भी अवहेलना करनी शुरु कर दी. पारिजात का मां के साथ बैठकर पूजा करना भी उसके बर्दाश्त के बाहर था और इसी वजह से पारिजात ने मां के साथ बैठना बंद कर दिया था किंतु प्रसाद वह अब भी ग्रहण कर लेता था.

आत्मविश्वास और निर्भीकता से लदफद पूर्णिमा का अनुसरण करने के अलावा पारिजात के पास कोई और चारा न था किंतु जब भी पूर्णिमा की खटपट मां से होती तो पारिजात का मुंह सूज जाता. पूर्णिमा जानती थी कि अंत में पारिजात को उसे ही मनाना होगा क्योंकि मां को लेकर वह बहुत संवेदनशील था.

‘मम, परि को आप कब तक अपनी गोद में छिपाए रखेंगी?’ पूर्णिमा ग़ुस्से में कहती तो मां की हिम्मत नहीं होती कि उसे चुप कर दें. आस-पड़ौस और स्कूल में भी किसी की मजाल नहीं थी कि कोई उससे अथवा पारिजात से बैर मोल ले. पूर्णिमा के स्कूल छोड़ने के बाद पारिजात ने पूरे लम्बे तीन साल स्कूल में कैसे गुज़ारे, वही जानता था. छात्र-छात्राएं उसे ‘गे’ अथवा ‘परि’ कह कर पुकारने लगे थे क्योंकि उसका स्वास्थ्य और आचरण दोनों नाज़ुक थे.

सौभाग्यवश पूर्णिमा ने जल्दी ही अपनी शादी का ऐलान जौन गूल्ड से कर दिया, जो भारतीयों से अधिक भारतीय था. उसे पूर्णिमा और पारिजात दोनों से हिन्दी अच्छी आती थी सो मां-पिता दोनों ख़ुश थे. एक महीना लगा कर पूर्णिमा ने अपने सारे दोस्तों को बौलीवुड नृत्य में पारंगत कर दिया था. पारिजात और मां और पिता को भी उसने ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ के गीतों पर नचा के छोड़ा था.

‘हमारी पूर्णिमा लाखों में एक है, क्या हुआ जो वह पूजा-पाठ में विश्वास नहीं रखती; उसका दिल बिल्कुल साफ़ है और भगवान ऐसे लोगों की हमेशा रक्षा करते हैं!’ मां पूर्णिमा पर वारी वारी जा रही थीं. मां का बड़ा मन था कि पारिजात का विवाह भी कुछ ऐसे ही होता किंतु वह लड़कियों के मामले में बहुत शर्मीला था. वह बाईस का हो चला था किंतु देखने में अब भी बच्चा सा ही लगता था.

फिर अपनी इच्छाएं और दुविधाएं लिए मां एकाएक चल बसी थीं; फेफड़ों का कैंसर का निदान बहुत देर से हुआ था.

‘जाही बिधि राखे राम ताही बिधि रहिए,’ कहते हुए मां ने अपना इलाज करवाने से इंकार कर दिया; शायद वह कीमोथैरेपी और रेडियोथैरेपी जैसे भारी-भरकम नामों से ही डर गईं थीं. उन्होंने जयश्री आंटी को कसम दिला दी थी कि वह बच्चों को उनकी बीमारी के विषय में कुछ नहीं बताएंगी किंतु यह राज़ अधिक देर तक छिपा न रह सका; उनकी हालत बड़ी तेज़ी से बिगड़ी. बीमारी के अंतिम दिनों में पारिजात मन्दिर में बैठा देवी-देवताओं के हाथ-पांव जोड़ता रहा किंतु वे कुछ न कर सके.

मृत्यु से पहले मां ने बहुत चाहा कि जल्दी से कोई अच्छी सी लड़की मिल जाए तो पारिजात की शादी कर दें. मां और पारिजात को दिखाने की नौबत तो तब आती जब पूर्णिमा को कोई लड़की पसन्द आती. ख़ैर, पूर्णिमा के हिसाब से पारिजात अभी शादी के लिए तैय्यार ही नहीं था.

मां के यूं अचानक चले जाने से पारिजात और पूर्णिमा को बहुत सदमा पहुंचा था, ख़ासतौर पर पूर्णिमा को, जिसे लगता था कि उन दोनों के बीच बहुत कुछ कहना-सुनना बाक़ी रह गया था. जब तब पारिजात को बैठाकर वह कैफ़ियत देने लगती कि वह मां को क्यों परेशान किया करती थी.

