नन्हीं बुनकर

नन्ही सी बुनकर थी वो
गुड़िया की चोटी गूँथना सीखने से पहले ही
सपने बुनना सीख लिया था उसने
छोटे छोटे सपनों को
शब्दों के फंदे
डाल कर आराम से बुन लेती थी
और किताब के पन्नों में
सहेज कर रख लेती
फिर जब माँ का हाथ बँटाने लगी
घर के कामों में
कपड़े तहाते हुए सीख लिया उसने
सपनों की सलवटें हटाना और
चपोत कर रखना सम्भाल कर
जब उसने उड़ना सीखा
अरमानों को खुले आकाश में विचरने
की आजादी दी
उसके सपने भी उड़ चले
क्षितिज छू छू कर आते
किरणों को अलग अलग रंगों में बाँटकर देखते
और भिन्न भिन्न रंग में रंगने लगे
अपने विचारों के कैनवास को
जगमगा उठे अब सपने उसके
जब किसी की संगिनी बनी
सपनों की पिटारी साथ लेती आई
उसकी हर मुस्कान बुन देती कोई नया सपना
हर उमंग रंगने लगी सपनों के आसमां को
वो नन्ही सी बुनकर छुपकर
बैठी रही दिल की परतों में
हर लड़की की तरह
उसकी जिन्दगी भी धूप छाँव
से गुजरकर चलती
कभी कोई चुभन कोई खरोंच
उलझा देती उसकी बुनाई को
फिर कई कई दिन उलझी ही रहती वह
सुलझाए नहीं सुलझते फंदे
जब भी पलकें भारी हुईं उसकी
टूट कर गिरने लगते नाजुक सपने
लपकना चाहती उन्हें कभी
कभी यूँ ही गिरने देती
सधे हाथों वाली वह
मजबूत हौसलों वाली वह
नित्य नए सपने बुनने वाली वह
खोलकर देखना चाहती है
सपनों की उस पिटारी को
जो उसकी जन्म भर की कमाई है
कहाँ कुछ चाहती है वह
बस इतना ही तो
कि उसके सपनों को किसी की नजर न लगे..
 - शशिबाला
मैं अवकाश प्राप्त स्टेट बैंक अधिकारी हूँ ।कविता लेखन में रुचि रखती हूँ ।मेरी दो पुस्तकें (कविता संग्रह) प्रकाशित हुई हैं.।दोनों अमेजन एवं फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>