धज्जियाँ मेरे बहु-उपयोगितावाद की

 

जिन दिनों मैं (उदासीन और शायद अनिच्छुक) विद्यार्थियों को पढ़ाने का पुनीत कार्य करता था, उस दौरान मल्टी-टास्किंग, मल्टीपल-यूज़ जैसे विषय भी पढ़ाने में आजाते थे। देखा जाय तो उस विषय को पढ़ाने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि उन्हें मल्टी-टास्किंग का बड़ा अच्छा अनुभव पहले से ही था। नोट्स लेने के साथ साथ कोई मेरा कार्टून बनाता था, कोई आँख बचा कर शुद्ध मन से गुप्त पवित्र उपन्यास या सचित्र पत्रिका पढ़ता रहता था, कोई काग़ज़ के मानव-रहित ‘ड्रोन’ बना कर आगेवाले विद्यार्थियों पर हमला करता रहता था, कोई अपनी गर्लफ्रैंड को सन्देश भेज रहा होता था, वगैरह। खैर, फिर भी मेरा कर्तव्य था कि सिलेबस पूरा करने के अपने दायित्व के वशीभूत मैं उन्हें बतलाऊँ कि अर्थशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में एक चीज़ के कैसे, कितने अधिक उपयोग हो सकते हैं, किस तरह एक साथ कोई कितने अधिक काम निपुणता से कर सकता है, या एक व्यक्ति कितने विभिन्न कामों के लिए उपयोगी हो सकता है, आदि। उदाहरण के लिए मैं बताता था कि जहाँ संभव हो, किस तरह एक ही बाँध को सिंचाई, बिजली उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, पेय-जल आपूर्ति वगैरह जैसे बहु-उपयोगी, बहु-उद्देश्यीय, मल्टीपल-यूज़ के लिए उपयुक्त बनाया जा सकता था।

कई वर्षों के बाद जब अध्यापन के पुण्यमय कार्य से अलग होकर एक संस्थान से जुड़ने का दुर्भाग्य प्राप्त हुआ, तब किसी दफ़्तरी सिलसिले में मुझे कुछ दिनों के लिए एक विभाग में इंग्लैण्ड जाना पड़ा। वहाँ हवाईअड्डे पर मुझको लेने एक सभ्य सा व्यक्ति आया जो खुद कार चला रहा था, अपने दफ़्तर के कार्य क्षेत्र के बारे में चर्चा कर रहा था, और रास्ते की ख़ास इमारतों के इतिहास के बारे में गहराई से बताता भी जा रहा था। खासा आश्चर्य हुआ जब यह पता चला कि वह उस विभाग का ड्राइवर था। थोड़े दिनों बाद मैंने उसी आदमी को विभाग के गैराज में गाड़ियों की मरम्मत करते देखा, एक-दो दिन बाद वह सामान इधर उधर लेजाते लाते नज़र आया, उसके कुछ दिनों के बाद वह लॉन में मशीन से घास काटता दिखाई दिया और एक दिन ट्रैक्टर में लगे डम्पर से मिट्टी और मलबा हटाता हुआ भी दिखा। मैं तब सचमुच बड़ा प्रभावित हुआ था। मानव-संसाधन के बहु-उपयोगी नियोजन का प्रैक्टिकल, व्यावहारिक वास्तविक उदाहरण मुझे देखने को मिला था।

वहाँ से लौटने के बाद अपने दफ़्तर में मैंने भी चपरासियों और ड्राइवरों को इसका उदाहरण देते हुए उनकी स्किल बढ़ाने के लिए कई भाषण दिए और हर एक को इसी दिशा में सब तरह के काम करने के लिए प्रेरित किया। जैसे, ड्राइवर सुबह अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद बैठ जाने की बजाय दफ़्तर की फ़ाइलें वगैरह पहुँचा सकता है, चपरासी भी कमरों में चाय सर्व करने के साथ साथ फ़ाइलें भी ला सकता है, माली की गैरहाज़िरी में चपरासी क्यारियों और लॉन में पानी डाल सकता है, ड्राइवर या माली किसी चपरासी के न होने पर चाय वगैरह बना सकता है और अफ़सरों का खाना गरम कर सकता है, आदि।