जयश्री आंटी के सिवा, पड़ौसियों का आना जाना अब बन्द हो चुका था. पूर्णिमा हर शुक्रवार की रात को पारिजात के साथ रहने आ जाती और इतवार की रात को वापिस मिल्टनकींज़ चली जाती; इस दौरान पुत्र आर्यन को जौन सम्भाल लेता था. पूर्णिमा के साथ पारिजात के ये चार दिन ख़ुशी-ख़ुशी गुज़र जाते थे; दोनों घंटों गप्पे मारते, खट्टी-मीठी बातें और वादा करते कि वे एक दूसरे से कभी कुछ नहीं छिपाएंगे.

मां की मृत्यु को दो महीने हो चले थे और पारिजात ने अब तक उनका मन्दिर एक बार भी साफ़ नहीं किया. मां क्या सोच रही होंगी? उसने पिता या किसी अन्य पुरुष को कभी पूजा करते नहीं देखा था. यदि वह अपनी मां का पूजा-पाठ जारी भी रखना चाहे तो उसे फ़िक्र थी कि पूर्णिमा क्या सोचेगी? वह बड़ी पशोपश में था क्योंकि यह पहेली किसी से विमर्श से सुलझने वाली नहीं थी; इसके लिए पहले उसे स्वयं से सुलटना था.

पहले-पहल तो उसने सोचा था कि कम से कम मां की तेरहवीं तक वह देवी-देवताओं को सिलसिलेवार याद करेगा; बिल्कुल वैसे कि जैसे कि मां किया करती थीं. इन दिनों इस काम में उसे कोई मुश्किल भी नहीं आई क्योंकि मां की तस्वीर के आगे दिया जलाए रखने के अलावा उसे करना ही क्या था. घर के सारे काम स्वतः चल रहे थे; पूर्णिमा ने सब सम्भाल लिया था.

सुबह और शाम ‘गुड मौर्निंग’ और ‘गुड नाइट’ के अलावा वह चोरी-छिपे देवी-देवताओं से ‘हाय’ और ‘बाए’ भी करता रहा. उसे विश्वास था कि वे सब उसके दिल का हाल जानते ही होंगे. ऐसा करते हुए भी वह अचकचा जाता था जैसे कि छिपी खड़ी पूर्णिमा कहीं ठठा के न हंस दे.

मां ने मरने से पूर्व पारिजात से कहा था कि दफ़्तर के अलावा पढ़ाई आदि की वजह से यदि उसे पूजा-पाठ का समय न भी मिले तो मन्दिर में वह रोज़ सुबह एक दिया जलाकर काम चला सकता था. जयश्री आंटी भी उसे याद दिलाती रहती थीं कि यदि उसके बस का यह भी नहीं था तो उसे मन्दिर समेट कर थेम्स में बहा आना चाहिए.

दफ़्तर जाना शुरु किया तो पारिजात ने सोचा कि भगवान तो हर तरफ़ हैं; दफ़्तर जाते समय रेडियो पर अंग्रेज़ी गाने सुनने की जगह वह सारे देवी देवताओं को मन ही मन याद करने लगा. यदि उसके दिमाग़ में यह बात आ भी जाती कि यह सब वह क्यों कर रहा था तो उसे लगता कि वह मां से दग़ा कर रहा था. वैसे तो उसे सब रटा पड़ा था किंतु वह यह भूल जाता था कि मां किस क्रम में देवी-देवताओं की पूजा करती थीं और इसलिए कभी-कभी उसे एक ही देवता को दो-दो बार मनाना पड़ जाता था.

‘सदा शिव भज मना, निश दिन, ऋद्धि सिद्धी दायक विनय सहायक नाहक भटकत फिरत अनवरत, सदा शिव भज मना, ओम सर्व मंगल मांगल्य, शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्य तम्बिके गौरी, नारायणी नमुस्तते (सात बार), गणेश वंदना, गंगा मां की जय, तुलसी महारानी की जय, बालाजी महाराज की जय, सरस्वती देवी की जय, लक्ष्मी-महालक्ष्मी-लक्ष्मी महारानी की जय, शेरां वाली माता तेरी सदा ही जय, जगदियां ज्योतां वाली माता तेरी सदा ही जय, दुर्गा मां की जय, लड्डु गोपाल की जय, राधे रानी की जय, कृष्ण बिहारी लाल की जय, शिरडी के सांईं बाबा की जय, गुरुवायुरप्पन महाराज की जय, ईसा मसीह की जय, बुद्धम शरणम गच्छामी, धम्मम शरणम गच्छामी, संघम शरणम गच्छामी (सात बार), नाम्यो हो रैंगे क्यो (सात बार), श्री हनुमान चालीसा, भरत-लक्ष्मण-शत्रुघन की जय, सीता मैय्या की जय, श्री राम स्तुति, मंगल भवन अमंगल हारी, द्र्वहु सो दशरथ अजिर बिहारी (सात बार) और अंत में श्री रामायण जी की आरती. इसके अतिरिक्त, शुक्रवार को संतोषी माता की आरति और पूर्णमाशी के दिन ‘श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवा’ के जाप के बाद सत्यानाराण जी की आरति.

