नील का इतिहास

 नीलेश !
सोहत ओढ़े पीत पट ,स्याम सलोने गात।
मनो नीलमणि सैल पर ,आतप परयो प्रभात।
कवि  बिहारी का अमर दोहा।  नीला रंग कृष्ण का रंग।
और यह रहे तुलसी के राम।

कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील -नीरद -सुंदरम।
पट्पीत मानहुँ  तड़ित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरं।
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नीला रंग भगवान् का रंग माना गया है।  नील आकाश के अमित विस्तार से एकात्म , परम शक्ति की कल्पना , संभवतः इसका कारण रही हो।

टर्की की पारंपरिक संस्कृति में ” नज़र ” एक नीली आँख है जो आसमान से सबको बराबर देख रही है।  नज़र का असर दैवी शक्ति का स्रोत है अतः नीली आँख सब शुभ शकुन मान कर धारण करते हैं।
परंतु नीले रंग –  गहरे नीले रंग  को विष का रंग भी  माना जाता है।   शिव ने विषपान किया तो  वह नीलकंठ कहलाये।  पंजाबी भाषा में ‘ नीला ‘ यानि जलन खोर।  नाटक परंपरा में दानवों को गहरे नीले रंग से रंगा जाता है।  रामलीला में शूर्पणखा के वस्त्र गहरे नीले पहनाये जाते हैं।  तो यह नकारात्मक  पूर्वाग्रह क्योंकर बना ? कारण है नवग्रह परंपरा में शनि का नीला रंग।  कहना न  होगा कि हमारे पूर्वजों ने हज़ारों वर्ष पहले शनि के नीले रंग को बिना टेलिस्कोप के जान लिया था।  ज्योतिष शास्त्र में शनि के असर के विषय में जो धारणा  है उसी के कारण ,संभवतः , ठाकुरों को नीला परिधान पहनाना वर्जित है।  शुभ सूचक रंग लाल पीला ,एवं हरा आदि ही समाज में  अधिक प्रतिष्ठित हैं।

अब जरा पश्चिमी सभ्यता में इसका महत्त्व देखिये।  रॉयल ब्लू।  ब्लू ब्लड।  ब्लू ब्लडेड रॉयल्टी।
ग्रीक और रोमन देवताओं के परिधान का रंग तनिक लाली लिए हुआ नीला।  अंग्रेजी में पर्पल और फ्रेंच में मॉव यानि कुसुम के फूलों का रंग। मीरा बाई की कुसुम्बी साड़ी को याद करें।

नीले रंग को पाश्चात्य संस्कृति में  यह महत्त्व आखिर क्योंकर प्राप्त हुआ ?
कहा जाता है कि प्राचीन देश फिनीशिया में इसका आरम्भ हुआ।
ईसा से १००० से ३००० वर्ष पूर्व।  [ कालखंड बहुत चौड़ा है परंतु मिथकों को तिथियों से बाँधना  कठिन काम है।  ]
भूमध्यसागर के पूर्वी तट का प्रदेश,  जहां आजकल लेबनान और सीरिया हैं ,फिनीशिया कहलाता  था।  इसका  प्रमुख  शहर ‘ टायर ‘ कहलाता  था।  वहीँ लैवेंट नदी के  किनारे एक स्वर्ग की अप्सरा( nymph ) टायरॉस  संध्या समय अपने प्रेमी ,परमवीर मेलकार्ट के संग भ्रमण कर रही थी।  वही उस देश की  राजकुमारी थी और यह नगर उसी के नाम पर था।  संग में उनका प्रिय  कुत्ता भी टहल रहा था।  अचानक कुत्ते ने किनारे रेत पर रेंगते एक घोंघे को खा लिया जिससे उसका थूथन चटक बैंगनी  रंग का हो गया। देवी टायरोस उस रंग की आभा पर मोहित हो गयी और उसने मेलकार्ट से ज़िद की की वह उसे उसी रंग की पोशाक बनवा कर दे। प्रेयसी की इच्छा का सम्मान उसके जैसा  सर्वशक्तिमान पुरुष भला क्यों न करता ?उसने तुरंत राजाज्ञा दी कि उस रंग के वस्त्र बनाये जाएँ।
उस प्रजाति के कई हज़ार घोंघे  एकत्र किये गए। उनके अंदर जो जीव होता है वह एक प्रकार  का द्रव आत्मरक्षा के लिए वमन करता है जिसका रंग नीला होता है। इस रंग से वस्त्र रंगने पर तेज पक्का रंग  चढ़ता है  जो समय के साथ मौसम के प्रभाव से गहरे फालसई रंग का हो जाता है।   नौ हज़ार नन्हें घोंघे मारने पर केवल एक  ग्राम रंग प्राप्त होता है।  यह कपडे की किनारी रंगने के लिए भी पर्याप्त नहीं होता था।  परंतु देवी देवताओं की बात का अनादर कौन करे।  पूरा  फिनीशिया प्रदेश इस उद्योग में लग गया।  लाखों करोड़ों की संख्या में सीप घोंघे  मार डाले जाने लगे।
इस काम में इतनी अधिक मेहनत और समय लगता था और उसका उत्पाद इतना कम था कि  केवल धनिक वर्ग ही इस रंग को पहन सकता था।  इसका नाम टिरियन ब्लू रख दिया गया।
फिनीशिया शब्द का अर्थ है ” बैंजनी रंग की धरती ” . कालांतर में भूमध्यसागर के अनेक तटीय   देशों में यह उद्योग चल पड़ा और जगह जगह सीप शंखों के कंकालों के ढूह नज़र आने लगे।

