द्वन्द् बोध

अमर मुसकान
अलभ वरदान!
जीवन की अतृप्त पिपासा
मृदु कलिका पर तुहिन-निराशा
सौरभ झड़ते मधुवन में
दावानल का ज्यों प्रवासा
प्रलय-आह्वान कि भैरव-गान
सतत मुस्कान अलभ वरदान ।

अमर मुसकान सुलभ वरदान
मानव का आधार पुरातन
मानव का है धर्म सनातन
सतत साधनामय,गौरवमय
युग-युग से है उसका जीवन
कर्मक्षेत्र यह,चिर परिवर्तन
जीवन सुरव- दुःख का आवर्तन
कमी मुसकान,कमी दुःख दान
कहीं आदान, कहीं प्रतिदान ।

अमर मुसकान, अळम वरदान
छिपा प्रळय में कौन विहंसता
मानव का यह गान नहीं
अट्रटहास नर्तित मूधर का
सर्जन का अभियान नहीं
सृष्टी बनी ही दुःख का कारण
हंसना इसका शान नहीं
इसे कहूं क्या श्राप? किंतु यह
कहळाता वरदान नहीं ।

कहां मुसकान, कहां वरदान
अमर मुसकान, अळम वरदान ।

जीवन के इस कोळाहळ में
आत्मशुद्धि का कर आह्वान
चिंगारी से ज्वाळा बन कर
अरिवळ विश्व का कर कल्याण
चिंगारी आ आत्म बोघ से
रवोए मानव का उपधान
पीडित जग का सकल वेदना
क्षण भर में हरले पहचान

अमर मुसकान सुलभ वरदान ।
- जगत आत्मा

 

कवि ‘जगत आत्मा’ की संक्षिप्त परिचय:

मैं बिहार (भारत) के एक दूरदराज के आरा शहर में पैदा हुआ था. मेरी प्रारंभिक शिक्षा अपने मातृ भव्य पिता (नाना) द्वारा प्रदान किया गया था. में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) भारत में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध संस्था से स्नातक किया. इसके बाद मैं एक स्थानीय उच्च अंग्रेजी स्कूल में एक विज्ञान शिक्षक के रूप में शामिल हो गए. इसके बाद मैं सरकार सेवा में शामिल हो गए और 1990 में सेवानिवृत्त हुए.

इस अवधि के दौरान मैं पढ़ना, लेखन और महत्वपूर्ण सामग्री के संग्रह के रूप में अच्छी तरह सहित शौक के विभिन्न प्रकार में लगी हुई थी. मैं खेल, चित्रों, और अतिरिक्त पाठयक्रम गतिविधियों में अपनी रुचि दिखाई. मैं हिंदी और अंग्रेजी के रूप में अच्छी तरह की कहानियों और निबंध में कई कविताएं लिखी है. 

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