ढाई महीने बाद एक शनिवार की सुबह पारिजात ने तय किया कि वह मन्दिर की साफ़-सफ़ाई करके ही घर से शौप्पिंग के लिए निकलेगा. कांसे और चांदी  के देवी देवता अपनी चमक खो चले थे. पूर्णिमा ने फ़ोन करके बता ही दिया था कि वह इस सप्ताहंत पर नहीं आ पाएगी और शायद इसीलिए उसने इस काम को अंजाम देने की सोची थी.

मां ने देवताओं को टीका, चावल, चन्दन और पानी आदि चढ़ाना बन्द कर दिया था क्योंकि बचा-खुचा पूजा का सामान और चढ़ाया गया प्रसाद वह लन्दन में कहां फेंकने जातीं? उन्होंने अपने मन को समझा लिया था कि सब कुछ उसी का तो दिया था, चाहे कटोरी में रखो अथवा डिब्बों में. पूर्णिमा भी तो यही तर्क देती थी कि मन्दिर मन में होना चाहिए किंतु मम्मी का कहती थीं कि वह इतनी पहुंची हुई नहीं थीं कि पूजा के लिये उन्हें मूर्तियों की और मूर्तियों के लिए मन्दिर की आवश्यक्ता न पड़े. वैसे तो मां स्वयं भी धार्मिक ग्रंथों में मीनमेख निकालती रहतीं थीं, संतोषी मां की आरती के उपरांत ‘भोग लगाओ मैय्या योगेश्वरी’ और ‘कृष्ण का पालना’ उन्हें दोनों अटपटे लगते थे क्योंकि इन दोनों की तरज़ ठीक नहीं बैठती थी. इन्हें जल्दी से पढ़ कर वह ‘श्री कृष्ण श्री कृष्ण’ का जाप करके माफ़ी भी मांग लेतीं कि उन्होंने ऐसा सोचा भी क्यों? बच्चों से भी वह सदा कहतीं कि उनसे यदि कोई ग़लती अनजाने में हो जाए तो ‘श्री कृष्ण, श्री कृष्ण’ का जाप करने से मन में ग्लानि नहीं रहती. पारिजात के मुंह से जब तब यह जाप निकल पड़ता तो वह सोचता कि शायद पूर्णिमा ठीक ही कहती थी कि वह बिल्कुल मां की तरह भीरु था.

फ्रिज से दूध की बोतल निकाली तो देखा कि उसे इस्तेमाल करने की आख़िरी तारीख़ निकल चुकी थी. वह कशमकश में था कि इस ‘आउट आफ डेट’ दूध से मूर्तियों को नहलाए या नहीं. मां की मृत्यु के बाद, उसने कई बार बासे दूध की चाय बनाकर पी थी, पुराने अंडों का आमलेट खाया था, बासे पनीर की सब्ज़ी बनाई, कभी कुछ नहीं हुआ उसे. ये सुपरस्टोर्स वाले यूं ही आखिरी तारीखें डाल-डालकर लोगों को परेशान करते हैं. पारिजात ने निर्णय लिया कि बासे दूध से देवी-देवताओं को नहलाने मे कोई हर्ज़ न था.

कृष्ण जी की प्रतिमा को नहलाने चला तो मां का गीत बरबस मुंह से फ़ूट बहा, ‘आओ भोग लगाओ मेरे मोहना, भिलनी के बेर, सुदामा के कन्दुल, रच रच भोग लगाओ मेरे मोहना.’

‘परि, तू तो बिल्कुल लड़कियों की तरह ‘बिहेव’ करता है’. पूर्णिमा होती तो उसका ख़ूब मज़ाक उड़ाती, बरबस वह झिझक उठा. काश कि वह इस दोग़लेपन से उबर पाता!

साफ़ तौलिए से मूर्तियों को सुखा कर पारिजात उन्हें पोशाकें पहनाने लगा तो देखा कि उनपर धूल जम गई थी. इन नाज़ुक पोशाकों को वाशिंग-मशीन में धोना उचित न था. उसे तो यह भी नहीं मालूम कि हाथ से कपड़े कैसे धोए जाते थे. जयश्री आंटी से पूछेगा; शायद वह स्वयं ही उसे धोकर दे दें. कितना ध्यान रख रही थीं वह पारिजात का. जब तक मां ज़िन्दा रहीं, उसने कभी जयश्री आंटी को घास तक नहीं डाली. ‘केम छो, सारु छे, केटला माटी’ जैसे छोटे छोटे जुमलों से पूर्णिमा उन्हें आते जाते चिढ़ाती थी. एक नकलची बन्दर की तरह पारिजात भी पूर्णिमा का कहा दोहराया करता था पर जयश्री आंटी ने कभी बुरा नहीं माना; वह बस मुस्कुरा देतीं थीं.