प्राचीन मिस्र में प्राप्त पेपिरस के पर्चों पर लिखा एक आलेख जिसे ” अनस्तासी ” का  आलेख कहते हैं ,यह कहता है कि रंगकर्मियों के हाथों में सड़ी मछली की      बदबू स्थायी रूप से  बैठ जाती थी।  अतः यहूदी धर्मग्रन्थ ” तालमुद ” ने स्त्रियों को विशेषाधिकार दे दिया था कि वे ऐसे  पति को तलाक़ दे सकती हैं जो विवाह के बाद रंगकर्मी बन जाए।  मगर फैशन तो फैशन है चाहे किसी भी युग का हो।  धनिक वर्ग क्या ,किसी भी शक्तिशाली पद पर बैठे अधिकारी वर्ग में  यह  रंग उच्चता का द्योतक माना जाने लगा।  टायर से चलकर तत्कालीन अन्य राष्ट्रों में भी यह देवत्व का चिन्ह माना जाने लगा।  मंदिरों के पुजारी बिना टिरियन ब्लू पहने ग्रीक  देवताओं की  पूजा नहीं कर सकते थे , ना राजा सिंघासन पर बैठ सकता था। रोम मिस्र और फारस की  सभ्यताओं ने भी इसे अंगीकृत किया। यहाँ राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने की परम्परा चली आ रही थी अतः बैंगनी नीला रंग आध्यात्मिकता का प्रतीक मान लिया गया।  और तत्कालीन मंदिरों के पुजारियों के लिए अनिवार्य कर दिया गया।
तीसरी शताब्दी में रोम के सम्राट औरेलियन ने अपनी रानी को इस रंग का रेशमी शाल दिलवाने से मना कर दिया क्योंकि उसकी कीमत सोने में आंकी गयी थी।
नौवीं शताब्दी में गद्दी पर आसीन राजा के यदि पुत्र होता था तो उसे पोरफाइरोजेनिट {Porphyrogenite } कहा जाता था।  इसका अर्थ है ” बैंगनी रंग में जन्मा ” . चूंकि राजा का  परिधान उसके जीवन काल में नीला होता था ,मरने के बाद उसका कफ़न भी उसी रंग का पहनाने व ओढाने का विधान बना दिया गया। ग्रीस  और रोम के संग्रहालयों में पहली शताब्दी के ऐसे शाल  सुरक्षित हैं जो राजाओं पर मृत्यु के बाद डाले गए।
मिस्र की ममी को जिन  सूती पट्टियों में  लपेटा जाता था , उनको पहले नीला रंग देते थे ताकि पता चले कि वह राजवंश की ममी है।
यूरोप में क्रिस्चियन  धर्म के आने के बाद भी राजतिलक करते समय राजा का चोंगा बैंगनी  रंग का बनाया जाता है जिसपर सुनहरे तार से कढ़ाई करके  अनेक बेशकीमती रत्न जड़े  जाते  हैं।  भारत से ले जाया गया कोहिनूर हीरा जिस राजमुकुट में जड़ा  हुआ है वह भी बैंगनी नीले रंग का है। चर्चों में माँ मेरी का परिधान नीला कर दिया गया।  देवत्व और आध्यात्मिकता से ओत प्रोत कैथोलिक नर्सें सफ़ेद और नीली ड्रेस पहनती हैं। यहां अस्पतालों में भी नरसों को नीला  रंग  पहनाते हैं।
इंग्लैंड तो एक राष्ट्र के रूप में बहुत बाद में आया। मगर यहां भी नीले रंग का प्रभुत्ववाद सर चढ़ कर बोलता रहा है।  महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने सोलहवीं  सत्रहवीं शदाब्दी में राज  किया।  उनके काल में सख्त ताकीद कर दी गयी थी कि राज परिवार के अंतरंग सदस्यों के अतिरिक्त नीला रंग कोई न पहने।  उस काल में एक विशेष क़ानून बना ” समपचुरि ला ” जिसके अन्तर्गत अंग्रेजी समाज में कौन सी जमात ( class ) कौन सा रंग ,वस्त्र या परिधान पहनेगी यह     राजाज्ञा से तय  होता था।

टायरोस की इस कथा को अनेक प्राचीन लेखकों ने अनेक भाषाओं में लिखा है।  कुछ लोग मेलकार्ट  को हेराक्लेज़ या हरक्यूलिस भी लिखते हैं।  परंतु इसके काल में मतभेद है।  जो भी हो कथा अति  प्राचीन है।  आज की पुरातत्व विद्या के प्रसार से विश्व के अनेक स्थानों पर इस प्रकार शंख घोंघों   से रंग निकालने के साक्ष्य मिलते  हैं।  प्राचीन सभ्यताएं लगभग सभी ,किसी न किसी बड़ी नदी के किनारे पनपीं।  इटली के पास क्रीट नामक स्थान में समुद्र तट  पर शंख सीपियों के अवशेष  इतनी मात्रा में मिले हैं कि यह कहा जाने लगा है कि यह विद्या वहां के मिनोअन सभ्यता के लोगों को भी पता थी यानी ईसा से ३००० वर्ष पहले ।  यूरोप और अफ्रिका के समुद्र तट  पर कई जगह ऐसे ही अवशेष मिले हैं।  इन सबसे अलग थलग  भारत के कर्णाटक और  केरल में भी बैंगनी रंग वमन करनेवाली मछली का उद्धरण  मिलता है।  दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी किनारे पर पेरू के प्रागैतिहासिक सभ्यता के  भी जो मानव  अवशेष पाए गए हैं उनमे नीले रंग के कफ़न मिले हैं।  मिस्र देश से निकली एक ममी का कफ़न टिरियन ब्लू है।

इस तरह रंग निकालने के चक्कर में शंखों ,घोंघों की वह प्रजाति ही नष्ट हो गयी है।  आज हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि नीला रंग निकालने का यह ढंग  अति प्राचीन एवं विश्व व्यापी  था।  अधिक समय और श्रम व्यय करके भी उत्पाद इतना कम था कि केवल उच्च वर्ग ही इसे पहन सकता था।  एक बार यह पुजारियों व राजाओं का प्रतिष्ठा -प्रतीक बन गया तो अन्य देशों ने  भी इसे अपना लिया।   इस रंग के महत्त्व को महिमामंडित करने के लिए इसके साथ  देवी  देवताओं से सम्बंधित एक किंवदंती जोड़ दी गयी। विश्व के सभी धर्मो में अतिरंजनापूर्ण मिथक  प्रचलित है।

