पाजेब

 

जब मैं सोलह श्रंगार करूँ
अपने पी के लिए सजूं
तब तब मेरी बिन्दिया चूड़ी
हंसते मेरे संग।
कभी ना छूटे , ईश्वर इनसे मेरा ये सम्बन्ध।।

बिन्दिया थोडा सा शरमाये।
कुमकुम माथे पर इतराये।।
काजल पी का रूप छिपाये।
अधरों की लाली मुस्काये।।

कान का झुमका ख़ुशी से झूले।
गले का हार ह्रदय को छू ले।।
हाथ का कंगना खन खन बोले।
कंगना संग पिया मन डोले।।

चमकते खनकते से मेरे ये गहने।
खुशी खुशी सब मैंने पहने।।
जैसे ही पाजेब उठाई ।
वो थोडा सा घबराई।

मैंने पूछा उस से क्यों
पाजेब तूम हो उदास।।
वो बोली मै क्यों सखी
तेरे पैरो की दास।।
मेरी कीमत हजारो की
फिर भी पैरो में बांधी जाऊं
दो रूपये की बिन्दिया रोली जैसा
क्यों ना दर्जा पाऊं
मेरी छमछम से ही तो तुम
अक्सर उन्हे बुलाती हो।
मेरी ही रुनझुन से सारे
घर को तुम झनकाती हो ।।
मेरे बिन हर दुल्हन का
सोलह श्रंगार अधूरा है।
मेरे बिन तेरे बिछिये
का भी दीदार अधूरा है।
तो है इतनी अनमोल
तो क्यों बोल तू नाराज है।
तो पैरो में ही सुन्दर है।
तेरा पैरो तक ही राज़ है।।
अब समझी पाजेब मेरी
कि वो कितनी अधिक जरूरी
जगह है उसकी अपनी ।
नहीकेवल बांधनी।।
अपनी अलग है उसकी पहचान।
मिलता है उसे भी मान।।
ऊपर चढ़ मत करो अभिमान।
देती है पाजेब ये ज्ञान।।

 

-पूर्ति खरे

निज निवास- सागर म.प्र।
कविता , कहानी, लेखन में विशेष रूचि।

 

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