थोड़ी सी झाड़-पोंछ से मन्दिर चमकने लगा. पारिजात ने देखा कि मन्दिर में कृष्ण जी की प्रतिमायें बहुत थीं जबकि मां के आराध्य देव, राम की केवल एक चन्दन की प्रतिमा थी. उसने कृष्ण की सारी प्रतिमाओं को एक साथ रख दिया और श्री राम दरबार का वह पारम्परिक चित्र जिसमें राम, लक्षमण, सीता, भरत शत्रुघन खड़े हैं और हनुमान और वानर सेना उनके चरणों में बैठी है, के आगे राम की प्रतिमा रख दी. पारिजात को लगा कि राम और उनके परिवार की मर्यादा का अनुसरण करते मां ने जीवन शायद कभी जिया ही नहीं. अनगिनत मर्यादाएं खुद पर और कितने ही बन्धन वह अपने बच्चों पर लगाती रहीं.

पूर्णिमा के पीछे तो मां कभी-कभी हाथ धो कर पड़ जातीं थीं, ‘करवट लेकर लेटो, बिस्तर पर बैठ कर पांव न हिलाओ, ज़ोर से नहीं हंसो, सूरज उगते ही उठ जाओ, बड़ों का आदर करना सीखो, बुरे का जवाब बुरे से न दो’ इत्यादि इत्यादि और सब मर्यादा पुरुषोत्तम राम और उनके परिवार के नाम पर. एक बार पूर्णिमा ने पूरी एक कापी भर डाली थी मां के लगाए बन्धनों पर.

‘राम को देख, परि, कैसा सेल्फ-राइटियस दिख रहा है! जो उसने सीता के साथ किया, वाज़ दैट राइट? शी ब्लडी हैड टु सिट औन फ़ाएर और मां चाहतीं हैं कि मैं सीता बनूं, माइ फ़ुट!’ कभी-कभी पूर्णिमा अकेले में पारिजात के सामने अपने मन की भड़ास निकालती तो पारिजात को लगता कि वह कितनी बहादुर थी; भगवान तक से नहीं डरती थी!

‘परि, वाए आर यू नौडिंग यौर हैड? अगर तुझे मम्मी का ये पूजा पाठ शैम लगता है तो बोलता क्यों नहीं? भोंदु कहीं का!’ सिर हिला कर पूर्णिमा की हां में हां मिलाने पर भी पारिजात को झाड़ ही पड़ती थी. चाहे वह पूर्णिमा से आधा फ़ुट लम्बा हो गया था पर उसके लिए तो पारिजात हमेशा ‘परि’ ही रहा और ‘भोन्दु’ भी.

पूर्णिमा के तर्क-वितर्क से तंग आकर मां अकसर बड़बड़ाया करती थीं कि काश उनकी बेटी पारिजात सी सीधी होती और पारिजात बेटी जैसा तेज़ तर्रार. मां की हसरत ही रह गई कि मरगिल्ला बेटा कुछ मुटा पाता जबकि बेटी घास फ़ूस खाकर भी फैल रही थी. पारिजात बादाम, मलाई और मक्खन खाकर भी सूखे गन्ने सा था. बचपन में जब वह नहलाने के लिए उसके कपड़े उतारतीं तो उनका कलेजा मुंह को आ जाता. उसके बदन की एक-एक हड्डी और पसली गिनी जा सकती थी. जब भी पूर्णिमा कहती कि मां बेटे को अधिक चाहती थीं, प्रतिउत्तर में मां का एक ही जवाब होता कि पूर्णिमा जब तक ढाई साल की नहीं हो गई, उन्होंने उसे अपना दूध पिलाया था.

इस सबके बावजूद भाई बहन की ख़ूब छनती थी. मां से अधिक वह बहन की ही सुनता था या कहिए कि उसे सुननी पड़ती थी. पूर्णिमा उसकी रोल मौडल थी. लाम-तड़ांग पूर्णिमा जींस-कमीज़ पहने पारिजात के सहपाठियों के साथ क्रिकेट और फ़ुटबाल खेलती थी.

‘दिस इज़ नौट फेयर,’ जब देखो तब वह पैर पटकते हुए यही गाती रहती थी, विशेषतः जब उसे पिताजी से किसी चीज़ की ज़रूरत होती; मां-बाप ने उसके साथ कभी भी भेद-भाव नहीं किया.

प्लास्टिक के हनुमान जी की प्रतिमा को उसने झाड़-पोंछ के राम के चरणों में बैठा दिया. मन में उठ रहे इस प्रश्न को उसने मन में ही दबा दिया कि वह क्यों न फेंक पाया उस बदरंग मूर्ति को जिसे वह एक साल से मां से फेंकने के लिए कह रहा था?