नील
भारत में नीला रंग वनस्पतियों से निकाला जाता था।  टिरियन रंग की अत्यधिक  मांग और उत्पाद की कमी  भारत के नील से पूरी की गयी।  वनस्पति से निकाला नील गुणवत्ता में किसी प्रकार  कम नहीं था।  शुद्ध नील  बैंजनी आभा लिए हुआ होता है और अम्ल व क्षार की मात्रा घटा या बढ़ाकर इसे गहरे लाल फालसे के रंग तक ले जाया जा सकता है।  अतः यही आपूर्ति  का साधन बना।  भारत से पश्चिमी देशों से व्यापारिक सम्बन्ध इन मिथकों के समान ही प्राचीन हैं।  ईसा से ३००० -५००० वर्ष पूर्व की सिंधु घाटी सभ्यता में नील के व्यापार के साक्ष्य मिले हैं।  भारत के सौदागर मध्य एशिया में नील बेचते थे।  इसका पौधा भारत भूमि में सर्वत्र उगाया जाता  था।  एवं नील सभी प्रान्तों में बनाया  जाता था।  इससे कपड़ा और ऊन  रंगने की कला का विकास भी भारत में हुआ क्योंकि सूती कपड़ा बनाना भारतीय उद्योग था।
नील का पौधा इंडिगोफेरा कहलाता है और यह भारत भूमि का पादप है।   इससे नील  बनाना भारतीय अनुसंधान था। इसका व्यापार करनेवाला देश भी एकमात्र भारत था। इसीलिए इसका नाम  पशिमी भाषाओं में ” इंडिगो ” पड़ा।  अरबी भाषा में इसे  ” ए – नील ” के नाम से जाना गया।  वहां से ग्रीस पहुंचा तो इसका नाम पड़ा ” इंडिकन ” . ग्रीस के आगे जब यह रोम  पहुंचा तो इसका लैटिन रूपांतर हुआ  ” इण्डिकम ”. तत्पश्चात पूरे यूरोप और अंग्रेजी भाषा में इसे ” इंडिगो ” नाम से प्रसिद्धि मिली।
नील के व्यापार का इतिहास कितना पुराना  है यह तय करना आसान नहीं है।  थीब्स  के उत्खनन में ईसा से २५०० वर्ष पूर्व का एक वस्त्र पाया गया है इसके वैज्ञानिक परीक्षण से साबित हो चुका है  कि यह नील से रंगा गया था।  फारस में उत्खनन से प्राप्त एक कालीन ईसा से ५०० वर्ष पूर्व का है और इसकी ऊन नील से रंगी गयी थी।  हेरोडोटस ने ४५० ई ०पू ० में नील का  उल्लेख किया है।  इसके बाद मेसोपोटामिया से एक लेख- पट मिला  है जिसमे नील से ऊन को रंगने की विधि लिखी हुई है। तेरहवीं शताब्दी में मारकोपोलो ने भारत में नील बनाने की विधि अपने यात्रा वृत्तान्त में लिखी है।

नील बनाने की विधि
नील के पौधे को ” इंडिगोफेरा ” कहा जाता है।  यह और इसकी अनेक प्रजातियां , कुल ७५० , पूरे भारत और उसके आस पास के देशों में पैदा होती हैं। इसका वानस्पतिक वर्गीकरण  Fabaceae  family है।    इसकी फसल को समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है।  भारत के मैदानी क्षेत्रों में जहां वर्षा का बाहुल्य होता है ,नील का पौधा आसानी से उगता है।  इसके फूल लाल से गुलाबी रंग के होते हैं।  कई प्रजातियों में सफ़ेद और पीले फूल भी पाए जाते हैं।  यह एक झाडी है मगर कुछ प्रजातियां पेड़ के रूप में भी पाई जाती हैं। यह सदाबहार रहती हैं।  यह झाडी तीन से पांच फुट की ऊंचाई लेती है।  गर्मी की ऋतू में जब सब कुछ मुरझाया हुआ नज़र  आता है , इसकी फसल अपने पूर्ण निखार पर होती है।  मानसून आते ही यह फसल काट ली जाती है।  काटते ही नील बनाने की विधि शुरू हो जाती है। जो डंठल कट चुकते हैं उनको वैसे ही खेतों में छोड़ दिया जाता है।    क्योंकि यह पुनः हरे हो जाते हैं और सितंबर के महीने में दूसरी  कटाई संभव हो जाती है। कभी कभी एक ही पौधे से तीन बार कटाई संभव होती है एक साल में।
बंगाल में जब गंगा जी की बाढ़ उतर  जाती है तब नील के पौधों की बोआई की जाती है।  बाढ़ उतरने के बाद जहां जहां नरम मिटटी जम जाती है बीज छींट दिए जाते हैं।  इसे ” छिंटाई  ” कहा जाता है।  खेतिहर नावों में बैठकर नदी के किनारे किनारे दौरा करता है। जहां जहां खर पतवार दीखते हैं उनकी ” नियराई ” करता चलता है।  यह काम अनेक मेहनती हाथ माँगता है।  नील के खेत पांच पांच मील तक फैले होते हैं।  नील  बनाने के कारखाने भी इन्हीं खेतों में होते हैं।   कटाई के बाद पौधों के गट्ठड़ बाँध दिए जाते हैं और उनको डंडों की सहायता से लकड़ी के गहरे कूंडों में एकदम सीधा खड़ा किया जाता है।  ताकि उनको हवा लगती रहे।अब इन कठौतों में पानी भरा जाता है।  पौधे तीन चौथाई तक डूबे रहने चाहिए।  पानी के प्रभाव से यह फूलने  लगते हैं।  तीन  चार घंटे के बाद पौधे अपना रंग छोड़ने लगते हैं।  दस बारह घंटों की गलाई के बाद जो गाढ़ा द्रव निकलता है उससे नील बनाया जाता है।
यह द्रव झागदार होता है। जब झाग बैठने लगता है तब यह निश्चित हो जाता है की पौधे अपना सारा रंग छोड़ चुके हैं।  इस समय यदि इस द्रव की सतह पर माचिस जलाई जाये तो नीली  लौ फूटती है जो कई गज़ लंबी हो सकती है।  नील के कारीगर इस द्रव को सूंघकर और चखकर बता देते थे कि वह  तैयार हुआ या नहीं।  यदि इस समय वह  एक घंटा भी अधिक पानी में रह जाये तो उसका गुण  नष्ट हो जाता  है। इसलिए जैसे ही यह द्रव मीठा हो जाए और उनका रंग  नीला सा दिखने लगे उसे दूसरे कठौते में पलट दिया जाता है।  घसिया पौधा छानकर निकाल दिया जाता है। यह खाद बनाने के काम आता है।  कठौते बहुत वज़नी होते थे अतः द्रव को पिचकारी की सहायता से खींचकर निकाल लेते थे और घसिया वहीँ रह जाता था।  इस स्थिति में  इस द्रव में इंडोक्सिल नामक रसायन भरपूर होता है जिससे इसका रंग नारंगी से गहरा मेहंदी रंगा हो सकता है।
तीसरे चरण में इस द्रव को मथा जाता है।  श्रमिक डंडे लेकर कठौतों में उतर  जाते हैं और पूरी शक्ति से इसे  नीचे से ऊपर की ओर पतवार की तरह चलाते जाते हैं।  यह सबसे कठिन  काम होता है।  द्रव को जैसे जैसे हवा मिलती है ऑक्सिजन के प्रभाव से रंग निखरने लगता है।  ठोस कीच नीचे बैठने लगता है और निर्मल पानी ऊपर तिरने लगता है।  यह शुरू में झागदार होता है। झाग का रंग पहले नीला ,फिर सफ़ेद होता जाता है फिर एकदम गायब हो जाता है।  द्रव  का रंग भी पहले तीखा हरा फिर नीला हो जाता है।  तब चलाई डुलाई बंद कर दी जाती है और द्रव को जमने के लिए छोड़ दिया जाता है।  ऊपर के द्रव को उबाला जाता है ताकि और सड़ने की प्रक्रिया बंद हो जाये।  अब जो गाढ़ा घोल बच रहता है उसे दबा- दबाकर  निचोड़ लिया जाता है।  औ र जमा दिया जाता है.  ठोस हो जाने पर उसकी ईंटें बना ली जाती हैं। इसी समय फैक्ट्री का ठप्पा इन पर लगाया जाता है।  बांस के ताक बने होते है जिनपर इनको सूखने के लिए छोड़ दिया  जाता है। इनको धूल  से बचाने के लिएबार बार उलट पलट किया जाता है ताकि चारों तरफ से सूख जाएँ।
सूखी हुई ईंटों से उनकी गुणवत्ता तय की जाती है।  सबसे बढ़िया नील गहरे बैंगनी  रंग का होता है जिसमे तांबई झस मारती है।  रंग के आधार पर नील का वर्गीकरण ४० प्रकारों में किया जाता है।
नील के प्रयोग
नील रंगाई के लिए प्रयोग होता था।  भारत में कपास का जन्म हुआ और कपड़ा  बनाना सारे विश्व ने भारत से सीखा ।  सूती कपडे की सफेदी को निखारने के लिए नील के हलके घोल को काम में लाया जाता है।  क्योंकि कपास का असली रंग पीलापन लिए हुआ सफ़ेद होता है।   नील में अम्ल और क्षार की मात्रा मिलाकर विविध अन्य रंग बनाये जाते थे।  इसके अलावा   नील के औषधीय गुण अनेक थे।  यह रोगों के निदान में प्रयुक्त होता था।  इससे सूजन  को दूर किया जा सकता था।  इसलिए दांत के दर्द में इसका प्रयोग होता था।  न केवल भारत में बल्कि ग्वाटेमाला और केनिया में भी लोग इसकी डंडियाँ दातुन के रूप में इस्तेमाल करते थे।   नील से दर्द को मारा  जा सकता था अतः बुखार खांसी में और जहर को मारने में यह काम लाया  जाता था ,विशेषकर सांप के ज़हर को मारने के लिए।  चीन और मध्य अमेरिका में इससे बालों को रंगा जाता था।  आज भी यह आयुर्वेद में प्रयोग होता है।  भारत के आस पास के पूर्वी द्वीप राज्यों  में भी वैद्यों को इसके गुणों का पता था।  यहां सभी जगह नील का पौधा उगता था और नील बनाया जाता था। मगर यहां  यह व्यापारिक मद  नहीं था और यह वाणिज्य उद्योग नहीं था।  केवल भारत से ही इसके निर्यात के साक्ष्य मिलते हैं।