नतीजा हर मायनों में विस्मयकारी निकला।

बहुत जल्दी ही फ़ाइलों में से कागज़ों की बजाय शाक सब्ज़ियों की सुगंध आने लगी और कुछ दिनों में तो वे पूरी तरह रंग बिरंगी ही हो गयी थीं। उसके अलावा कमरे में दाखिल होते ही पता लग जाता था कि कोई आज लहसुन प्याज़ वाली आलू की सब्ज़ी या आम का अचार लेकर आया है। साहब लोगों के साथ साथ अक्सर फाइलों और ज़रूरी काग़ज़ातों को भी भरपूर चाय पिलाई जाने लगी। कभी जब फ़ाइलें पैट्रोल या इंजन के तेल से सनी होती थीं या उनमें कोई पेंचकस अटका होता था, तब पता चल जाता था ड्राइवर ने आज अपनी बहु-उपयोगिता का परिचय दिया है। कुछ फ़ाइलें तो माली की मल्टी-टास्किंग के दौरान लॉन काटने की मशीन की भेंट ही चढ़ गईं। गरज़ ये कि पूरी उपस्थिति होने के बावजूद सब लोग अपना ‘मल्टीपल-यूज़’ सिद्ध करने के लिए अपने काम की बजाय एक दूसरे का ही काम करते दिखाई देने लगे, जिसमें उनके अपने बिलकुल अलहदा तरह के काम का मिश्रण भी होता था जिसे मिलाना दफ़्तर की तंदुरुस्ती के लिए हानिकारक हो सकता था। कहना न होगा कि बहुत जल्दी ही सब कर्मचारियों को अपने अपने निर्धारित कामों को करने का ही आदेश निकालना पड़ा।

लेकिन तभी मुझसे जो सबसे बड़ी आपराधिक किस्म की भूल हुई थी वो ये थी कि इंग्लैण्ड के अपने उस तथाकथित बहु-आयामी, बहु-उद्देश्यीय, बहु-उपयोगितावादी, वस्तु और व्यक्ति के बहु-उपयोगी नियोजन के अनुभव को मैंने घर पर भी पत्नी और बच्चों के साथ साझा कर लिया था। बाद में मुझे महसूस हुआ, कम से कम पत्नी के मामले में तो यह नितान्त अनावश्यक था। इस विधा में वैसे ही मेरी पत्नी का कोई मुक़ाबला नहीं था। एक ही चीज़ को कितनी तरह बनाया जा सकता है, या एक ही चीज़ कितनी अधिक वैराइटीज़ का स्वाद पैदा कर सकती है यह व्यावहारिक रूप में दिखा सकने में उसमें उसकी मास्टरी थी। मुझे याद है, शादी के तुरंत बाद उसे मैंने बताया था मुझे सुबह किस तरह से बनाई गई चाय अच्छी लगती है। उस दिन का दिन है और इतने वर्षों बाद आज का दिन है, हर रोज़ मुझे चाय का अलग स्वाद मिलता है। कभी चाय ऐसी कड़क कि पहली घूँट के बाद ही आदमी तो आदमी, उसके सिर के बाल भी उठ खड़े हों, कभी ऐसी कि श्रीखंड की कमी भी महसूस न हो, कभी ऐसी कि जैसे साहब को तंदुरुस्त बनाने के लिए महरबानी करके दूधिया मुफ़्त में आधा लीटर दूध ज़्यादा दे गया हो, कभी आल इन वन, कभी ऐसी कि खून ग्लूकोस को तरसने लगे, और कभी ऐसे जैसे बाज़ार में लंबे चले दंगों के दौरान अचानक हर चीज़ का अकाल आगया हो। चाय बनाने के जितने परम्यूटेशन कॉम्बिनेशन एक गणितज्ञ सोच सकता है, उससे ज़्यादा कॉम्बिनेशन्स से चाय बना कर मेरी पत्नी अब तक मुझे पिला चुकी है। शुरू शुरू में तो मैं प्रेमवश कुछ नहीं कहता था, उसके बाद संकोचवश कुछ नहीं कह पाया और अब भयवश कुछ नहीं कह सकता हूँ। हालिया स्थिति यह है कि जिस नई रैसिपी की भी चाय मिले वैसी ही पी लेता हूँ और बदले में उसको ‘अच्छी’ चाय बनाने के लिए धन्यवाद भी देता हूँ।