‘जब हनुमान जी ने सीता जी के कुशल-मंगल का समाचार श्री राम को दिया तो प्रसन्न होकर उन्होंने हनुमान जी को अपने ह्र्दय से लगा लिया. कैसा प्यार उमड़ा होगा श्री राम के ह्र्दय में हनुमान जी के लिये और कैसी आराधना रही होगी हनुमान के अपने हृदय में श्री राम के लिये!’ यह कहानी पारिजात को सुनाते समय मां की आंखे भर आती थीं. राम-हनुमान के आलिंगन का चित्र पारिजात के दिमाग़ में भी सुरक्षित था किंतु अपना पूरा ध्यान केन्द्रित करके भी वह चालीसा का पाठ करने में असमर्थ रहा; लगा कि मां की मृत्यु के बाद उसमें प्यार और निष्ठा की कमी हो गई थी.

पार्वती शिव के बाईं ओर बैठतीं हैं कि दाईं ओर? पार्वती की पूजा करते समय भी शिव का नाम ही पहले आता है, ‘दिस इज़ नौट फेयर.’ पूर्णिमा कहीं आसपास होती तो कहती.

‘ये इंडियन मेन अपने से पहले अपनी वाइफ़ की पूजा कैसे ऐक्सेप्ट कर सकते हैं? शिव का गुस्सा तो वर्ड-फ़ेमस है पर ऐसा भी क्या कि कोई अपने बच्चे का सिर ही काट डाले! हाउ स्ट्रेंज कि उन्हें अपने बेटे के बारे में ही कुछ पता नहीं था, हिज़ ओन ब्लडी सन? हैव यू हर्ड दैट स्टोरी, परि, कि गणेश पार्वती के मैल से पैदा हुए थे? समथिंग लाइक दैट…’

‘मम्मी कहती हैं कि हमारे ऐनसैस्टर्स बड़े-बड़े साइंटिस्ट्स थे…’ पारिजात ने कुछ कहना चाहा तो पूर्णिमा ने उसे तुरंत काट दिया.

‘होली शिट, तू भी न परि, मम्मी की हर बात बिना सोचे-समझे मान लेता है.  यूज़ यौर ब्रेन, मैल से कभी बच्चे बनाए जा सकते हैं?’ पारिजात की हिम्मत नहीं हुई कि वह पूर्णिमा से बहस करता.

‘वाट आइ थिंक, परि, कि शिव इम्पोटैंट था. पार्वती की चिकचिक से तंग आकर, ही रैन अवे. सालों बाद वेन ही केम बैक, ही वाज़ ऐस्टौनिश्ड टु फ़ाइंड दिस बौए रन्निंग अराउंड इन हिज़ हाउस. पार्वती ने अपने हज़्बैंड को एक कौक ऐण्ड बुल कहानी सुना दी. शिव मस्ट हैव बीन भोन्दु लाइक यू; मान गया,’ फिर कुछ सोचते हुए बोली, ‘ओर ही मस्ट हैव कैप्ट क्वाइट टु कीप पीस, नेबरहुड में उसे अपनी इंसल्ट थोड़े ही करानी थी!’

‘पर जीजी वो बच्चा आया कहां से?’ पारिजात ने पूछा.

‘अरे भोन्दु, पार्वति कब तक शिव की वेट करती? उसने कोई ब्वाय-फ़्रैंड बना लिया होगा.’ पूर्णिमा जानती थी कि पारिजात कुछ पूछना चाह रहा था किंतु उसे चुप देखकर वह फिर जारी हो गई.

‘तुझे पता है न परि, शिव ने तांडव डांस करके पूरी अर्थ हिला दी थी. गौड होकर भी वह अपने ग़ुस्से पर कंट्रोल नहीं कर सका? ह्यूमन-बींग्स और ग़ौड में कोई तो डिफ़्फरैंस होना चाहिए? इफ़ नौट तो पूजा किसलिए?’ पूर्णिमा देवी देवताओं के नामों के आगे ‘जी’ नहीं लगाती थी. छोटा था तो पारिजात मन ही मन ‘शिव जी’, ‘सीता जी’ और ‘पार्वति जी’ कहकर उन सबसे माफ़ी मांगता रहता ताकि उसकी जीजी को पाप न लगे.

पूर्णिमा मां से भी ऐसे ही अटपटे प्रश्न पूछा करती थी. मां ‘श्री कृष्ण, श्री कृष्ण’ कह कर चुप हो जाती थीं. पारिजात ने भी अपने मन को यही मंत्र जपकर शांत करना चाहा. काश कि उसका मन मां सा सरल, साफ़ और उदार होता! संतोषी मां की तस्वीर को राम की बगल में रखते हुए पारिजात रुक गया. उन्हें  तो शिव और पार्वती के साथ रखना चाहिए.