नील का प्रसार और व्यापार
भारत के उत्तर पश्चिम से वणजारे मध्य एशिया की ओर व्यापार के लिए जाते थे।  यह अधिकतर सिंध और सौराष्ट्र के मरुस्थल की गर्मी से उत्तर दिशा की ओर पलायन कर   जाते थे।  यह लोग आजीविका की तलाश में जाते थे परंतु अपने साथ अनेक वस्तुएं बेचने के लिए ले जाते थे। इनमे दवाईयां प्रमुख होती थीं।  सौराष्ट्र से मोती व नगीने ,हीरे जवाहिरात , सूती व  रेशमी कपड़ा ,हाथी दांत का बना सामान ,आदि कुछ उदाहरण हैं। पश्चिम में चूंकि नील की माँग विशेष थी यह नील प्रचुर मात्रा में निर्यात करते थे।

भारत से बाहर नील के  व्यापारी मध्य एशिया तक अपना माल पहुंचा देते थे।  तेरहवीं  शताब्दी में मारकोपोलो भारत आया उसी ने अपने वृत्तान्त में  लिखा है कि भारत से आनेवाले कारवों का अंतिम पड़ाव अरब मिस्र , दमिश्क ,फिनीशिया आदि देशों तक होता था।  इन देशों में  नीले रंग की खपत आयात से कहीं ज्यादा थी।  अतः इसके आगे नील का सफर बहुत कठिन कर दिया गया।  अरब और फारस ने नील पर बेहद ऊंचा निर्यात कर ठोंक दिया ताकि पूर्वी यूरोप के  व्यापारी  इसे न खरीद सकें।  फिर भी क्रूसेडर्स इसे मसालों के साथ साथ किसी तरह हासिल कर लेते थे।फिर सायप्रस और अलेक्जांड्रिया के रास्ते यूरोप में बेचते थे।    पर इसका दाम बहुत देना  पड़ता था।  अतः मध्य काल में नील यूरोप में बहुत कम मात्रा में पहुंचा।  जिसका परिणाम यह हुआ कि वोड नामक पौधे से बनाया नील यूरोप में अधिक बिकता था। मगर इसका रंग इतना शोख नहीं होता था।  यह पौधा मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप में पाया जाता था।  और इससे नील  बनाने की कला सदियों  से चली आ रही थी।  हजारों की आजीविका इसी पर निर्भर थी।
पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में पुर्तगाली वास्को-डि- गामा ने भारत आने का समुद्री रास्ता  ढूंढ लिया।  इसके बाद यूरोप के सभी राष्ट्र भारत आने लगे।  उनहोंने कर्णाटक और केरल से हज़ारों टन नील समुद्र के रास्ते अपने देशों में भेजा।  एक प्राचीन पत्र में लिखा मिलता है कि महाराष्ट्र के समुद्र तट  पर एक ऐसी मछली पाई  जाती है जो नीला रंग वमन करती है।  यह पत्र  वास्को डि गामा  के दोस्त ने अपने घर भेजा था।
शुरू शुरू में यह यूरोपीय  नाविक व्यापारियों से तैयार माल खरीद लेते थे मगर इनमें कई देशों के नाविक व्यापारी थे जिनकी  आपसी स्पर्धा बढ़ती गयी।  व्यापारिक मदों के कारण इनमे अनेक युद्ध भी हुए जिसके लिए इन विदेशियों ने  भारतीय राजाओं को निशाना बनाया। उनको मित्रता का झांसा देकर उनकी सेना और धन का उपयोग किया।  सभी यूरोपीय देशों में राजसी  शक्ति का प्रतीक नीला रंग था।  अतः सेना का परिधान नीला होता था।  इसके लिए  जरूरत थी नील की।  वोड का रंग इतना पक्का नहीं चढ़ता था।
इसलिए यूरोपीय  उपनिवेशों  में  १६वीं  शताब्दी में नील का पौधा भारत से बाहर ले जाया गया।  स्पेन ने १५६० ई ० तक हौंड्यूरॉस  और सेंट्रल अमेरिका में नील की फैक्ट्रियां जमा ली थीं।  इसके लिए भारत  से  कारीगर भी वहां ले जाये गए।  ग्वाटेमाला के निवासियों को नील बनाना आता था पहले से। वह  इससे अपने बाल रंगते थे।  १६०० ई ० तक  यूरोप में धड़ल्ले से उपनिवेशों  में बना नील बिकने लगा।  मगर फिर भी यह श्रम- प्रधान उत्पाद था। इसलिए इसका दाम सोने के भाव जैसा ही था।  सेना की वर्दी के लिए कोई भी भरौती  पर्याप्त नहीं होती थी।  वास्कोडिगामा के आगमन के १०० वर्ष  बाद भी भारत से  १२५००००० पाउंड नील यूरोप  भेजा  गया।
सत्रहवीं शताब्दी में फ्रांस के उपनिवेश सेंट डोमिंगो में बड़ी मात्रा में नील उगाया गया  और इसके माल की गुणवत्ता सर्वोपरि थी।  अंग्रेजों ने भी इनकी प्रतिस्पर्धा में जमैका में नील बो दिया।  इसके बाद १७४० ई ० में साउथ कैरोलिना में नील की फैक्ट्री शुरू की।  इसके लिए श्रमिक  भारत से ले जाए गए।  गर्मी की चिलचिलाती धूप में नील की कटाई और प्रक्रम किया जाता था।  अनेक दास बद इंतजामी और प्रताड़ना के कारण मर जाते थे।  नील की कीमत इतनी बढ़ी कि  १७५० ई ० आते आते अमेरिका में ” इंडिगो बूम ”  आ गया।  दाम इतने बढ़ने से नील की बोरी के बदले गुलाम खरीदे जाने लगे।  तराजू में एक ओर दास को बैठा दिया जाता था और दूसरी ओर नील उसके वज़न के बराबर तौल दिया जाता था। नील की खेती इतनी कठिन थी कि इसको ”  शैतान की आँख ” The Devil ‘s Blue Eye  कहा जाने लगा।     इसकी आमदनी इतनी बढ़ी कि इसने शक्कर को भी पीछे छोड़ दिया।  १०० वर्षों तक नील ने मंडियों पर राज किया।  १८५० ई ० आते आते रूई ने इसे मात दी आखिरकार क्योंकि कपड़ा बनाने की मशीनें बन गईं और रुई प्रमुख  व्यापारिक मद  बन गयी।