पत्नी की यह विलक्षण क्षमता केवल चाय तक ही सीमित नहीं है, एक सुघड़ गृहस्थ नार भोजन बनाने में एक ही व्यंजन को कितनी तरह से अलग अलग स्वाद में बना सकती है, उसका भी वह नायाब मुजाहिरा पेश करती है। जादूगर की तरह कभी दाल में पानी भाप बना कर इस क़दर उड़ा देती है कि वह सब्ज़ी के ठोस रूप और स्वाद में तब्दील होजाती है, कभी म्युनिसिपल्टी की अभूतपूर्व कर्मठता और दया से अगर नल में पानी आगया तो बाल्टियों और बर्तन-भांडों के साथ साथ वह सूखी सब्ज़ी में जल का भरपूर संचय करके दाल का अभाव ही महसूस नहीं होने देती और कभी रसम की तारीफ़ करते वक़्त पता चलता है दरअसल वह दाल है। इसी तरह चपाती भी हर रोज़ अलग अलग रंगों और स्वादों में होती है – कभी कृष्ण स्वरूप, कभी धवल उज्ज्वल, कभी पापड़ की तरह, तो कभी इतनी नरम कि लगता है तवे पर रख कर उसको किसी तरह की कोई यंत्रणा या पीड़ा नहीं पहुंचाई गई है। खाने की मेज़ पर तो भोजन से पहले हर रोज़ हमारा ‘सब्ज़ी-सब्ज़ी’ नामक पहेली का कार्यक्रम आयोजित होता है जिसके अन्तर्गत देख कर और चख कर यह अनुमान लगाना होता है कि आज यह कौन सी सब्ज़ी बनी है। ज़ाहिर है मुझे हमेशा हार का मुंह देखना पड़ता है। पर एक अच्छे पति की तरह मैं भी अपनी पत्नी से लगातार प्रेम करता आया हूँ और उसकी मौलिक क्रिएटिविटी और अद्भुत रचनात्मक शक्ति पर विस्मय के साथ साथ प्रशंसा और गर्व भी करता रहा हूँ।

मेरे उस उदाहरण से प्रेरणा लेकर बच्चे भी अपनी तीव्र बुद्धि का परिचय देते हुए मल्टिपल यूज़ के क़ाबिले-तारीफ़ प्रयोग करने लग गए थे। उन्होंने ही अपनी मम्मी को सलाह दी थी कि मेरी टी-शर्ट में नीचे की तरफ़ एक ज़िप चेन लगवा ली जाये ताकि उसका इस्तेमाल पापा के द्वारा पहने जाने के अतिरिक्त सब्ज़ी लाने के लिए भी किया जा सके। इस विवेकपूर्ण बहु-उद्देश्यीय उपयोग का पता मुझे एक दिन अचानक तब चला जब भूल से चेन बंद रह जाने के कारण तरह तरह से घुमा कर कोशिश कर लेने के बावजूद मुझे टी-शर्ट पहनने में तकलीफ़ आई। अंत में उस टी-शर्ट को पूरी तरह थैले में बदल देने में ही उसका सार्थक उपयोग पाया गया। बच्चों ने मेरी फ़्रेम में मढ़ी जवानी की फ़ोटो का दीवार पर टंगी रहने के अलावा एक और उपयोग सोच निकाला था। उसको खूँटी से उतार कर वे बाहर ले जाते थे और मेरी आँख को लक्ष्य करके टॉयगन से सही निशाना लगाने की प्रैक्टिस करते थे। एक दिन तो मेरे खुद के बहु-उपयोगिता परीक्षण के लिए उन्होंने मेरे सर पर बोतल रख कर उस पर नई नई खरीदी गई छर्रों वाली पिस्तौल से निशाना लगाने की ख्वाहिश भी ज़ाहिर कर दी। अन्य ऐसे बहुउद्देश्यीय प्रयोगों के अंतर्गत फ़्रिज के अतिरिक्त उपयोग के लिए गर्मी के दिनों में बाहर धूप में निकलने से पहले ठन्डा करने के लिए कुछ देर के लिए कमीज़ निकर उसमें रखना, टेलीफ़ोन की केबल्स का रस्सी कूदने जैसे स्वास्थ्यवर्धक या कपड़े सुखाने जैसे बहु-उपयोगी आवश्यक कार्यों के लिए इस्तेमाल, दोपहर में मेरे दफ़्तर में होने के दौरान कम्प्यूटर के माउस के साथ पड़ौस में रहने वाली पत्नी की एक सहेली के छोटे बेटे का घसीट घसीट कर चूहा-बिल्ली और गाड़ी-गाड़ी खेलना, मेरे द्वारा दोस्तों से कबाड़ी गईं, इधर उधर से चुराई गईं, या जी पर पत्थर रख कर अपवाद स्वरूप खरीदी और बड़े यत्न से संजोयी गईं किताबों के पन्नों का अक्सर हवाई जहाज़ों और कश्तियों की शक्ल में या बच्चों के टिफ़िन में परांठा-अचार लपेट कर रखे जाने के लिए पेपर नैपकिनों की तरह बहु-उपयोग में दिखाई देना, आदि शामिल हैं।