‘गर्ल्स के साथ डिस्क्रिमिनेशन भी आपके इन्हीं देवी-देवताओं की वजह से शुरु हुआ होगा, मम्मी, इज़ दिस फेयर?’ पूर्णिमा ने एक बार मां से कहा था जो उससे सिलाई-बुनाई में मन लगाने के लिए कह रही थीं. पड़ौस में लड़कों के अभाव के कारण मां साऊथहाल वाले मन्दिर में जाकर संतोषी-मां के व्रत का उद्यापन किया करती थीं. वैसे भी घर में पूर्णिमा को खटाई से दूर रखना असम्भव था.

‘कैन यू बिलीव, परि, कि संतोषी मां को खटाई पसन्द न हो? आइ एम वन हंड्रेड परसैंट श्योर, ये चाल किसी सिक पन्डित की होगी, जिसे डाक्टर ने खटाई खाने के लिए मना किया होगा.’ पारिजात को ख़ुद यह समझ नहीं आता था कि संतोषी मां को खटाई से क्या बैर था.

‘बेचारे सिम्पल लोगों को गौड्स का डर दिखा कर उल्टा-सुल्टा कुछ भी करवा लो. ट्यूसडे को बाल नहीं कटवाओ, संडे को नई ड्रैस नहीं पहनो, बुल शिट!’ पूर्णिमा को जिस-जिस बात के लिए मां ने टोका, उसने सब किया ही किया और फिर पारिजात को हड़काया कि वह यूं ही डरता था, ‘देख कुछ हुआ क्या?’ मां पूजा करने बैठतीं तो कहती कि चलो पहले गणेष मना लें.

‘हमेशा गणेष की ही पूजा पहले क्यों? दिस इज़ नौट फेयर.’ पूर्णिमा अड़ जाया करती और पिता भी उसी का साथ देते. पारिजात को मां का यूं अलग पड़ जाना अच्छा नहीं लगता था किंतु वह कर भी क्या सकता था?

‘मम्मी, मैं एक ‘रोटा’ बना देती हूं सो दैट आप सारे ग़ौड्स को ख़ुश कर सकें.’ पूर्णिमा ने सचमुच एक रोटा तैय्यार किया और उसे मन्दिर के ऊपर दीवार पर चिपका दिया. हैरानी की बात यह थी कि मां सचमुच उस रोटा के हिसाब से पूजा करने लगीं. पारिजात ने भी तय किया कि वह गणेषजी से पहले अब संतोषी मां से नमस्ते करेगा.

जयश्री आंटी द्वारा लाई गई साईं बाबा की मूर्ति को उसने बीचों-बीच रख दिया. मां कहती थी कि गुरु का दर्जा भगवान से भी बड़ा है किंतु न जाने क्यों वह ख़ुद साईं बाबा की आरती आख़िर में किया करती थीं. ईसा मसीह के माथे पर मां जब टीका लगातीं थीं तो पूर्णिमा हंसते-हंसते लोट पोट हो जाया करती थी. एकाएक पारिजात ने अपने आप को टोका; वह पूजा कर रहा था अथवा पूर्णिमा के क़िस्से याद करते हुए मज़े ले रहा था! किंतु उसके पास इन यादों के सिवा अब बचा भी क्या था?

‘मम्मी, आप तो कहती हैं कि भगवान एक हैं तो आपके मन्दिर में ये इतने सारे नमूने क्या कर रहे हैं?’ पूर्णिमा मां से पूछती.

‘इसी बहाने इतनी बार भगवान का नाम तो मुख से निकलता है.’ मां कहतीं.

‘पर मम्मी, अगर आप एक भगवान पर ही कनसनट्रेट करें तो क्या बैटर नहीं होगा?’

‘अलग अलग भगवानों के कार्य-क्षेत्र अलग अलग हैं.’

‘भगवान की नहीं मम्मी आप डर की पूजा करती हैं,’ पूर्णिमा से भी चुप नहीं रहा जाता.

‘परि, सीता की तरह ‘पेरिफ़िरी’ में चुपचाप बैठे रहने वालों को आग में बैठा दिया जाता है.’ पूर्णिमा ठीक कहती थी; मजाल है घर में कभी उसकी कोई बात टाली गई हो. पारिजात ने कभी ज़िद नहीं की और वह केवल ‘एक अच्छा बच्चा’ बन कर रह गया. पिछले पूरे हफ़्ते पूर्णिमा लन्दन में थी और हर शाम को अपने साथ किसी न किसी मित्र को लिए घर आ जाती थी. न जाने क्यों हर शाम बात भगवान के अस्तित्व पर ही आकर टिक जाती. उसकी एक क्रिसचियन सहेली, लिंसी एटनबरा, के अनुसार ये पृथ्वी जीसस क्राइस्ट की कृपा पर ही टिकी थी.

