नज्म – रज़िया रागिनी ‘समर’

जाने वो क्यूं मुझसे ख़फा रहता है,

जब भी मिलता है रूला देता है,

शिकायतें कम ही नही होती उसकी,
हर बार एक नया ज़ख्म देता है,
अपनी हर एक दुआ में उसी को चाहा है मैंने,
वो मेरी मुहब्बत का ये सिला देता है,
अक्सर दिल की बात कहती हूँ उससे,
 मेरी बातों को हवा में उड़ा देता है,
हर आहट पर अब भी नज़र रहती है,
कोई कैसे यूं अपनों को भुला देता है,
अल्लाह उसे भी मेरी मुहब्बत का एहसास करा दे ,
सुनते हैं जो मांगो  तू ज़रूर देता है ।
- रज़िया रागिनी ‘समर’
रेडियो और टीवी से जुड़ी  हूँ ।
संगीत के घराने से ताल्लुक है तो संगीत मुझ में भी है।
लिखने पढ़ने का बचपन से लगाव रहा है ।
जो मुझ में,और मेरे आसपास घटता है उसे अपनी ज़बान में पन्नों पर उतारने की कोशिश करती हूँ ।
अभी व्यक्तिगत परामर्शदाता की वजह से लोगों से जुड़ी हुई हूँ और उनकी परेशानी से  निकलने में उनकी मदद करने की कोशिश करती हूँ ।
रेडियो और टीवी पर नज़्में प्रसारित हुई हैं,कई मंचो पर भी अपनी नज़्में कही हैं ।

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