भारत में नील की खेती
यह सुनिश्चित हो चुका था कि भारत का नील सर्वोत्तम था।  इसके अलावा अन्य देशों से सस्ता बैठता था।  यूँ तो नील भारत के सभी भागों में उगता और बनाया जाता था मगर  उसकी गुणवत्ता और उत्पाद की मात्रा पर विदेशियों का कोई नियंत्रण नहीं था।गुणवत्ता और वज़न में   हर समय एक जैसा डिमांड के अनुसार नील उपलब्ध कराने में अंग्रेजों को दिक्कत आती थी।  बाहरी उपनिवेशों में यह समस्या हल कर ली गयी थी। भारत के नील के किसान और उद्योगपति उनकी नज़रों का काँटा बन गए थे। अंग्रेज उनको उखाड़कर अपना वर्चस्व नील पर जमाना चाहते थे।  खासकर बिहार में जहां सबसे अच्छा नील उगता था।
सन १७५७ ई ० में प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल में अंग्रेजों का बोलबाला हो गया।   अतः अंग्रेजों ने बंगाल के किसानों से माल उठाना शुरू किया। उनके तौर तरीके भारतीय ज़मींदारों  को नहीं भाये।  मगर नवाबों की दोस्ती का फायदा उठाते हुए सन १७७७ ई ० में लुई बोनार्ड नामक अंग्रेज ने नील की खेती शुरू की। उनका इरादा था कि यहां भी वह साउथ कैरोलिना की तरह नील के व्यापारिक उद्योग लगाएं।  उनको सैकड़ों एकड़ ज़मीन की तलब थी मगर यह संभव न हुआ।    नील से धन  का लाभ अधिकाधिक  था।  अतः अंग्रजों  ने किसानों को नील उगाने के लिए प्रेरित किया।  इसके  लिए किसानों  को एक  तरह  का क़र्ज़ देना शुरू किया जिसे ” दादोन ”  कहते  हैं।   मगर इस क़र्ज़ की शर्तें कुछ ऐसी थीं कि इसे उठानेवाला किसान कभी भी इसके चंगुल से उबर नहीं सकता था। ब्याज की दर इस कदर ऊंची रखी गयी थी कि मूल कभी वापिस ही नहीं हो पाता था।    मरने के बाद भी पुश्त दर पुश्त यह बरकरार रहता था।   यही ” बँधुआ मजदूरी ”  की शुरुआत थी ,जो आज तक गैरकानूनी होते हुए भी ज़िंदा है।
नील तैयार हो जाने पर उसकी बाज़ार भाव से जो कीमत होती थी ,उसका केवल ढाई प्रतिशत किसानों को दिया जाता था।  अतः उनको कोई लाभ नहीं था। अपने खाने के अनाज का  नुक्सान भी वह वहन  करते थे।    चूंकि  अंग्रेजों को इस खेती के लिए ज़मीन नहीं आवंटित की गयी।   ईस्ट इण्डिया कंपनी के चालाक  निवेशकों ने इसका एक आसान तोड़ निकाला।  नील के व्यापार में स्थानीय ज़मींदारों को मोटा लाभांश देना तय किया और उनसे कहा की वह अपने  किसानों को नील बोने  के लिए राजी करें।   बदले में अंग्रेज इन ज़मींदारों को विलायती शराब आदि से खुश करते थे और उनके संग पार्टियां करते थे।  ज़मींदारों ने अपने काश्तकारों को बाध्य किया कि वे उनको  बंटाई पर खेत तब देंगे जब वह अपने खेत के छठे हिस्से में नील उगाएंगे।   ऐसा न करने पर उन्हें १०० रुपये ” तवान ” देना पडेगा।  यह  गरीब किसान के लिए बहुत बड़ी रकम थी।  आज के हिसाब से करीब १० लाख रूपए सालाना।  इतना तो आज भी किसान नहीं दे  सकता।  इसलिए बेचारे बेगार में मेहनत  करते थे  और चाबुक भी खाते  थे  क्योंकि नील बेचकर जो पैसा आता था वह अंग्रेज ज़मींदार के संग बाँट लेता था।
यह अत्याचार अगले २०० वर्षों तक चला।  सिराजुद्दौला के पतन के बाद अंग्रेजों ने  ज़मीनो पर भी शनैः शनैः कब्ज़ा कर लिया।  १७८२ ई ० में १२०००  किलो नील बंगाल से इंग्लैंड भेजा गया।  इसकी गुणवत्ता इतनी अधिक थी कि नील के ठेकेदारों ने इस उद्योग पर अधिक से अधिक पैसा लगाना निश्चित किया।  तत्कालीन एक लेखक , एम एन  मैकडोनाल्ड  की रिपोर्ट  के  अनुसार —  आज की तारीख में हमारी नेवी ,पुलिस ,पोस्टमैन ,व आर्मी की सारी यूनिफार्म भारत के सबसे शुद्ध नील से रंगी जाती हैं क्योकि यह तरह – तरह के खराब मौसम और समुद्र के खारे पानी में भी बिगड़ता नहीं है।  अमेरिका में भी इसकी   इतनी ही मांग है  जितनी हमें।   रशिया , जर्मनी और इटली भी इसके बड़े ग्राहक हैं।   ——–  इस उद्योग में हजारों श्रमिक और हमारे नौजवान अफसर लगे हुए हैं।  केवल बिहार में ही हमारे £ ५००००००  लगे हुए हैं।  और ३७०  ००० एकर ज़मीन में खेती होती है।  खेतों और फैक्टरियों को मिला कर  १ ५०० ००० मजदूर दिन रात काम करते हैं जिन पर ७०० अंग्रेज अफसर हैं।  अंग्रेजों के अतिरिक्त प्रशासन में किसी और को नहीं रखा गया है।  यह लोग अपनी कचहरी में बहुत कठिन हिसाब किताब सुलझाते हैं।    मुकदमो का अंत नहीं है।  नए अंग्रेज अफसर आ तो जाते हैं मगर यहां की कठिनाइयों का उनको ज़रा भी अंदाज़ा नहीं होता है।  —-  .
नील के उद्योग में जो शारीरिक बल लगता है वह आधे पेट खानेवाले गरीब भारतीय  किसानों में नहीं था अतः १७८८ ई ० में अंग्रेजों ने वेस्ट इंडीज के  काले कद्दावर गुलामो को भारत मंगवाया।  १७९५ ई ० में  बंगाल से  ४३६८००० पाउंड शुद्ध नील इंग्लैंड भेजा गया।  १८१५ ई ० आते आते यह मात्रा बढ़कर ७६५०००० पाउंड हो गयी।  जो इंग्लैंड में ६ शिलिंग प्रति पाउंड के  हिसाब से बेचीं गयी। हालात ये थी कि भारत से निर्यात होनेवाली सभी वस्तुओं की जो आमदनी थी उसका ५०%  नील से मिल रहा था।
किसान को कुछ नहीं मिलता था।  अन्न का नुक्सान होता था.  फसल उगने पर  ज़मींदार बंटाई ले जाता था।  बेगार और भुखमरी के बाद चाबुक भी खाने पड़ते थे।  बाल बच्चे तक काम करते थे।  कर्ज़ अलग। तावान तो देना ही पड़ता था अगर नील न उगाया तो।  जिसकी दर बढ़ा दी गयी।
अंग्रेजों के पाप और लालच बढ़ता जाता था।  यूरोप में नील की खपत का लाभ उठाते हुए इनके एकाधिकारऔर हथकंडों  के कारण जर्मनी और फ्रांस ने नील का बहिष्कार कर दिया।  यूरोप में वोड से  नील बनाने का कारोबार सदियों पुराना  था।  भारत और  उपनिवेशों से आनेवाले नील ने यूरोपीय किसानों की आजीविका छीन ली। अतः इन देशों ने नील का विकल्प खोजना शुरू किया साथ ही वोड को प्रश्रय दिया।  इससे यूरोप में नील का दाम गिरने लगा।  वोड को प्रश्रय देने के लिए  यूरोपीय देशों ने कई बार ऐसे नियम बनाये जिनके अनुसार भारतीय पौधे से बने नील का बहिष्कार अनिवार्य कर दिया गया मगर यह नियम टिक न सके इसका कारण यह था कि वोड की रंगाई इतनी चटख और पक्की नहीं थी।
अंग्रेजों के बाज़ार पर एकाधिकार के कारण यूरोपीय देश जी जान से नील का सिंथेटिक यानि नकली रासायनिक विकल्प खोज रहे थे।  अंग्रेज इन्हीं देशों में चोर बाज़ारी से अपना माल  अधिक ऊंचे दाम पर बेचकर चौड़े हो रहे थे।  अतः यदि भारतीय किसान नील उगाने से मना करता था तो वे तवान वसूलते थे जिसकी दर और बढ़ा दी गयी।  नवाब अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली बन गया था।  सिराजुद्दौला को हराने के लिए अंग्रेजों ने उसके मंत्रियों,  मीर जाफ़र आदि  को तगड़ी  रिश्वत देकर उकसाया था।  अब उन्हीं को राज मिल गया था इसलिए वह  अंग्रेजों की ही सुनते थे।   ज़मींदारों को अंग्रेज नील के दाम में लाभांश देते थे ,इसलिए वह भी अंग्रेजों की सुनते थे और किसानों पर जुल्म करते थे क्योकि यह मुफ्त की आमदनी थी जो सीधे उनकी जेब में जा रही थी।
१८३३ ई ० में नवाब ने एक क़ानून बना दिया जिसके अनुसार अंग्रेज फैक्टरियों के मालिक अपने तरीके से किसानों से काम ले सकते थे।  बस फिर क्या था।  अंग्रजों के जुल्म ताबड़ तोड़ उन पर बरसने लगे।  किसान या तो फसल नष्ट करके भाग जाते थे या स्वयं को ही नष्ट कर देते थे।  अगर पकड़ लिए गए तो भी मौत ही उनको मिलती थी।  बंगाल भूखा  मर रहा था।  हारकर सं १८५९ ई ० में किसानों ने सत्याग्रह कर दिया।  किसानों को दबाने के लिए कंपनी के कारिदों ने हिंसा का तांडव खेला।  तिस पर क्रांतिकारियों ने ज़मींदारों के घर जला दिए। नील की फैक्टरियां जला दीं।  और बंगाल छोड़कर अन्यत्र भाग गए।  अनेक किसान मौत के  घाट  उतार दिए गए।
” नील दर्पण ”
इस क्रांति का सूत्रपात श्री दीनबंधु मित्रा के अजर अमर नाटक ,” नील दर्पण ” से हुआ।  इस नाटक में उन्होंने गरीब किसानों के जीवन संघर्ष का सही सही चित्रण किया।  तत्पश्चात यह नाटक गली गली खेला  गया।  इसने किसानों को आत्म संरक्षण की राह दिखाई।  उस समय इसकी लोकप्रियता इतनी अधिक हुई कि अनेको की मानवीयता ने अंगड़ाई ली।  उस समय के पादरी श्री जेम्स लॉन्ग ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद करवाया।  माइकल मधुसूदन दत्ता नामक व्यक्ति ने इसे अंग्रेजी में अनूदित किया और छाप दिया।  तिसपर इंग्लैंड में पाठकों की जबरदस्त प्रतिक्रया हुई।  अपने देशवासियों के वीभत्स कारनामे पढ़कर उन्होंने मुक्तकंठ भर्त्सना  की। ज़माना सामाजिक कुरीतियों को सुधारने का चल रहा था।  इंग्लैंड शराब के कुप्रभाव ,स्त्रियों और मजदूरों की दुर्दशा से लड़ रहाथा। अनेक उद्योगपति अंग्रेजी उपनिवेशवाद के खिलाफ बोल रहे थे इस सामाजिक जागृति के माहौल में नील दर्पण ने मानवीय चेतना को झकझोर दिया।  मगर भारत में  अंग्रेजी सरकार ने पादरी जेम्स लॉन्ग को जेल में डाल दिया।  यही नहीं , उनपर जुर्माना  भी लगाया।  तब तत्कालीन साहित्यकार ,श्री कालीप्रसाद सिन्हा ने अपनी जेब से २००० रुपये देकर उन्हें कारावास से मुक्त करवाया।  आज की मूल्यवत्ता के अनुसार करीब २ करोड़ रुपये।   कलकत्ता में उन्हीं दिनों एक थिएटर बना था ,दी नेशनल थिएटर।  उसमे पहला नाटक ,नील दर्पण दिखाया गया।

