पत्रकार और व्यापार

पत्रकार सर्वप्रथम इस शब्द को पढ़कर उस किरदार का विचार मन मस्तिस्क में आता है जो सत्यान्वेषी होता है, जिसमे न्यायाधीश का नीर क्षीर विवेक जागृत रहता है, जो सत्य और असत्य के बोध को न केवल धारण करता है वरन उसे आत्मसात भी रखता है, उस पत्रकार को एक जुनून है सत्य की खोज करके असत्य के पर्दाफाश का! पत्रकार सदैव किसी भी मुद्दे के सत्य तक पहुचना ही नही चाहता बल्कि वह सदैव अपने कंधों पर एक और जिम्मेदारी भी रखता है वह जिम्मेदारी होती है उसके समाज के प्रति, एक पत्रकार सदैव सत्य को समाज मे लाना चाहता है जिससे समाज किसी भी विषय पर निष्पक्ष मत बना सके!
मेरे विचार में पत्रकार सत्यान्वेषी(एक अधिवक्ता की तरह), विवेचक(एक पुलिस अधिकारी की तरह), सत्यदृष्टा(किसी बुद्धत्व प्राप्त व्यक्ति की तरह), प्रचारक (सत्य को सामने लाने और जनता के मध्य पहुचाने), और न जाने किन किन अद्भुत व्यक्तित्व का समावेश होता है!
पत्रकार का लक्ष्य जीविका से बढ़कर होता है वह समाज के लिए एक लाइट हाउस की तरह होता है जो अपना सम्पूर्ण जीवन केवल इसलिए समाज मे अर्पित कर देता है कि समाज सत्य को जान सके ! मेरे विचार में नैतिकता का शिखर कहे या पत्रकार दोनों समानार्थी ही होंगे!
हमारे भारत मे पत्रकारिता का इतिहास स्वर्णिम रहा है बंगाल गजट से प्रारम्भ पत्रकारिता आज के वैश्विक युग मे टीवी चैनलों के माध्यम से घर घर के बेड रूम में अपनी पकड़ बना चुका है ! केसरी, हरिजन, मराठा आदि समाचार पत्रों पत्रिकाओ ने हमारी स्वतन्त्रता संग्राम की लड़ाई में बहुत बड़ी भूमिका निभाई कभी तो समाचार पत्रों से ब्रिटिश हुकूमत इतनी भयभीत हो जाती थी कि उनके पास उस अमुक समाचार पत्र को प्रतिबंधित करने के अलावा कोई रास्ता ही नही सूझता था! हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के साथ हमारे समाचार पत्र और पत्रिकाएं भी कंधे से कंधा मिलाकर ब्रिटिश हुकूमत से लड़ रही थी! ये कहना अतिश्योक्ति नही होगी कि तत्कालीन समाचार पत्र भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ही थे! ये समाचार पत्र सेनानियों की तरह लड़ पा रहे थे क्योंकि इनके पीछे इनके सम्पादक और पत्रकार निर्भीकता और निष्पक्षता से कलम चला रहे थे, उनकी कलम की रोशनाई से समाज रोशन हो रहा था लोगबाग शामिल हो रहे थे आजादी की लड़ाई में साथ ही निष्पक्ष और निर्भीक कलम की रोशनाई से फैली रोशनी अंग्रेजो की आंखों में चकाचौंध कर रही थी वे किंककर्तव्यविमूढ़ हो जाते थे! इस तरह की पत्रकारिता में इतना तेज तब आ पाता था जब उस पत्रकार की कलम की रोशनाई जीविका कमाने के लिए नही चलती थी वह चलती थी करोड़ो भारतीयों के लिए आजादी का नया सवेरा और नवजीवन लाने के लिए! वह कलम बिकाऊ नही होती थी नोटों के बाजार में उसकी कीमत कोई नही लगा सकता था !
समय बीता देश आजाद हुआ, लोग स्वतन्त्र भारत मे जीने लगे अब पत्रकारिता की कलम देश के अंदरूनी मुद्दों को तराश रहे थे वे अब लड़ रहे थे स्वराज से सुराज के लिए !
90 के दशक में डंकल समझौते पर हस्ताक्षर के साथ भारत विश्व के लिए बाजार बन गया विदेशी कम्पनियों की सुनामी भारत के अंदर दाखिल हुए व्यवसायीकरण की अंधी दौड़ शुरू हुई हर बात में अर्थशास्त्र के दो शब्द अपनी जगह बनाने लगे वे दो शब्द है हानि और लाभ!
इन दोनो शब्दो ने पत्रकारिता में भी अपनी पहुच बनाई अब विदेशी देशी मीडिया हाउसेस को अपने समाचार पत्र पत्रिकाओं चैनलों से अधिकाधिक लाभ चाहिए, उन्हें मुनाफा बढ़ाना है परिणामतः कलम की रोशनाई खर्च करने से पहले पत्रकार के सामने हानि लाभ मुनाफा आदि शब्द घूमने लगे पत्रकारिता अब सेवार्थ और सत्यान्वेषण के स्थान पर व्यवसाय बन गयी, फिर इस व्यवसायिकता की दौड़ और अधिक मुनाफा कमाने का उद्देश्य इस पावन कार्य को धंधा बनाने लगा! अब पत्रकार की कलम की रौशनाई से समाज रोशन हो न हो धंधे में मुनाफा होना चाहिए, तो सज गयी दुकाने रातो दिन मीडिया हाउसेज के चैनलों में पेड न्यूज चलने लगीं, झूठ मसालेदार खबरे, टी आर पी बढाने लगी धंधा चल निकला पर साथ ही कुछ और निकल गया। वह थी पत्रकारिता, निर्भीक, निष्पक्ष, सत्यान्वेषी, जागरूक कलम की रोशनाई बदल कर पत्रकार की कलम में चाटुकारिता, इमेज बिल्डिंग, झूठ, मसालेदार खबरे, पेड न्यूज आदि की रौशनाई भर दी गई!
पत्रकारिता अब समाज सेवा एक जुनून न रह कर धंधा बनती जा रही है बस सब्र इतना है कि अब भी कुछ पत्रकारों की कलम बिकाऊ नही है, उनकी कलम की रौशनाई से मुनाफा नही निकलता बस निकलता है तो लाइट हाउस का प्रकाश, पर यह रौशनाई कही खत्म न हो जाय बस इसी का डर लगता है……
- अनुराधा सिंह
बहराइच उ०प्रo

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