गरज़ ये कि ये सब काम खुले आम, बड़े संतोष और गर्व के साथ संपन्न किये जाते हैं, साथ में यह बताते हुए कि अर्थशास्त्र की दृष्टि से किस तरह किसी वस्तु का उपयोग विभिन्न कार्यों के लिए किया जा सकता है ताकि उस काम के लिए दूसरी वस्तु खरीदने की आवश्यकता ही न पड़े!

जिस तरह मुंह से निकली बात, बन्दूक से चली गोली और टूथपेस्ट से निकली पेस्ट वापस नहीं डाली जा सकती, मुझे बेहद अफ़सोस है, मुझ द्वारा नासमझी में हांक दी गयी डींग भी निरस्त नहीं हो सकती। अपने ज्ञान का बहु-उपयोगी हश्र तो मैंने देख लिया, मेरे लिए अब जो कुछ बाकी बचा है वो ये देखना है कि इन प्रतिभाशाली व्यक्तियों के द्वारा आगे घर की किन किन चीज़ों का बहु-उपयोगी इस्तेमाल का आविष्कार होना शेष है!

- कमलानाथ

कमलानाथ (जन्म 1946) की कहानियां और व्यंग्य ‘60 के दशक से भारत की विभिन्न पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। वेदों, उपनिषदों आदि में जल, पर्यावरण, परिस्थिति विज्ञान सम्बन्धी उनके लेख हिंदी और अंग्रेज़ी में विश्वकोशों, पत्रिकाओं, व अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में छपे और चर्चित हुए हैं। हाल ही (2015) में उनका नया व्यंग्य संग्रह ‘साहित्य का ध्वनि तत्त्व उर्फ़ साहित्यिक बिग बैंग’ अयन प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है तथा एक कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन है।

कमलानाथ इंजीनियर हैं तथा अंतर्राष्ट्रीय सिंचाई एवं जलनिकास आयोग (आई.सी.आई.डी.) के सचिव, भारत सरकार के उद्यम एन.एच.पी.सी. लिमिटेड में जलविज्ञान विभागाध्यक्ष, और नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टैक्नोलोजी, जयपुर में सिविल इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफ़ेसर पदों पर रह चुके हैं। जलविद्युत अभियांत्रिकी पर उनकी पुस्तक देश विदेश में बहुचर्चित है तथा उनके अनेक तकनीकी लेख आदि विभिन्न राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं व सम्मेलनों में प्रकाशित/प्रस्तुत होते रहे हैं। वे 1976-77 में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय (अमरीका) में जल-प्रबंधन में फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन फ़ैलो रह चुके हैं। विश्व खाद्य सुरक्षा और जलविज्ञान में उनके योगदान के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय सम्मान भी मिल चुके हैं।

वर्तमान में कमलानाथ जलविज्ञान व जलविद्युत अभियांत्रिकी में सलाहकार एवं ‘एक्वाविज़्डम’ नामक संस्था के चेयरमैन हैं।

 

One thought on “धज्जियाँ मेरे बहु-उपयोगितावाद की

  1. एक अत्यंत प्रतिभावान व्यंग्यकार की इस रचना से पत्रिका को चार चाँद लग गए हैं| गुदगुदाने वाली बेहतरीन रचना के लिए संपादक और लेखक दोनों को बधाई|

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