क्रांति की आवाज़ इतनी बुलंद हुई कि आम जनता भी किसानों के पक्ष में खड़ी हो  गयी।  अनेक ज़मींदारों ने उनका साथ दिया।  नदिया के बिस्वास बंधू ,  पबना से क़ादिर  मौला , और मालदा से रफ़ीक़ मंडल आदि इस क्रांति के नेता थे।  रामरतन मलिक नामक एक ज़मींदार भी अनेक ज़मींदारों के साथ मिलकर इस  क्रान्ति का साथ दे रहा था। श्री हरीश चंद्र मुकर्जी ने अपने  अखबार ,” The Hindu Patriot ”  दी हिन्दू पेट्रियट , में इन अत्याचारों का उल्लेख किया जिससे अंग्रेजों के मित्र ज़मींदार भी क्रांति का साथ देने लगे.  मुर्शिदाबाद , बीरभूम , पबना , बर्दवान आदि में विद्रोह की ज्वाला खूब भड़की।  नील दर्पण के प्रकाशन के बाद इंग्लैंड से ईस्ट इण्डिया कंपनी के  नील के व्यापारियों की इन्क्वायरी बैठी।  तब बंगाल सिविल सर्विस के मजिस्ट्रेट ई. डी .  लातूर ने अपनी गवाही इन्क्वायरी समिति को  देते हुए सं १८४८ ई ० में लिखा :—–
” इंग्लैंड पहुँचने वाली नील की एक भी पेटी इंसानी खून से मुक्त नहीं थी।  —  मैंने  अपनी आँखों से ऐसे अनेक किसानों को , जो मेरे मजिस्ट्रेट होने के नाते मेरे पास भेजे गए थे , देखा है जिनके शरीर बर्छियों से बींधे हुए थे।  मेरे सामने कई भारतीय किसानों को अंग्रेज मालिकों द्वारा गोली से मारकर गिरा दिया गया।  मैंने अपनी विज्ञप्ति में लिखा है कि कैसे अनेक किसानों  को पहले बर्छियों से गोंदा  गया और फिर उनका अपहरण करके गायब कर दिया गया।  ऐसा ही खून खराबे का सिस्टम नील के खेतों में चल रहा है।  ”
जब अपने ही लोगों ने अंग्रेजों को सरे आम उजागर किया तब ईस्ट इण्डिया कंपनी का  राज ख़तम कर दिया गया। भारत में रानी विक्टोरिया की नई बनी सरकार ने १८६० ई ० में ”  इंडिगो एक्ट ”  बनाया  जिसके अनुसार किसी भी किसान को उसकी मर्जी के खिलाफ नील उगाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता था।
जोगेश चंद्र बागाल के अनुसार किसानों ने कोई भी हिंसात्मक काम नहीं किया।  यह विद्रोह पूरी तरह सत्याग्रह था।  इसी कारण इसका असर हुआ और यह सफल रहा।  जबकि इसके  पूर्व १८५७ का ग़दर असफल रहा।  आगे चलकर गांधी जी ने इसी नीति को अपनाया जिसे असहयोग आंदोलन कहते हैं।  यही शुरुआत थी भारत के अहिंसात्मक  स्वतंत्रता संग्राम की।