‘यू मस्ट बी जोकिंग, वेयर इज़ यौर प्रूफ़?’ उसके ब्वाय-फ़्रैंड टिम ने पूछा.

‘कैन यू सी एयर? इट इज़ औल अराउंड अस, लाइक ग़ौड इज़ एवरी वेयर, यू कुड फ़ील हिम बट यू कांट टच हिम.’

बहस थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. पूरी शाम पारिजात थाली के बैंगन की तरह लुढ़कता रहा. जब उसे भगवान के अस्तित्व पर पूरा भरोसा नहीं तो वह क्यों करता है पूजा? क्या मम्मी की प्रथा निभाने को? कितने सुलझे हुए हैं वे लोग जो पूरी तरह से इधर हैं या उधर.

पानी का अर्पण करके पारिजात ने जब अपने सिर पर पानी छिड़का तो उसे याद आया कि कैसे पूर्णिमा अपने हाथ सिर पर रख लेती थी कि कहीं करीने से संवरे उसके बाल न बिगड़ जाएं. लुटिया के बचे हुए पानी को पारिजात ने तुलसी जी के पौधे में डाल दिया; जिसका एक भी पत्ता यदि पीला पड़ जाता था तो मां पीली पड़ जाया करती थीं; घंटो वह उनकी मनुहार करती कि तुलसी जी उनसे क्यों नाराज़ थीं. उन्हें बहुत नाज़ था कि इंग्लैंड में तुलसीजी किसी किसी के घर ही में ही फलती थीं और उनके घर में वह ख़ूब पनप गई थीं. जब कभी पारिजात बीमार पड़ता तो वह उसे तुलसी के पत्तों की चाय पिला कर ही उसे डाक्टर के पास ले जातीं थीं. गंगाजल की सीलबन्द लुटिया को पारिजात ने पौधे के अन्दर ही रख दिया ताकि तुलसी जी अकेला महसूस न करें.

‘वाए गो टु दि डाक्टर, परि? तुलसी तुझे ठीक कर देंगी.’ पूर्णिमा चिढ़ाती तो पारिजात भी सोचता कि मां के मन में भी सन्देह उठता होगा कि सिर्फ़ तुलसी जी से ही बच्चों का उद्धार शायद न हो. पिछले ही हफ़्ते की ही तो बात है कि पारिजात को नज़ला ज़ुकाम हो गया था तो उसने कफ़-लिंक्टस के साथ अदरक तुलसी की चाय भी पी और जब ठीक हो गया तो सोचा कि यह तुलसी जी की ही करामात थी. जब भी पूर्णिमा घर में होती, आते जाते वह तुलसीजी और गंगा जी से एक दूसरे का ध्यान रखने को कहता और नज़र बचा कर ‘सौरी’ भी कह देता ताकि वे दोनों उपेक्षित महसूस न करें.

‘परि, लगता है कि तुझे किसी साएकाएट्रिस्ट को दिखाना पड़ेगा, कहीं तू औटिस्टिक तो नहीं?’ पारिजात जानता था कि पूर्णिमा ऐसा ही कुछ कहेगी इसलिए जब भी वह घर में होती, वह पूजाघर या पौधों की तरफ़ एक चोर नज़र डालकर चल देता पर पूर्णिमा की नज़र चील सी तेज़ थी.

‘परि, तेरा दिमाग़ कहां रहता है, तुझे अब शादी कर ही लेनी चाहिए, शादी.कौम की वेबसाइट दी थी न तुझे? लाखों लड़कियां हैं उस पर, कोई तो पसन्द आई होगी तुझे?’ पारिजात के दफ़्तर जाने से पहले पूर्णिमा ने शादी.कौम पर एक पूरा भाषण दे डाला था.

‘परि, आज मैं देर से निकलूंगी. तू कहे तो मां का कमरा साफ़ कर दूं?’ पूर्णिमा ने पूछा.

‘थैंक्स जीजी, मां की अल्मारियों में न जाने क्या-क्या भरा है; क्या चीज़ काम की है और क्या नहीं, मुझे नहीं पता.’

शाम को घर लौट कर पारिजात सीधा मां के शयनकक्ष में पहुंचा उसके होश उड़ गए; जैसे सिर पर आसमान टूट पड़ा हो.

देवी-देवताओं सहित मन्दिर ग़ायब था. दीवार पर सुनहरे फ़्रेम्स में जड़ी दो नई तस्वीरें टंगी थीं. एक मां की थी और दूसरी में उसके मां-पिता, पूर्णिमा-जौन-आर्यन और वह स्वयं, सब के सब वह मुस्कुरा रहे थे. उसने पूरा कमरा छान मारा कि शायद पूर्णिमा ने उसे तंग करने के लिए मन्दिर को कहीं छिपा दिया हो. कमरे की सफ़ाई बाक़ायदा ठीक से की गई थी. बिस्तर तो बिस्तर, पूर्णिमा ने पर्दे तक बदल डाले थे.