नील का विकल्प — रासायनिक नील
यूरोपीय देश १८वीं शताब्दी से ही नील का रासायनिक विकल्प ढूंढ रहे थे। उनको अंग्रजों का विदेशी नील उगाकर अपने ही देशवासियों की आजीविका नष्ट करने की नीति नहीं  सुहाती थी।  इसके अलावा अंग्रेजों की बाज़ार नीतियां बहुत एक तरफ़ा थीं और वह अधिक से अधिक लाभ कमाने के चक्कर में मनमाना दाम वसूलते थे।  यह साबित हो गया था कि कोलतार से नीला रंग निकाला जा सकता है जो कपड़ों को रंगने के काम आ सकता है।    परंतु इसे सफलता नहीं मिली थी।  कोलतार से नील बनाने की प्रक्रिया चल रही थी जिसके फलस्वरूप   १८५६ में एक प्रकार की नीली डाई निकाली गयी थी।  इस प्रयोग को बड़े पैमाने पर लाने में और दस वर्ष लगे।   १८६५ ई ० में अडोल्फ वान बेयर में जर्मनी में सफल परिक्षण किया और  १८८० ई ० में  डाई ( रंग ) बना लिया।  इससे नील के व्यापार को फर्क पड़ने लगा।  मगर परीक्षण की सफलता ही काफी  नहीं थी।  बाज़ार में उसे उतारने के लिए गतिशीलता चाहिए थी।  ढेर मात्रा में डाई का उत्पादन हो नहीं पा  रहा था।
इक्तेफ़ाक़ से एक दिन लेबोरेटरी में जब कोलतार को उबाला  जा रहा था  , तापमान  चेक करनेवाल थर्मामीटर परीक्षक के हाथों से घोल में गिरकर टूट गया।  टूटने से अंदर का पारा घोल में बिखर गया।  उसकी रासायनिक प्रक्रिया से नीला रंग विलग होकर ऊपर आ गया।  यह एक ” सुखद दुर्घटना ”साबित हुई।  बेयर को अपना उत्तर मिल गया जिस रासायनिक माध्यम को  डाई बनाने के लिए वह ढूंढ रहा था वह अचानक उसे समझ में आ गया।  पारा यानि मर्क्युरी ही वह  माध्यम बना जिसने डाई को कोलतार से क्षण भर में अलग कर दिया।  इधर कपडे बनाने के लिए भी सिंथेटिक विकल्प ढूंढा जा रहा था।  आगामी समय में सिंथेटिक को रंगने के लिए नील या  वोड कमजोर साबित हुए।