मां क्या सोच रही होंगी? जान से भी प्यारे उनके मन्दिर की, जो नाना जी ने उनकी शादी की पहली वर्षगांठ पर विशेषतः जयपुर से भेजा था, पारिजात ढाई महीने भी देख-रेख नहीं कर सका.

तभी घंटी बजी; जयश्री आंटी प्रसाद लेकर आई थीं. उन्होंने मन्दिर के विषय में पूछा तो वह उन्हें क्या जवाब देगा? वह बहुत परेशान था.

‘अने घबराना नु नईं, मंदिर मारा घरे मां छै, जारे पण इच्छा थाइ, त्यारे आवी नु जोई लेओ.’

जयश्री आंटी ऐसे चहक रही थीं कि जैसे उनके हाथ मां का मन्दिर नहीं, कोई बड़ा ख़ज़ाना लग गया हो. पारिजात उनसे कई गुना अधिक ख़ुश था; लगा कि जैसे उसके जीवन का एक नया अध्याय आरम्भ होने जा रहा था.

जयश्री आंटी के जाते ही पारिजात शादी.कौम की वेबसाइट खोलकर अपनी भावी पत्नी की तलाश में जुट गया.

 

 

- दिव्या माथुर

दिव्या माथुर 1984 में भारतीय उच्चायोग से जुड़ीं, 1992-2012 के बीच नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी रहीं और आजकल भारतीय उच्चायोग के प्रेस और सूचना विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं। रौयल सोसाइटी की फ़ेलो, दिव्या वातायन कविता संस्था की संस्थापक और आशा फ़ाउंडेशन की संस्थापक सदस्य हैं।

कहानी संग्रह - आक्रोश (पद्मानंद साहित्य सम्मान, हिन्दी बुक सैंटर, दिल्ली), पंगा और अन्य कहानियां (मेधा बुक्स, दिल्ली), 2050 और अन्य कहानियां (डायमंड पौकेट बुक्स, दिल्ली) और हिन्दी@स्वर्ग.इन (सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली)।

अँग्रेज़ी में कहानी संग्रह (संपादन) – औडिस्सी: विदेश में बसी भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (स्टार पब्लिशर्स), एवं आशा: भारतीय महिला कहानीकारों की कहानियां (इंडियन बुकशैल्फ़, लन्दन)।

कविता संग्रह - अंतःसलिला, रेत का लिखा, ख़्याल तेरा, चंदन पानी, 11 सितम्बर, और झूठ, झूठ और झूठ (राष्ट्रकवि मैथलीशरणगुप्त सम्मान)।

अनुवाद - मंत्रा लिंगुआ के लिए बच्चों की छै पुस्तकों का हिंन्दी में अनुवाद : औगसटस और उसकी मुस्कुराहट; बुकटाइम, दीपक की दीवाली; चाँद को लेकर संग सैर को मैं निकला; चीते से मुकाबला और सुनो भई सुनो। नैशनल फ़िल्म थियेटर के लिये सत्यजित रे-फ़िल्म-रैट्रो के अनुवाद के अतिरिक्त बी बी सी द्वारा निर्मित फ़िल्म, कैंसर, का हिंदी रूपांतर। इनकी रचनाओं का भी विभिन्न भाषाओं में अनुवाद।

नाटक : Tête-à-tête और ठुल्ला किलब का सफल मंचन, टेलि-फ़िल्म : सांप सीढी (दूरदर्शन)।

सम्मान/पुरस्कार : भारत सम्मान, डॉ हरिवंश राय बच्चन लेखन सम्मान, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त प्रवासी भारतीय पुरस्कार, पदमानंद साहित्य सम्मान, प्रवासी हिन्दी साहित्य सम्मान, आर्ट्स काउंसिल औफ़ इंगलैंड का आर्टस एचीवर पुरस्कार, चिन्मौय मिशन का प्रेरणात्मक व्यक्ति सम्मान, इंटरनैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ पोइटरी द्वारा पुरस्कृत कविता, बौनी बूंद ‘Poems for the Waiting Room’ परियोजना में सम्मलित, ‘दिव्या माथुर की साहित्यिक उपलब्धियाँ’ नामक स्नातकोत्तर शोध निबन्ध, ‘इक्कीसवीं सदी की प्रेणात्मक महिलाएं’, ‘ऐशियंस हू ज़ हू’ और विकिपीडिया की सूचियों में सम्मलित।

संप्रति : भारतीय उच्चायोग, लंदन, में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी।

 

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