नील और चंपारण
बिहार के चंपारण प्रदेश में नील की खेती खूब होती थी।  १८९७ ई ० में जब यूरोप में  नया नीला रंग बना , बिहार में ७००० वर्ग किलोमीटर ज़मीन में नील की उपज होती थी। पूरे भारत में इस काल में नील का पौधा २०,००००० एकर में बोया जा रहा था।   प्राकृतिक नील की  सालाना उपज १९००० टन हो गयी थी।  सिंथेटिक नील के बन जाने से यह उपज अगले २० वर्षों में घटकर केवल १००० टन आ गयी।  यद्यपि एक बार अंग्रेज मुंह की खा चुके थे फिर भी उनके  हथकंडे वैसे ही चलते रहे।  १८६० में इंडिगो कमीशन बन जाने पर यहाँ बैठे साकारी कारिंदों ने फिर से क़ानून बनाने का ढोंग रचा मगर नए अनुबंध की शर्तें पुराने ढर्रों से अधिक मारक थीं।   असल में इनके अनुसार किसानों की स्वतंत्रता कतई ख़तम कर दी गयी थी।  अतः किसान देश  छोड़ छोड़कर गिरमिटिया मजदूर बनने पर मजबूर हो जाते थे।  तावान की रकम बढ़ा दी गयी।  किसानों पर अत्याचार वैसे ही चलते रहे थे।  नील का दाम गिर गया था यूरोप में।  अतः भुखमरी  से व्याकुल होकर किसानों ने १९१४ ई ० में पिपरा में क्रांति कर दी।  क्रांति फ़ैलने लगी.  १९१६ ई ० में टुकुलिया में भी बगावत हो गयी।  अतः गांधी जी को वहां भेजा गया।  १० अप्रैल को चार वरिष्ठ  वकीलों को संग लेकर गांधी जी चंपारण गए यह चार वकील थे  , वृजकिशोर प्रसाद ,राजेंद्र प्रसाद , अनुग्रह नारायण सिन्हा , और आचार्य कृपलानी।
चंपारण में सत्याग्रह शुरू हो गया।  सिविल डिसओबेडिएंस यानि असहयोग आंदोलन।  गांधी जी ने यहां अपना आश्रम स्थापित किया।  इसमे अनेक मित्र और स्वयंसेवक एकत्र हुए।   इन लोगों ने एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जिसमे गाँवों की हालात का ब्यौरा था।  इसमे सभी अत्याचारों का उल्लेख किया गया और गाँव वालों की दुर्दशा दर्शायी गई।
गांधीजी को पकड़कर जेल में डाल दिया गया।  इससे सारा राष्ट्र स्तब्ध रह गया।  सब लोग गांधीजी के सहयोग में उठ खड़े हुए।  जनता का आक्रोश बढ़ने लगा।  अंततः गाँधी जी को  रिहा कर दिया गया और किसानों को उनकी ज़मीनो पर अपना नियंत्रण दे दिया गया।  साथ ही तवान  को समाप्त कर दिया गया। गाँधी जी को तबसे ही राष्ट्र पिता कहा जाने लगा और महात्मा  की  उपाधि दे दी गयी।
इसके ३० वर्ष के बाद भारतवर्ष अंग्रेजी राज से मुक्त हो सका।
आधुनिक काल में नील
नील का रंगाई पर से एकाधिकार ख़त्म हो चुका है।  सिंथेटिक डाई के आगमन से इसकी विश्व में खपत बहुत कम रह गयी थी।  इसे बनाने और उगाने में अधिकाधिक श्रम लगता  है और आज के युग में श्रम  की कीमत  बेहद ऊंची चुकानी पड़ती है। बहुत से सिंथेटिक कपडे या धागे नील से नहीं रँगे  जा सकते।  खासकर एसीटेट या नायलॉन। ऊँन  हो या प्लास्टिक की रस्सी  .पानी में घुलनेवाला नील बेकाम रहता है।  मगर इसके बावजूद नील की खपत में कोई फर्क नहीं आया है।  दुनिया भर में नीली जीन केवल नील से रंगी जाती है क्योंकि यह पक्की रंगाई हमेशा रहती है और धुप में खराब नहीं होती।  सफ़ेद कपडे की लोकप्रियता बनी रहेगी ,गरम देश  सूती कपडे के अलावा कुछ और नहीं पहन सकते। सूती कपडे को निखारने व् रंगने के लिए नील ही सर्वोत्तम है।  आजकल  सिंथेटिक कपड़ा गरीब और प्राकृतिक कपड़ा अमीर पहनते हैं।  अतः नील हमेशा रहेगा।  स्वास्थ्य की दृष्टि से नील का प्रयोग अनेक रोगों से दूर रखता है अतः इसके  रंगाई और छपाई में प्रयोग बढ़ा ने पर जोर दिया जा रहा है।  अलबत्ता अब सस्ता नहीं मिलेगा।

- कादंबरी मेहरा 


प्रकाशित कृतियाँ: कुछ जग की …. (कहानी संग्रह ) स्टार पब्लिकेशन दिल्ली

                          पथ के फूल ( कहानी संग्रह ) सामयिक पब्लिकेशन दिल्ली

                          रंगों के उस पार (कहानी संग्रह ) मनसा प्रकाशन लखनऊ

सम्मान: भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान २००९ हिंदी संस्थान लखनऊ

             पद्मानंद साहित्य सम्मान २०१० कथा यूं के

             एक्सेल्नेट सम्मान कानपूर २००५

             अखिल भारत वैचारिक क्रांति मंच २०११ लखनऊ

             ” पथ के फूल ” म० सायाजी युनिवेर्सिटी वड़ोदरा गुजरात द्वारा एम् ० ए० हिंदी के पाठ्यक्रम में निर्धारित

संपर्क: यु के

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